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असफल तुर्किश कू और सूर्या का विभाजन

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असफल तुर्किश कू और सूर्या का विभाजन-

– शालिनी और श्री किडाम्बि

भूरणनीतिक नतीजे
और भारत के लिए निहितार्थ
रिरियाते रहे साम्राज्यवादी लुटेरे सामंत और फ्री मेसन जब सुल्तान, खलीफाओं सायरस के उत्तराधिकारियों और जार ने खोला हार्ट लैंड के लिए सड़क मार्ग

क्या भारत दुनिया भर की समस्याओं को पार कर पायेगा या लुक ईस्ट होगा चीन के नाम और भारत बनेगा फ़िल्मी मनोरंजन का ठिकाना?
उत्तरी कोरिया के संकट का दौर है, साथ ही भारत की बौद्धिक विसंगति का भी, जो आज भी अंग्रेज के कठपुतली नेताओं में मसीहा तलाश रही है| हमारे राजनेता के दुःख का ज्यादा बड़ा सबब ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने डिनर में क्यों नहीं बुलाया! राजनेता भी ऐसे जो महज राष्ट्रपति के साथ डिनर भर के लिए अमेरिका से बन्दर के खिलौनों जैसे हथियार खरीद लाते हैं| हाल ही में एक बड़ी घटना हुई जिसके परिणाम और निहितार्थ बहुत दूरगामी और गहरे हैं| तुर्किश कू के फेल होने के बाद टर्की के सुल्तान ने ओटोमन आदर्शों की तरफ रुख किया, यह कदम यू टर्न जैसा है, और इसका मकसद साझेदारी है| टर्की के इस कदम से इंसानियत की किस्मत में लिखी तरक्की अमन और खुशहाली बिगड़ भी सकती है और बन भी|

इस घटना के नतीजे और निहितार्थ को सभी देशों के जानकारों ने अलग अलग नाम दे डाले| हिंदुस्तान के अलावा सभी ने सामझा और महसूस किया कि इस घटना से दुनिया क्या रुख लेगी| लेकिन हमेशा की तरह भारत ने वाशिंगटन में बयान दिया कि वे आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के साथ हैं| क्या भारत यह भूल गया कि वे जिहादी आतंकी समूह मिडिल ईस्ट के कठपुतली राज्यों के लिए किराये के टट्टू ही तो हैं जिन्हें सीआईए और पेंटागन ने तैयार किया! इसके साथ ही साथ दो बड़ी घटनाएँ और हुई, जो इससे अलग, ज्ञान और विद्वता की प्राचीन विरासत के उषाकाल की संकेत जैसी हैं|

यह दौर मोबाइल युद्ध प्रणाली का है, लेकिन आधुनिक सॅटॅलाइट और सूचना तकनीकी युद्ध कौशल के छठे दौर में भी शास्त्रीय युद्ध प्रणाली का अपना महत्त्व है| इस दौर में भी शास्त्रीय युद्ध प्रणालियों में मोंटगोमरी का सिद्धांत भारत के अलावा सभी देशों में पढ़ा जाता है, मोंटगोमरी के साहित्य में मौजूद पेशवा बाजीराव के पलाखेड की कुशल युद्धकला का अक्सर जिक्र होता है| इसी युद्ध की तर्ज पर सीरियन और उनके इलीट टाइगर फोर्सेज ने हिजबुल्लाह के साथ मिलकर अद्वितीय प्रदर्शन किया| उन्होंने दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने वाली अमेरिकी सेना को अल तनीफ सीमा पार करने से रोक दिया| उन्होंने बिजली की फुर्ती के साथ सौ किलीमीटर रेगिस्तान पार किया, अल तनीफ़ को नाकाम किया, इसको घेरकर इराक सीमा की पॉपुलर मोबिलाइजेशन यूनिट के साथ जोड़ दिया| ऐसा करने के साथ साथ उन्होंने न सिर्फ सीमा की सुरक्षा की बल्कि डमस्कस बगदाद इंटरनेशनल हाईवे को भी खोल दिया| अमेरिकियों ने इसे सामान्य प्रक्रिया कहा और दावा किया कि अमेरिकी खुफिया को इसकी जानकारी थी लेकिन उनके लिए ये एक अचम्भा था| दूसरे जानकार मानते हैं कि यह अन्तराष्ट्रीय आतंक के प्रायोजकों की सीरिया में एक करारी हार थी| इससे सीरियन युद्ध के अंत की शुरुआत हुई, साथ ही सीरिया का तीन हिस्सों में पूर्व नियोजित विभाजन सुनिश्चित हुआ| ऐसा होने से लम्बे समय से बंद पड़ा डमस्कस बगदाद इंटरनेशनल हाईवे भी खुल गया|

इसरायली और अमेरिकियों की तरह बहुत से लोग यह दावा करते हैं कि इस युद्ध की योजनाकारी को हिजबुल्ला या सीरिया ने नहीं बल्कि रुसी सेना ने अंजाम दिया जो इस पूरे अभियान में सीरिया के साथ रही| डेइराज़ुर पर ईरानी मिसाइल फायरिंग हुई, उसके के बाद सीरियन सेना ने वहां लगातार बमवर्षा जारी रखी की, ताकि अमेरिकी और सहयोगी सेना को उलझाया जा सके, यह अमेरिकी और सहयोगी सेना का ध्यान भटकाने की एक कुशल और कारगर रणनीति रही जिससे सीरियन सेना अल तनीफ सीमा के पास जाकर इराकी सेना के साथ जुडी और डमस्कस और बगदाद हाईवे को खोल दिया|

लेकिन ग्रेट गेम के वरिष्ठ प्रायोजकों ने महसूस किया कि युद्ध भूमि में हुई तकलीफें तमाम मीडिया में प्रकाशित नहीं हुई हैं, तत्काल उन्होंने रिपोर्टिंग कम से कम करने, भ्रमित करने और लीपापोती करने के लिए कॉर्पोरेट नियंत्रित बिकाऊ पत्रकारों को काम पर लगा दिया| इसी साथ कदम के मद्देनजर अपनी तैयारी और योजनाकारी में जुट गए| इनमे से ईरान का आतंकी हाईवे, भूमध्यसागर में ईरान की स्थायी मौजूदगी मुकम्मल करना, ईरान-लेबनान-टर्की का भूमार्ग या लेबनान के शिया कट्टरपंथियों खास कर हिजबुल्लाह को ईरान से हथियार पहुँचाने का रास्ता या ईरान का लैंड ब्रिज बनाने के कुछ अहम् मामले हैं|

साथ ही साथ वो लोग तमाम दूसरे अल्फ़ा नुमेरिक जिहादी समूह उगाने लगे जिन्होंने अचानक से यह घोषणा की कि इस हाईवे पर शिया समुदाय की मौजूदगी बर्दाश्त नहीं की जाएगी| ऐसा होने से पूरा मामला सदियों पुराने शिया-सुन्नी संघर्ष में तब्दील कर दिया गया| अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से सभी देश और समुदाय शिया सुन्नी संघर्ष के समर्थन और विरोध में खड़े होने लगे| ये घटना बैलेंस ऑफ़ पॉवर की पुनरावृत्ति जैसी है ताकि सबकी सत्ता का संतुलन बरक़रार रहे|

हो सकता है कि यह महज संयोग हो कि तमाम घोषित आतंकी समूहों को सूची से बाहर किया गया, जिनका सीरिया के युद्ध में भारी नुकसान हुआ था| उन समूहों के नेताओं और प्रशिक्षकों को सीरिया से बाहर निकाल कर नए नामों और पहचानों के साथ नए ठिकानों पर पहुँचाया गया| आजाद कराये गए हाईवे के दोनों ओर बसे देशों में उनके ठिकाने बनने लगे| पूर्व ब्रिटिश फॉरेन सेक्रेटरी रोबिन कुक का बयान है,
“सच तो ये है कि अल कायदा जैसा कोई इस्लामी समूह या सेना है ही नहीं| समझदार खुफिया एजेंसियों में हर कोई यह बात जानता है| लेकिन एक प्रचार अभियान जरुर है ताकि लोगों को यह भरोसा दिलाया जा सके कि ऐसे भी लोग हैं जो शैतान के प्रतिनिधि भी हैं| इससे टीवी देखने वाला प्रत्येक व्यक्ति आतंक के खिलाफ लड़ाई में साझे अन्तराष्ट्रीय नेतृत्व को स्वीकार करेगा| इस प्रचार के पीछे मौजूद देश है अमेरिका|

इसके पीछे है इस्लाम की वहाबी छाप विचारधारा जिसके मुरीद या कहिये प्रायोजक हैं सऊदी अरब के 20X20 वर्ग किलोमीटर भूखंडों के शासक शेख लोग| शेखों की ये सल्तनतें ब्रिटेन की पाइरेट्स मोनार्की के तौर पर बसीं जिनकी हिफाजत का जिम्मा अमेरिका उठाता है| बैलेंस ऑफ़ पॉवर की रणनीति के तहत इन सल्तनतों में शिया-सुन्नी का संघर्ष चलता रहता है|

सीरिया की इस अनकही जीत के बाद उनके उगाये शेखों और सुल्तानों की मसखरेबाजी का तंत्र शुरू हो गया| पहले सऊदी अरब ने क़तर को आतंक का प्रायोजक घोषित करके दुनिया के लिए खतरा बताया| इतना ही नहीं बंदरगाह विहीन क़तर से कूटनीतिक संबंधों को ख़त्म करके सऊदी अरब ने क़तर के विमानों के लिए नो फ्लाई जोन घोषित कर दिया| क़तर के सुलझे हुए, पक्के इरादे-आजाद ख्याल और समझदार अमीर ने एक संतुलित कदम उठाया| उसने तत्काल टर्की के सुल्तान, ईरान के साइरस और जार को मामले में मदद करने का निवेदन किया| उन लोगों ने कतर की सभी बंदिशों को ख़त्म करके सेना और रसद मुहैया करवाई| विनम्रता से टर्की और ईरान की तरफदारी करते हुए क़तर ने अमेरिका और सऊदी प्रायोजित जिहादी आतंकियों को सीरिया से बाहर कर दिया| ये जिहादी समूह सीरिया की बजाये सऊदी अरब और अमेरिका प्रायोजित आतंकवादियों के खिलाफ हो गए| अपने पावरफुल मीडिया चैनल अल जजीरा के माध्यम से क़तर ने खुलासा किया कि जिन आतंकवादी समूहों के क़तर से प्रायोजित होने के दावे किये गए वे संगठन सऊदी अरब और अमेरिका के ही इशारे पर काम करते हैं| इस दौरान सऊदी अरब को खुद में एक कू का सामना करना पड़ा जिसे अल सऊद के उजड्ड राजघराने के पंद्रह हजार से ज्यादा राजकुमारों ने किया|

जब शेख को यह महसूस हुआ कि उजड्ड राजकुमार क़तर के अलग किये जाने को लेकर बगावत कर देंगे तो उसने उनकी जगह अपने बेटे की ताजपोशी कर दी| लेकिन जिसकी ताजपोशी हुई है वह राजकुमार और ज्यादा उग्र साबित हुआ और उसने घोषणा कर दी कि बहादुर सऊदी रूस को एक हफ्ते में सीरिया मामले के बाहर कर देंगे|

आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक स्थिर और समझदार क़तर भारी प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर है| लेकिन अब क़तर सऊदी के नेतृत्व में चल रहे गल्फ कोऑपरेशन कौंसिल से बाहर हो रहा है| उत्तराधिकार के नियम चाहे जो भी हों लेकिन फिलहाल के सऊदी राजा ने जिस राजकुमार को हटा कर अपने बेटे को गद्दी पर बैठाया है, वह उसका अपना भतीजा ही है| जिस उजड्ड राजकुमार को गद्दी पर बैठाया गया है और भविष्य में राजा बनने का दावेदार है, वह अत्यधिक ढीठ, घमंडी, आर्थिक मामले बिगाड़ने वाला और अपने जानकारों में तमाम दुश्मन बनाने वाला माना जाता है| सऊदी नेशनल गार्ड्स हटाये गए राजकुमार के प्रति वफादार हैं साथ ही राजकुमार की बेदौइन ट्राइबल आर्मी के साथ भी मधुर सम्बन्ध हैं| बेदौइन को शाही खानदान ने खास दस्तावेजों के साथ तैयार किया गया था जिन्हें शाही खानदान, उनकी स्थिति और अपनी सुरक्षा में अपनी भूमिका की बखूबी जानकारी है| हटाये गए राजकुमार को क़तर या ईरान की शह और बगावत के अंदेशे से, गद्दीनशीन राजकुमार ने एकदम आश्चर्यजनक हरकत की, उसने ऐसी सच्चाइयों को उजागर कर दिया जो सऊदी अरब सल्तनत में पहले किसी ने भी नहीं सुनी थीं|

नेशनल गार्ड हटाये गए राजकुमार के नजदीक हैं, वो हटाये गए राजकुमार की शह पर सत्तासीन सरकार के उजड्ड राजकुमारों और राजा का तख्तापलट न कर दें, इसलिए उनकी ट्रेन की सुरक्षा के लिए इजराइल के 18 और खाड़ी के दो लड़ाकू विमान सऊदी अरब में उतरे| अंततोगत्वा सऊदी अरब ने क़तर को अपनी तेरह मांगे और दस दिन का समय दिया, और मांगे ऐसी कि अगले दस सालों तक पूरी नहीं की जा सकती हैं|
यहाँ क्या हो रहा है? असफल तुर्किश कू के बाद सुल्तान या ज़ार की शतरंजी बिसात क्या एक अहम् यू टर्न साबित होगी?

हार्टलैंड से सम्बन्ध

हार्टलैंड का तात्पर्य सड़क मार्ग से यूरेशिया और अफ्रीका के सभी हिस्सों को जोड़ते हुए उस भूभाग से है जिसे जिसे अल हिन्द या हिन्द कहा जाता है| प्राचीन भारतीय साहित्य में इसे भारतभूमिका या भारतवर्ष या भारतीय महाद्वीप या भारतखंड कहा गया| पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण दिशाओं में समुद्र मार्ग से दुनिया के दूसरे भूभागों से सम्बद्ध यह हिस्सा मानव सभ्यता का केन्द्रीय स्थल कहा जाता था| पहले का केन्द्रीय स्थल कश्मीर के आस-पास का हिस्सा था| यहीं पर चारों दिशाओं में विस्तृत राजा ललितादित्य के साम्राज्य की राजधानी थी| कश्मीर घाटी या कहें मधुमती घाटी या नीलम घाटी इस केन्द्रीय स्थल की केंद्र थी| यहाँ पर बना शारदा सर्वज्ञ पीठ जो कि पूरी भौतिक और अध्यात्मिक विज्ञानं में दुनिया का ज्ञान केंद्र बना| 330 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ मधुमती घाटी या नीलम घाटी का यह क्षेत्र तमाम विद्याओं के अध्ययन साबित हुआ| अपने शिखरकाल में यहाँ 100000 से ज्यादा विषयों की पढाई होती थी जिसमे से भौतिक विषयों के 96000 पाठ्यक्रम और अध्यात्मिक विषयों के 4000 पाठ्यक्रम होते थे| पाकिस्तानी सेना की मदद से इस अध्ययन क्षेत्र का विषद अनुसन्धान रुसी और जर्मन पुरातत्ववेत्ताओं ने किया|

यहाँ हम किसकी बात कर रहे हैं? सीरिया और इराक के राजमार्ग पर कब्जे से अचानक अमेरिका और दूसरे देशों को युद्ध में क्यों उतरना पड़ा?
डमस्कस से बगदाद का हाईवे महज एक छोटा सा हिस्सा है, यह उस भूमार्ग से जुड़ा है जो डमस्कस या अल श्याम से वर्तमान टर्की या पहले का अनातोलिया और यूरोप में आज के लेबनान या पहले के कन्नान से भूमध्यसागर से पश्चिम या उत्तर पश्चिम में यूरोप के दूसरे ठिकानों को, पूर्व में बगदाद से तेहरान से बलूचिस्तान अफ़ग़ानिस्तान से भारत के केन्द्रीय स्थल कश्मीर को जोड़ता है| इसके उत्तर में चीन, उत्तर पूर्व में मध्य एशिया और मंगोलिया और उत्तर में रूस मौजूद हैं| पश्चिम में यह रास्ता बगदाद से शुरू होकर मिस्र और तमाम अफ़्रीकी देशों को जोड़ता है| ये रास्ते तब तक सलामत रहे जब तक उन्नीसवीं सदी में सिनाई के युद्ध के बाद स्वेज नहर बना कर अफ़्रीकी हिस्से को केन्द्रीय स्थल के जुड़ाव से जबरन अलग कर दिया गया, उसके बाद अफ्रीका डार्क कॉन्टिनेंट साबित हुआ|

इस्लाम, क्रिश्चियनिटी या मूसा के हजारों साल पहले से दुनिया ने इसी भूमार्ग या हाईवे से भारत देश की यात्रा की| यह सिल्क रूट या स्पाइस रूट या कहें कि लूकिंग ईस्ट अध्यात्म और ज्ञान के लिए कश्मीर की मेधा से परिचय का मार्ग बना|

इन्हीं भुमार्गों का प्रयोग करके ग्यारहवीं शताब्दी में चंगेज खान ने अपनी समझ भर की दुनिया को जीता और मंगोलियन साम्राज्य बनाया या जीता गया भूभाग सिकंदर के जीते गए हिस्से से पांच गुना ज्यादा था| साम्राज्य बनते बिगड़ते रहे लेकिन अपवाद के कुछ समय को छोड़कर ये भूमार्ग जारी रहा| यह वो रास्ता है जिस पर ईश्वर की खोज करते और मानवीय आज़ादी की तलाश करते हुए दुनिया के हर मजहब और धर्म के लोगों ने अपनाया| पहले यहूदियों ने फिर ईसाईयों ने उसके बाद पारसियों ने और हाल ही में बहाई लोगों ने इस रास्ते का प्रयोग करके सुरक्षा, ज्ञान और व्यापार के लिए भारत का रुख किया| इस्लाम के शुरुआती दौर में इस रास्ते को पारसियों ने अरबों के लिए बंद कर दिया, बारहवी शताब्दी तक पारसियों और अरबों के बीच रस्साकशी जारी रही| इस जद्दोजहद में पश्चिमी भारत का सिंध का हिस्सा बर्बाद होने के भी किस्से मिलते हैं| कुस्तुन्तुनिया के नेपल्स पर ओटोमन साम्राज्य के कब्जे के बाद यह रास्ता यूरोपीय लोगों के लिए पूरी तरह से बंद हो गया| तब से यह रास्ता 700 सालों तक बंद रहा| लेकिन इसका व्यापार पर सबसे ज्यादा असर पड़ा| हिंदुस्तान से यूरोप जाने वाले हर वस्तु के लिए टर्की एक केंद्र बन गया| यह व्यापर सत्रहवीं शताब्दी तक जारी रहा जिससे भूमार्ग के इर्दगिर्द बसे लोगों में समृद्धि आई|

मानव सभ्यता के हजारों सालों में कश्मीर से पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण को जोड़ने वाले भूमार्ग को किसी भी राजा ने कभी बंद नहीं किया| रास्ते के साम्राज्य अपने अपने हिस्से का नियंत्रण जरुर करते रहे ताकि व्यापार और ज्ञान की साझेदारी बरक़रार रहे| यही वजह है कि धर्म और मजहब चाहे जो हो लेकिन अफ्रीका के दक्षिण में मोरक्को से व्लादिवोस्तोक तक के इस भूमार्ग पर पड़ने वाली तमाम जगहों के नाम, परम्पराएँ और संस्कृतियाँ एक जैसी है|

अफ्रीका के आखिरी छोर से व्लादिवोस्तोक और आर्कटिक से टर्की, तेहरान, काबुल, कश्मीर से कन्याकुमारी तक एशिया और अफ्रीका के सारे भूभाग का सुचारू जुड़ाव रहा, किसी ने इसकी परवाह नहीं की कि कौन किस भगवान को मानता है| इस भूभाग का केंद्र रहा कश्मीर और कश्मीर से जुड़े सारे भूभाग को हिन्द कहा गया जिसे प्राचीन भारतीय साहित्य में भारतभूमिका की उपमा दी गयी| इस सारे भूभाग को नियंत्रण करने वाला राजा रहा ललितादित्य जिसकी राजधानी केन्द्रीय स्थल के केंद्र में हुआ करती थी जिसे श्रीनगर कहते हैं|
कल्हण की राजतारंगिणी में भारत के महान राजाओं का इतिहास है जिन्होंने श्रीनगर में शासन किया| उस साहित्य और समयांकन के साथ हुई छेड़छाड़ और कल्हण के साहित्य को महज काल्पनिक घोषित कर देने के चलते सभी राजाओं की ख्याति मिटटी में मिल गयी| जैसे ही भारत का इतिहास 5000 सालों के किताबी खांचे में बांध दिया उसी के मुताबिक राजा ललितादित्य का शासन भी 800 ईस्वी का बताया गया| लेकिन जैसे ही हम उस दौर के लोगों और घटनाओं के साथ इस तथ्य की समीक्षा करते हैं तो हमे कुछ भी हाथ नहीं आता है|
इसके चलते भारतीय इतिहास के समकालीन अध्येताओं के लिए यही निष्कर्ष निकलता है कि संभवतः कल्हण की रचना महज काल्पनिक हो क्योंकि 800 इस्वी के किसी दस्ताबेज में राजा ललितादित्य का नाम मौजूद नहीं| इसी समस्या के चलते बुद्ध, शंकर समेत सभी को 5000 साल के काल्पनिक समयकाल में समेटना शुरू हो जाता है|

जिहोने टीएस इलियट के इतिहास को सच मानकर भारत के इतिहास का समय पांच हजार सालों में समेट दिया वो भी तुलनात्मक रूप से दस्तावेजों, घटनाओं और लोगों के विषय में हो रही स्वतंत्र खोजों से अभिभूत हैं, वे एलियट के इतिहास विवेचन को नकार रहे हैं| इसी कालखंड में अगर समकालीन पर्शियन और अरबी दस्तावेजों को जिसमे मीर कासिम या अरब पर आक्रमण की घटनाएँ देखें तो टीएसएलियट के झूठों का पुलिंदा सामने आता है| शुरूआती दौर के ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत के टाइम और स्पेस की समझ का सत्यानाश कर दिया, गहराई से जाँच की करके हुई खोजें दुनिया के वर्तमान सन्दर्भों में भारत की केंर्दीय भूमिका बयान करती हैं|

सिकंदर के पहले पारसी साहित्य में यूरेशिया और अफ्रीका के भूभाग को हिन्द और हमारे प्राचीन साहित्य में भारतवर्ष कहा गया, जिनके ज्ञान और संपत्ति का केंद्र कश्मीर था| भरतखंड महाभारत के युद्ध के बाद बचे भारतवर्ष का एक हिस्सा था| यहाँ कश्मीर से हमारा आशय डोगरा राजाओं के प्रदेश या पहले दूसरे या तीसरे विभाजन के बाद बचे कश्मीर से नहीं| जब पर्शिया और अरब का इस्लामीकरण हो गया तो वे पर्शिया के बाद के सभी गैर इस्लामिक हिस्सों को हिन्द कहने लगे, इसी अल हिन्द को ब्रिटिश लोगों ने भारतीय उपमाद्वीप या इंडियन सबकॉन्टिनेंट कहा|

कश्मीर से दो रास्ते निकलते हैं दोनों रास्ते अरब प्रायद्वीप और अफ्रीका और यूरोप के मुख्य भूभाग तक और रूस के पूर्व में एशिया से जुड़े हैं| इन्ही दो रास्तों का इस्तेमाल करके मंगोलों ने दुनिया में सिकंदर से पांच गुना बड़े भूभाग पर कब्ज़ा करके मंगोल साम्राज्य आबाद किया|
ओटोमन साम्राज्य ने यूरोप को एशिया और अफ्रीका की ओर बढ़ने से रोकने के लिए जैसे ही ये भूमार्ग बंद किया यूरोप और अफ्रीका दोनों अँधेरे युग में पहुँच गए, वजह साफ़ थी पूर्व से आ रहे ज्ञान से उन्हें कोई के प्रकाश मिल सका| तब तक जो भी ज्ञान यूरोप में बचा था, वो उनके चर्च या फ्री मेसन या उन्ही के टेम्पलर सामंतों ने दरकिनार कर दिया| यूरोप के राजघरानों को टर्की के व्यापारियों से महंगे दामों पर व्यापार रास नहीं आया इसलिए उन्होंने हार्ट लैंड के लिए वैकल्पिक रास्ते की खोज शुरू की| यह तलाश वास्को डी गामा के भारत पहुँचने के साथ समाप्त हुई| उसने हिंदुस्तान तक का घुमावदार समुद्री रास्ता खोज निकाला| उन्होंने अमेरिका तक का समुद्री मार्ग भी खोजा| लेकिन ये रास्ते लम्बे होने के साथ साथ सड़क मार्ग से ज्यादा खर्चीले भी थे| कैथोलिक चर्च की कृपा से पुर्तगाली और डच लोगों की जगह ब्रिटिशों ने समुद्री रास्तों से व्यापार करने का एकाधिकार बना लिया, क्योंकि वे टर्की के अधिकार वाले भूमार्ग को धता बता कर भारत के संसाधनों पर नियंत्रण करना चाहते थे| ब्रिटिश एकाधिकार के खतरों को सबसे पहले फ़्रांसिसियों ने महसूस किया| इसके चलते नेपोलियन ने जिओपॉलिटिक्स की हार्टलैंड थ्योरी को पुनर्जीवित किया और सामुद्रिक व्यापार पर ब्रिटिश एकाधिकार को सीमित करने के प्रयास भी किये| यह मकसद नेपोलियन के रूस की ओर बढ़ने की वजहों में से एक था, क्योंकि वो पूर्वी भूमार्ग से रूस और रूस के दक्षिणी भूमार्ग से भारत आने की तैयारी कर रहा था| हालाँकि इस कदम के मद्देनजर रूस और फ़्रांस दोनों आपस में सहमत थे लेकिन ब्रिटिश व्यापारियों ने समुद्री रास्ते के हाथ से निकल जाने के खतरे को भांप कर नेपोलियन को रूस के खिलाफ भड़का दिया, ऐसा करके उन्होंने आने वाले खतरे से कम से कम 100 साल के लिए निजात पा ली|

स्वेज कैनाल और हार्टलैंड के बंटवारे के लिए नौसैनिक शक्तियों के ग्रेट गेम की शुरुआत

ब्रिटिश लोगों ने महसूस किया कि जिन समुद्री रास्तों के नियंत्रण से वे भारत को कब्जाना चाहते हैं वे बहुत लम्बे हैं, सैनिको की आसान आवाजाही और संसाधनों की लूट के लिए उन्होंने इस दूरी को घटाना चाहा| इस विचार से उन्हें एशिया और अफ्रीका के दो महाद्वीपों के बीच मिस्र के नजदीक एक जगह मिली| वहां के भूभाग को काटकर उन्होंने दोनों महाद्वीपों को अलग करने के लिए स्वेज़ नहर बनाने का मौका देखा| एक बार यह नहर बनकर तैयार हो गयी तो यह ब्रिटिश लोगों के सबसे अहम् पड़ाव हुई जहाँ से समुद्री व्यापार के सारे नियंत्रण होने लगे| मिस्र और अफ्रीका को अलग करने के बाद उन्होंने ओटोमन साम्राज्य को उनके गवर्नरेट रहे मिस्र से अलग कर दिया| आगे बढ़ते जर्मन लोगों ने ब्रिटिश एकाधिकार के खतरे को समझा और टर्की के ओटोमन साम्राज्य और पर्शिया से बात की| उसके बाद उन्होंने बर्लिन बगदाद रेलवे का निर्माण किया| जर्मन लोगों को ईरान के शासकों से इस रेलवे को बगदाद तक बढ़ाने की मंजूरी मिली| इसके बाद उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान तक रेल नेटवर्क का विस्तार किया, अफ़ग़ानिस्तान के दक्षिण में भारत मौजूद है|

जब यह रेल नेटवर्क पूरा होने वाला था तब ब्रिटिश लोगों को खतरे का आभास हुआ और पहला विश्व युद्ध शुरू हो गया| पहला विश्व युद्ध ख़त्म होने तक ब्रिटिश लोगों ने पूरे मिडिल ईस्ट को शेखों, राजाओं और राज रियासतों में बाँट दिया जहाँ उन्होंने अपने खास साझीदारों का कठपुतली राज बहाल किया| इस तरह उन्होंने उस भूमार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया जिससे भारत सीधे यूरोप से जुड़ सकता था और ऐसा होने से पूरा ब्रिटिश व्यापार तबाह होना तय था साथ ही उनका समुद्री यातायात से एकाधिकार भी ख़त्म हो सकता था|

द्वितीय विश्व युद्ध में डमस्कस-बगदाद-तेहरान-अफ़ग़ानिस्तान हाईवे के भविष्य में ख़त्म हालात बन गए, तब जर्मनी ने नेपोलियन के रूस-अफ़ग़ानिस्तान और भारत के पुराने रास्ते को खोलने की कोशिश की| दूसरे विश्व युद्ध में नेपोलियन के मामले की तरह रूस ने जर्मनी की खिलाफत की, इससे भूमार्ग पर दशकों के लिए विराम लग गया| उसके बाद जर्मनी ने एक खाई खोदने जैसी कोशिश की| जर्मनी ने सुभाष चन्द्र बोस को जापान जाने में मदद की| सुभाष जापान की मदद से पूर्वी रास्ते की ओर से आगे बढ़ते तो कश्मीर से होकर सेंट्रल एशिया, रूस और यूरोप के साथ साथ बगदाद की तरफ का उत्तर पश्चिमी रास्ता खुल जाता| लेकिन उसी दौरान जापानियों की पराजय हुई और एटॉमिक बम गिराने की घटना भी| दो एटॉमिक बम गिराने की घटनाओं के साथ साथ फ्री मेसन समुदाय ने फिर से साबित किया कि भारत को कब्जे में रखना उनका अहम् मकसद है और इसके लिए वो किसी भी हद तक गिर सकते हैं| इसी के साथ ब्रिटिश लोगों ने यह भी महसूस किया की अविभाज्य भारत उनके समुद्री व्यापार के वैश्विक एकाधिकार में बड़ा खतरा है|

हिन्दू और मुसलमान मामले के मुर्दा घोड़े को जिन्दा करके, पाल-पोस कर, उन्होंने इसी दिन के लिए बड़ा किया था| आखिरकार इसी से बंटवारा हुआ और कश्मीर से बगदाद तक का उत्तर पश्चिम मार्ग बंद हो गया| अब सिर्फ अब सिर्फ कश्मीर से मध्य एशिया और रूस के मार्ग की सम्भावना बची है| रूसियों के भारत के मुहाने पर पहुँच जाने के खतरे से भयभीत होकर ब्रिटिश लोगों ने रूस को चकमा देकर ईरानी सुन्नी आतंकवादियों को भर्ती किया| उसके बाद उन्ही आतंकवादियों को अफ़ग़ान और जनजातियों का बताते हुए बहलाते रहे| उन्ही आतंकवादियों ने कश्मीर पर आक्रमण करके एक तिहाई कश्मीर कब्ज़ा कर लिया और कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया, जिसे हमारे पश्चिमी भाइयों ने ले लिया| इस हिस्से में कश्मीर से रूस तक जाने वाले भूमार्ग का रास्ता बंद हो गया, इसकी वजह से भारत से डमस्कस-बगदाद का पारंपरिक मार्ग भी बंद हुआ और भारत का हार्ट लैंड यूरेशिया के एक बड़े भूभाग से कट गया|

अगर भारत का बंटवारा न हुआ होता और पाकिस्तान में युद्धोन्मादी परिस्थितियां न बनतीं तो ये दोनों भूमार्ग बड़ी शान से खोले जा सकते थे| लेकिन ऐसा हो न सका, इस कदम से भारत का अरब सागर में मौजूद होर्मुज़ स्ट्रेट के साथ संपर्क समाप्त हो गया साथ ही पर्शियन बॉर्डर पर भी संस्कृतियों के आदान-प्रदान पर विराम लग गया|

लेकिन भारत को कश्मीर के उत्तरी भूमार्ग को फिर से चलाना होगा| यही वह जगह है जहाँ से रूस तक का भूमार्ग पड़ता है जो कि हमारे पश्चिमी भाइयों के कब्जे में है, ब्रिटिश लोगों ने सारी गन्दी राजनीति इसी हिस्से में की है| यहाँ उन्होंने कश्मीर को हमारे भाइयों और चीन के बीच बांट दिया, भारत के पास अब कोई मौका नहीं, जिससे वे अपनी ही जमीन का अपने ज्ञान और व्यापार के लिए इस्तेमाल कर सके| भले ही कश्मीर अपने इतिहास में दुनिया के ज्ञान गौरव का केंद्र रहा हो लेकिन आज हम इससे अलग-थलग हो चुके हैं| जो शारदा सर्वज्ञ पीठ दुनिया के लिए ज्ञान और अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहा, जब सेना उस जगह से महज चार किलोमीटर दूर थी, भारतीय सेना को उस पर कब्ज़ा करने से रोक दिया गया|

ब्रिटिश लोगों को डर इस बात का भी था कि अगर भारत अविभाजित रहा तो इस देश की सीमायें ईरान तक होंगी| ऐसा होने से भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और भाषाई आदान प्रदान से सम्बन्ध भी पुनर्जीवित होंगे, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत में बहाल नहीं किया जा सका था| ऐसा होने से दोनों देश अपने पूर्वजों के दिखाए रास्तों पर चलकर सभ्यता में योगदान करते हुए दुनिया में अहम् भूमिका निभा सकते हैं| ऐसा करने के साथ साथ वे तुलनात्मक अध्ययन करके इतिहास भारतीय और संस्कृति के 5000 साल वाले ब्रिटिश संस्करण से भी निजात पा लेंगे और दुनिया की तमाम समस्याओं से भी|

अरब के तमाम देशों ने बाद में कहा कि वे सोचते थे कि ग्वादर बंदरगाह पर भारत के पडोसी होंगे लेकिन दुर्भाग्यवश यह नहीं हो सका|
दूसरे विश्व युद्ध के खात्मे के साथ ब्रिटिश नियंताओं ने महसूस किया कि अगर भारत यह तय कर लेता है कि उसे पर्शियन पड़ोसियों से भाईचारा बनाना है तो हार्ट लैंड के लिए चल रहे ग्रेट गेम का अंत हो जायेगा| भारत में ऐसी कोई पहल न हो इसके लिए कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा हमारे पड़ोसियों द्वारा ले लिया गया और तीसरा हिस्सा चीनियों ने|

पामर्स्टन से ट्रूमैन से किसिंजर के सिद्धांत

1. रसिया आउट, ओटोमन डाउन और अमेरिका इन

नेपोलियन के उदय के जारी ग्रेट गेम से हार्ट लैंड के साथ भारत पर कब्जे के लिए योजना बनी| भारत सुरक्षित रहे अपरिचित यूरोपीय ताकतों के हाथों में न चला जाए और साथ ही भारतवासियों को इसकी जानकारी भी न हो कि ऐसा कुछ हुआ भी| ये मकसद हासिल करने के लिए किसी के साथ कैसा भी सहयोग किया जाये| रूस की सीमा भारत के साथ लगती है, इस मकसद के लिए पहली जरुरत ये थी कि रूस को इससे दूर किया जाए| इसका दूसरा चरण ये था कि रूस को कमजोर किया जाए| तीसरे चरण में रूस को लगातार चलने वाले युद्ध में उलझा दिया जाए| इसके लिए इस्लाम को कट्टरपंथ बनाने और उसका इस्तेमाल करके आक्रमण और मोर्चेबंदी करने की प्राथमिकता तय हुई| ये मकसद हासिल करने के लिए ओटोमन साम्राज्य का टूटना बिखरना तय हो गया| हर बेदौइन जनजाति को कट्टरपंथी बना कर हथियारबंद किया गया| ओटोमन साम्राज्य के हर हिस्से को केंद्रीय शासन के खिलाफ कर दिया गया|

हार्ट लैंड के साथ भूमार्ग से जुड़े एशिया और अफीका को अलग करने के लिए स्वेज नाहर बनी| इस अलगाव से बेदौइन जनजातियों के व्यापार के जरिये ख़त्म हुए और वे एक दूसरे के संसाधन हड़पने के लिए आपस में लड़ने लगे| वे ब्रिटिश लोगों के हाथों में खिलौना थे| जैसा कि भारत में करते हैं, बेदौइन जनजातियों की आपसी लड़ाई करवाने के बाद आखिरकार ब्रिटिश लोगों ने उन्हीं में से अपने वफादारों का मुकम्मल बंदोबस्त किया| ब्रिटिश मकसद के लिए वफादार ये घराने उजड्ड राजाओं और राजकुमारों के तौर पर कहे जाने लगे| इसी तर्ज पर भारत के राजघराने बने थे और उजड्ड घरानों वाला अरब भी बना| जब लूटमार करती और खून की प्यासी इन जनजातियों के दस्ते ओटोमन और पर्शियन साम्राज्य को गिराने का काम नहीं कर पाए| उस समय ये गिरोह और भारत के साथ भूमार्ग दोबारा बनाकर चलाने के लिए जर्मनी के पक्ष में लगे थे| पहले विश्वयुद्ध का परिणाम जर्मनी के मुंह पर तमाचा जैसा हुआ और टर्की को जबरन गिरा दिया गया| ऐसा सोचा गया कि पहले विश्व युद्ध के बाद रूस भी बोल्शेविक क्रांति से बिखर जायेगा| विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य के तमाम हिस्से बड़ी होशियारी के साथ तमाम नस्ली और मजहबी तंजीमों में बांटे गए| तब अनगिनत राजघराने और शेखों के समूह यानि नकली उजड्ड राजघरानों के बीच शह और मात का खेल चला| तब शुरू हुआ ये खेल, फिलिस्तीन के बंटवारे के बाद ख़त्म हुआ| बंटवारे में यहूदी और अरबी क्वार्टर्स मिलकर इजराइल राज्य बन गए|

2. रसिया आउट, टर्की डाउन, डकैत और लुटेरे राजा अन्दर

जब रूस क्रांति में उलझा था तब बंद भूमार्ग खोलने की समस्या जर्मनी ने उठाई, जर्मन लोगों ने महज बर्लिन बगदाद रेलमार्ग ही नहीं बनाये बल्कि रूस होकर जाने वाले नेपोलियन के तरीके पर भी अमल में लाये| जापान के रास्ते सुभाष का आक्रमण अविभाजित भारत से ब्रिटिश हुकूमत के पैर उखाड़ देने के लिए काफी था| ऐसा करने से अगर जर्मनी हार भी जाता तो भी दोनों रास्ते खोले जा सकते थे| ये रणनीति शायद सुभाष और जापानियों के बीच बनी जिससे गांधीजी सहमत थे|

गाँधी और सुभाष का यह साहसी कदम सिंगापुर के रास्ते ब्रिटिश हुकूमत के ग्रेट गेम को ख़त्म करने वाला था इसलिए इसका दमन किया गया|ब्रिटिश लोगों ने अमेरिका से कहा कि जापान पर बम गिराओ ताकि बोस को रोका जा सके| जापान ने आत्मसमर्पण किया| उसके बाद बोस की गिरफ़्तारी और वनवास हुई| इसके बाद तो ब्रिटिश हुकूमत को अविभाजित भारत यानि भारतीय उपमाद्वीप के तमाम टुकड़े करने की खुली छुट थी, उन्होंने ओटोमन साम्राज्य यानि आज के टर्की की भी यही हालत की थी| ऐसा करके उन्होंने रूस, यूरोप बगदाद, टर्की और अफ्रीका के भूमार्ग अवरुद्ध कर दिए|

फिलिस्तीन, पर्शिया और भारत का विभाजन
3. जर्मनी डाउन, रसिया आउट और अमेरिका (इजराइल) इन
4. यूरोप रसिया आउट, अमेरिका और चाइना इन, इण्डिया एंड पर्शिया डाउन
5. जापान डाउन, रसिया आउट चाइना इन

खानों और स्थानों ने भारत की तरह रूस और मध्य एशिया के पर्शियन साम्राज्य में भी जबरिया इस्लाम कबूल करवाया| रूस और ब्रिटिश प्रभाव से नस्ली और मजहबी तर्ज पर तमाम देश बनाये गए, ताकि ब्रिटिश अधिकार के सामुद्रिक मार्गों पर कोई खतरा न हो| मतलब ये हुआ कि दुश्मनों से घिरे पर्शिया में आतंरिक उलझाव जारी रहे| पर्शिया की आतंरिक चुनौतियों में शिया सुन्नी-बहा’ई जैसे तन्जीमी फर्क और फासले हैं, तो परंपरागत पर्शियन संस्कृति के भी| पर्शिया के बाहरी मोर्चे पर सुन्नी देशों में इराक और पाकिस्तान सरीखे फेल राज्य हैं| असल दिक्कत पर्शियन साम्राज्य की रही जिसे इस्लाम में शिया की समस्या कहा जा सकता है| शिया तबके में वहाबी और सलाफी सरीखे तमाम फिरकों के सुन्नियों की तरह तंग नजर नहीं| तकनीक पसंद, पर्शियन रिवाजों की इज्जत करने वाली आवाम को ख़ुदकुशी करने वाले दस्ते की तरफ धकेलना आसान नहीं| लेकिन ईरान की घेरेबदी करके भारत के भूमार्ग को कमजोर करना था| जब आवाम की चुनी हुई ईरानी सरकार का तख्तापलट करके सीआईए ने शाह हुक्मरानों की ताजपोशी की तो पर्शियन लोगों ने महसूस किया कि ब्रिटेन और अमेरिकी ताकत के आगे खिलाफत का कोई मौका नहीं| इस लिहाज से उन्होंने इस्लाम और समाजवादी की अध्यात्मिक परंपरा का सहारा लेकर शाह के शासन को उखाड़ फेंका| इस क्रन्तिकारी बदलाव के बाद कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट फिरकों पर इस्लामिक फिरकों का दबदबा बना| सोवियत संघ से अलग हुए देशों में पर्शियन साम्राज्य के खानों और स्थानों का यह दबदबा आज भी देखने को मिलता है| पर्शिया का कट्टरवाद उनके देशों में बढती अमेरिकी दखल के खिलाफ एक प्रतिक्रिया जैसा है| इसमें अंग्रेजी और अमेरिकी शह से बने मिडिल ईस्ट के अरबी राजघरानों की खिलाफत भी शामिल है|

इतिहास से सबक लेकर कट्टर इस्लामी फिरकों और एंग्लो अमेरिकन लॉबी से घिरे रूस के जार और पर्शिया के सायरस के बीच नजदीकियां बढीं| उन्होंने एंग्लो अमेरिकी दैत्य की खिलाफत के लिए साथ मिलकर लड़ना तय किया जो लालच और खास मजहबी और सियासी तौर फ्री मेसन के फलसफे से दुनिया को निगल रहे थे| फलसफे की यह लड़ाई जैसे मूसा के पहले सहज शुद्धतावादी यहूदियों के खिलाफ थी वैसे ही आज भी अति रुढ़िवादी यहूदियों के तौर पर मौजूद है|

फिलिस्तीन के बंटवारे से महज इजराइल ही नहीं बना, खोमैनी क्रांति के बाद एंग्लो अमेरिकन आर्थिक हितों के लिए वे आपसी दुश्मन भी हो गए| वरना पर्शिया में यहूदियों की बहुत बड़ी आबादी रहती है, उनकी बस्तियां पर्शियन देशों की सीमाओं पर हैं| अति रुढ़िवादी यहूदी या कहें आरोनिक यहूदी जो मूसा के पहले गाय और बछड़े के सुनहरे प्रतीक की उपासना किया करते थे (महात्मा गाँधी के समय कांग्रेस ने इस प्रतीक का प्रयोग ब्रिटिश फ्री मेसनों की ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई में किया, संभवतः ये प्रयोग ब्रिटिश शासन में फ्रीमेसन फिरकों को उनके असल उसूलों की याद दिलाने के लिए किया गया, मसीहाई यहूदी फिरके के तौर पर पूरी दुनिया के देशों को लूटने और राज करने की नीयत रखने वाली इस कौम का रिश्ता स्कॉटिश यॉर्क कर्मकाण्ड वाली आधुनिक तंजीम से है जिसे जायानिस्म भी कहा जाता है) इन अति रुढ़िवादी यहूदियों का विश्वास आरोनिक यहूदी फिरके जैसा तो है लेकिन उनकी मान्यताओं में ईश्वर का कोई भौतिक या राजनीतिक सीमाओं वाला साम्राज्य नहीं, यह उनकी आतंरिक अध्यात्मिक जाग्रति है जो किसी व्यक्ति के परम चेतना से जुड़कर ही प्राप्त होती है|
फिलिस्तीन के बंटवारे के साथ साथ अरब या सीरियाई या डमस्कस और मिस्र के हिस्सों की जनजातीय समूहों का ऐसा तानाबाना बुना गया ताकि जरुरत पड़ने पर उनके तथाकथित लोकतंत्र का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सकें| ईरान में यह राजनीति लोकतंत्र और इराक में खलीफा के नाम पर हुई| इसके खिलाफ आम लोगों ने भी खिलाफत दर्ज कराई, खोमैनी क्रांति का आगाज़ ओटोमन के मिस्र हिस्से से हुआ, जो मुस्लिम ब्रदरहुड के तौर पर जानी गयी| मुस्लिम ब्रदरहुड ने शेखों और राजघरानों के दिखावे का विरोध करके शुद्धतावादी इस्लाम की वकालत की, साथ ही मिडिल ईस्ट में जारी अत्याचारों के जिम्मेदार इजराइल का विरोध भी किया| जिसके चलते मिस्र समेत मिडिल ईस्ट के तमाम तानाशाहों और राजघरानों ने मुस्लिम ब्रदरहुड पर पाबंदियां लगा दीं| क़तर और टर्की ने तमाम खलीफाओं, ISIS, ISIL, Daesh जैसे वहाबी फिरकों और जिहादियों की बजाए मुस्लिम ब्रदरहुड का स्वागत किया| क़तर को छोड़कर सऊदी और मिडिल ईस्ट की दूसरी रियासतें अध्यात्मिक मामलों में अव्यवहारिक साबित हुईं, इस्लाम की लौकिक सत्ता और अध्यात्मिक संकट के मामले उनसे हल नहीं हो सके|

15000 से ज्यादा उजड्ड राजघराने सऊदी अरब की संपत्ति को स्वाहा कर बैठे और नए संसाधनों के लिए अपने नजदीकी पडोसी देशों को भी हड़पने लगे| इन राजघरानों की खुद तो इंडोनेशिया के भूमार्ग तक कट्टरपंथी वहाबी फिरकों के समर्थन में अहम् भूमिका है, लेकिन जो उनकी शाही उजड्डता की खिलाफत करे उसको आतंकवादी घोषित करने में देर नहीं करते|

वे पाकिस्तानी सुन्नी कट्टरपंथी ताकतों के साथ मिलकर अपना बचाव करते हैं, इससे पाकिस्तानी सेना में भी भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, उन्हें भय है कि इससे पाकिस्तानी सेना में शिया-सुन्नी विवाद बढेगा और राजनैतिक अस्थिरता होगी| सीरियन युद्ध ख़त्म होने को है इसमें सीरियाई सरकार की जीत साथ साथ सऊदी लोगों को अपने उस पैसे की बर्बादी नजर आ रही है, जो उनके दैनिक जीवन के लिए जरुरी है| इसके लिए सऊदी घरानों ने क़तर पर कब्जे का पुराना नुस्खा उठाया जो उन्ही के लिए आत्मघाती साबित हुआ| उनकी उजड्डता की हद तो तब हो गयी जब उसने अविश्वसनीय तरीके से ऐसा बयान दिया जिसे सुनकर अमेरिकी और यूरोपियन सहयोगी भी बेहोश हो जाएँ, प्रिन्स सलमान ने कहा कि उनके बहादुर सऊदी सिपाही एक हफ्ते में रूस को सीरिया से निकाल बाहर करेंगे| शायद रूसियों के लिए ये 2017 का सबसे बड़ा मजाक था!

जब मौजूदा मिडिल ईस्ट में बंटवारे चल रहे थे तब ब्रिटिश लोगों ने इस्लाम के अध्यात्मिक केन्द्रों को अलग करने की भी कोशिश की| इस्लाम के खलीफाओं के परंपरागत अध्ययन केन्द्रों को बगदाद और डमस्कस या अंकारा सल्तनत की राजधानी या कैरो गवर्नरी के मुख्यालय से हटवा कर सऊदी के कठपुतली राज्यों में पहुंचा दिया| हालाँकि मोहम्मद के इन्तेकाल के बाद ही राजनीतिक ताकत डमस्कस से बगदाद पहुँच गयी थी लेकिन डमस्कस, बगदाद कैरो और अंकारा इस्लामिक अध्ययन के केंद्र बने, हार्टलैंड के भूमार्ग पर बसे ये शहर तब तक जुड़े रहे जब तक स्वेज नहर की खुदाई नहीं हुई|

मोहम्मद के इंतकाल के बाद शिया और सुन्नी के बीच दावेदारी की लड़ाई भी जारी रही लेकिन इस्लाम के इन अध्ययन को पर्शियन साम्राज्य और उनके विद्वानों के योगदान से भी से मजबूती मिली|मेक्का और मदीना की यात्रा सभी कौमें करती थीं, बेदौइन जनजातियों ने यात्रियों के लिए तमाम सहूलियतें मुहैया करवायीं (यह वो दौर था जब अमीर यात्रियों को लूट लिया जाता था)| ऐसा करने से वो अल सउद छाप घरानों के प्रतीक बन गए| ईरान के शियाओं से सामने अल सउद ने अरब में पूरे इस्लाम के सुन्नियों के अलमबरदार होने का दावा किया| सुन्नियों की अलम्बरदारी का ये दावा व्यवहारिक और अध्यात्मिक दोनों मामलों में टर्की के सेक्युलर गणराज्य के सामने कहीं नहीं ठहरता था| पिछले तीस सालों में तेल के पैसे की मदद से सऊदी घरानों ने मोहम्मद की असल नसीहतों वाले इस्लाम के सामने जनजातियों वाले वहाबी फिरके को आक्रामक रूप से हवा देना शुरू किया| ये हर समझदार इस्लामिक देश के साथ दखलंदाजी थी| इस काम में सऊदी घरानों को पाकिस्तान का साथ मिला जो कि पूरी तरह से असफल गणराज्य है और सबसे भ्रष्ट देश साबित होने की दौड़ में शामिल है| सऊदी पैसों और चीनी तकनीक वाले चेहरे के साथ पाकिस्तान ने वहाबियत को भी कबूल कर लिया|

लेकिन पाकिस्तान के इस मुखौटे के पीछे कश्मीर का स्थायी विवाद भी है जहाँ बर्बादी के तौर पर निर्दोषों की हत्याओं, बलात्कार और बड़े पैमाने पर अपाहिज बनाने वाला जिहाद जारी है| ये नजारा पूरी दुनिया के सामने है और इस भारत पूरे किस्से को दरकिनार करके अपने पुराने आकाओं से आदेश का इन्तेजार कर रहा है कि अगला कदम क्या हो| ब्रिटेन और अमेरिका की शह के बगैर सऊदी घरानों का पूरा सर्कस बेलज्जत है|

पेट्रोडॉलर समझौते से अमेरिकी अर्थव्यवस्था संभल सकी और तमाम शाही घराने ईजाद हुए| ये घराने मानवाधिकार और महिला अधिकारों से नफ़रत के भी घरौंदे हैं और घराने वाले मिस्र के जुआघरों में अपनी बीवियों को गिरवी रखने का कारोबार करके रोजाना करोड़ों मिलियन डॉलर बनाते हैं| अल सऊद घरानों ने तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों को जो पैसा दिया उससे सउद घराने को इज्जत तो मिली लेकिन भ्रष्ट निज़ाम वाले देशों से मिली बिकाऊ इज्जत टिकाऊ न बन सकी| अपने तख़्त की हिफाज़त में सऊदी घराने ने हर सुन्नी देश से लालचियों की एक बड़ी सेना बना ली| हमारे पड़ोसियों ने भी इसमें शिरकत की और फंसे जिन्हें अरब नाटो बनाने का मौका मिला| बैलेंस ऑफ़ पॉवर के अपने सदियों पुराने फलसफे के चलते ट्रम्प के अमेरिका ने ईरान के सामने अरब नाटो को खड़ा किया है|
सऊदी छाप इस्लाम की खिलाफत करने वाले सभी इस्लामिक नेताओं को तेल के पैसे से खरीद लिया गया, इस्लामिक मदरसों की फंडिंग होने लगी और पोलिटिकल मूवमेंट्स को हवा देकर सभी रियासतों को सऊदी प्रायोजित और अमेरिकी मध्यस्थता वाले निजामों में बदलने का सिलसिला चल पड़ा| अगर इसे सऊदी अरब की विदेश नीति कहा जाए तो इसका मकसद किसी भी तरह ईरान को कमजोर करने का है| इस्लामी देशों के आतंरिक मामलों में सऊदी अरब के हस्तक्षेप की खिलाफत हर देश की राजधानी में हुई और आखिरकार उन सब इस्लामिक देशों ने खिलाफत के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड तैयार किया| इस संगठन को सऊदी अरब और इंटरनेशनल प्रायोजकों ने आतंकवादी घोषित कर दिया|
अमेरिकी प्रायोजकों को सऊदीयों की धोखाधड़ी पसंद आई, उन्होंने विचार किया कि सऊदीयों की भव्य योजना सीआईए और पेंटागन की योजनाओं से बेहतर साबित हो सकती है| सउदियों के तख्तापलट की योजनाओं को लेकर अमेरिकियों ने शिया क्रेसेंट के देशों का प्लान बनाया| इस प्लान में उन्होंने डमस्कस और बगदाद को जोड़ने वाले हार्टलैंड हाईवे को उन्होंने सुन्नी अरब हाईवे नाम दिया| भारत और मिडिल ईस्ट के बीच भूमार्ग की तर्ज पर चीन ने वन बेल्ट रोड बनाने का काम शुरू किया है| भारत की सीमाओं से शुरू होकर भूमध्यसागरीय क्षेत्र के बीच व्यापार, मुद्रा अकूत सम्पदा की दृष्टि से यह भूमार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है| ऐसा होने पर भारत और मिडिल ईस्ट मिलकर अमेरिका और यूरोप के सहयोगियों के रूप में फ्री मेसन के धन और सत्ता के लालच के लिए संसाधन मुहैया करायेंगे| यह हाईवे बना कर वे और मजबूत नियंत्रण बना सकेंगे और ऐसा होता है तो रूस को घेरने का काम पूरा हो जायेगा|

<a href=”https://www.nytimes.com/2017/05/27/world/middleeast/iraqi-toll-road-national-highway-iran.html”>https://www.nytimes.com/2017/05/27/world/middleeast/iraqi-toll-road-national-highway-iran.html</a>

सीरिया के तख्तापलट के पूरे प्लान के तीन अहम् मकसद थे| पहला मकसद तो पामर्स्टन और किसिंजर के दस्तावेजों के मुताबिक रूस की घेरेबंदी करने का था, ऐसा करके उन्हें हार्ट लैंड तक न पहुँचने दिया जाए, या रुस्सियन हार्ट लैंड के लिए कोई रास्ता न निकाल सकें| इस सन्दर्भ में पहले के दो मामले सामने हैं, नेपोलियन का युद्ध और दो विश्वयुद्ध, इन दोनों मामलों में फ़्रांस और जर्मनी को यह हार्टलैंड खोलने से रोकना था| ऐसा करने में डकैतों की ईस्ट इंडिया कंपनियां बर्बाद हो जानी थीं और उनका हार्टलैंड से कब्ज़ा ख़त्म हो सकता था|

कोल्ड वॉर के बाद जब रुसी इसे खोलने को तैयार हुए तो किसिंजर दस्तावेजों की बात आई| किसिंजर दस्तावेज पामर्स्टन दस्तावेजों के चमकीले संस्करण जैसे माने जाते हैं|
इस दस्तावेज के कुछ अहम् बिंदु हैं:
1. अमेरिका यूरेशिया के बड़े भूभाग का सुदूरवर्ती महाद्वीप है|
2. यूरेशिया के संसाधन और लोगों की आबादी अमेरिका के संसाधन और आबादी से कहीं ज्यादा है|
3. शीतयुद्ध के दौरान या बाद में भी यूरेशिया के किसी भी देश (यूरोपियन हो या एशियाई) का प्रभाव बढ़ने से अमेरिकी भूराजनैतिक और भूआर्थिक मकसद और राष्ट्रीय हितों को खतरा होगा|
4. यूरेशिया की ताकतों (प्रमुख रूप से चेन और रूस) के बीच कोई भी सैन्य राजनैतिक प्रकल्प बनता है तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सेना दोनों को खतरा होगा|
5. अमेरिका का वैश्विक भूराजनीतिक मकसद है ऐसे किसी भी सहयोगी प्रकल्प को नेस्तनाबूद करना (सोवियत संघ /चीन-रूस)|

दरअसल हेनरी किसिंजर ने इस मामले में दो अहम् पहलुओं को सामने रखा:
1. दुनिया के भूराजनीति में यूरेशिया की अहमियत और
2. यूरेशिया का हार्टलैंड रूस है. इस लिहाज से रूस पर नियंत्रण का मतलब पूरे यूरेशिया पर कब्जेदारी जैसा है|
यही वजह है कि शीत युद्ध के बाद सोवियत संघ और उस के बाद पुतिन के रूस से अमेरिकी जद्दोजहद जारी रही है| अमेरिकी भूराजनीति का दृष्टिकोण पूर्व निर्धारित लक्ष्य की औपचारिकता भर है जिसका मकसद है: यूरेशिया के हार्टलैंड पर नियंत्रण स्थापित करना| इस कवायद में आजाद रूस या मजबूत रूस अमेरिकी नीति नियंताओं के लिए कोई मंजूर समाधान नहीं|

इसमें जो बात नहीं कही गयी है वह ये है कि रूस या चीन के खिलाफ भारत को अमेरिकी या ब्रिटिश नियंत्रण में रखा जाए| पहले और दूसरे विश्व युद्ध में इसका मकसद था भारतीय सैनिकों को इस्तेमाल करके से विश्व युद्ध को जीतना तीसरे विश्व युद्ध में यही हो सके यह भूराजनीति इसी की कवायद है| भारत में किसी भी दल की कोई भी सरकार हो उस पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण बना रहे| भारत पर नियंत्रण के लिए स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव के तहत राजनैतिक नियंत्रण के वाल्डेन मॉडल का सहारा लिया जा रहा है| ऐसा होता है तो यह फ्री मेसन का राज होगा, और अगर यह नहीं भी होता है तो भारत में अमेरिका आसक्त अंग्रेज प्रेमी शासकों की सरकार हो| हमारे अंग्रेज प्रेमी राजनेता सेना और संसाधनों के इस्तेमाल से आगे बढ़ने के लिए अमेरिकी और ब्रिटिश दूतावासों के आदेशों का इन्तेजार करेंगे| भारतीय सेनायें पश्चिमी आदर्शों से प्रेम करती थीं और देश में चाहे कैसा भी राजनीतिक नेतृत्व हो वे ब्रिटिश या अमेरिकी हितों की खिलाफत करना पसंद नहीं करेगी|
आधारभूत रूप से वैश्विक दादागिरी की अमेरिकी नीति की दो अहम् आतंरिक प्रक्रियाएं हैं, जो अमेरिकी आज़ादी और राज्य बनने के समय से मौजूद हैं (इनकी घोषणा 1776 में हुई):

1. अमेरिकी नागरिकों की उपभोक्तावादी मानसिकता जो कि पूरे अमेरिका की संस्कृति में गहराई से समायी हुई है;
2. दुनिया भर की वस्तुओं, उर्जा, प्राकृतिक संसाधनों और साख के लिए विशेषाधिकार सुनिश्चित करने के लिए सैन्य संस्थानों की सर्वश्रेष्ठता| उदहारण के लिए, आज दुनिया भर के देशों में अमेरिका के 800 ठिकाने हैं, उनमे से सबसे बड़ा केंद्र कोसोवो में है—यह क्षेत्र यूरोप में अपने प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है (इसकी कीमत 500 बिलियन डॉलर आंकी जाती है)|
अगर हर भारतीय और उसके परिवार में सभी मारे जाते हैं तो भी भी ट्रिलियन डॉलर की ब्लैक इकॉनमी और सोने के साथ साथ भारत के संसाधनों पर अमेरिकी कब्ज़ा होना दुनिया भर के युद्धों को जीतने के लिए बहुत जरुरी है| ये अचम्भे की बात जरुर है लेकिन महज वीसा के लिए तमाम भारतीय आगे के मोर्चे पर रह कर अपने संसाधनों की हिफाज़त करेंगे ताकि उन्हें अमेरिकी या ब्रिटिश हाथों में सौंपना सुनिश्चित हो सके| ऐसा ही नजारा नोटबंदी के हालिया में मामले में भी देखा गया है|

सत्ता परिवर्तन का दूसरा पहलु ईरान और इराक को पूरी तरह बर्बाद करके वहां कठपुतली सरकारों को बैठाने का होगा ताकि वहां से भूमार्ग बनाकर भारत और पाकिस्तान को नियंत्रण में रखा जा सके|

लेबनान में सत्ता परिवर्तन करके सहयोगी सरकार बनाने का अहम् मकसद पश्चिमी नीतियों या इजराइल के मुताबिक उस क्षेत्र की क़तर या ईरानी पाइपलाइन से गैस को अमेरिकी, सऊदी या इजराइल की निगरानी में यूरोप पहुँचाना रहा| लेबनान होते हुए भारत से जाने वाले सभी संसाधन सीरिया, ईरान और इराक और पाकिस्तान होते हुए यूरोप पहुँचते हैं तो यह वन बेल्ट रोड के एक विकल्प जैसा होगा| सभी यूरोपियन सहयोगियों के लिए भी यह भारी मशक्कत का काम है|

वे सभी अपनी उर्जा आवश्यकताओं के लिए अमेरिकी मध्यस्थता वाले तेल और प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं| ऐसा होते हुए वे निकट भविष्य में अपने हिसाब से भूमार्ग खोलने के लिए रूस के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते| उन्हें अमेरिका के बनाये भूमार्ग का ही इस्तेमाल करना होगा|

इस पूरी प्रक्रिया में यह मान लिया गया था कि टर्की पूरी तरह से अमेरिकी नियंत्रण में रहेगा| पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक अमेरिकियों ने तुर्किश सेना को कई सालों तक रुसी और इस्लामिक आतंकवादियों के खिलाफ उलझाये रखा| सऊदी खजाने और तुर्किश ट्रेनिंग की बदौलत ये आतंकी समूह शीतयुद्ध में काम आये| वैकल्पिक तौर पर ट्रेनिंग के दौरान अमेरिकियों ने तुर्किश सेना में भी पैठ बनाई| अगर वे अमेरिकी योजना के मुताबिक नहीं काम करते हैं तो ऐसा करके उन्होंने सेक्युलर तुर्किश सेना को नष्ट करने की तरकीब भी लगाईं| उनके अनुमान के मुताबिक अगर सीरिया का बिभाजन होता है तो टर्की अपने डमस्कस गवर्नरी के लिए मंजूर करेगा और ये अमेरिकी योजना के मुताबिक होना था| लेकिन उस क्षेत्र में बैलेंस ऑफ़ पॉवर की नीतियों में इजराइल का झुकाव कुर्दिश सेनाओं की तरफ रहा, उसने अमेरिका को भी कुर्दिशपक्ष के लिए दबाव बनाया| कुर्दिश और इजराइली सहयोग की यह कूटनीति टर्की ने भांप ली| इससे तुर्क बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने टर्की की सेक्युलर सेना को भ्रष्ट करके अलग-थलग करने की कवायदों का भी पता लग गया, जिसमे तुर्किश सेना को चौथी दुनिया की तंगनजर इराकी जज्बाती सेना बनाने की करतूत भी शामिल थी|

टर्की का असफल तख्तापलट

तुर्किश इंडिपेंडेंस मूवमेंट को काफी हद तक सफल कहा जा सकता है क्योंकि तुर्किश इंडिपेंडेंस मूवमेंट के चलते ऑट्टोमन साम्राज्य को पूरी तरह टुकड़ों में बंटने से बचा लिया गया| साथ ही इस मूवमेंट से टर्की के दिल जैसे हिस्से अनातोलिया को भी यूरोपियन प्रशासन के हस्तक्षेप से बचाया गया (सेव्रेस की संधि ) और लुसाने की संधि के तहत टर्की के शासन को बहाल किया जा सका| ट्रीटी ऑफ़ सेव्रेस में एंग्लो-अमेरिकन उद्देश्य स्पष्ट हैं कि कुर्द, ग्रीक आर्मेनियन और मुस्लिम आबादी वाले हिस्सों को अलग अलग रख के उन्हें यूरोपियन देशों के समूहों द्वारा सुरक्षा मिलती रहे| लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है कि तुर्किश इंडिपेंडेंस मूवमेंट को गल्लीपोली के हीरो मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में इनसे निजात मिली|

जब ऑट्टोमन साम्राज्य के सेंट्रल एशिया उत्तरी अफ्रीका के दूसरे हिस्सों में ब्रिटिश कठपुतली राजाओं का शासन चल रहा था उस समय तुर्कों ने अपनी मातृभूमि में एक मजबूत राष्ट्रवादी शासन बना लिया, यह भी गौरतलब है कि कमल अतातुर्क के स्वीकार किया कि ओटोमन साम्राज्य के मिडिल ईस्ट और मिस्र में कब्जे को वाले बोझ को कम करके राज्य छोटा करना जरुरी है (उसके अस्सी साल बाद यही करके सोवियत यूनियन से रूस बना)|

हमे यह भी कम नहीं आकना चाहिए कि अतातुर्क ने तमाम मामलों को संभाल कर जिन दरारों को भरने का काम किया था, आज टर्की को उन्हीं मामलों का इस्तेमाल करके गुमराह किया जा रहा है! हर दूसरे दशक में कुर्दों का सवाल उठता है, एंग्लो-अमेरिकन हितों में कुर्दों का इस्तेमाल करके भी उनके साथ धोखा किया जा रहा है| जिसके चलते कुर्दों का ये सवाल मध्य-पूर्व की भूराजनीति में एक सुनहरा अध्याय बन कर उभरा है| (यहाँ भारतीयों पाठकों को ध्यान रखना चाहिए कि भारत सरकार द्वारा हाल ही में कुर्दिस्तान में उच्चयोग खोलने के क्या मायने होंगे?)| अगला खतरा है आर्मेनियाई लोगों का जो कि आर्मेनिया के नरसंहार के नतीजे में भड़के| ये भी ब्रिटिश लोगों द्वारा उकसाया गया वैसा ही सवाल है जो टर्की के ऑट्टोमन साम्राज्य और ग्रीकों के बीच सायप्रस के मामले में पैदा हुआ|

वर्ष 1975 तक इस चालबाजी से टर्की का अरब की राजनीति में इस्तेमाल हुआ| अरब की राजनीति से टर्की में दखल के लिए अमेरिका ने वहाबियों का प्रयोग करना शुरू किया| हालाँकि इससे टर्की के लिए इस मोर्चे पर दबाव कम जरुर हुआ लेकिन एंग्लो-अमेरिकन समूहों ने टर्की के आतंरिक मामलों में दखल जारी रखी ताकि टर्की को भी अरब राज्यों की तरह अपनी जागीर बनाया जा सके| यही आखिरी पहलू आज के संदर्भो में राष्ट्रपति एरडोगन की उस सख्त कार्रवाई की वजह बना जो एंग्लो-अमेरिकन लॉबी के लिए हजम कर पाना मुश्किल है|

यह भी गौरतलब है कि एंग्लो-अमेरिकन समूह के लिए टर्की का कट्टर इस्लामीकरण करने में नाकामयाब होने से अब उन्हें इन कामों के लिए कोई और क्षेत्र (सऊदी अरब) देखना होगा| टर्की में मिली नाकामयाबी सऊदी अरब की कट्टरता बढ़ानेवाली होगी| इसी के परिणामं से भारत में हमें अपने लिए भी कुछ सबक लेने होंगे| अगर पाकिस्तान कट्टर इस्लामी ताकतों को शरण देने से इनकार करता है तो हमारे ऊपर क्या असर पड़ेगा?

कमाल पाशा द्वारा बनाये गए धर्म निरपेक्ष संस्थानों में से एक है टर्की की सेना, जिसने देश की सेहत और शांति बहाल करने में अहम् भूमिका निभाई है| तुर्किश जनरल सेविक बीर (जिसने 1997 के षड़यंत्र और इस्लामी कट्टरता पर नियंत्रण करने में खास किरदार निभाया) का एक अहम बयान है, “टर्की में हमने इस्लाम और लोकतंत्र की शादी रचाई है, इस शादी का बच्चा है सेकुलरिज्म| अब ये बच्चा बार-बार बीमार पड़ रहा है| टर्की की सेनाएं वो डॉक्टर है जो इस बच्चे को बचाती हैं| बच्चे की बीमारी के मुताबिक हमे जरुरी इलाज का इन्तेजाम करना होगा”| सेना ने सुनिश्चित किया है कि बच्चों के लिए धर्म निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था हो| इस्लामी कट्टरता फ़ैलाने वाली अथवा कट्टर वामपंथी पार्टियों को गैरकानूनी करार दिया| इस्लामी तरीकों (सूफी इस्लमी जमातें जिनमे विदेशी अथवा चरमपंथी ताकतों का असर हो) को दुरुस्त किया गया|

साथ ही ये भी मुकम्मल किया गया कि अल्पसंख्यक मजहबों (ऑर्थोडॉक्स क्रिस्चियन, आर्मीनियाई, यहूदियों, आदि) पर ज्यादती न हो| जो अधिकारी कट्टर इस्लामी आंदोलनों में शामिल हैं सेना अक्सर उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा देती है| सेना ने वित्तीय प्रबंधन के संकट के समय में भी सरकार के हाथों को मजबूत किया|

इस सेक्युलर और सेहतमंद ढांचे में चरमपंथियों को बढ़ावा देकर अपना कब्ज़ा बनाने के लिए पश्चिम और विशेष रूप से ब्रिटिश लगातार दखलंदाजी करते रहे हैं| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, ब्रिटिश और उनके साथी पश्चिमी समूहों की चालबाजी के कम से कम चार ऐसे प्रयास हैं, जिसमे टर्की को बचाने का श्रेय वहां की सेना को मिलना चाहिए| यही वजह रही जिससे तुर्किश सेना को नेस्तनाबूद करना एंग्लो-अमेरिकन समूहों के एजेंडे में सर्वोच्च प्राथमिकता बना|

पश्चिम की इस जियो स्ट्रेटेजी के चलते टर्की, सीरिया को अस्थिर करने वाले देश की भूमिका अदा करेगा| तुर्क नियंत्रण में हैं, सीरिया में शासन पर कब्जेदारी या बदलाव टर्की की थल सेना के सहयोग से किया जाना है, ऐसा करके यूरोप-अमेरिकी हितों और उन्ही की सहूलियत के हिसाब से तय कीमत पर पाइपलाइन से तेल की आपूर्ति होगी| इसके लिए उन्होंने टर्की में ISIS/ISIL Daesh के ट्रेनिंग कैंप भी खड़े किये| इसी के क्रियान्वयन में अमेरिकियों का टर्की की सेना के साथ अच्छे संबंधों की जरुरत पड़ी| तुर्किश सेनाओं में अमेरिकियों की दखल बढ़ाने के लिए फेतुल्लाह गुलेन के संगठन का प्रयोग किया गया| इस प्रकार राष्ट्रपति एरडोगन के साथ काम करते हुए उन्होंने एक सामानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली, वो भी इस कदर कि जब तुर्किश प्रेसिडेंट असहयोग करे, अथवा अमेरिकी सेनाओं को हटाने की कोशिश करें तो सामानांतर तंत्र का सहारा लेकर गिराया जा सके| इस खेल से तुर्किश राष्ट्रवादी सरकार को नाराजगी हुई साथ ही कुर्दों को अमेरिकी आर्थिक सहयोग से भी| एक तरह से ये भी कहा जा सकता है कि अमेरिका ने टर्की में अपनी मौजूदगी और ताकत को अधिक करके समझा और साथ ही यह भी मान बैठे कि उन्होंने तुर्किश राष्ट्रवादियों को खरीद लिया है (कर्नल कैम्पबेल के नाइजीरियन बैंक अफेयर से)|
जैसा कि ऊपर बताया गया कि टर्की नीति में पश्चिमी उद्देश्य उत्तर में रूस और दक्षिण में अरब राजनीति पर नियंत्रण स्थापित करने की है| इसके लिए अमेरिका द्वारा तुर्किश रूसो विवाद का इस्तेमाल किया गया जिससे टर्की इस घेरे में आ गया साथ ही इस खेल में धुरी साबित हुआ| नाटो का सदस्य होने के नाते टर्की को बाकी सभी विवादों में खींच लिया गया साथ ही साथ टर्की और परंपरागत रूस के बीच युद्धों को शीत युद्ध की धारणा से देखा जाने लगा|

शीतयुद्ध के चरम पर जिस तरह रूस को हटाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान को मुजाहिदीन का प्रशिक्षण और पूर्वाभ्यास क्षेत्र बनाया गया उसी तरह का प्रयोग सोवियत यूनियन के विघटन के बाद चेचेन्या में भी किया गया| इस प्रशिक्षण का आदर्शवादी और सूचानागत ढांचा पश्चिम द्वारा दिया गया जिसकी व्यवस्था टर्की ने की और पैसा लगाया सऊदी अरब (वहाबी), क़तर(सलाफी इस्लाम) आदि देशो ने| और इस तरह टर्की उनके गिरोह का हिस्सा बन गया|

टर्की को अपने खेमे में शामिल रखने के लिए पश्चिम ने सायप्रस में टर्कीश कब्जेदारी पर सहमति जताई, आर्मेनियाई नरसंहार से किनारा किया और टर्की की क्षेत्रीय अस्मिता में कुर्दों के सवाल पर आँख मूँद लीं| लेकिन जैसा कि कोल्ड वॉर के दिनों में होता था, रूस के किसी भी दुश्मन को लड़ाई के लिए प्रशिक्षण (अमेरिकी हितों के लिए भले ही उसके कोई भी उद्देश्य हों) दिया जाता था| सौभाग्य से या दुर्भाग्य से कहें तो पश्चिम के हथियार बंद लड़ाई के इस आह्वान पर सोवियत यूनियन के तमाम मुल्कों के गरीब और सेक्युलर मुस्लिम उनके साथ शामिल हुए|जब उनकी संख्या कम पड़ी तो और ज्यादा गरीब अफ़्रीकी मुल्कों (इथियोपिया, सोमालिया, सूडान, नाइजीरिया) और सुदूर पूर्व के देशों (फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया) और साम्राज्य के मुकुटमणि रहे भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार) से भी मुस्लिमों की भर्तियाँ हुईं| यही आखिरी हिस्सा हमारी साझी जिम्मेदारी है|

शीतयुद्ध के दृष्टिकोण से कहें तो टर्की की व्यवस्था और अरबों के पैसे से बनी यह नीति अमेरिका की रूस को घेरने जैसी कही गयी जबकि तुर्कों ने खुद इस मामले को अलग तरीके से देखा| साथ ही इस दौरान एक घटना ऐसी हुई जिसने तुर्कों की वह छवि तैयार की जिसके चलते उन्हें एहसास हुआ कि वे रूसियों के साथ अपना विवाद सुलझा सकते हैं|

तालिबान और अफ़ग़ानिस्तानी मुजाहिद को छोड़कर बाकी के समूहों की ट्रेनिंग टर्की की सेना में ही हुयी| इससे टर्की की ऐतिहासिक विरासत पर गहरे सवाल और असर पैदा हुए| पिछले दो दशकों में आर्मी अधिकारीयों के तमाम समूहों ने इन प्रशिक्षण सत्रों में हिस्सा लिया| पश्चिम की मदद से चल रहे इन प्रशिक्षण सत्रों के नतीजे सेना में बड़े नकारात्मक रहे| अतातुर्क द्वारा स्थापित सबसे पवित्र संस्थान के रूप में तुर्किश सेना के इन प्रशिक्षण ठिकानों के लिए संयोजन और मोनिटरिंग का जिम्मा तुर्किश सेकंड आर्मी ने उठाया जिसका कार्यक्षेत्र इन्सिर्लिक की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहा| संयोग से या दुर्घटनावश हालिया कू के ज्यादातर प्लॉटर, प्लानर और कार्यवाहियों को अंजाम देने वाले लोग तुर्किश सेना के इसी बैच के रहे|

अहमद दावुतोग्लू (जो टर्की के पूर्व प्रधानमंत्री रहे) अमेरिका की पसंद थे और उन्हें सऊदी और सलाफियों से बहुत आर्थिक मदद मिली ताकि सुन्नी समर्थक वहाबी और शिया की खिलाफत के उद्देश्य पूरे हो सकें…ये सब टर्की के घोषित उद्देश्यों से परे था| सीरिया के सवाल पर जब एरडोगन यह वक्तव्य दे रहे थे कि अंतरिम सरकार में असद की हिस्सेदारी रहेगी तभी दावुतोग्लू ने असद के खिलाफ वक्तव्य दे दिए| उन्होंने कुर्दों के मामले में आँख मूँद कर कुर्दों की हथियारबंदी का आँख मूँद कर समर्थन किया|

उन्होंने अमेरिकियों द्वारा आतंकवादी समूहों को दी जा रही ट्रेनिंग पर जिस तरह पर्दा डाला वे सभी कार्यवाहियां रूस के खिलाफ थीं और इस तरह टर्की के लिए खतरनाक भी थीं, इस तरह सेना में विदेशी हस्तक्षेप खास कर अमेरिकी दखलंदाजी बढ़ी| कुल मिलाकर कू के बाद हुई टर्की की तंगहाली के सूत्रधार वही प्रधानमंत्री महोदय थे, यही वजह रही कि राष्ट्रपति एरडोगन ने उनको प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया| यही वजह है कि टर्की तमाम लोगों की अग्निपरीक्षा कर रहा है जिन्होंने टर्की की नीतियों को बिगाड़ा| कू के ज्यादातर भागीदारों ने नाटो द्वारा प्रशिक्षण हासिल किया| ऑस्ट्रियन और जर्मन सोर्सेज के मुताबिक पुलिस के साठ प्रतिशत, नागरिक प्रशासन के सत्तर प्रतिशत और सेना के 20 प्रतिशत लोगों के जीवन में अमेरिकी समर्थक गुल्लेन अनुयायियों की दखल रही| जिनकी दखल सामान्य प्रशासन और विधि व्यवस्था में रही, उन्होंने इस ऑपरेशन के असल मकसद को छिपाने का काम किया| क्या हम भारत में भी ऐसे किसी प्रकार का माहौल देखते हैं?
जैसा कि पहले बताया गया है, कू की इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था फेतुल्लाह गुलेन को अमेरिका में लाना और उसके संगठन का इस्तमाल करके न केवल सेना बल्कि तुर्किश सरकार में जगह बनाना| नए खुलासों में पाया गया कि फेतुल्लाह गुलेन नेटवर्क का दायरा विधि, पुलिस, शिक्षा व्यवस्था और बॉर्डर पेट्रोल यूनिट्स तक में हैं, अब तुर्किश खुफिया विभाग कू के सूत्रधारों, समर्थक और फाइनेंसर्स को टर्की के अन्दर तलाश रहा है| उससे बच कर भागे हुए लोग ISIS/ISIL/DAESH/PKK/ मॉडरेट पश्चिमी समूह समर्थित आतंकी समूह टर्की की सीमा पार मौजूद हैं| तुर्किश खुफिया ने उनमे से कुछ लोगों को आतंकी समूहों के नियंत्रण वाले शहरों से भी गिरफ्तार किया है|

इसका नतीजा निकला जब तुर्कों ने रुसी जहाज को मार गिराया| इस घटना से रुसी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने टर्की की 24/7 तफ्तीश शुरू की| जैसे ही रूसियों ने तुर्किश संवादों की तफ्तीश शुरू की तो उन्हें षड्यंत्र के खतरे का पता लगा जिसमे नाटो प्रशिक्षित सैन्य समूहों का whatsapp पर एक ग्रुप मिला जो कि कू की योजना बना रहे थे| रूस ने इस घटना के बारे में बिना कुछ कहते हुए टर्की से आने वाले यातायात को बंद कर दिया| कू की योजना पुख्ता होने के बाद उन्हें लगा कि टर्की की हालत भी लीबिया या इराक जैसी होने वाली है, ऐसा होने पर सेव्रेस की संधि की असफलता जैसे हालात बनेंगे और टर्की के साथ सीरिया के भी टुकड़े होंगे| रूस ने ये भी अनुमान किया कि अगर कट्टरवादी सुन्नी पार्टी टर्की की सत्ता में आती है तो उसके जिहादी रूस में घुसेंगे और यूक्रेन की समस्या को और उलझाएंगे| ऐसे में कू होने देना युद्ध को बढ़ावा देने जैसा होगा|

जल्दी ही जब कू होने की स्थिति बनी तो रूस ने राष्ट्रपति एरडोगन को सबूत दिखाए कि कैसे अमेरिकी मदद से ये षड़यंत्र रचा जा रहा था| जैसे ही कू शुरू हुआ एनबीसी चैनल ने दिखाया कि राष्ट्रपति एरडोगन जर्मनी भाग गए हैं—ऐसा करके उन्होंने राष्ट्रपति समर्थकों का मनोबल तोड़ने और षड्यंत्रकारियों के पक्ष में हव्वा बनाने का काम किया| जब एनबीसी ने यह खबर दिखाते हुए किसी अनाम सैन्य स्रोत से सुचना मिलने का दावा किया, तुर्किश सोर्सेज ने महसूस किया कि हो न हो यह जनरल कैम्पबेल की करतूत है| इस घटना से पता चलता है कि एनबीसी किसी अन्तराष्ट्रीय समूह के साथ मिलकर इस कू की योजना में शामिल रहा|

रूसियों ने न सिर्फ एरडोगन को चेतावनी दी बल्कि उनकी स्पेत्स्नाज सेना ने पीछे से सुरक्षा मुहैया करायी| राष्ट्रपति के विमान के पीछे उनके भरोसे के लोगों के तीन फाइटर प्लेन भी सुरक्षा में लगे रहे| मारमारिस रिसोर्ट से लौटते हुए इन्सिर्लिक की पहाड़ियों की तरफ से ऍफ़-16 लड़ाकू विमानों ने एरडोगन के प्लेन का पीछा किया| और उनके वफादारों के विमानों को भी ऍफ़-16 विमानों ने खदेड़ा| ऐसे कठिन समय में रुसी राष्ट्रपति पुतिन ने खुद मोर्चा संभाला और एक सीधी चेतावनी दी कि अगर एक सौ बीस सेकंड में उन्होंने अपनी कार्यवाही बंद नहीं कि तो अगले ही क्षण वे अपने एस-500 मिसाइलों को सक्रिय करके पांच सौ किलोमीटर के दायरे में मौजूद सभी नाटो विमानों को मार कर गिरा देंगे|

तब जाकर ऍफ़-16 लड़ाकू विमानों ने पीछा छोड़ा और इन्सिर्लिक के बेस में वापस जाने की बजाए ग्रीक के किसी स्थान में जाकर उतरे| तुर्किश सरकार ने झूठी अफवाह फ़ैलाने पर एनबीसी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करते हुए पुछा है कि वे बताएं कि उन्होंने कैसे जाना कि राष्ट्रपति एरडोगन टर्की से भागकर जर्मनी गए हैं|

जब या षड़यंत्र अपने चरम पर था तब राष्ट्रपति ने लोगों से अपील की कि वे अपने घरों से निकलें और इस कू को नाकाम करें| आश्चर्यजनक रूप से जो लोग इस अपील को सुनकर घरों से निकले वे तथाकथित रूप से कट्टर सुन्नी ही थे लेकिन जैसे ही उनको लगा कि कू नाकाम होने वाला है उन्होंने पाला बदल लिया और उन्होंने अमेरिकी निजाम से दूरी बना ली| क्योंकि कू की साजिश रचने वाले अतिवादी कट्टर समूहों की सऊदी-सीआईए-गुलेन ने मिलकर फंडिंग की थी|

सामने खड़े इस खतरे में टर्की ने जो झेला उसके बाद उसके पास एक ही रास्ता है कि वह पश्चिम, नाटो, अमेरिका और इस्लाम के सऊदी ब्रांड (जिसका कि वहां के शेखों ने बाना ओढ़ रखा है) की बजाए रूस और ईरान के नजरिए से समीक्षा करे|

इसलिए एरडोगन ने सफलतापूर्वक यह फैसला किया कि वह टर्की को कानूनी तौर पर इस दखल से पूरी तरह निजात दिलाएंगे| ऐसा करने पर इक्कीस सालों की घुसपैठ के प्रयास बेकार जायेंगे इसीलिए पश्चिम वाले चिल्ला रहे हैं क्योंकि टर्की को खोने का मतलब है सीरिया से भी विदा होना|

किसी भी भूराजनैतिक सबक को भूलकर टर्की ने कम से कम ये तो सीखा कि पश्चिम वाले ऑट्टोमन साम्राज्य के और ज्यादा टुकड़े करना चाहते हैं, साथ ही पश्चिम के हितों के लिए आतंकी समूहों को शह देकर टर्की की सेक्युलर सेना को भी भ्रष्ट करने का इरादा है| शिक्षाविदों, वकीलों, प्रशासकों के आतंकियों का पक्ष लेने पर, टर्की भी पाकिस्तान जैसा असफल राज्य साबित होगा| टर्की से कमाल पाशा का सक्षम नेतृत्व और समझदारी और विद्वतापूर्ण साम्राज्य की सदियों पुरानी विरासत, एरडोगन लीडरशिप और काबिल सेक्युलर सेना हटा दी जाये तो हमारा पडोसी पाकिस्तान बिलकुल टर्की का दूसरा बिम्ब नजर आता है|

केंद्रीय एशियाई देशों के आर्थिक विकास के दावों के साथ साथ भारतीय उपमहाद्वीपों के देशों को लेकर बनायी गई OBOR की योजना में अफीम या अफीम जैसे विकास के नारे ही असलियत हैं| OBOR की योजना तमाम बिन्दुओं को मिलाकर बन रही किसी तस्वीर जैसी है जो भविष्य में पूरी होगी तब तस्वीर साफ़ दिखाई देगी|

पहले चीन के पास कोई असल आर्थिक गतिविधि नहीं थी जिससे वो OBOR के लिए ट्रिलियन डॉलर्स खर्च कर सके| इसके लिए आर्थिक संस्थानों की एक पूरी श्रंखला खड़ी की गयी जिनमे एससीओ, ब्रिक्स आदि शुमार हुए| इन संस्थानों से सम्बद्ध देशों की सहमति हासिल करके आर्थिक विकास हासिल किया जा सके| चीन की जीडीपी घट रही है, मुद्रा का हेर-फेर शिखर पर है, चीनी उत्पादों की इंटरनेशनल मार्केट भी भरपूर हो चुकी है| अब चीन OBOR के देशों को हजारों करोड़ रुपये कर्ज देने के प्रस्ताव दे रहा है| इस भावी समझौते में पाकिस्तान और चीन शुमार हो चुके हैं| स्थानीय सरकारें पहले कर्ज ले भी ले रही हैं भले ही बाद में वो कहें कि उनके कर्ज राजेनेताओं के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया| स्थानीय सरकारों का ये कहना किसी काम नहीं आने वाला क्योंकि तब तक उन्हें अपने संसाधनों को चीन के हवाले करना पड़ेगा| इन कर्जों के बदले में उन देशों के सभी प्राकृतिक संसाधनों में चीन का हिस्सा लगाना ही पड़ेगा| चीन या अमेरिका में छपी ये पैसा असल में महज कर्ज देने के लिए ही बनाई गयी है| चीन किसी भी व्यापारिक घाटे की बात करता है तो वह अमेरिका या चीन में मुद्रा छाप करके ही पूरा किया जाना है| इसी तरह मुद्रा का हेर-फेर तब तक जारी रहेगा जब तक सभी देशों के संसाधनों की लूट पूरी नहीं हो जाती| OBOR से अगर एक बार संसाधनों की लूट पूरी हो जाती है तो फिर कहाँ पर किसका शासन है इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा| सूर्या में अमेरिकी हार के बाद मिडिल ईस्ट के जिहादी संघर्षों को मध्य एशिया में लाकर रूस या भारत के खिलाफ अग्रिम मोर्चे के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा| इन्ही देशों में अमेरिकी और चीनी साझेदारी से उगाई जा रही अफीम का भी बखूबी इस्तेमाल होना है| OBOR के सर्वेसर्वा चाहे अमेरिका हो या चीन, उनके इस कारोबार से इन सभी देशों के डरपोक प्रशासन को भी घुटना टेक कर आत्म समर्पण करना होगा|

चीनियों द्वारा इंटरनेशनल मंचों पर जो कड़वाहट घोली जा रही है उससे हम अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग के लिए भाग रहे हैं, और उन सभी देशों से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं जो हथियार बनाने का काम करते हैं जैसे उसी तरह जैसे हमे कल पाकिस्तान या चीन के साथ लड़े थे| इसी तरह हमारे पश्चिमी भाई लोग भी हिंदुस्तान के अन्दर जो दखलंदाजी करने वाले जो कदम उठा रहे हैं उनसे भी हम अमेरिकियों से नजदीकियां बना कर हथियार्रों की खरीद कर रहे हैं| लेकिन ये सभी हथियार इलेक्ट्रॉनिक अस्त्र शस्त्रों के बिना बंदरों के खिलौनों जैसे ही हैं| 26/11 की घटना के बाद हमने अमेरिका से P-8 निगरानी मिसाइल 8 बिलियन डॉलर में खरीदी लेकिन उसमे इलेक्ट्रॉनिक सूट नहीं था, जिनसे हवाई तौर पर उन नौकाओं की निगरानी होनी थी जिनसे आतंकी या उनके जैसे दूसरे घुसपैठिये देश की सीमा में आये| अब हम चीन सागर में निगरानी के लिए 22 ड्रोन ले रहे हैं जिनकी कीमत 2 बिलियन डॉलर बताई जा रही है| ये खरीद भी अमेरिका से ही होनी है, इन महंगे उपकरणों के विषय में दावा है कि इनसे समुद्री सीमा में दूर तक निगरानी हो सकेगी, उनकी दृश्य क्षमता दूर तक है, लेकिन अगर इनसे सुदूर सागर में कोई खतरा दिख भी जाता है तो उससे निबटने के लिए कोई मिसाइल या विमान अलग से भेजना पड़ेगा| ऐसी मिसाइलों के लिए हमने इजराइल के साथ अलग से करार किया,उसके बाद उन मिसाइलों के लिए हमने फ्रांस से करार किया, इस करार की कीमत दो बिलियन डॉलर अलग से, इन मिसाइलों में इलेक्ट्रॉनिक सूट लगवाने के लिए 3 बिलियन डॉलर अलग से करार किया जायेगा, इजराइल से| अगर हम इतना पैसा भारत में खर्च करते हैं तो हजारों तकनिकी दक्ष युवाओं को नौकरियां दी जा सकती थीं, जो अपना इंटीग्रेटेड सिक्यूरिटी सिस्टम डेवेलप कर सकते थे!
कोई सवाल का जवाब देने को तैयार नहीं कि क्या भविष्य में इन P-8 विमानों से बंगाल की खाड़ी में चीनी पनडुब्बियों का पता लग सकेगा? या हम ये भरोसा किये बैठे हैं कि इन उच्च क्षमता के विमानों को सिर्फ चेन्नई से कराची तक के एकल दिशा लक्ष्य के मद्देनजर तैयार किया गया है? या इसके लिए अलग से क्षमता विकसित की जानी है? पिछले दशकों के दौरान वायुसेना नौसेना या आर्मी के लिए ख़रीदे गए इन खिलौनों का अर्थ उनको इस्तेमाल करने की बजाए महज जानकारी बढ़ाने भर का रह गया है| अब जबकि हम F-16 लड़ाकू विमानों को टाटा के साथ मिलकर बनाने की तयारी में हैं तो भी उनमे इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट का प्रावधान नहीं विकसित करना है, उसके लिए टाटा ही एयरफ़ोर्स को बताएँगे कि कौन से नंबर का पुर्जा कहाँ से खरीदना है| F-16 लड़ाकू विमानों के ज्यादातर पुर्जे अमेरिका में बनेंगे जिससे अमेरिका को महान बनाने के ट्रम्प के दावे के मुताबिक सारी नौकरियां अमेरिका में ही सृजित हो सकेंगी और इन उपकरणों को अमेरिका से भारत भेजा जायेगा ताकि मेक इन इण्डिया के दावे के मुताबिक भारत में भी कुछ नौकरियों का सृजन हो सके|

ऐसी हालत में हिन्दुस्तानी आवाम की गाढ़ी कमाई जब्त करके ही बन्दर के खिलौनों जैसे हथियारों की खरीद फरोख्त होनी है, ये भी महज इसलिए क्योंकि अमेरिकी हुक्मरान भारत के हुक्मरानों को तरजीह न देकर पहले चीनियों के साथ डिनर करते हैं| और जैसे ही हमे डिनर का मौका मिलता है तो हम हिन्दुस्तानी अमेरिकी प्रस्तावों को मानने के लिए पूरी तरह तत्पर हो जाते हैं, हम अमेरिका के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का दावा करते हैं साथ ही यह भी भूल बैठते हैं कि दुनिया भर का आतंकवाद एंग्लो सैक्सन्स और उनके हितों के लिए ही है|
हमारे पास एक निजी सबक भी है जो चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि हिन्दुस्तान का बॉलीवुड दंगल जैसी फ़िल्में बनाने के लिए सर्वश्रष्ठ हैं, और हमे ऐसी फ़िल्में बनानी चाहिए क्योंकि उन्होंने पसंद किया| उसी के साथ चीनी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि हमे अरुणाचल और सभी सीमा विवादों में अपना रुख धीमा रखना चाहिए इन विवादों का समाधान हम बातचीत से कर लेंगे|
हमने न तो चीनियों से और न ही अपने पडोसी भाईजान से यह पूछते हैं कि वे कश्मीर में जबरन कब्ज़ा करके बलूचिस्तान, ग्वादर बंदरगाह से चीन तक की सड़क कैसे बना सकते हैं? और उस पाकिस्तान का जिसकी कश्मीर में कोई वैधानिक भूमिका नहीं वह काराकोरम हाईवे के लिए कश्मीर का वह हिस्सा 99 साल की लीज पर कैसे दे सकता है?

उपरोक्त उदाहरण दिखाते हैं कि हमने अपना सारा राष्ट्रीय गौरव उन्हें समर्पित कर दिया है जो हमे व्यापारिक भाषण देते हैं, हमारा उत्साह सिर्फ इतनी सी बात में है कि हमे अमेरिका और ब्रिटेन के नए बने राष्ट्राध्यक्षों के साथ डिनर का मौका मिले और वो हमे बैठा के सुरक्षा और विदेश नीति के प्रवचन दें| गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के सपने की बदौलत दुनिया के लिए एक दीगर मिसाल बनने और दुनिया की मानवता के लिए कुछ मदद कर सकने के लिए गुट निरपेक्ष आन्दोलन के उन्ही मौलिक सिद्धांतों का सहारा लेने की जरुरत है| पहला मुद्दा कश्मीर है, तिब्बत के कब्जे का मुद्दा छः दशकों से पूर्वी और पश्चिमी छोर के पड़ोसियों के साथ लंबित है| इस मामले में निदान के लिए नेहरु के उन सिद्धांतों को मानने की जरुरत है जिसमे उन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनी और ब्रिटिश राजकाज के उन सभी समझौतों को मना कर दिया था जिसे उन्होंने अपने ग्रेट गेम के मकसदों के तहत निर्जीव होते कुइंग घराने के साथ किया|

सुल्तान भारत आये आईआईटी के लिए

तुर्किश कू के असफल होने के बाद टर्की के लगभग सभी अहम् हुक्मरान हिंदुस्तान आये और उन्होंने हिदायतें दीं कि फ़तेहउल्लाह गुलेन संगठन ने हिन्दुस्तानी राजकाज में गहरी सेंधमारी की है और इससे हिन्दुस्तान की हिफाज़त करनी होगी, इस संगठन के मेम्बर अमेरिकी खुफिया के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, उन्होंने यह भी कहा कि देश को चलाने वाले हुक्मरान सच्चे हैं और वतनपरस्त हैं उनकी अमेरिकियों के साथ इतनी हमदर्दी ठीक नहीं, क्योंकि इसमें देश की सेनाओं के सेक्युलर नेचर में भी सेंध लगने का खतरा है, उस संगठन के लोग हमारी सेना को पश्चिम का नकलची बना सकते हैं और देश को जोखिम में पहुंचा सकते है| दुर्भाग्यवश हमने टर्की को ये जवाब दिया कि इस संगठन के लोगों ने हिंदुस्तान में कोई गुनाह नहीं किया है, उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकते और न ही उनके संगठन पर पाबन्दी| क्या ये वैसा ही बयान नहीं जैसा अमेरिका भागे रॉ डिफेक्टर के लिए हमे अमेरिका से मिला था, कि उसने हमारी धरती पर कोई गुनाह नहीं किया!
दूसरी बात जो टर्की ने कहीं वह बहुत ही रचनात्मक आर्थिक नीतियों की शुरुआत हो सकती है, जिसे आईआईटी (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्रेवलर्स अर्थात इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी नहीं) कहा जा रहा है, यानि इंडिया ईरान टर्की पार्टनरशिप कहा जा रहा है| हिन्दुस्तानी तहजीब के इस कदम ने दुनिया में हमारी रचनात्मकता का बहुत साफ़ सन्देश दिया है कि हमारी गुटनिरपेक्ष सोच से दुनिया को तमाम समस्याओं से निजात मिल सकती है| इसमें शामिल इलाकों के समग्र आर्थिक विकास के लिए मिलकर काम किया जा सकता है| अमेरिकी ईरान के मोर्चेबंदी के बीच हिंदुस्तान को सस्ते तेल की जरुरत थी जिसे सस्ते ईरानी तेल से पूरा किया जा सकता है, ईरानी बैंक जो इंटरनेशनल स्विफ्ट सिस्टम के चलते बर्बाद हो चले थे वो डॉलर में भुगतान नहीं ले सकते थे और न ही ईरान डॉलर में व्यापर करना चाहता है|यह बहुत ही जटिल परिस्थिति है|
भारत ने इस मामले में जिस बुद्धिमानी का परिचय दिया है वह क़तर सरीखी इंटरनेशनल पाबंदियों के बाद किसी देश के लिए एक बड़ा मुकाम है| यह एक सहज प्रक्रिया है| भारत टर्की को सोने में भुगतान करता है, टर्की उसी सोने का एक हिस्सा को बैंकों को भेजता है कमीशन के तौर पर| ईरान भारत को तेल या गैस देता है वह भी इंटरनेशनल मार्किट से कम कीमतों पर| एक बार यह प्रक्रिया बहाल होती है तो रूस और ईरान के साथ साथ नार्थ कोरिया इसी प्रक्रिया को मानना शुरू कर सकते हैं| इससे उनको राजनीतिक दखलंदाजी वाले नियमों, मनी एक्सचेंजर गिरोहों और काली पाबंदियों से निजात मिल सकेगी| इस मकसद को हासिल करने के लिए हिन्दुस्तानी सरकार ने सोना खरीदने के लिए मुद्रा की छपाई देश के बाहर करवाई ताकि इस बिज़नस मॉडल के की गंध विदेशी एजेंसियों को न लग सके|
तब से हर देश सोने के खरीद की दौड़ में लगा हुआ है, और शायद सोने का वह भण्डार हिंदुस्तान में ही मौजूद है जो अगले पांच सौ सालों के लिए खरीद के लिए काफी होगा| दूरदर्शी तुर्किश नेता हिंदुस्तान को चोटी से नीचे आते देख सकते हैं, जिसमे हिंदुस्तान का नीचे आकर अमेरिकी खेमे में बैठ जाना खतरे से खाली नहीं| इसमें निर्दोष नागरिकों को लूटने से सरकार को मिले जनसमर्थन के भी बिखर जाने का खतरा है| अपने संचित स्वर्ण को मिशनरी तरीके से सरकार को देकर वो महीने के खर्चों के लिए भी मल्टीनेशनल कंपनियों का ही मुंह देखेंगे और उन्ही के पैसे खर्च होने हैं जिनको कृषि क्षेत्र में आने का मौका दिया जा रहा है|
(तीसरी दुनिया में धर्मान्तरण के लिए ईसाई मिशनरियों ने भी तीस रूपया रोजाना देना शुरू किया है, अगर वो क्रिस्चियन विश्वासों के मुताबिक जीवन स्वीकारते हैं तो उनकी लॉयल्टी के लिए स्थानीय चर्च उन्हें रोजाना दे रहे हैं|)

सरकारें भी कमोबेश यही कर रही हैं जिसमे उन्होंने 1000 रुपया मासिक यूनिवर्सल इनकम और शायद इससे इसाई धर्मान्तरण भी रुक सके, लेकिन ये काम के बदले इनाम का माहौल बिगाड़ सकता है, और मल्टीनेशनल कंपनियों के नए उत्पादों के लिए मुफीद बाज़ार भी बनाने जैसा है| इसकी परिणति ईस्ट इंडिया कंपनियों के दौर में पड़े अकाल जैसी हो सकती है| ऐसी नारेबाजी के चलते अधिकांश मझले और लघु उद्योग इकाईयों की बंदी हो चुकी है| और अब बड़ी इकाइयों और रक्षा क्षेत्र के इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी मेक इन इंडिया का ग्रहण लगने वाला मालूम होता है|

दुविधा में डेविड

यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि इस सारे किस्से में जो दुनिया में सबसे समझदार समूह हैं, जी हाँ वही इसरायली, वही पहले लोग थे जिन्होंने इस भूमार्ग के खोलने का विरोध किया| उनके डर का सबब था शिया इस्लामिक फंडामेंटलिज्म जो आज ईरान के शासक वर्ग में शुमार होते हैं| इसरायली लोगों ने इस भूमार्ग का सदियों तक प्रयोग किया| स्वेज नहर बनने तक उनका हिन्द या ओल्ड सिल्क रूट की सड़क पर निर्बाध आवागमन जारी रहा|

आज भी सबसे रुढ़िवादी इसरायली ईरान में रहते हैं| शिमोन पेरेज़ के पहले के सभी इसरायली नेता ईरान से ही उठे और वे सभी बहुत अच्छी पर्शियन जानते थे| इजराइल पहला देश है जहाँ हाइफा में बहा’इयों का सर्वोच्च अध्यात्मिक और धार्मिक केंद्र यूनिवर्सल हाउस ऑफ़ जस्टिस मौजूद है| बहा’ई के संस्थापक बहाउल्ला ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष इजराइल में बिताये| आज भी ईरान के हजारों बहा’ई इजराइल की यात्रा करते हैं या इजराइल में रहते हैं| ये इसरायली लोगों की खूबी है कि उन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों में बर्बाद हुए राज्यों के तमाम आस्थाओं वाले विस्थापितों के शरणस्थल को आबाद किया है|

वर्तमान रुसी प्रधानमंत्री 2000 साल पहले का वाकया बताते हैं कि पर्शियन साम्राज्य यहूदियों के विस्थापन के समय के बैरभाव से सभी परिचित हैं| जब मोहम्मद ने राजा सायरस को अपने नए अध्यात्मिक मिशन के बारे में बताया तो भी सायरस ने उसी तरह पेश आया और कम से कम अगले चार सौ सालों तक पर्शियन ने अरबों के ईरान को पार करने पर पाबन्दी बरक़रार रखी|

शिया इस्लाम को मानने वाले जिन शासकों ने पर्शिया पर राज किया वे सभी के लिए बहुत सहिष्णु थे| जब तक ब्रिटिशों ने उनके आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करके कट्टरवादी शिया फिरके को उकसाया नहीं तब तक ईरान ग्रेट गेम में शामिल नहीं रहा| आज तमाम सबूत मौजूद हैं जिनसे जाहिर होता है कि ब्रिटिशों ने शिया मुल्लों को धन देकर उन्हें कट्टरवादी शिया फिरके में तब्दील किया| कट्टरवाद और हिंसा के लिए शियाओं की तुलना सऊदी अरब के वहाबियों से की जा सकती है| लड़ाकों को अफगानी जनजातियों के बीच भेजकर कश्मीर की बर्बादी रचने से लेकर 1950 के दशक में लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए ईरानी प्रधान मंत्री को बेदखल करने की घटनाओं में कट्टरवादी शिया फिरके का ही हाथ रहा है| कट्टरवादी शिया फिरके ने कम्युनिस्टों को चुन चुन कर मारा और मुल्लों ने जनजातियों से भी भीषण संघर्ष किया|

बशर्ते वो वहाबी सुन्नी न हो, सऊदी किसी को भी अपने देश का नहीं मानते और दोयम दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार करते हैं, और उनकी आबादी बढ़ने की भी बात नहीं मानते उसी तरह ईरान का कट्टर शिया तबका गैर शिया लोगों को ईरान का नागरिक नहीं मानता| इस रूढ़िवादिता के चलते असल पर्शियन बहा’ई और दूसरे मजहबी लोग जिनकी आबादी ईरान की कुल आबादी के 40 प्रतिशत से ज्यादा हैं वो ईरान में ही पहचान को मोहताज हैं| न ही तो उन्हें कोई परिचय पात्र हासिल है और न ही पासपोर्ट| उनका किसी सरकारी रिकॉर्ड में कोई जिक्र नहीं इसलिए वहां मानवाधिकारों के उल्लंघन की कोई बात नहीं उठती| वे बहुत से भाग्यशाली है जिन्हें ईरान से बाहर निकलने का मौका मिल गया, अब वो टर्की के शरणार्थी कैंप में रहते हैं, कुछ भाग्यशाली लोगों को पश्चिमी देशों में बसेरा हासिल हो गया जिनका सब कुछ ईरान में छुट गया|

इन निर्वासित ईरानियों को ईरानी दूतावासों और उनकी खुफिया पुलिस ने खोज निकाला इसलिए वे ईरान की छवि को धब्बा नहीं बने| जैसे सऊदी अपने पैसे से असर खरीद लेते हैं वैसे ही ईरानी भी करते हैं बस ये फर्क है कि ईरान ने इस काम के लिए अपनी खुफिया पुलिस को ऐसे समूहों को नेस्तनाबूद करने के लिए अधिकृत कर रखा है जो उन्हें खोजकर मार देते हैं| हिंदुस्तान और कनाडा में ऐसे तमाम लोगों को पनाह देकर उनकी पहचान सलामत रखी है, लेकिन फिर भी उन्हें अन्तराष्ट्रीय मंचों पर ईरानी पैसे और प्रभाव से जूझना है|

इसरायली लोगों को शायद इस गतिमान व्यापारिक सांस्कृतिक और अध्यात्मिक भूमार्ग पर ऐसे कट्टरवादियों से खतरा है जो ईरान की राजनीति को नियंत्रित करते हैं| कम से कम सऊदी अरब, अमेरिका और इजराइल वाले तो इस तरह के मामलों को अच्छे से जानते ही हैं| उन्हें उजड्ड राजघरानों और उनकी गतिविधियों का बखूबी पता है और अगर वे उन्हें शह देना बंद कर देते हैं तो ये राजघराने ऊँट और भेड़-बकरियां चराने के अपने पुराने खानाबदोशी कारोबार में पहुँच जायेंगे| ऐसा फिलहाल की पर्शियन सरकार के साथ नहीं है, जो इस समय एंग्लो अमेरिकन हितों के बाहर है साथ ही साथ रुसी और चीनी हुक्मरानों के साथ मौजूं है| पुराने व्यापारिक भूमार्ग पर कब्जे और उसे नए सिल्क रूट के तौर पर दिखाने की चीनी ख्वाहिश में ईरानियों ने उनके साथ होकर सारे शिया हलकों में उत्तरी रूस के खान तक विस्तार करने का सपना संजोया है| इजराइल वाले शायद इसी से भयभीत हैं कि ये सिलसिला कहाँ तक जायेगा!

ये हिंदुस्तान के लिए फ़िक्र करने वाले हालत हैं, क्योंकि हमारे भाई लोगों के ज्यादातर शिया फिरके सूर्या में युद्ध के लिए पहुंचे| आज जब टर्की ने यू टर्न के हालात पैदा कर दिए और सउदियों को हटा कर पूरी दुनिया में सुन्नी इस्लाम की बादशाहत बनाना चाहता है, और कुर्दिश स्टेट की खिलाफत में है तो यह इजराइल के लिए और ज्यादा जटिल हालत पैदा हो रहे हैं|

रूस और अमेरिका के भूराजनीति में वे अलग-अलग हैं अथवा उनके सुरक्षा खतरे उनके स्थान की वजह से नहीं, यह इजराइल के लिए हिदायत जैसा है| इजराइल इस बात के लिए जोर दे रहा था कि सूर्या के युद्ध में ईरान की भूमिका सीमित हो| इजराइल इस उम्मीद के साथ बड़ी बेसब्री से कुर्दिश संगठन को हवा दे रहा था कि अमेरिका और इजराइल की मदद से किसी दूसरे गैर इस्लामिक देश का बनना शिया और सुन्नी जिहादियों के लिए एक बफर क्षेत्र साबित होगा|

पुराने भूमार्ग के खुलने में छिपी इन दिक्कतों के अलावा इजराइल को कोई आपत्ति नहीं| यह उनके अस्तित्व को संकट होने का भय है, जिसके चलते उन्हें ईरान के तख्तापलट में शरीक होना पड़ा| हालाँकि गैर शिया समूहों, जिनकी आबादी ईरान का लगभग 40 प्रतिशत है, वो ईरान में शिया सुन्नी की सरकारों को गिराने में लगे हैं जिसके लिए उन्होंने इस्लाम का अपना तर्जुमा ईजाद किया है| उन्हें भी टिकाऊ और समन्वय के लिए वैकल्पिक रणनीति की जरुरत है| इजराइल इनसे अलग है और अपनी हिफाज़त के पुख्ता इन्तेजाम कर रहा है क्योंकि दुनिया में इस्लाम और ईसाइयत के बीच यहूदियों की बदहाली का हजारों साल पुराना इतिहास है|

आतंकवाद में भारत दुर्दशा

जो हालत इजराइल की है कमोबेश कश्मीर मामले में हिंदुस्तान का भी वही हाल है| वर्तमान कश्मीरी मुखिया ने बड़ी बहादुरी के साथ घोषणा की कि अगर हम अमेरिकियों को कश्मीर में आने की इजाजत देते हैं तो यह दूसरा सूर्या बन जायेगा, यह घाटी में शिया क्रेसेंट की दखल का असर बयान करता है| यह वक्तव्य उस समय आया, जब भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका में थे और अमेरिका के साथ मिलकर पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात कर रहे थे| इस मामले में मजाक की हद तब हुई जब अमेरिका ने घोषणा की कि वे सूर्या में सीआईए के आतंवादी समूहों को समर्थन देने के गुप्त प्रकट सभी अभियानों को समाप्त कर रहे हैं| और वे इन्ही आतंकवादी समूहों के खिलाफ लड़ने की बात करते हैं, जिन्हें पहली जगह सीआईए ने तैयार किया और दूसरी जगह पेंटागन या किसी दूसरी मिलिट्री एजेंसी ने! शायद इसीलिए कश्मीरी मुखिया ने ऐसा बयान दिया होगा क्योंकि हम अपनी सेनाओं को कश्मीरी जिहादियों से लड़ने के लिए पेंटागन की ट्रेनिंग की ख्वाहिश रखते हैं!

भारतीयों को असहज सत्य नकारने की आदत पड़ गयी है और वे इसे यूँ भूल जाते हैं जैसे ऐसा कभी हुआ ही न हो| जो कुछ भी ऊपर कहा गया है वह ऐसा ही सच है जिसे हम भूलना चाहते हैं, क्योंकि यह हमारे मष्तिष्क में बौद्धिकता के बेसुरे राग जैसा है| लेकिन जो सच है वह तो वही रहता है| सच यही है कि गुपचुप तरीके से सीएआई ने कश्मीर में तमाम जिहादी और पगड़ी वाले अराजकतावादियों को प्रशिक्षण दिया जिहोने ईश्वर की घाटी में बेहिसाब तबाही मचाई| पिछले पचास सालों में हजारों लोगों को मार दिया गया और लाखों लोग घाटी से बेघर हुए| ऐसे तमाम लोग अपने भारत के अनेक भागों में शरणार्थी कैम्पों में रहने को मजबूर हैं, सूर्या की लड़ाई में जो कुछ भी हुआ वह पिछले साथ सालों से यहाँ जारी है||

यह भी आश्चर्यजनक है कि किसी एक्टिविस्ट के ट्वीट किये विडियो को देखकर वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों को जवाबदेही के लिए तलब किया, जो कि किसी भी सूरत में सामने नहीं आने वाले| साथ ही अमेरिकी नीति निर्माताओं ने जांच करके पाया है कि दूसरे ट्रेनिंग प्रोग्राम में ऐसे मॉडरेटस की ट्रेनिंग में एक बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च हुआ, जिसमे भरोसे के महज 6 लोग निकले जो अभी विलुप्त हैं|

https://thedailycoin.org/2017/08/01/trump-saw-disturbing-video-shut-cias-covert-syria-program/
http://economiccrisisreport.com/trump-saw-a-disturbing-video-then-he-shut-down-the-cias-covert-syria-program/

क्या ऐसा नहीं है कि हमारे पास कम तस्वीरें, ग्राफ़िक्स या वीडियोज हों, जिसमे दुनिया भर ने देखा कि महिलाओं और बच्चों बड़ी बेरहमी से मारा गया, कश्मीर में ही सीआईए प्रशिक्षित जिहादियों ने ही गर्भवती महिला की छातियाँ काट दीं? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम भी ट्रम्प को दिखाएँ ताकि वो सीआईए और हमारे पडोसी भाईजान लोगों के आतंक को ईंधन देना बंद करने का निर्णय कर सकें? और अगर वे हमारी मदद नहीं कर सकते हैं तो क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं कि वो चाहे कहीं भी हों उन्हें चुन-चुन कर नष्ट करें? दशकों तक यह देखना कितना दुखद है कि कश्मीर अवैध कब्जे में है भले ही यह कितना भी कठिन हो लेकिन इसे बंद करना ही पड़ेगा ताकि कश्मीर चीन के हाथों में पड़कर पूरे भारत को अस्थिर करने का औजार न साबित हो, क्योंकि चीन की महत्वाकांक्षी OBOR की योजना में भारतीय सिल्क रोड को ही अपने मुताबिक रिब्रांडिंग की है! समय ही बताएगा कि भारत और इजराइल की सलामती कब बहाल हो सकेगी, क्योंकि दोनों ही तमाम रंगों के मजहबी कट्टरवादियों से वाकिफ हैं, जो अब राजा हो गये|

कहाँ खड़ा है भारत

भारत चौराहे पर खड़ा है| ऐसे में या तो हम गुट निरपेक्ष के रुख पर वापस जा सकते हैं ताकि नेतृत्व करके आपसी कलहों से दुनिया को निजात दिला सकें| बेफिजूल मजहबी झगड़ों, आर्थिक विचारधाराओं, गोपनीय राजभक्ति से जिसने दुनिया को 2000 सालों से ज्यादा समय से लगातार युद्धभूमि बना रखा है| ईसाई वर्गों और सम्प्रदायों और इस्लामिक विभागों और यहूदी विभागों और इसाई और इस्लामिक फिरकों, या उनकी सीक्रेट सोसाइटियों जैसे फ्रीमैसन, इल्लुमिनाती, असैसिन्स, ओपुस डाई, कार्बोनरी, स्कल्स एंड बोंस सरीखे तमाम संगठनों ने समय समय पर, अपनी सरकारों के साथ मिलकर धोखेधड़ी से अथवा खुलेआम, एक समूह ने दूसरों के साथ मिलकर, देशों के संसाधनों की लूटखसोट करके, दुनिया को ऐसे अँधेरे में पहुंचा दिया है, जिसमे विभाजन और संघर्ष सदा बना रहे|

जब ये भारत की बात हो तो उपरोक्त सभी आपस में मिलकर लूट और डकैती करते रहे हैं, भौतिक संसाधनों की बात हो अथवा आत्माओं की ताकि वे अपनी लड़ाइयाँ अपनी मनचाही जगहों पर लड़ सकें| सौभाग्य से कहें या दुर्भाग्य से हिंदुस्तान के तमाम नेता इन सब चीजों से वाकिफ नहीं, इसलिए इन मसलों में पड़ जाते हैं और ऐसे संघर्षों में हिस्सा बन जाते हैं जिनसे कृषि और आर्थिक मकसदों के लिए अक्सर ऐसी विनाशकारी नीतियां बनाते हैं कि आम आदमी या आम भारतीय नागरिक के जीवन को खतरा हो जाता है|

जिन्हें किसी भी दर्जे की सुरक्षा के बारे में जानकारी नहीं हो, ऐसे नेता बच्चों की तरह चिल्ला के सीमा सुरक्षा में लगी सेनाओं की भी शिकायतें करते हैं| जिन लोगों ने बंटवारे और संघर्षों के लिए भड़काया वो दूर बैठ कर रोते बच्चों को देखकर मजे लेते हैं और आगे लूटने के लिए हर कदम पर चोर, पुलिस और जज वाला खेल खेलते रहते हैं|

हमे गंभीर दूरदृष्टि के साथ 100 सालों का रोडमैप तैयार करने के लिए खुद को समर्पित करना होगा किसी इण्डिया फर्स्ट, इण्डिया सेकंड, इण्डिया थर्ड टाइप की नारेबाजी के लिए नहीं बल्कि अपने कार्यक्षेत्र और विचारों के लिए| हमे खुद को गुट निरपेक्ष मूल में रखते हुए, बहुध्रुवीय विश्व को फिर से परिभाषित करने के लिए, पिछले 70 सालों की ज्वलंत समस्याओं में पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं के लिए चाहे शांतिपूर्वक बातचीत से जैसा कि चीनी राष्ट्रपति ने कहा, या फिर सूर्या वालों की तरह जरुरी बल प्रयोग करके आतंकवाद और क्षेत्रीय सीमाओं के विवादों और समस्याओं के समाधान तलाशने हैं जिन्हें एंग्लो अमेरिकन लॉबी ने हमारे ऊपर थोपा| भारत के भीतर जमे अंकगणितीय जिहादी समूह हों या वामपंथी बहुरंगी पगड़ियों वाले अराजकतावादी इन सभी में समानताएं हैं और ये सूर्या के छद्म आतंकी समूहों से कम नहीं जो हमारे पडोसी भाईजान लोगों के हाथ या पैरों के निशानों पर चलते हुए एंग्लो अमेरिकन लॉबी के सदियों पुराने फूटडालो और राज करो वाले नुस्खे में फंस कर अलग-अलग समय में गुनाहगार, पुलिस या जज बनते रहते हैं|

यह उस पुरानी कहावत को भली प्रकार से समझने का समय है जो कहती है कि “कई बार दूसरों की गलतियों से सीखना होता है.” भले ही हम टर्की का सबक भूल जाएँ, हमे यह कहावत जरुर याद रखनी चाहिए| हमारे पडोसी का हाल सबके सामने है जिसने अमेरिका को अपने अंदरूनी मामलों में दखल देने का मौका दिया और आज वैश्विक आतंकवाद में एक असफल देश साबित हुआ है, उसके बावजूद अमेरिकी मोर्चेबंदी में खुद को आतंकवाद से लड़ता हुआ देश मानता है, अमेरिकी रणनीति के मुताबिक रुसी घेरेबंदी खुद बर्बाद हो रहा है| क्या हम हिन्दुस्तानियों को भी इसी तरह इस्तेमाल हो जाना चाहिए? या फिर हमे अपने गुट निरपेक्ष रुख पर कायम रहकर अपने देश की सबसे बड़े जल्लादों, गैंगस्टर और लालची रक्तपिपासुओं से संसाधनों को हड़पने से हिफाज़त करनी चाहिए?

यह समय है जब हम बच्चों की तरह रोने से बचें और समाधान तलाश कर रहे सभी लोगों को दिलासा देकर देश के भीतर एक दूरदर्शी की भूमिका निभा सकें| इसकी बजाए कि OBOR का हिस्सा बनकर कृत्रिम रूप से रचे जा रहे सडकों के जाल में फंसकर पूरे एशिया को चीन का गुलाम बना दें| हमारी सदियों पुरानी समस्याओं के लिए और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ कर एशिया को चीनी कर्ज और गुलामी के दानव से बचने के लिए कश्मीर के उत्तर और उत्तर पश्चिम के पुराने रास्ते को खोलकर अपनी ज्ञान सम्पदा और मानवता के लिए जरुरी व्यापार का प्रवाह फिर से हार्टलैंड कश्मीर से होने दे| हार्टलैंड कश्मीर से निकली मानवता के विकास की धारा पिछले 2000 सालों से युद्धों की विभीषिका में फंसी दुनिया की इंसानियत के लिए मरहम का काम करेगी| कश्मीर के पैगम्बर नौरिद्दीन की भविष्यवाणी को याद रखना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था “ओ कश्मीर जाग जा जिस दिन तू परम ज्ञान से दुनिया का केंद्र बनेगा उस दिन दौलत तेरे कदम चूमेगी”| मानवता को बचाने के इस मिशन में हम हिन्दुस्तानी अकेले ही हैं और अकेले ही चंद दोस्तों के साथ चलेंगे जिन्हें हमारे मकसद की कद्र है और नजर की भी|

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