Uncategorized @hi

गुलामी में डूबता हिंदुस्तान: 1947 से 2016 -गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के अगुवा से लेकर पश्चिम की गोद तक

This post is also available in: English

गुलामी में डूबता हिंदुस्तान: 1947 से 2016

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के अगुवा से लेकर पश्चिम की गोद तक 

श्री किडाम्बि

जो भी त्रिंकोमाली पर काबिज होगा वो पूरे हिन्द महासागर का नियंत्रण करेगा|

बोनापार्ट नेपोलियन

लेकिन नेपोलियन की गणनाओं में भारत कहाँ है?    – देकार्ते

मालूम होता है कि वे ब्रिटिश कॉर्पोरेट प्रेस्टीटयूट से अमेरिका आधार पर नाचने वाली एशियाई वेश्यांए बन रहे हैं| -जिम डी विट

दो सौ से ज्यादा घटनाएँ ऐसी रही हैं जब हमने (अमेरिका ने) दूसरे देशों को अपनी बात मनवाने के लिए अपनी सेनाएं उतारी हैं| –जॉन स्टॉकवेल सीआई के पूर्व अधिकारी और लेखनकर्ता

एलन डुलेस जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के सचिव रहे हैं, पाकिस्तान के मामले में बताते हैं कि अमेरिका का प्रयास एशिया के लिए एक हाथ में अमेरिकी सहायता और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर चलने वाला रहा है|

किसी देश की विदेश नीति गृह सुरक्षा के मामले में सीधी जुड़ी होती है| इस हिसाब से युद्ध एक तरीके की कूटनीति ही है जिसमे हाथ में हथियार भी रखना होता है| यह संभवतः ऐसा सबक है जो हमे अपने उन पश्चिमी रिश्तेदारों से दोबारा सीखना चाहिए जिन्होंने पाकिस्तान और भारत का बंटवारा किया| आजादी के बाद यही ज्ञान हमारी आत्म निर्भरता और समाजवादी राज्य बनकर सबके लिए संपत्ति के विभाजन की नीति साबित हुआ| हालाँकि पहले दौर में ब्रिटिश समर्थित निर्देशों के लिए नेहरु को उनका पिट्ठू कहा जाता है, लेकिन बाद में दृढ इच्छाशक्ति वाले, समर्पित स्टेट्समैन नेहरु ने ही संयुक्त राष्ट्र में आत्म निर्भरता आधारित विदेश नीति का दावा करने में निर्णायक भूमिका निभाई| इसी के तहत आज़ादी के बाद महानतम वैज्ञानिक, सैन्य, तकनिकी और खुफिया उपलब्धियों के साथ आज़ादी के चालीस बीते|  यह सिलसिला जारी रहा प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के उदित होने तक जारी रहा| दुनिया ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की अद्वितीय विदेश नीति वाले भारत के रूप में पहचान बनी| यह नीति पश्चिम की दमनकारी, शोषक और विभाजनकारी नीतियों के समीक्षक की रही| साथ ही हम पश्चिमी नीतियों पर सोवियत प्रतिक्रिया के कम्युनिज्म के रास्ते के समालोचक साबित हुए|

इस विदेश नीति के अर्धविकसित चरण में ही हमे चीन के साथ युद्ध में पराजित होना पड़ा जिसका आरोप नेहरु पर लगता है| माओ ने नेहरु को “साम्राज्यवाद का भागता कुत्ता” कहा जबकि असल में नेहरु का दृढनिश्चय साम्राज्यविरोधी, पूंजीवाद विरोधी और पश्चिम विरोधी ही रहा| इसलिए भारतीयों को माओ का  इतिहास जानकर इस उपाधि की सार्थकता की बहस में शामिल होना पड़ेगा|

नेहरु का ब्रिटिश समर्थक से ब्रिटिश विरोधी मतान्तर का नतीजा सामने आया ब्रिटिश खुफिया की जानकारी से| भारतीय दक्षिण पंथी और वामपंथियों के इस्तेमाल की जानकारी से नेहरु को ब्रिटिश खुफिया के हथकंडों का पता लगा| इन्ही हथकंडों में महात्मा गाँधी और सुभाष चन्द्र बोस सरीखे भारतीय नेतृत्व की हत्याएं भी शामिल रहीं| नेहरु अमेरिका की स्वार्थी विदेश नीतियों पर हमेशा उग्र विरोधी रहे| एशियाई देशों के लिए अमेरिकी विदेश नीति में एलन डुलेस की इसाई धर्म प्रचार की वकालत और वित्तीय मदद के गुप्त एजेंडे नेहरु को फूटी आँख नही सुहाए|

स्वेज समस्या पर संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाही में भारत का जो पक्ष रहा वह सिर्फ साम्राज्यवाद विरोधी ही नहीं था, भारत ने इस मुद्दे पर पूरे जोर से ब्रिटेन को एक आतंकवादी देश घोषित करने की माँग तक कर डाली| भारत को रुसी प्रेक्षकों के सामने यह स्थिति खोनी नहीं चाहिए| साथ ही नेहरु की साख में एक खूबी यह भी रही कि उन्होंने भारत को रुसी कैंप में ले जाने की जल्दबाजी भी नहीं दिखाई| उन्हें कम्युनिज्म के साथ साथ मार्क्सवाद के दुष्प्रयोगों का अनुमान था| वे जानते थे कि मार्क्सवाद का प्रयोग पश्चिमी शोषण पर रूस की प्रतिक्रिया भर है और इसका कोई गंभीर वैचारिक आधार नहीं| नेहरु ने ईसाइयत के हजार साल पुरानी खेमेबंदी में छद्म नाम रूपों, कम्युनिज्म और पूंजीवाद में फंसने की बजाये भारत को आजाद बनाये रखना पसंद किया|

नेहरु की दृष्टि भारत की प्राचीन प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करके ज्ञान और मेधा में श्रेष्ठता बनाने की रही| नेहरु वह प्रतिष्ठित भारत बनाने में लगे रहे जहाँ मानव मेधा की विविधता और सह अस्तित्व साकार हुआ| नेहरु ने माना कि भारत के लिए एकमात्र रास्ता है कि वह आत्म निर्भरता के लक्ष्य को महसूस करे|

देश के लिए यही नजरिया उनके “डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया” के आलेखों में मिलता है| इस प्रकार के मार्गदर्शक सिद्धांतों से बनी दूरदर्शी विदेश नीति हमारे घरेलू और देश के आर्थिक मामलों में साकार हुई है| नेहरु ने महसूस किया कि भारत खाद्य सुरक्षा समेत सभी मामलों में आत्म निर्भर नहीं होता भारतीयों को अपने लक्ष्य स्पष्ट नहीं हो सकेंगे| आधुनिक भारत के मंदिरों को स्थापित करने में उनकी नीतियां उस दिशा में पहला कदम है| नेहरु ने पूंजी और उत्तर उपनिवेशी शासन वाले साम्राज्यवाद के इस खुले विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकाई| बाद के प्रधानमंत्रियों (शास्त्री, इंदिरा, राजीव) में, जिन्होंने नेहरु की दृष्टि समझकर उनकी नीतियां जारी रखीं, उन सभी ने जान देकर उसकी कीमत चुकाई है|

नेहरु की मौत का अधिकारिक बयान है कि उनकी मौत सेरिब्रल थ्रोम्बोसिस से हुई, लेकिन सच तो यह है कि उनकी हत्या हुई, क्योंकि अंग्रेजों ने यह जान लिया कि नेहरु को पता है कि चीन का इस्तेमाल ब्रिटिश लोगों द्वारा हुआ है, और यह जानते हुए वे संयुक्त राष्ट्र (जो कि उस समय तक अपनी शैशवावस्था में था) को नेस्तनाबूद कर देंगे| साथ ही उन्हें पता था कि गुट निरपेक्ष आन्दोलन को ही विश्व नेतृत्वकारी शक्ति बनाकर जिससे दमनकारियों को ठिकाने लगाने में कामयाब हो जायेंगे| इसी के साथ नेहरु के प्रयास भारत को आत्म निर्भर बना कर उसे कामनवेल्थ से दूर ले जा रहे थे| अगर भारत अपने ही प्रयासों से पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर लेता तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी सहायता की जरुरत नहीं रहती| इससे भारत उन सभी देशों का आदर्श बन जाता जो उस दौर में गुलामी से आजाद हुए थे|

नेहरु के अर्थशास्त्र ने भारत की नींव राष्ट्र निर्माण की प्राचीन कला के एक दस्तावेज के रूप में रखी साथ ही समाजवाद की भारतीय सन्दर्भों में पुनर्व्याख्या भी प्रस्तुत की|

आर्थिक क्षेत्र दो भागों में बाँट कर काम किया: प्रमुख क्षेत्र और प्राथमिक, द्वितीयक और सहायक क्षेत्र| प्रमुख क्षेत्रों में सरकार की जिम्मेदारी बहाल की जिसमे रक्षा, घरेलू संरचनाओं, शिक्षा, कृषि को शुमार किया| बाद में बैंकिंग और तेल उद्योग के क्षेत्रों को इस भाग में इंदिरा गाँधी ने जोड़ा, वो भी तब जब देशभक्त तेल के उद्योगों ने 1971 के युद्ध में तेल सप्लाई करना बंद कर दिया उसके बाद| बैंकिंग और इंश्योरेंस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों के बाद उन्हें भी प्रमुख क्षेत्र में जोड़ा गया जो कि निहायत जरुरी था|

आज़ादी के बाद जब चिकित्सा, विज्ञानं और तकनीकी क्षेत्रों में दक्ष कोई नहीं बचा, सरकारी खजाने की आखिरी पाई तक अंग्रेज लूट कर विदा हो गए और महात्मा गाँधी की हत्या से भारत की सामाजिक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा तार-तार हो गयी, तभी अंग्रेजों की उकसाई अफगानी टट्टुओं की सेना ने कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर कब्ज़ा करके भारत का अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते मध्य एशिया का संपर्क काट दिया| ऐसा करने से विकास के तमाम रास्ते बंद हो गए, इसके बावजूद नेहरु टीम ने सारे झंझटों के साथ यह निर्णय लिया कि भारत को विश्व शक्ति बनाना है|

जिन लोगों ने नेहरु प्रशासन में काम किया और उनके उत्तराधिकारी रहे प्रधानमंत्रियों ने भारत को विश्व शक्ति बनाने के इस महान कार्य को ह्रदय की गहराई में उतार कर काम किया| दिन रात काम करते हुए, योजनायें और क्रियान्वयन पर जोर दिया, संसाधन जुटाए और सर्वाधिक क्षमता से उनका नवोन्मेष प्रयोग किया|

यह कहने की जरुरत नहीं कि वहां भ्रष्टाचार नहीं था, उस प्रगतिशील कराधान के चलते, जो कभी दहाई के अंक तक नहीं पहुंचा, राजनीति के निचले हिस्से और राजकाज में काले धन की गुंजाइश कम थी|

इस दौर में फ़िरोज़ गाँधी के नेतृत्व में इंश्योरेंस सेक्टर का राष्ट्रीयकरण हुआ, जिससे सुनिश्चित किया गया कि इंश्योरेंस के बाद बची पूंजी से राष्ट्र निर्माण किया जा सके| जिसकी वजह से फ़िरोज़ गाँधी की भी जान गयी|

इंश्योरेंस और बैंकिंग के पूंजीलाभ से निजी प्रबंधन द्वारा लोभी मालिकों के हित में सत्यानाश किया जा रहा था अथवा राजनीतिक हितलाभ के लिए कॉर्पोक्रेसी का हेरफेर जारी था|

आज़ादी की भोर से वर्ष 1985 तक भारत ने हजारों हजार करोड़ का निवेश प्रमुख क्षेत्रों में किया जिससे आर्थिक विकास का इंजन बना जिसकी बागडोर उद्यमी हाथों में थी| ऐसा नहीं कि इस तरीके में कमियां नहीं थी, लेकिन जिम्मेदारी और जवाबदेही मुकम्मल बंदोबस्त था| इस प्रकार आत्म निर्भर, आत्म पोषित अर्थव्यवस्था को प्रमुख रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में भारत ने अपनी मजबूत आवाज बुलंद की| भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक सदस्य भी रहा| (गौरतलब है कि जनता सरकार ने रूस को अफ़ग़ानिस्तान की तरफ बढ़ने से रोका)|

दुनिया के तमाम मामलों में गुट निरपेक्ष आन्दोलन को संयुक्त राष्ट्र से ज्यादा सफल माना जाने लगा| वस्तुतः गुट निरपेक्ष आन्दोलन ही इतना सक्षम रहा कि वह ताकतवर देशों के अनवरत जारी अन्याय को रोक सके|  गुट निरपेक्ष आन्दोलन में (संयुक्त राष्ट्र की तरह) भारत ने अपनी सेनाएं मुहैया कराई ताकि संघर्ष वाले क्षेत्रों में शांति बहाल की जा सके और स्थायी संतुलन के लिए बातचीत का दौर शुरू हो सके|

अर्ध वैधानिक संस्थान के रूप में मौजूद संयुक्त राष्ट्र के परीक्षा की घडी तब आई जब स्वेज नहर का विवाद बढ़ा| जैसी कार्यवाही संयुक्त राष्ट्र में हुई उससे पूरी दुनिया को खास कर नेहरु और कृष्णा मेनन को स्पष्ट हो गया कि संयुक्त राष्ट्र पश्चिम का एक औजार भर है और इसका नए बने देशों की समस्याओं के लिए समाधान करने की कोई रूचि नहीं| एक जोर का झटका देकर रूस को अचंभित करते हुए अमेरिका और ब्रिटिश नफ़रत को ठिकाने लगाने के लिए नेहरु के नेतृत्व में ब्रिटेन को रोकने, एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने और संयुक्त राष्ट्र से बाहर करने की तीन मांगे भारत ने उठायीं | भारत ने इस बात की भी धमकी दी कि वह संयुक्त राष्ट्र से बाहर चला जायेगा|

नेहरु और एडविना के विवाद में राष्ट्रीय हितों का बरबाद होना वाजिब नहीं| कमोबेश ये किस्से लोगों में फ़ैलाने वालों ने अफवाह फैला कर नेहरु को बदनाम करने में देश की तमाम उपलब्धियों को भी दरकिनार करने का षड़यंत्र रचा है|

लाल बहादुर शास्त्री ने इन्ही नीतियों को जारी रखा, अंतर्राष्ट्रीय गुण्डई को दरकिनार करके सेना और खाद्यान्न आत्म निर्भरता के क्षेत्र में देश को आगे बढाया| नतीजन उनको भी इसकी कीमत बलिदान देकर चुकानी पड़ी|

कश्मीर के मुद्दे पर पश्चिमी आकाओं के उकसाने पर पाकिस्तान ने शास्त्रीजी पर 1961 की लड़ाई थोपी| उस लड़ाई में शास्त्रीजी ने न सिर्फ लड़ना स्वीकार किया बल्कि हमारी सेनाएं समाधान निकालने के लिए रावलपिन्डी तक पहुंची| जब सेनाओं ने लाहौर में डेरा जमा लिया तो रूस के लिए रवानगी के पहले ही उनकी मौत तय हो गई| उनकी हत्या की योजना अमेरिकी ख़ुफ़िया ने बनाई जिसमे शास्त्रीजी के उन करीबियों की मदद ली जो अमेरिकी ख़ुफ़िया के नियंत्रण में थे, उन्ही के द्वारा समय के साथ असर करने वाले जहर का प्रयोग किया| उनकी इस असामयिक मौत का आरोप रुसी एजेंसी पर ही लगा|

जब श्रीमती गाँधी ने इन्ही नीतियों को दोगुना करके दोहराने का प्रयास किया तो, अमेरिकियों ने पाकिस्तान को युद्ध के लिए फिर से उकसाया| पाकिस्तान ने कश्मीर राजस्थान और बांग्लादेश में एक साथ मोर्चे खोल दिए|  श्रीमती गाँधी ने जीत दर्ज की, यह अमेरिकियों के लिए अप्रत्याशित घटना थी| यहाँ हम तुर्किश कू के आलेख का हवाला देना चाहेंगे जिसमे हमने स्पष्ट किया है कि ये वही समय था जब अमेरिका-ब्रिटेन ने संयुक्त रूप से टर्की की बजाये मिडिल ईस्ट को इस्तेमाल करके वहाबी छाप इस्लाम को अपना औजार बनाया| और सऊदी अरब के वहाबी छाप इस्लाम का इस्तेमाल करके यूरेशिया की राजनीति पर नियंत्रण करना शुरू किया|

हिन्दुस्तानियों को यह गौर करना चाहिए कि इस समय दक्षिणपंथी और वामपंथी आतंकवाद व्यवस्थित तरीके से भारत पहुँच रहा हैं| इस लिहाज से देखा जाए तो अमेरिका ने पाकिस्तान पोषित आतंकवाद पर लगातार शह दी है, हाल का उड़ी हमला ताजा उदहारण है| ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफीम कारोबार की तर्ज पर आतंकवाद की इन गतिविधियों में फंडिंग ज्यादातर नशे के कारोबार से ही रही है| श्रीमती गाँधी को नशे के कारोबार और आतंकवाद के बीच के रिश्ते का अंदाजा लग गया था जो कि उस समय अफ़ग़ानिस्तान, भारत और पाकिस्तान के बीच नशे का स्वर्णिम त्रिभुज क्षेत्र था जिसके रास्ते पंजाब और कश्मीर से गुजरते थे|

इसी नशे के कारोबार और पैसे का इस्तेमाल खालिस्तान आन्दोलन को हवा देने में भी हुआ| जब इंदिरा जी ने इसके खिलाफ कदम उठाया तो उसकी कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी| ईस्ट इंडिया कम्पनी के मालिकों ने उनकी मौत का फरमान जारी किया बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के गलियारों में और आरोप लगा पंजाबी स्रुरक्षा कर्मियों पर| उसका अदालती स्वांग भी महात्मा गाँधी की हत्या सरीखा सनसनीखेज नाटक ही साबित हुआ|

राजीव गाँधी इस मामले की हकीकत का जानते हुए त्रिंकोमाली नौसेनिक अड्डे को पश्चिमी देशों के कब्जे से बचा सकते थे परन्तु उनकी भी हत्या हुई, आरोप लगा श्री लंकाई तमिलों पर|

अगले प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव अधिक व्यवहारकुशल, रणनीतिकार और चतुर वयोवृद्ध थे| उन्होंने भी आर्थिक आत्म निर्भरता की अवधारणा पर काम जारी रखा| वे अन्तराष्ट्रीय मामले दृढ़तापूर्वक, निष्पक्षता के हिमायती रहे, फिर भी उन्होंने पश्चिम की तुष्टिकारी नीतियों की बजाए व्यवस्थित उदारीकरण और निजीकरण का रास्ता अख्तियार किया, वो भी तब तक के लिए जब तक भारत के लिए आगामी खतरे स्पष्ट रूप से सामने न आ जाएँ|

दुर्भाग्यवश पी.वी. नरसिम्हा राव ने देश को जिस व्यवस्थित उदारीकरण और भारतीय निजीकरण की जरुरी खुराक दिलाई, बाद के प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व में वह खुराक खतरनाक साबित हुई और आज अनियंत्रित, विध्वंसक, दिशाहीन और अतार्किक नजर आती है| यह दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति आज तक जारी है|

भारतीय रक्षा अनुसन्धान के प्रोजेक्ट जबरन बंद किये गए, आईआईटी सरीखे संस्थानों का अवमूल्यन हुआ नतीजा ये हुआ कि विगत पांच वर्षों में हम दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक हैं| एक फौरी नजर डालें तो पता चलता है कि फ्रांस के साथ हुए हालिया राफेल सौदे हमने छत्तीस प्लेन उनतीस हजार करोड़ में किये, जबकि उन्ही लड़ाकू जहाजों के हेड डिस्प्ले यूनिट इजराइल से ख़रीदे गए चौदह हजार करोड़ रुपये में| सभी भारतीय देशभक्त इस पुष्टि करते हैं कि चौदह हजार करोड़ के ये उपकरण लद्दाख जैसे क्षेत्र के शून्य से नीचे के तापमान में कितने जरुरी हैं, जबकि फ्रेंच तकनीकी विशेषज्ञ यही उपकरण कुछ हजार करोड़ की अधिक कीमत पर मुहैया कराने को तैयार थे| फ़्रांसीसी लड़ाकू विमानों के उन उपकरणों की क्षमता रुसी इलाकों में युद्ध के दौरान जाँची परखी थी और वे युद्ध क्षेत्र लद्दाख के क्षेत्र से कहीं ज्यादा नीचे के तापमान वाले थे| फ्रांसीसी वही उपकरण भारतीयों को भी दे सकते थे लेकिन उनसे उपकरण लेने की बजाए इजराइल से आयात करना आश्चर्यजनक है!

लेकिन इन उपकरणों से युद्ध किससे? क्या हम शून्य से नीचे के तामपान में ऐसे किसी संभावित युद्ध की तैयारी कर रहे हैं या फिर कठपुतली की तरह किसी के आदेश का इन्तेजार कर रहे हैं कि आदेश हो और मार्च करें? या फिर हम दोस्ती के टोकन के तौर पर किसी डील की कीमत चुका रहे हैं? या फिर हम आत्म निर्भर और सक्षम देश के तौर पर इजराइल की आर्थिक हालत सुधारने के लिए योगदान देना जरुरी मानते हैं? क्या देश में कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जिसमे गौर करना जरुरी न हो इसलिए हमने तय किया कि सरकारी खजाने को इजराइल पर लुटाया जाए?

जब सभी प्रख्यात वैज्ञानिक सस्ते और सुरक्षित थोरियम आधारित रियेक्टरों की बात कर रहे हों और तीन दशकों से भारत इस क्षेत्र में तकनीकी सिरमौर हो, हम इसके लिए पहले और दूसरे जनरेशन के रिएक्टर किससे आयात करें यह उलझन अचरज पैदा करती है| साथ ही भारतीय तटक्षेत्र में तेल के टर्मिनल और विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर थोरियम के निर्बाध भण्डार को नष्ट किया जाना खतरनाक है! तमाम बांधों से नदियों की बर्बादी थोरियम स्रोतों की बर्बादी है क्योंकि ये नदियाँ थोरियम की अथाह भण्डार हैं, दुर्भाग्यवश बांधों के चलते ये नदियाँ सूख भी चुकी हैं|

बीस सालों से भी कम समय में चर्चिल और माउंटबेटन के भूत ने भारत में असर दिखाना शुरू कर दिया है| यह दावा था कि अगर चर्चिल इण्डिया एक्ट लागू करने देते हैं तो अगले पचास सालों में सारा भारत फिर से अमेरिका और ब्रिटिश समूह के हाथों में होगा|

इस तरह भारतीय विदेश नीति खतरनाक तरीके से आंग्ल-अमेरिकी गठजोड़ की ओर रुख कर रही है| भारत के रणनीतिक हित उन्ही पश्चिमी नीतियों के उद्देश्यों के मुताबिक तय हो रहे हैं|

भारत सियाचिन की चोटियों पर कब्ज़ा करने की मजबूत हालत में रहा, और खाड़ी युद्ध में पश्चिमी युद्ध पोतों को ललकार के इराकी बच्चों को मानवीय चिकित्सकीय सहायता भेजी, लेकिन जब चीन ने काराकोरम की पहाड़ियों में सड़क बनाई तो सिर्फ मूकदर्शक बना रहा, उसके बाद वह क्षेत्र नब्बे सालों के लिए चीन के हवाले कर दिया| उस चरम बिंदु पर लेह सेक्टर में हमारे टैंक नहीं भेजे और बाद में जब समस्या नहीं थी तो सैकड़ों टैंक ले जाकर खड़े कर दिए| क्या बाद में जो कार्रवाई हुई वह दक्षिणी चीन सागर से ध्यान हटाने के लिए अमेरिकी दबाव में की गयी? काराकोरम मामले में कार्रवाई के समय टैंक भेजना और चेतावनी देना हमारे सामरिक हितों के लिए कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता था|

वर्ष 1971 महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि इसी समय पाकिस्तान में वहाबी चरमपंथियों को प्रशिक्षण देने का सिलसिला शुरू हुआ, जिसका मकसद था रूस की नाक के नीचे मध्य एशियाई की राजनीति में दखल बनाना, यह ऐसा पड़ाव बना जिसमे भारत और अफ़ग़ानिस्तान तो पीछे नहीं हट सकते| अफ़ग़ानिस्तान मामले में 1979 से जारी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का छद्म युद्ध और उसके परिणाम भी सामने हैं|

भारत को इस मामले में हस्तक्षेप करके वहां की सरकार की हिफाजत करनी चाहिए, अफ़ग़ानिस्तान गुट निरपेक्ष आन्दोलन में एक मजबूत साझीदार रहा है| उस समय तो वजह साफ़ नहीं थी लेकिन आज इसे आसानी से समझा जा सकता है कि भारत की जनता सरकार ने अफगानिस्तान और गुट निरपेक्ष आन्दोलन में रुसी दखल को नाकाम किया, लेकिन अमेरिकी उकसावे से अफगानी क्षेत्रों में बढे पकिस्तानी आतंकवाद को रोकने में हम नाकाम रहे| अफगानी सरकार को किसी भी तरह की सहायता देकर कुछ ठोस नतीजे नहीं बना सके| भारत में बनी बाद की सरकारें एक ध्रुवीय विश्व की तरफ झुकती चली गयीं, यह भारत के अपने हितों की अनदेखी करने के साथ साथ गुट निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना के सिद्धांतों के अपमान करने जैसा हुआ|

भारत ने न केवल अफ़ग़ानिस्तान को सहायता देने और आतंकवाद के खिलाफ वहां के सरकारी महकमे को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी छोड़ी बल्कि उनके पूर्वी और हमारे पश्चिमी पड़ोसियों की ओर से आने वाले आतंकवाद के खतरे से भी मुंह मोड़ लिया|

हमारी इस अनदेखी से अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी आतंकवाद की दखल कुछ इस तरह बढ़ी कि वह देश बुरी तरह बरबाद हो गया, अफ़ग़ानिस्तान का सांस्कृतिक और सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया जिससे लाखों लोग रिफ्यूजी हो गए| नतीजा यह हुआ कि किसी समय एक मजबूत आध्यात्मिक सांस्कृतिक केंद्र रहे उस भूभाग की हालत एक ऐसे वीराने की हो गयी जिस पर बहुत से देशों के अराजक और आतंकवादी समूहों की कब्जेदारी हो|

कारगिल युद्ध के दौरान भी उन आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने की कार्रवाई नहीं की, ऐसा पाकिस्तान से हुए पिछले युद्धों में कभी नहीं हुआ| भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जब हमने अपनी अग्रिम पंक्ति के नायकों को बदला हो जैसा कि करगिल युद्ध में हुआ, क्योंकि अमेरिकी हमारी सेना को आक्रामक होते नहीं देखना चाहते थे, जब तक कि लड़ाई उनके निर्देशों के मुताबिक न हो जाए! हम नेपाल के शाही घराने को नहीं बचा पाए जबकि हम अच्छे से पता था कि ड्रग माफिया तख्तापलट की साजिश रच रहा है| इतना ही नहीं हमारे स्कूली बच्चों की किताबों में यह पढाया जाने लगा कि नेपाल के संविधान में बदलाव की जरुरत है! (जबकि भारतीय संविधान की हालत ये है कि उसे विदेशी भाषा में लिख कर इस तरह तैयार किया गया कि भारत की बहुसंख्यक आबादी आज भी उससे अछूती है?)

राजीव गाँधी के बाद भारत की सरकार ने श्रीलंका को आतंकवाद से निबटने में कभी मदद नहीं की, इससे श्रीलंका की हालत बदतर होती गयी| नतीजन आईएसआई को फायदा मिला और एमआई6, मोसाद सरीखे आकाओं की शह पर पाकिस्तानी खुफिया ने बेहिसाब तबाही मचाई| इन मामलों पर हमने कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी और श्रीलंका को जो भी मदद दी गयी वह एजेंसियों द्वारा गुप्त अभियानों के रूप में, न कि भारत की सरकार द्वारा|

श्रीलंका की समस्या शुरू तब हुई जब चीन ने श्रीलंका सरकार को सहयोग करना शुरू किया, इसकी गलत व्याख्या करते हुए जवाबी कार्रवाई में भारत ने राजनीतिक मध्यस्थता करने की बजाए तमिल लड़ाकों को मदद देनी चाही, यह भयंकर भूल थी जिसने क्षेत्रीय राजनीति में दूरगामी असंतुलन पैदा किया| इसकी वजह से पश्चिमी ख़ुफ़िया को श्रीलंका में दखल देने का मौका मिला, श्रीलंका के आतंकवादी संगठनों का मुख्यालय बना लन्दन और प्रशिक्षण मुकम्मल हुआ भारत में! इसके नतीजे में खामियाजा हमें प्रधानमंत्री पद के दावेदार राजीव गाँधी की हत्या से भुगतना पड़ा|

इस घटनाक्रम में हम ध्यान दिलाना चाहेंगे कि जिन आतंकवादी समूहों को भारत ने प्रशिक्षण दिया, सच तो ये है कि उन्होंने भारत की ही नहीं सुनी, आतंकियों ने भारत पर गौर करने की बजाए लन्दन में बैठे अपने आकाओं की मानी और हत्या की घटना को अंजाम दिया| अगर हम इतिहास से सबक नहीं लेते है तो यह गलतियाँ दोबारा फिर होनी तय हैं|

भारतीय पक्ष को एक गंभीर चेतावनी देनी चाहिए थी| श्रीलंका के मामलों में दक्षिणी हिस्सा अलग नहीं हुआ इसके हमे लिए गुट निरपेक्ष प्रधानमंत्रियों को धन्यवाद देना चाहिए| लेकिन आज के समय में उत्तर पश्चिम में उठ रही चुनौतियां हावी हैं| नतीजन पूरे कश्मीर भारत के नक़्शे से कट जाने का खतरा खड़ा हो रहा है|

भारत सरकार का पाक अधिकृत कश्मीर पर कोई नियंत्रण नहीं, बनिस्बत इसके कि हम उस हिस्से को भारत में छपने वाले नक्शों में अपना हिस्सा दिखाते हैं| पिछले पैसंठ सालों में लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद से ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया जिससे परिस्थिति में सुधार हो सके| 1971 में हमने सबसे बुरा दौर देखा जब भारतीय पक्ष के कश्मीर की हालत भी हाथ से निकल जाने की रही| उसके बावजूद “कूटनीतिक समाधान” चाहे जो भी हों, हम आज भी उसी का का बाजा बजा रहे हैं| नतीजा है हाल की उड़ी घटना| इस घटना के बाद भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की जिसे भारतीय सीएनएन एक बड़ी सफलता बताता है तो पाकिस्तान में वही चैनल कहता है कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं!

क्या यह अजूबा नहीं कि हमारी उप विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र में चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं कि पाकिस्तान दुनिया भर के आतंकवाद का खर्च उठाता है और तमाम देशों और कबीलों की अराजक तत्वों का पोषण करता है (कौन से देश और कौन सा इस्लाम वो नहीं बताते हैं)|

दोयम दर्जे के भारतीय प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्र में ये जिक्र करना भूल जाते हैं कि एक असफल राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान अपने ही नागरिक प्रशासन के नियंत्रण में नहीं, वे उन भारतीय श्रोताओं को गुमराह करते हैं जो सोचते हैं कि कहीं न कहीं इन घटनाओं की जिम्मेदार पाकिस्तानी सेना है… वे यह जिक्र भी   भूल बैठे हैं कि न ही पाकिस्तान की सेना और न ही नागरिक प्रशासन का कोई नियंत्रण उनके अपने देश पर बाकी बचा है, बजाए इसके कि वे ब्रिटिश-अमेरिकी सऊदी समूह के निर्देशों का पालन करे| कुछ पाकिस्तानियों ने जब इस बात पर सवाल उठाये तो उन्हें चुप करा दिया गया, पाकिस्तान में ही उनकी हत्या हो गयी या फिर देश छोड़ना पड़ा|

और जो पाकिस्तान में बचे रहे उन्हें अमेरिकी और सऊदी निर्देशों के मुताबिक काम करना होता है| रूस को घेरने का एकमात्र अमेरिकी उद्देश्य है| इसकी वजह से कठपुतली पाकिस्तान की हरकतों पर आँख मूँद लेना उनकी रणनीति है| भारत और पाकिस्तान के साथ हिंसा और जोर जबरदस्ती उनके राजनीतिज्ञों के दीवालियापन और दोमुहे स्वार्थ से जुड़ा है| वहीँ उनके आकाओं के निर्देशों के मुताबिक हम गंभीर कूटनीतिक आक्रमण तक सीमित रहना है! कश्मीर में आतंक फैला रही सऊदी वित्तपोषित, अमेरिकी प्रशिक्षित, लन्दन मुख्यालय वाली जिहादी कंपनी पर विस्तृत रिपोर्ट जिप्सी के आगामी प्रकाशन में प्रस्तुत की जाएगी|

जिस संयुक्त राष्ट्र ने सीरिया के संघर्ष विराम और अलेप्पो में दखल देना और निरिक्षण करना अस्वीकार कर दिया उन्ही को कश्मीर में बनी (या बनाई) नियंत्रण रेखा के निरीक्षण के लिए क्यों लाया गया है, जबकि इस नियंत्रण रेखा को भारत सरकार खुद स्वीकार नहीं करती|

जैन कमीशन के सामने भारतीय विदेश सचिव ने स्वीकार किया कि राजीव गाँधी ने खाड़ी युद्ध में ब्रिटिश-अमेरिकन नाटो के लड़ाकू विमानों के लिए भारत की जमीन के इस्तेमाल से इनकार किया यही उनकी हत्या की वजह बना| क्या यह फैसला गुट निरपेक्ष धारा के मुताबिक नहीं था? अमेरिका के साथ हुए हालिया समझौते के बाद आज भारत की क्या हालत है? वे भारत भूमि में अपने जंगी बेड़े बना कर ब्रिटिश अमेरिकी सेनाएं आजाद देशों पर आक्रमण करेंगी, वो भी अपनी सहूलियत से, हर मामले में मुताबिक हिंदुस्तान के साथ फैसला करके! ऐसे में खाड़ी युद्ध के मामले में भारत का फैसला या नीति क्या होनी चाहिए या क्या होगी? शायद हम भारतीय अपने नेतृत्व से पूछ सकें कि अगर खाड़ी युद्ध में ब्रिटिश-अमेरिकी विमान भारत भूमि से लड़ाकू विमानों के लिए ईंधन भरने का प्रयोग करना चाहेंगे तो हमारा फैसला क्या होगा?

क्या हम मामले दर मामले में अपनी सेनाओं के भ्रष्टाचार को बर्दाश्त कर सकेंगे जैसा कि टर्की कू के पहले वहां होता रहा? क्या हम देश की राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर हो रहे भ्रष्टाचार के गवाह नहीं जब हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय ने दगाबाज ख़ुफ़िया अधिकारी को अमेरिका भागने दिया| वह ख़ुफ़िया अधिकारी जिसने हमारी गोपनीय सूचनाएं अमेरिका को बेचीं उसे ऐय्याशी के लिए “विधिपूर्वक” और “सपरिवार” अमेरिका पहुंचा दिया गया! देश के लिए जान हथेली पर लेकर जीने वाले हमारे देशभक्त अधिकारी देश की बरबादी के नज़ारे आँखों के सामने देखने को विवश हैं, और तो और उनकी सुनवाई तक नहीं हो रही! अगर उसी ख़ुफ़िया अधिकारी ने हमारी गोपनीय सूचनाएं पाकिस्तान को बेचीं होतीं तो क्या हमारे प्रधानमंत्री की नीति उसकी गिरफ़्तारी पर धीमी कार्रवाई की ही होती ताकि उसे सपरिवार कराची पहुँचने का समय मिल सके?

प्रेस की आज़ादी के वकीलों से प्रेस्टीटयूट और वेश्याओं तक

पोत सेवाओं के लिए तयशुदा करार के तहत अमेरिकी नौसेना हिंदुस्तान आ रही है?

भारत में इस समझौते की तैयारी हो रही है, जबकि अमेरिका में एक बड़ी जांच बैठी है, तीस अमेरिकी नौसेना नायक जांच के घेरे में हैं, जिन्होंने मलेशियाई माफिया (फैट लियोनार्ड) से वेश्याओं सहित तमाम सेवाएं लेकर अमेरिकी नीतियों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार किया!

इससे पहले फिलीपींस और थाईलैंड ने अमेरिकी नौसेनिक बेड़े को ईंधन भरने और पोत सेवाओं की इजाजत दी| नतीजा ये निकला कि बहुत ही कम समय में वे देश अन्तराष्ट्रीय वेश्यावृत्ति की राजधानी हो गए और उनकी राष्ट्रीय संप्रभुता और गणतंत्र ब्रिटिश अमेरिकी तानाशाही के सामने भेड़िया धसान बन गया| क्या हिंदुस्तान उनसे प्रतिस्पर्धा करके अन्तराष्ट्रीय वेश्यावृत्ति की राजधानी बनने में आगे निकलना चाह रहा है? और अगर हम विगत सरकारों के समझौतों पर गौर करते हैं तो पाते हैं कि इस सवाल का जवाब है… हाँ और वो किसी भी कीमत पर! जिस तरह भारत में मीडिया का निजीकरण हुआ है उससे भारत खबररंडियों की राजधानी तो बन ही गया है, जो पश्चिमी हितों के माफिक है|

ब्रेक्सिट के बाद हर मीडिया संस्थान ने ब्रिटेन में निवेश करने ठानी है, ब्रिटेन को बचाने के लिए! जबकि हम वर्ल्ड बैंक, आईएम्ऍफ़ दुबई और सऊदी अरब से कर्ज ले रहे हैं अपने खुद के विकास कार्यों के लिए! कुछ अंधभक्त तर्क दे रहे हैं कि यह हमारा ही काला पैसा है जो दुबई के रास्ते सफ़ेद होकर भारत लौट रहा है… हमे इस सफलता पर गर्व करना चाहिए! (हमे उनका शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि वे यह तो जानते और मानते हैं कि यह हमारा ही पैसा है)

और जब वैश्वीकरण के खिलाफ पश्चिम के तमाम मीडिया संस्थान अभिव्यक्ति की आज़ादी की वकालत करते हैं और भारत में दमन के खिलाफ सवा करोड़ बैंक कर्मी हड़ताल करते हैं तो सारे मीडिया जगत में सन्नाटा छा जाता है— जैसे ये घटनाएँ किसी दूसरे गृह पर हुई हों!!

यह ऐसी चेतावनी है जैसे कि भारत सत्ता परिवर्तन के ब्रिटिश अमेरिकी खेल में बच्चा हो और लोकतंत्र के खेल की दलाली करने वाला मीडिया ब्रिटिश अमेरिकी हितों में मिलिट्री इंडस्ट्रियल काम्प्लेक्स का पैरोकार हो गया हो! वे जिनके लिए युद्ध भारी मुनाफे का सौदा हो और आतंकवाद महिमामंडित निवेश, मादक पदार्थ एक जरुरी सामग्री जिसका उपयोग करके नागरिक और सांस्कृतिक विनाश अनिवार्य नतीजा हो, ताकि मुक्त बाजार की ताकतों का नंगनाच जारी रह सके| मुक्त बाज़ार को लोकतंत्र की नींव के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है|

इस खेल की कठपुतलियाँ है तथाकथित आज़ादी के लड़ाके/आतंकवादी/नए बनते देश/ भौगोलिक सामरिक बंटवारे के इस खेल के विभिन्न चरणों को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है| पहला किसी देश की सरकार को उनके अपने ही नागरिकों की हत्या और बलात्कार का दोषी ठहरा कर|

दूसरा पीड़ितों के लिए संघर्ष कर रहे स्थानीय स्वयं सेवी संगठनों को अन्तराष्ट्रीय दान दाताओं से पैसा मुहैया करवा कर| तीसरा आवाम के साथ हो रही ज्यादती के सनसनीखेज समाचार लगातार दिखा कर| जब इतना हो जाता है तो चौथा चरण शुरू होगा जिसमे पश्चिमी देशों की सरकारें शोषित पक्षों को धन देंगी, आत्म रक्षा समूह बनायेंगी| आतंकवाद से लड़ने के नाम पर क्षेत्रीय नेतृत्व के हाथों में सौंप कर स्थानीय स्तर पर कठपुतली सरकारों के मोर्चे बनते हैं| पश्चिमी देश सभी अन्तराष्ट्रीय संधियों को नकार कर आत्म रक्षा समूहों को संघर्ष क्षेत्रों में हथियार मुहैया कराती हैं| जब भारी संख्या में लोग प्रशिक्षित हो जाते हैं तो उन्ही से सरकारों पर हमले करवाए जाते हैं, जाहिर है इसके बाद संप्रभु सरकारों को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी ही पड़ती है| ये कार्रवाई दूसरा सबब होती है लोगों को अपनी ही सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए, उसके बाद निर्वासित सरकारें भी बनती हैं|

जब ये आत्म रक्षा समूह अपनी ही सरकारों से लड़ रहे होते हैं तो पश्चिमी ताकतें नो फ्लाई जोन घोषित करके सीधा सैन्य हस्तक्षेप भी कर सकती हैं| अंततोगत्वा जब उनके आत्म रक्षा समूह अपनी संप्रभु सरकारों से लड़ने में नाकाम होते हैं तो पुनर्गठन की जिम्मेदारी लेकर पश्चिमी ताकतें सीधे सैन्य हस्तक्षेप भी करती हैं| मिशनरी तरीके से यही रणनीति पश्चिमी तिमोर, सूडान, इथियोपिया, सोमालिया, लीबिया, इराक और सीरिया के मामले में देखने को मिलती है| उन देशों में कठपुतली खेल और लोकतंत्र का नंगनाच सफलतापूर्वक रचा गया|

सीरिया मामले में पश्चिमी ताकतों की करारी हार से उनके आत्म रक्षा समूहों (अल कायदा, ISIS, ISIL, अल-नुसरा आदि) के मर खप के ख़त्म हो जाने का भी खतरा है| भविष्य में उनको वहां से निकल कर उनका किसी दूसरी जगह आबादी रहित क्षेत्र में जाना होगा, संभव है कि उनका इस्तेमाल ईरान या रूस के खिलाफ किया जाये| बलूचिस्तान में उनके माफिक आबादी रहित क्षेत्र है| ऐसे में उन आत्म रक्षा समूहों लिए को शरण देने के लिए हिंदुस्तान एक क्षेत्रीय शक्ति साबित होगा जिसका कठपुतली नियंत्रण पश्चिमी ताकतें आसानी से कर सकती हैं|

शह मात के खेल में पाकिस्तान जो अत्याचार कश्मीर में कर रहा है उसी का सहारा लेकर बलूची शरणार्थियों को और बलूची लड़ाकों को भारत में बसाने की बातचीत चल रही है| ऐसे में उरी हमले का इस मामले से सीधा सम्बन्ध क्यों नहीं देख पा रही हैं?

हम बलूचिस्तान के सम्बन्ध में कुछ तथ्य और रखते हैं जिनको शायद ब्रिटिश परस्त प्रेस्टीटयूट मीडिया न दिखा सके:

पाकिस्तान के जन्म से ही बलूचिस्तान सबसे उपेक्षित क्षेत्र रहा है| डूरंड रेखा पर हुई अफगानी समस्या और संघर्षों के चलते अधिकांश पश्तो जनजातियों को वहां से आकर बलूची क्षेत्रों में बसना पड़ा| इस घटना से वहां की जो आबादी 100 प्रतिशत बलूची थी उसक संतुलन बिगड़ा और आबादी में बलूची पश्तो का अनुपात 70-30 का हो गया| प्राकृतिक संसाधनों की खोज के बाद पाकितान ने पश्चिमी कंपनियों के लिए उस क्षेत्र का बेहिसाब दोहन शुरू किया| 1971 के बाद आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर नस्ल सुधार के नाम पर बलूचियों का शोषण शुरू हुआ| पश्चिमी आकाओं की शह पर पाकिस्तान द्वारा की गई इस कार्रवाई की वजह ये रही कि बलूचियों की नस्ल सांस्कृतिक रूप से हिंदुस्तान के ज्यादा करीब है| इस कवायद में बलूचिस्तान के लोगों के लिए आत्म निर्णय, लोकतंत्र की अवधारणा, लोगों के लिए संसाधनों के प्रयोग की बातें धरी की धरी रह गयीं| इस्लामाबाद की पंजाबी सेना और नागरिक प्रशासन ने पिछले तीस सालों में क्वेटा सहित कई क्षेत्रों में ऐसी कार्रवाईयां की है जिसमे नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की धज्जियाँ उड़ गयीं| बलूचियों को जेलों में डालकर, हत्या करके, नागरिक क्षेत्रों में बम बरसा रहे पाकिस्तान को अमेरिकी और ब्रिटिश शह किसी से छुपी नहीं है| नतीजन अधिकांश बलूचियों को ईरान भागना पड़ा|

जिस तरह पश्तो की समस्या डूरंड रेखा खींच कर ईजाद की गयी उसमे  पश्तों को अफगानी और पाकिस्तानी के रूप में दो देशों में बांटा गया उसे उन्होंने आज तक कभी स्वीकार नहीं किया| इसी तरह बलूची क्षेत्र को भी पाकिस्तान और ईरान में बांटा गया जिसको बलूचियों ने कभी स्वीकार नहीं किया| ईरान ने इन लड़ाकों को लम्बे समय तक समर्थन दिया, शरण दी और उन बलूचियों के नेता ईरान की संसद में भी सदस्य हैं| हाल ही में पाकिस्तान ने बलूची क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा चीनी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लीज पर दिया है जिसमे ग्वादर बंदरगाह भी शामिल है| चीन ऐसा होने पर ईरान से तेल और बलूची क्षेत्र से तमाम प्राकृतिक संसाधनों को काराकोरम होते हुए अपने देश ले जा सकेगा|

जिस तरह कोई भी इस्लामी देश अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याओं को तरजीह नहीं देता वैसे ही पाकिस्तान ने भी बलूचियों के सवाल को क्वेटा के इर्द गिर्द रहने वालों का मामला माना और बाकी हिस्सों में नस्ली आधार पर नरसंहार तक किया| इन सालों में पश्चिम ने इसी तरह के दूसरे हिस्सों को भी देखा और समझा और पाकिस्तान की तर्ज पर रूस से लड़ने के लिए जिहादी कंपनी को तैयार किया|

जब बलूचियों का नरसंहार निर्बाध रूप से तीस सालों तक जारी रहा तो अभी क्यों बलूचियों के अधिकार अंतराष्ट्रीय और भारतीय कॉर्पोरेट मीडिया के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बन गए? क्या वे खास कर भारत की विदेश नीति के मार्गदर्शक बनना चाहते हैं?

रूस से लड़ने को पाकिस्तान को दिया गया हर हथियार बलूची और कश्मीरियों के खिलाफ प्रयोग किया गया| (जैसे सऊदी यमन के नागरिकों के खिलाफ प्रयोग करते हैं), अब ये भारत की जिम्मेदारी है कि वह बलूची आत्म रक्षा समूहों को ब्रिटिश अमेरिकन सेना द्वारा प्रशिक्षित पाकिस्तानी सेना और सऊदी अरब द्वारा वित्तपोषित जिहादियों से लड़ने के लिए तैयार करे| ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि पाकिस्तानी सेना को कब्ज़ा किये बैठे ब्रिटिश अमेरिकी जो अपनी मनमर्जी से नो फ्लाई जोन बना सकते हैं, पाकिस्तान से क्यों नहीं कहते कि बलूचिस्तान से अपनी सेना हटा ले|

लेकिन ओरवेल के उपन्यास और ओ’हेनरी के नाटक जैसा एक पहलू और है, भारतीय मीडिया एक वितंडा फैला रहा है जिसके मुताबिक “हम भारतीयों को” “बलूचिस्तान बचाना ही होगा” और उनको हथियार देकर, फण्ड करके ट्रेनिंग देकर बलूचियों को पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ खड़ा करना ही होगा| अजीब पागलपन है, जब हम पीओके में एक अदद आतंकी कैंप नहीं हिला पाए तो इस शोर शराबे का क्या मतलब… क्या इसलिए क्योंकि हमारे ब्रिटिश-अमेरिकी मालिक ऐसा चाहते हैं?

इसका एक दुखदायी पक्ष यह भी है कि हम सभी अन्तराष्ट्रीय मंचों पर यह भी ढिंढोरा पीटते घूम रहे हैं कि बंटवारे में बिछड़े हमारे ही भाई (पाकिस्तान) खालिस्तानी, कश्मीरी, वाम और दक्षिण समेत भारत में पनप रहे सभी आतंकवादियों को हथियार प्रशिक्षण आदि मुहैया करवा रहे हैं|

जबकि नेहरु ने स्वेज़ नहर की समस्या को लेकर संयुक्त राष्ट्र में घोषणा की थी कि ब्रिटेन एक आतंकवादी देश है, और वे इसीलिए मारे भी गए| आज क्या हम ब्रिटिश पिछलग्गू होकर खुद ही आतंकवाद के समर्थक बनना चाह रहे हैं? कश्मीर समस्या का सही समाधान आतंकवाद के खिलाफ आतंकवादी बनकर नहीं बल्कि आतंकवाद को हर प्रकार से विफल करके मजबूत स्वतंत्र राष्ट्र साबित होने से निकलेगा| इसके लिए चालीस सालों पहले अपनाई गयी उस नीति को फिर से अपनाने की जरूरत है जो कि फ़िलहाल आखिरी साँसे गिन रही है| आतंकवाद से लड़ने के लिए रूस, टर्की, सीरिया की तरह मजबूत राष्ट्र बनने की जरुरत है, हाल के महीनों में यह नजीर मिली है|

हमारे विदेश मंत्री की याददाश्त भी एक खूबसूरत मजाक है, ईरान से लेबनान तक चार देशों की यात्रा में आतंकवाद के असल संस्थापक, पोषक और ट्रेनरों की पूरी जमात को देखते हैं जानते है, यहाँ तक कि उनसे यह गुजारिश भी की जाती है कि भारत को आतंकवाद से लड़ने में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए| लेकिन भारत भूमि पर उतरने के बाद वे सारे सबक भूल कर सिर्फ एक देश को याद रख पाते हैं…. पाकिस्तान जिसे वे आतंकवाद की सेंट्रल यूनिवर्सिटी मानते हैं, जबकि चार देशों की यात्रा में उसका जिक्र तक नहीं होता है! शायद उनका जहाज ऐसे क्षेत्रों से गुजरा हो जिसमे उनकी स्मृति विलुप्त हो गयी हो! या शायद उनके मष्तिस्क की सेटिंग ही ब्रिटिश अमेरिकी विदेश नीति वाली बन गयी हो!

इसलिए फिर से वही सवाल खड़ा होता है कि बलूचिस्तान और भारत का मामला फिलहाल में ही क्यों? अगर पागलपन और प्रेस्टीटयूट विज्ञापन माध्यमों को किनारे करके भी देखते हैं तो निम्नलिखित परिदृश्य सामने नजर आता है| मिडिल ईस्ट के सीरियाई सत्ता परिवर्तन में ब्रिटिश अमेरिकी रणनीतिकारों को अप्रत्याशित करारी हार का सामना करना पड़ा है| इसके चलते सऊदी निवेशकों और आतंकियों की प्रशिक्षक ब्रिटिश अमेरिकन एजेंसियों के सामने बड़ा संकट खड़ा हुआ है| ISIS/ISIL/DAESH(अलग-अलग नाम रंग रूप वाले उदारवादियों से लेकर कट्टरवादियों समेत लगभग 5-6 सदस्यों वाले एक हजार से ज्यादा सम्बद्ध समूहों के सामने अस्तित्व का संकट है) ने पश्चिमी आकाओं से रूस से लड़ने के मूल उद्देश्य को लेकर बचाने की गुहार लगाई है| इसलिए पश्चिमी खलीफा को ज्यादा सुरक्षित जगह भागना पड़ा… वह जगह है बलूचिस्तान!

अमेरिकी चुनावों के बाद के नतीजों में अमेरिकियों को विनाशकारी कॉर्पोरेट की छवि से निजात पानी है, ताकि वे वास्तविक अमेरिका की छवि बना सकें| इसलिए कॉर्पोरेट अमेरिका ने अपनी मजबूती बनाये रखने के लिए आतंकवादी समूहों को खाद पानी देने भर का रास्ता अख्तियार किया और वो रास्ता हिंदुस्तान होकर जाता है… यही आज का भारत है!

पश्चिम द्वारा बड़ी आसानी से हमे बताया जा रहा है कि उरी के बाद हमे कूटनीतिक रुख अख्तियार करने की जरुरत है|

आज वो सभी लोग जिन्होंने सोवियत संघ का विरोध किया था वे खुश हैं क्योंकि कम्युनिज्म ख़त्म हुआ और अब गुट निरपेक्ष आन्दोलन की जरुरत नहीं| लेकिन कम्युनिज्म और कैपिटलिज्म क्रिस्चियन लड़ाई के आर्थिक छद्म आवरण रहे हैं| ग्रीक और रूस के पूर्वी रुढ़िवादी चर्च (पूर्वी चर्च या पूर्व) और रोम के पश्चिमी रुढ़िवादी चर्च (वेस्टर्न चर्च या पश्चिमी सभ्यता या पश्चिम) और इनसे निकले प्रोटेस्टेंट के बीच की लड़ाई जगजाहिर है| तमाम ऐतिहासिक और भौगोलिक समानताएं होने के बावजूद वे क्रिश्चियनिटी में जीसस के जन्म और सलीब पर चढ़ाये जाने की तारीखों जैसी मूलभूत अवधारणा पर सहमत नहीं| रुसी लोग जीसस का जन्मदिन 8 जनवरी को मानते हैं, जबकि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट इसे 25 दिसम्बर को मनाते हैं| इन्ही भिन्नताओं के चलते पिछली एक हजार साल की लड़ाइयाँ होती रही हैं जो बाद में शीत युद्ध में तब्दील हो गयीं| रूस को घेरने और जीत हासिल करने के लिए, पश्चिम ने इस्लामिक कार्ड खेला जिसमे मिडिल ईस्ट की सुन्नी जमातों को समर्थन देना और वित्तीय सहायता देकर कट्टरवादी ताकतों को खड़ा करने का रुख अख्तियार किया| भारत में इसी नीति का असर सामने है! रूसियों ने ईरान की शिया जमात को समर्थन देकर सुन्नी अरब का संतुलन तैयार करना शुरू कर दिया| साल भर पहले दोनों चर्च के मुखिया क्यूबा में मिले इस मकसद से कि दोनों चर्चों का तालमेल बनाया जाए लेकिन दुनिया भर के क्रिस्चियन तबके का नेता कौन हो इस पर तकरार हो गयी| तब रूसियों के खुद को चर्च का नेता घोषित कर लिया लेकिन रोम के चर्च के कम्युनिस्ट नेतृत्व ने गैर क्रिस्चियन पश्चिमी देशों और उनके जिहादियों के खिलाफ धर्म युद्ध की घोषणा कर दी| उसी की तर्ज पर ट्रम्प के प्रशासन में एंग्लो अमेरिकन लॉबी ने भी पूर्व के खिलाफ धर्म युद्ध की घोषणा कर दी और पूर्व ने इस्लामिक राज्यों को समर्थन देना शुरू किया|

आज का पूरा मिडिल ईस्ट संघर्ष नतीजा है अरब राज्यों की नीतियों का जिसके चलते ईरान और रूस के खिलाफ तमाम आतंकी समूह खड़े हो गए हैं| तेल के खजाना हासिल होने के बाद एक अंध समर्थन उन सभी समूहों को मिल रहा है जो सऊदी या क़तर शैली का इस्लाम अख्तियार कर रहे हैं, यही अन्तराष्ट्रीय आतंकवाद की जड़ है|इन समूहों ने रूस और पश्चिम के खिलाफ धर्म युद्ध छेड़ रखा है| दुनिया की इस तंगहाली में रूस और अमेरिका दोनों देशों ने राज्य की प्राचीन अवधारणा अर्थशास्त्र के तहत शक्ति संतुलन के लिए पूरी दुनिया की सभ्यता में छद्म युद्ध की हालत पैदा कर दी है| इन युद्धों का विनाश संयुक्त राष्ट्र बाहर है, जो अब एक ऐसा मंच साबित हो रहा है जो वास्तविक समस्याओं पर किसी बात के लिए कभी भी सहमत नहीं हुआ|

वास्तव में आज गुट निरपेक्ष आन्दोलन की सबसे ज्यादा जरुरत है, वजह साफ़ है, पूर्वी और पश्चिमी चर्च के आर्थिक आवरण में छिपे शीत युद्ध को नकार कर धर्म युद्ध या जिहाद की खुली घोषणा हो चुकी हैं| रूसियों ने सर्बिआ को यूरोप के इस्लामीकरण से बचाने के लिए अल्बानिया में युद्ध की घोषणा कर दी है|  सऊदी शेख अमेरिकी और ब्रिटिश समर्थन से 34 मुस्लिम देशों को जोड़कर इस्लामिक नाटो बनाने जा रहे हैं जिनका खुला सैन्य या आतंकी एजेंडा है| भारत और तमाम एशियाई और अफ़्रीकी देश जो न मुस्लिम हैं और न ही क्रिस्चियन के पास विकल्प ये बचता है कि वे किसी न किसी समूह का साथ दें या फिर गुट निरपेक्ष आन्दोलन की तरह निरपेक्ष रहें|

भारत में बहुत से लोग सोचते हैं कि पश्चिम की पूर्व देखो नीति आज के समय में बहुत आकर्षक है| वस्तुतः पुर्तगाली और स्पेनिश राजाओं ने जब नौसेना को यह आदेश दिया कि भारत के लिए समुद्री रास्ते की तलाश करें तब से वे पूर्व देखो नीति पर ही चलते रहे हैं| आज भी जब अमेरिका कहता है कि पूर्व को देखो तब उसका इरादा यहाँ के मानव और प्राकृतिक संसाधन का ही होता है जो कि उनके दीवालिया और कर्ज से लदी अर्थव्यवस्था के लिए निहायत जरुरी हैं| लेकिन भारतीयों के लिए अपना ही देश देखना एक बोझ के जैसा मालूम होता है|

अमेरिका और ब्रिटेन वे देश हैं जिन्होंने अपने कठपुतली सुन्नी राज्यों की खुशामद के लिए इस्लामिक कट्टरवादी आतंकी समूह तैयार किये| उन राज्यों में मानवाधिकार और महिलाओं के अधिकार की खिल्ली उड़ाते  तमाम दस्तावेज भी मौजूद हैं|  उन्ही के पैसों से हमरे पडोसी ने कश्मीर में आग लगाईं और  भारत में आतंक का भी मुख्य कारण है| जरुरत पड़ने पर या अपने कठपुतली राज्यों के लिए वही पश्चिमी नीतिकार भारतीय पक्ष और आतंकवादी घुसपैठ को अक्सर नजरअंदाज करते रहते हैं, क्योंकि उनके समर्थन से हमारे पश्चिमी पडोसी रूस के खिलाफ भी काम आते हैं| गुट निरपेक्ष आन्दोलन के ख़त्म होने और पश्चिमी खेमे में विलीन होने से कश्मीर का मामला कभी ठीक न होने वाला नासूर साबित होने लगा है| हाँ इतना जरुर होने लगा है कि हम अपने अहम् को ब्रिटेन और अमेरिका की सहमति से सर्जिकल स्ट्राइक करके बढ़ाने लगे हैं, जो कि भारत के लोगों और हमारी सैन्य शक्ति के साथ अपने आप में एक घिनौने मजाक जैसा है| इसी के साथ हमे मिल रही है आतंकवादी गतिविधियों की एक अंतहीन श्रंखला| यह उस देश का हाल है जिसने अपने स्वाभिमान को अक्षुण रखते हुए नफ़रत की पश्चिमी दुनिया की परवाह न करते हुए खाड़ी युद्ध के चरम बिंदु पर बीमार इराकी बच्चों के लिए अपने सागर सिन्धु जहाज भर कर दवाइयां भेजीं थी|

इसके विपरीत दक्षिण कोरिया के दबाव में लगे तमाम प्रतिबंधों के बावजूद उत्तरी कोरिया ने अपनी आत्म निर्भरता के लिए हथियार बना रहा है| सब जानते हैं कि शीत युद्ध के समय से ही रूस और चीन की खिलाफत में दक्षिणी कोरिया में अमेरिकी प्रशिक्षित धर्मान्तरित क्रिस्चियन शासकों की नियुक्ति हुई| हाल के दक्षिणी कोरियाई राष्ट्रपति प्रत्याशी ने भी निवेदन किया कि वहां के चुनावों में अमेरिकी दखल न हो| जब कोरियाई युद्ध समाप्त हुआ तो वहां का हर शहर, हर गाँव और सभी स्थापनाएं मिट चुकी थीं, तीन करोड़ आबादी के साथ पूरा उत्तरी कोरिया धुल में मिला दिया गया था| उन्हें हराने के लिए हर एक जैव और रासायनिक हथियार का उनके खिलाफ इस्तेमाल हुआ| लेकिन उत्तरी कोरिया जीता!

कोरिया की हजारों सालों की सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत, धर्म स्थल और आर्किटेक्चर के अजूबे धुल में मिल गए| कोरिया के हर परिवार से कोई न कोई युद्ध में शहीद हुआ| सोवियत और अमेरिकियों की लड़ाई में कोरिया एक टिश्यू पेपर की तरह दो फाड़ हुआ| लेकिन अपने सीमित संसाधनों और अपने लोगों के दम पर कोरिया फिर से बना, एकदम शुरुआत से, और आज हर आफत झेलने को तैयार है| पश्चिमी ताकतों को तब यही फ़िक्र थी कि अगर कोरिया उनके हथियार खरीदता है तभी उनके लिए मित्र होगा| इसकी बजाये कोरिया ने अपने संसाधनों से अपनी आत्मनिर्भरता के लिए हथियार बनाये, यह पश्चिम के लिए खतरनाक परंपरा की शुरुआत है| क्योंकि पश्चिमी मानते हैं कि सभी स्रोतों से मिलने वाले ज्ञान का नियंत्रण सिर्फ पश्चिम ही करे ताकि वह दुनिया पर अपना कब्ज़ा बरक़रार रख सके| तमाम हिन्दुस्तानी आज भी यह बात जानते हैं कि उस समय बच्चों, औरतों और निर्दोष लोगों के साथ हुई वीभत्स कार्रवाईयां गुट निरपेक्ष आन्दोलन की शुरुआत की प्रमुख वजह थीं| लेकिन बदकिस्मती की इन्तेहा और क्या होगी कि वही भारत आज कोरिया पर प्रतिबन्ध लगाने की वकालत करने वालों में से हैं! हमारी याददाश्त की इससे ज्यादा दुर्गति और क्या होगी कि कोरिया के वीभत्स युद्ध के तीन साल पहले भारत का भी बंटवारा हुआ था| कोरियाई युद्ध में मारे गए लोगों के तीन गुने से ज्यादा लोग उस बंटवारे में बर्बाद हुए!

लाखों उजड़ गए| हर एक ऐतिहासिक विरासत तबाह हो गयी| यह सब इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश ने वो बड़ा खेल खेला जिससे भारत दुनिया के साथ अपने परंपरागत संपर्क मार्ग से कट जाए| यह एक दूसरा कारण था जिसकी वजह से गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नींव पड़ी| लेकिन आज हम उसी पश्चिम में विलीन हो जाना चाहते हैं जिसने हमे व्यावहारिकता के नाम पर बरबाद किया| शायद व्यावहारिकता वही है जिसे अमेरिकी प्रेसिडेंट के प्रेस सेक्रेट्री के शब्दों में कहें तो “चुनाव जीतना ही राष्ट्रीय हित है” पिछले कई वर्षों में पश्चिम के तमाम दबावों के बावजूद अपने हितों और भलाई की चाहत के साथ भारत ने अपनी आज़ादी बरक़रार राखी है| जब ईरानी तेल पर पाबन्दी रही और ईरानी बैंकों पर प्रतिबन्ध लगे तो भारत ने ईरान से बातचीत करके अपने लिए सस्ते तेल की व्यवस्था की और अंतराष्ट्रीय कानूनों को बिना तोड़े ईरान के साथ साझेदारी की एक मौलिक बुनियाद बनाई दुनिया जिसे आज भी आईआईटी यानि इण्डिया, ईरान और टर्की साझेदारी के नाम से जानती है| हिंदुस्तान ने टर्की को रूपया दिया और वहां से सोना लिया जिससे तेल का भुगतान किया गया| वस्तुतः भारत ने अपने पैसों की छपाई भी बाहर ही की जिससे कि पश्चिम को भनक तक न लगे| इस तरह भारत स्वर्ण विनिमय में दुनिया का सिरमौर बना और कागजी मुद्रा की दुविधाओं से बच भी सका| भारत का ही अनुसरण करते हुए ईरान, चीन, रूस और कोरिया ने स्वर्ण विनिमय अपनाया और दुनिया में डॉलर के दम पर बादशाहत करने वाला अमेरिका कमजोर हुआ| लेकिन वही भारत आज अरब के साथ फिर से पुराने ढर्रे पर है यह जानते हुए भी कि दुनिया भर में जिहादी आतंक का पर्याय वहीँ कठपुतली साम्राज्य हैं|

अगर हम अरबों डॉलर के हथियारों उन सौदे पर गौर करें जो अमेरिका और ब्रिटेन से दक्षिणी बहरीन और कुवैत को जाते हैं| इससे ये राज्य मिडिल ईस्ट के तमाम खेमों को यमन के बच्चों और निर्दोषों की हत्या का साजो सामान पहुंचाते हैं| वही राज्य कुछ हथियार कश्मीर भी भेजते हैं| अगर हम इतनी जानकारी जुटा सके तो हम जरुर अपने उन नेताओं की बुद्धिमत्ता को सराहेंगे जिन्होंने गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नींव रखी| हो सकता है कि उन अमेरिकी और ब्रिटिश पिट्ठुओं के साथ डिनर करते देख कर उनके जिहादी समूह आगामी चुनावों में कुछ वोट बढ़ा दें लेकिन एक उभरती ताकत की साख में लगने वाला बट्टा भविष्य में कितना नुकसानदायक होगा इसका हिसाब कर पाना संभव नहीं|

किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ भारत की भूमिका एक निर्णायक के रूप में होनी चाहिए और साथ ही हमारा प्रयास ये रहना चाहिए कि मानवता का विकास हो| गुट निरपेक्ष आन्दोलन के मरने की घोषणा करके उसी पश्चिमी कैंप में विलीन हो जाना कितना सार्थक होगा, जबकि हमारी सारी समस्याएं उन्हीं की बनाई हुई हैं? यह दुर्भाग्यपूर्ण उपेक्षा हमारी गिरावट का एक स्तर है या व्यावहारिक राजनीति का नतीजा? हम इसे गुट निरपेक्ष आन्दोलन कहें या न कहें लेकिन एक देश के रूप में दुनिया की समृद्धि की हमारी स्वतंत्र धारणा क्या होनी चाहिए—बर्बरता या समृद्धि? सबसे पहले हमे भ्रष्टाचार और गरीबी की अपनी घरेलु समस्याओं से निबटना होगा जो कि उन्ही की देन है जिन्होंने हमे गुलाम रखा और लूटा| उसके बाद हमे जिहादी आतंक से सुरक्षा बहाल करनी होगी चाहे बातचीत से हो या ताकत से| उसके लिए हमे जानना होगा कि अपने संसाधनों से अपने देश को दुनिया की सांस्कृतिक राजधानी कैसे बनाएं| तब तक इसे हम चाहे गुट निरपेक्ष आन्दोलन कहें या न कहें हमे निरपेक्ष रहना चाहिए| साथ ही उस संयुक्त राष्ट्र से भी नहीं उलझना चाहिए जो पीड़ित मानवता के लिए किसी भी प्रकार सहमति बना पाने में सक्षम नहीं| अगर इस देश की वर्तमान सरकार और हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व इन साधारण विकल्पों को भी भारत के हित में सार्थक साबित करने में सक्षम नहीं तो फिर हम भारत के लोगों को आगे बढ़ कर देश को इन सौदेबाजों से निजात दिलानी होगी और सच्चे अर्थों में स्टेट्समैन बनना होगा|

Share:
error: Content is protected !!