चीन वर्तमान घटनाओं

चीन की शेखी

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चीन की शेखी

– शालिनी और श्री किडाम्बि

नशाखोर ड्रैगन की दुर्दांत कलाकारी और मदहोशी की बयानबाजियां
चीन के मुर्दा साम्राज्यवादी घोड़े पर सवार ईस्ट इण्डिया कम्पनियां
कहाँ खड़े हैं हम और क्या करे भारत?
चीन देश, क्या था, आज कहाँ है, ऐसा कैसे बना और चीन का क्या होगा!

आंकड़ों की असलियत जांचने से समझ आता है कि चीन अपनी सर्वहारा आबादी को रोटी तक मुहैया नहीं करा सका है, बड़ी बेरहमी से सारे मानवाधिकार दरकिनार करके मजदूर आबादी का बेहिसाब शोषण जारी है| यह सब कम्युनिज्म के नाम पर हो रहा है, जिसमे अतिभ्रष्ट नेता सारे सौदों-समझौतों में पच्चीस प्रतिशत दलाली लेकर भी गर्व महसूस करते हैं| ये सौदे-समझौते ब्रिटिश खुफिया के साथ मिलकर हो रहे हैं| इन अन्तराष्ट्रीय दुरभिसंधियों में लिप्त देश आज भी भारत की युवा आबादी को नशे के कारोबार में बर्बाद करके भारतीय सेना को हराने की नीयत रखते हैं|

जब ब्रिटिश कूटनीतिज्ञों ने संयुक्त राष्ट्र में देखा कि भारत अंग्रेजी हितों के खिलाफ है तब उन्होंने चीन को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना की जरुरत महसूस की, रणनीति बनी और नतीजे में हमे युद्ध मिला| कश्मीर का पहला युद्ध इसी रणनीति का हिस्सा रहा है, इस युद्ध में हमे एक तिहाई कश्मीर खोना पड़ा| आज चीन युद्ध करके भारतीय सेना के मनोबल और आवाम के रुतबे को बर्बाद करने की धमकी दे रहा है| चीन के साथ अगर युद्ध होता है तो यह फ्री मेसन और कैथोलिक चर्च जमातों की कट्टर दुश्मनी का एशियाई संस्करण होगा| चीन ने हमेशा कैथोलिक चर्च की तरफदारी की है, चाहे क्रन्तिकारी हों या राष्ट्रवादी चीन के ज्यादातर नेता धर्म बदलकर शासक बने| धर्म परिवर्तन के औजार से यही नेता भारत समेत तमाम बौद्ध देशों में ब्रिटिश और अमेरिकी हितों को साधने के लिए काम आते हैं, यही नेता आवाम का दृष्टिकोण बनते हैं|

आज चीन भारत के संसाधनों की जबरिया लूट में लगा है, साथ ही साथ नए सिल्क रूट या OBOR को लेकर उसका आक्रामक रुख को भी दीगर है| चीन के इस फैसले में विरोधाभासी और खोखली दुरभिसंधियों और नव उदारवाद के उलझाऊ विचारों वायदों का घालमेल समझने का समय है| इस नवउदारवाद में अग्रेरियन मर्क्सिस्म, कम्युनिज्म और माओवाद की कॉकटेल चीन की देन है| इस कॉकटेल में नशे के शिकार ड्रैगन के हिलने-डुलने और बेरूख होने में भी भारत के लिए गहरे निहितार्थ हो सकते हैं| चीन के मंतव्यों को समझने के लिए उसके असल और नक़ल मंसूबों को भी समझना होगा, इसलिए नहीं क्योंकि यह चीन की दादागिरी है बल्कि इसलिए कि चीनी आवाम के नेताओं ने हिंदुस्तान के मामलों में दखल रखी है, और हिंदुस्तान ने चीन को बौद्ध धर्म दिया| ऐसे सियासी किस्सों से बन रही छवि या मिथक असल मामले की समझ के साथ टूटेगा| चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना, असल भारत केन्द्रित भूमार्ग ही है, जिसे न्यू सिल्क रूट के नाम से नयी पैकेजिंग करके चीन पूरी दुनिया को बेचना चाहता है|
परंपरागत रूप से चीन का बहुरुपिया होना खतरनाक नजर आता है| सार्वभौमिक ज्ञान और सभ्यता के शिखर रहे भारत के लिए सबसे अहम् पहलू है भौतिक और अध्यात्मिक सम्पदा| जब तक यूरोपीय लोगों ने चीन में अफीम का बड़ा बाज़ार नहीं बना लिया, मध्य राज्य अर्थात चीन की परवाह किसी को नहीं थी| यूरोपियन व्यापारियों ने अट्ठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में चीनी साम्राज्य के अधिकारियों से लेकर आम लोगों को नशे की लत लगायी, भारत में उगाये गए अफीम से! जब ओटोमन शासकों ने डमस्कस, बग़दाद, तेहरान, खुरासन और कश्मीर के हिन्दुस्तानी सिल्क रूट पर रोक लगा दी तो यूरोपीय व्यापारियों को भारत तक के भूमार्ग की बजाये वैकल्पिक मार्ग की खोज में जुटना पड़ा| समुद्री मार्ग खोजने के अभियानों में लगे प्रतिष्ठान ईस्ट या वेस्ट इण्डिया कंपनी कहे जाते हैं| कोलंबस और दूसरे लोगों की खोजों में जो भी नए टापू मिले उन सभी जगहों में तमाम सांस्कृतिक समानताएं मौजूद थीं, यही वजह रही कि वहां के निवासियों को भी इंडियन्स ही कहा गया, न की चीनी| उदारीकरण और कम्युनिज्म का मुखिया बना चीन हमारे पश्चिमी भाइयों के साथ मिलकर शताब्दियों से बनी भारतभूमिका को हड़पने में लगा है, वह भी भारत के दिल और आत्मा कश्मीर पर अवैध कब्ज़ा करके, साथ ही साथ भारत के इर्द गिर्द समुद्री रास्तों से! जिहादियों और चीनियों के मेल-मिलाप से भारत के अस्तित्व का खतरा सामने है, देसी विदेसी दोनों तरह के खिलाडियों की बेहिसाब लूट बदस्तूर जारी है| आबादी और संसाधनों की लूट से निरर्थक, कमजोर और असहाय होते देशों की हालत हम सबके सामने है|

तो आगे क्या रास्ता है?

तमाम राज्यों से घिरे चीन का अर्थ मध्य गणराज्य से है| चीन शब्द संस्कृत के चिन या जिन शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ यह हुआ कि बुद्ध और कन्फ़्यूशियस के पहले चीन में जिन का दर्शन प्रधान रहा, जिससे चीन पर भारत के असर का हवाला मिलता है| चीन के चार स्तर के शासकीय विभाजन से लेकर युद्ध कला और नीतियों तक में भारत का अहम् योगदान होने की गूँज सुनाई देती है| चीन को नशे का गुलाम बनाकर, उसके सभी भौगोलिक क्षेत्रों और राज्यों का एकीकरण जारी है, पहले ये काम मृतप्राय समझौतों से हुआ उसके बाद हथियारबंद सेना से, इन चीनी कवायदों का मकसद भारत को घेरने का ही है, क्योंकि चीन पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों का औजार साबित हो रहा है|
एक भाषा वाले अविभाजित चीन पर ईस्ट इण्डिया कंपनियों की दखल में चर्च और ब्रिटिश के परोक्ष समर्थन से भारत और सभी एशियाई देशों को ठिकाने लगाने की योजना शामिल है|

भारत को बर्बाद करके कब्जेदारी बरक़रार रखना, कैथोलिक चर्च का वह मकसद था, जिसे ब्रिटिश समझौतों में मंजूर किया गया, इस मकसद में तीन दुश्मन हैं| पहला परंपरागत रूस, दूसरा यहूदी और मेसोनिक आर्डर समेत सुधारवादी आन्दोलन, तीसरा मोहम्मद के इस्लाम की सहज शिक्षाएं (न कि जनजातीय घालमेल वाले अरबी रियासतों के वहाबी-सलाफी तरीके जिनके चलते तमाम अराजकतावादियों, और ब्रिटिश-अमेरिकी निजाम की शह पर खड़ी हुई जिहादियों की फ़ौज, जिसका मकसद असल इस्लाम को काबू करने का है!

किसी भी कीमत पर इन तीनों दुश्मनों को बर्बाद किया जाना है| शताब्दियों तक चलने वाले इन युद्धों से दुनिया की बेहिसाब तबाही हुई है, यह सब हुआ भी तो तमाम ढोंग और आकर्षक नारों के साथ! चर्च की आपसी कलह की असल वजह को ग्रेट स्कीज्म यानि महान बंटवारा कहा जाता है जो किसी भी समझदार के लिए अचम्भा ही है| इन दो हजार सालों के युद्धों का सवाल जीसस के जन्म और मैरी की वर्जिनिटी के बारे में है| कैथोलिक या रोम के पश्चिमी चर्च मानते हैं कि जीसस के जन्म के बाद भी मैरी वर्जिन रही| जबकि ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स (पूर्वी परम्परावादी) कहते हैं कि ऐसा नहीं है| मैरी की वर्जिनिटी के मामले को कैसे समझा जाए इसी फर्क को लेकर चर्चों ने पंद्रह सौ सालों से एक दूसरे का बहिष्कार जारी रखा है| जीसस के जन्म और मौत की तारीखों को लेकर भी दोनों में कोई आमराय नहीं बन सकी| फिर भी उन सबके बीच अपने-अपने मजहबों को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और सबसे ज्यादा तार्किक साबित करने की होड़ है| चर्च की हठधर्मिता यही है कि जो कुछ भी बाइबिल में कहा गया वह सब नितांत वैज्ञानिक है, पश्चिम के सभी राजनैतिक तबकों पर यही हठधर्मिता भारी पड़ रही है| इसी हठधर्मिता के चलते वे स्थापित तथ्यों को भी दरकिनार करते हैं और सच्चाई-सबूतों को मिटाने की अंधेरगर्दी में जी-जान से लगे हैं|

भारतीय अभियानों में चन्द्रमा और मंगल पर पानी और जीवन के लक्षण साबित होने के बावजूद चर्च के कब्जे वाले दुनिया भर के अंतरिक्ष संस्थानों ने इसे न सिर्फ नकार दिया बल्कि इसपर पर्दा डालने में लगे हैं क्योंकि बाइबिल में ऐसा कहीं नहीं लिखा| किसी दूसरे गृह पर जीवन की मौजूदगी मिलती है तो ये धरती उनके देवताओं की नजर में अहम् नहीं रह जाएगी|

पूर्वी परंपरागत इसाई तरीकों या ग्रीक अथवा रसियन चर्च बर्बाद का मकसद ही रुसी साम्राज्य या सोवियत यूनियन या आज के रसियन फेडरेशन के विघटन की असली वजह है| पिछले दो सौ वर्षों से रूस को घेरना भारत को रूस, फ्रेंच और जर्मन गुट से अलग रखना ही इंटरनेशनल अफेयर्स की जिओपॉलिटिक्स है|

भारत क्यों ?

भारत एकमात्र देश है जहाँ ज्ञान का वह भण्डार आज भी मौजूद है जिससे रुढ़िवादी मजहबों को भी मानवता के उद्भव का समुचित नजरिया मिल सकता है| भारत के ज्ञान का अथाह भण्डार, प्राकृतिक संसाधन और मानवीय मेधा भूराजनीति के सभी बड़े खिलाडियों के लिए खासी अहमियत रखती है| चर्च के विभिन्न समुदाय, चाहे वे फ्रीमेसन और उनके जिहादी अराजकतावादी हों या फिर शिया और सुन्नी सभी को इस देश से कुछ न कुछ मिला जरुर है|

1750 के बाद से कमोबेश ढाई सौ सालों तक चीन पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियों का कब्ज़ा रहा है, इसके लिए पहले आबादी को अफीम के नशे का लती बनाया और उसके बाद भारतीय राज्यों से सेना लेकर बचे खुचे मंचू शासकों को हरा दिया| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियों ने किसी न किसी प्रकार अपना छद्म शासन बनाकर रखा| लेकिन इसी मृतप्राय राजघराने का इस्तेमाल करके ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूर्व के भारत के दूसरी तरफ मौजूद बर्मा, तिब्बत, असम और भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्रों के मुर्दा समझौते किये| इन समझौतों से उक्त क्षेत्रों को चीन के हवाले कर दिया गया| ऐसी हालत में चीन की नीयत भारत को एक बफर जोन के तौर पर इस्तेमाल करने की है|

अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान सरीखे राज्यों को बना कर इसी तरह के हालात दूसरी तरफ भी पैदा किये गए | इसका मकसद था कि रूसी जर्मन और फ्रेंच लोग सड़क मार्ग से भारत तक पहुँच ही न सकें| ऐसा होने से मानवता को अपनी सबसे प्राचीन विरासत से जुड़ने का मौका ही न मिल सकेगा| ओल्ड सिल्क रूट, वह भूमार्ग जो सांस्कृतिक और व्यापारिक जुडाव का सबब था, जब तुर्कों ने बंद कर दिया तो पूरे यूरोप को भारत तक के वैकल्पिक रास्ते की तलाश करनी पड़ी (याद रहे कि यह चीन के लिए रास्ता खोजने की कवायद नहीं थी, भारत के लिए रास्ता खोजने में जो जो हिस्से मिले उनके नाम भी भारत की तर्ज पर ही रखे गए जैसे वेस्ट इंडीज, नेटिव अमेरिकन इंडियन्स, साउथ अमेरिकन इंडियन्स)| जैसे ब्रिटिश का समुद्रों पर अधिकार हो गया, उनको भरोसा हो गया कि अब भारत तक कोई दूसरा देश समुद्र मार्ग से नहीं पहुँच सकेगा|चूँकि भारत सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से दुनिया से अलग हो चुका था, इसलिए ब्रिटिश ने भारत के दिलो-दिमाग पर कब्जेदारी का सिलसिला शुरू किया| भारत के संसाधनों को लूटने का चीन पर कब्जेदारी से शुरू होकर पहले और दूसरे विश्वयुद्ध तक के सभी सैन्य अभियानों में जारी रहा|

क्या था चीन?

मध्य एशियाई घुमंतू कबीलों से बचाव में बनी चीन की दीवार के बाद, पहाड़ों या दक्षिणी समुद्र मार्ग से आने वाले व्यापारियों या विद्वानों को छोड़कर चीन के दरवाजे बाकी दुनिया के लिए बंद ही रहे| चीन की मान्यता थी कि उनकी सभ्यता बाकी दुनिया से बहुत आगे है इसलिए दुनिया के दूसरे हिस्सों के पास चीन के लिए कुछ नहीं, वे संतुष्ट, सक्षम और स्वाध्यायी हुआ करते थे|

जैसा कि हमने बताया कि चीन मध्य राज्य था और सुदूर पूर्व में मांचू शासकों का राज्य था दोनों के बीच शताब्दियों तक जंग जारी रही जिसमे मध्य राज्य के तख्त के दावेदार बदलते रहे| जब मध्य राज्य मंगोलों ने कब्ज़ा कर लिया तो चीन के साम्राज्यवाद का अंत हो गया, पहले चीन पर मंगोलों का कब्ज़ा हुआ उसके बाद मांचू शासकों का| उसके बाद कमजोर मांचू शासकों को हराकर ब्रिटिश ने चीन को कब्ज़ा लिया|

ड्रैगन की नशाखोरी का पुराना किस्सा

मुक्त व्यापार और वैश्विक बाज़ार ईस्ट इंडिया कंपनी के दो श्रेष्ठ मकसद थे, यूँ मानिये कि ब्रिटिश हितों के लिए मुक्त वैश्विक व्यापार| जब कैथोलिक चर्च और ब्रिटिश भारत के ज्ञान संसाधनों को लूटकर बर्बाद करने को सहमत हुए तो उसके पीछे जर्मन प्रोटोस्टेंट और फ्रेंच क्रांतिकारियों की ओर से होने वाले खतरे का सबब था| जर्मन प्रोटोस्टेंट और फ्रेंच क्रांतिकारियों को भारत से मिले ज्ञान में टाइम और स्पेस का आधार रहा ज्योतिष और खगोलशास्त्र| यह ज्ञान पाने के बाद उन्होंने चर्च के दस्तावेजों, बहलाने वाले लालची और कामुक शास्त्र को दरकिनार कर दिया| उसी समय कैथोलिक चर्च का फ्रीमेसन, सामंतों, टमप्लर, प्रबुद्ध वर्ग और समर्पित यहूदियों के साथ जद्दोजहद जारी थी| इसलिए उन्होंने भारतीय ज्ञान सम्पदा को पूरी तरह बर्बाद किया| दर्जनों पर्शियन और बौद्ध राज्यों में इस ज्ञान सम्पदा की नक़ल बनाई, यह सिलसिला पूर्व के सभी राज्यों में चला| चीनी, बर्मी, थाई और तिब्बती इस सम्पदा के प्रमुख केंद्र साबित हुए कमोबेश कम्बोडिया से वियतनाम और कोरिया तक के सभी पूर्वी राज्यों में यही स्थिति बनी|

चीन को गुलाम बनाकर सभी पूर्वी देशों के खिलाफ इस्तेमाल करने की नीति अनिवार्य रूप से लागू की गयी| इसका साधारण तरीका था सारे देश को नशे का लती बनाना ताकि सैन्य क्षमताएं बर्बाद हो जाएँ उसके बाद युद्ध में जीतना|

इसके लिए ईस्ट इंडिया कंपनियों ने पहले मकाऊ, केंटन और शंघाई के पुर्तगाली व्यापारिक रास्ते के लिए तमाम समझौते किये जिसमे राजघराने को चर्च का आशीर्वाद हासिल रहा| व्यापारिक एकाधिकार हासिल होने के साथ साथ सांस्कृतिक विविधता के परदे में उन्होंने अफीम के लिए अड्डे बनाये|

लेकिन अफीम आई कहाँ से?

यह गंगा के उपजाऊ मैदानी राज्यों बंगाल और बिहार में उगाई जाती थी, बंगाल पर कब्ज़ा होने के बाद किसानों से जबरन अफीम की खेती कराने का सिलसिला शुरू हुआ जिसके नतीजे में किसान बंधुआ मजदूर या गुलाम हो गए| ये अफीम चीन भेजी जाती थी| पहले इसका प्रयोग सेना के अधिकारीयों के लिए हुआ उसके बाद उनके बच्चों में फिर तो सारी आबादी इसकी गिरफ्त में आ गयी| अधिकारी इस जाल में फंसने के बाद अपने देश में बढ़ रही लत का विरोध नहीं कर सके क्योंकि वो खुद तो उसके आदी थे साथ ही साथ अफीम के फायदे के साझीदार भी थे, इस साझेदारी को हम रिश्वत भी कह सकते हैं| जब भारी तादात में लोग इसके शिकार होने लगे तो खतरे की घंटी भांप कर मंचू शासकों ने दखल दी और अफीम के अड्डों को बर्बाद करने का हुक्म दिया| सेना के अधिकारीयों और आवाम इसकी लती थी साथ ही साथ कमाई की साझीदार भी, उसने आदेश नजरअंदाज कर दिया| जब राजा की सेनाएं आगे बढीं तो उनके लिए आतंरिक राजद्रोह और ब्रिटिश ताकत से पार पाना बहुत मुश्किल साबित हुआ| ब्रिटिश खेमे की सेना में भारतीय राजाओं के भाड़े के सैनिकों की बहुत बड़ी तादात शामिल थी| अफीम की लत के खिलाफ हर युद्ध में चीनी मंचू शासकों के अधिकार और साम्राज्य के दायरे सिमटते गए|

आज़ादी और सांस्कृतिक मूल्यों की हार के खिलाफ परम्परावादियों ने तायपेई और बॉक्सर की क्रांतियां की| ऐसा ही भारत में हुआ जब 1857 में पहली आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी|

अंग्रेजों ने जो भारत में सीखा उसे ही चीन में कार्यरूप में लागू किया| भारत में उन्होंने तीन समूह बनाये जो मध्यस्थ थे और अंग्रेजी अत्याचारों से ध्यान हटाने का काम करते रहे, आपस में ही उलझते रहे| इंडियन मुस्लिम लीग इस्लाम के वहाबी मॉडल जैसी थी, हिन्द महासभा कैथोलिक चर्च का देसी तर्जुमा थी और सेक्युलर नेशनल कांग्रेस अंग्रेजी पढ़े लिखे भारतीयों का गुट थी| हर समूह में उन्होंने कंजरवेटिव, मॉडरेट और सुधारवादी लोग शामिल किये जो भारत के सबसे उम्दा नीतियों की बात करते थे फिर वे अंग्रेजी हुकूमत से अपने-अपने नंबर बढ़ाने की सिफारिश भी करते थे| इन समूहों की शिक्षा ब्रिटिश तरीके से हुई जिसकी बदौलत देश से उनका जुड़ाव कमजोर होता गया और वे ब्रिटिशों की ख्याली दुनिया में रहने लगे| यद्यपि इनमे से कोई भी ब्रिटिश संस्करण की ईसाईयत में कन्वर्ट नहीं हुए लेकिन उनके दिल-दिमाग आत्मा सब कैथोलिक क्रिस्टियन विचारों से अभिभूत होकर रह गयी|

चीन में, लोगों के आक्रोश को दिशा देकर राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट खेमें बनाये गए जिनमे आपसी मतभेद थे| चर्चों की शह पर दोनों समूहों के नेताओं का धर्म परिवर्तन हुआ| मुर्दा होते कुइंग राजघराने की खिलाफत के साथ साथ दोनों खेमे एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलते रहे| इस युद्ध से चीन बर्बाद होता रहा और उनकी संस्कृति भी नष्ट होती गयी, शिक्षाएं और मूल्यों के साथ साथ सभ्यता के विकास में जमा हजारों किताबों की विरासत भी बर्बाद हो गयी|

सन 1800 के बाद चीन के परंपरागत तबकों में असंतोष बढ़ने लगा, यह असंतोष चीन के पश्चिमीकरण की ब्रिटिश साजिश के खिलाफ था, तायपेई और बॉक्सर रेवोलुशन सरीखी कई विद्रोही घटनाएँ भी हुईं लेकिन ब्रिटिश समर्थन से बने नाम मात्र के राजा ने इन विद्रोहों को कुचल डाला| जब भारत में बौद्धिक विसंगति का दौर था उस समय तक चीन सांस्कृतिक और नैतिक रूप से पूरी तरह बर्बाद हो चुका था|
नाकाबिल लीडरशिप को देखते हुए ब्रिटिश ने अपने भरोसेमंद राष्ट्रवादी और कम्युनिस्टों की फसल तैयार की, यह कुछ वैसे ही समझा जा सकता है जैसे भारत राजनीतिक सांस्कृतिक सुधार आंदोलनों में हिन्दू और इस्लाम के तमाम सामाजिक आयाम विकसित हो गए| चीन के राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्टों में अलग-अलग चर्चों की भूमिका रही| ये चर्च आपसी युद्धों में उलझे रहे और उन्होंने चीन की सांस्कृतिक विरासत में भी पांच हजार सालों वाला फार्मूला फिट कर दिया| ऐसा करने के लिए उन्होंने चीन का तमाम साहित्य मिटाया और भारत से जुड़ाव साबित करने वाले सबूतों को भी नष्ट किया| आज जबकि तमाम खोजों से यह ज्ञात हो चुका है कि इस ग्रह की सभ्यता का इतिहास लाखों साल पुराना है, इसके बावजूद उनके सारे पूर्वी देशो में उनके नियंत्रण की प्रेस से लेकर पार्लियामेंट तक यह मानने को तैयार नहीं, उन्हें आज भी वही पांच हजार साल वाला किस्सा ही समझ आता है|

क्विंग की बर्बादी और चीन का विभाजन

राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्टों के बीच हुए टकरावों में परम्परावादी चीनी दरकिनार कर दिए गए| क्विंग शासकों को हटाकर राष्ट्रवादियों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और चीन को एक गणतंत्र घोषित कर दिया| इन वर्षों में क्विंग का पूरा चीन साम्राज्य जिसमे तिब्बत, बर्मा, भूटान और आज का नार्थ ईस्ट भी शामिल है, ब्रिटिश राज की मिलकियत माना जाता था| इन परिस्थितियों में जापान ने दखल दी और मंचू राजाओं को हराकर पूर्वी चीन में दखल दी और आज के ताइवान और मध्य राज्य पर कब्ज़ा जमा लिया, जापान के सैन्य अभियानों का नारा रहा “एशिया फॉर एशियन”| जापानी दखल के चलते राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्ट खेमों का माओवादी झण्डे के नीचे एकीकरण हुआ| जापानियों की खिलाफत के लिए चीनी हुक्मरान माउंटबेटन के नेतृत्व वाले अमेरिका और ब्रिटेन के खेमे में पहुँच गए|

एक छोटे किन्तु सुझबुझ भरे प्रयास में सुभाष चन्द्र बोस ने बर्मा और सिंगापुर पर कब्ज़ा करके उन्हें आजाद करवाकर भारतीय गणतंत्र घोषित कर दिया, जिसका मुख्यालय सिंगापुर बनाया| इस चतुराई भरे कदम से भारत को घरने का पूरा ब्रिटिश खेल खतरे में पड़ गया, भारत से ब्रिटिश रुखसती होने के बाद तथाकथित चीनी नियंत्रण वाले वे राज्य भारत को घेरने के काम न आ सके| इसी तरह की गतिविधियों के चलते अमेरिकियों को जापान पर परमाणु बम विस्फोट करना पड़ा जिससे जापान ने हार मानी, बोस को वहां से निकलना पड़ा| चीन की जीत हुई और उसे आजाद घोषित किया गया, इसमें महज चीन का मध्य भाग ही नहीं बल्कि तिब्बत, बर्मा भी चीन के हिस्से में मान लिए गए| विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद चीन के राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्टों ने सत्ता संभाली| आपसी मतभेदों के चलते चीनी राष्ट्रवादी चीन छोड़कर ताइवान चले गए और उसे चीन गणतंत्र घोषित कर दिया कम्युनिस्टों ने मुख्य भाग वाले चीन की बागडोर संभाली और इसे पीपल’स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना करार दिया|

लेकिन अंग्रेज की समस्या यह थी कि अगर वे भारत छोड़ते हैं और भारत चीन से कोरिया तक सभी पूर्वी देशों के साथ फिर से जुड़ जाता है तो भारत अपने खोये हुए ज्ञान को फिर से पा लेगा और फिर से दुनिया का नेता बन जायेगा| इसलिए सभी पूर्वी देशों को इस कदर बर्बाद करना जरुरी था ताकि भारत उनके साथ कोई सम्बन्ध न बना सके| चीन से शुरू करते हुए उसकी आज़ादी के नाम पर सत्ता ब्रिटिश-यूरोपियन-अमेरिकियों के सिखाये पढाये स्थानीय मिशनरी नेताओं को सौंपी गयी, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इन सभी पूर्वी देशों में पिछले दो सौ वर्षों के पहले का कुछ बाकी न बचे, पिछले दो सौ सालों में जो कुछ हुआ वही सर्वश्रेष्ठ माना जाए|

चीन और माओ के शासन में पूर्वी देशों का विनाश

पब्लिक (सरकारी) स्कूल, प्रिंटिंग, पब्लिक डिबेट जिसमे सरकारी मध्यस्थता हो और प्रेस पर कब्ज़ा जमा करके अंग्रेज ने जो मानसिक, मनोवैज्ञानिक, और अध्यात्मिक पराधीनता दो सौ साल में बनाई थी, वह माओ राज के पच्चीस सालों में हासिल हो गयी| चीन की परंपरागत और सांस्कृतिक विरासत के प्रति नए ईसाई माओ ने जो निर्दयता और अमानवीय बर्बरता दिखाई वह लाखों कलाकारों, सगीतज्ञों, चित्रकारों, साधुओं, भिक्षुकों के नरसंहार में नजर आता है, इस कुकृत्य से चीन की विकसित सभ्यता धूल में मिल गयी| परंपरागत शिक्षा, कला, शिल्प, तमाम विज्ञानं पूरी तरह बर्बाद कर दिए गए| चीनी औषधि विज्ञानं बचा रहा क्योंकि इसने माओ की जान बचाई थी| न्याय और बराबरी के माओवादी तरीके से एक नारा रचा गया, “वर्कर, पीजेंट, स्टूडेंट, सोल्जर कैननोट फेल एनी एग्जाम”. इसलिए वे जैसे ही पहले दर्जे में भर्ती हुए वे अपने आप ही पीएच.डी में पहुंच गए, उसके बाद सभी को सरकारी सेवादार बना दिया| गावों में मौजूद परिवारों को छोड़कर बाकी सब मिटा दिए गए और शादी के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की सहमति जरुरी होने लगी| बच्चों को उनके मातापिता से छीन कर अलग रखा गया, जिनके ट्रेनिंग कैम्पों में मजदूरी नहीं होती थी, खाने-पीने और पहनने के साथ साथ कार्यस्थलों में बारह घंटे कड़ी मशक्कत और बारह आजाद घंटे कार्य की संस्कृति बनी| बच्चों को ब्रेनवाश करके आज्ञाकारी पार्टी कार्यकर्ता बनाया गया| इसमें चीन के अपने कम्युनिज्म के पार्टी कार्यकर्ता चीनी चर्च के अनुयायी थे| इस तरह चर्चों के मुताबिक धर्म परिवर्तन के इतने दमनकारी तरीकों में चीन के माओवादी लीडरशिप का उदय हुआ, जिसे चीनी कम्युनिज्म कहा जाता है|

सबसे ज्यादा प्रचारित धर्म को विस्मृत यानि कालवाह्य कर दिया गया, उसके परिचय तक को अस्वीकार कर दिया विपक्षी और विरोधी ताकतों ने कल्चरल रेवोलुशन के नाम से हर ग्रन्थ, स्मृति चित्र, और गौरवमयी अतीत के दस्तावेज जला दिए गए| उसके बाद वहां पश्चिम समर्थन से वहीँ नेता जापान के खिलाफ लड़े थे| जापान की खिलाफत वालों को वियतनाम, कंबोडिया, कोरियाई प्रायद्वीप और लाओस और चीन से आई खून की प्यासी जनजातियों के समर्थन से मजबूत किया गया|

ऐसा करने के लिए उन्हें दो हजार साल का इतिहास उधार में दिया| ऐसा इतिहास जिसमे दो हजार साल से आगे का इतिहास शामिल हो| जब तक वे अपने जीनों की खोज नहीं कर लेते तब तक उनके संस्थापक नेताओं की क़द्र भी न करेंगे| लाखों मारे गए, धर्म बदल लिए, और सारा ज्ञान बर्बाद कर दिया गया जिनको दण्ड का कोई ग्लानि या भय भी नहीं| फिर भी बेचारे जर्मनों और फ्रांसीसियों ने हर मूल्यवान चीज को खरीदने की परंपरा जारी रखी और मानवता की विरासत के लिए उन्हें बचाने की कोशिश भी कर रहे हैं|

तिब्बत

जब माओवादी कम्युनिस्ट सत्तासीन हुए उन्होंने क्विंग घराने की सभी संधियाँ ख़त्म कर दी थीं| लेकिन उनमे से तमाम को भारत से जुडी होने की वजह से जिन्दा रखा गया| इन्ही में से एक संधि थी मुर्दा क्विंग घराने और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच का समझौता जिसमे तिब्बत को चीन के मुर्दा क्विंग के हाथों सौंप दिया| अंग्रेजों ने इस काम को इसलिए अंजाम दिया ताकि रूसी और जर्मन भारत होकर तिब्बत न पहुँच सकें| इस मुर्दा नीति को जिन्दा करने की नीति में धार्मिक युद्धों और दंगों का नजारा भारत और पाकिस्तान बिभाजन के बाद पूरी दुनिया ने देखा| उससे सबक लेकर चीन ने सभी इस्लामी कम्युनिस्टों को तिब्बत से युद्ध के लिए उकसाया| हिन्दू मुसलमान के मामले की तर्ज पर मुसलमान कम्युनिस्ट कैडर और आर्मी के लोगों को तिब्बत के खिलाफ युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया गया| यह प्रकिया पंद्रह सालों तक चली, इतने समय में तिब्बत की सत्ता पर मुसलमान हुक्मरान काबिज हो गए, इस युद्ध में इंसानियत की जो तबाही हुई है वह चीनी दखलंदाजी की एक नजीर है| तिब्बत के धर्मगुरुओं ने जैसे ही सत्ता का त्याग किया चीनी अवैध रूप से तिब्बत में घुस कर काबिज हो गए|

उसके बाद वो भारत के पूर्वी कश्मीर में दाखिल हो रहे हैं ताकि उनका हमारे पश्चिमी भाइयों के साथ गठजोड़ बन सके, कश्मीर के इसी अवैध कब्जे की बदौलत चीन, मध्य एशिया और मिडिल ईस्ट के भूमार्ग को जोड़कर नया सिल्क रूट बनाना चाहता है|

स्वेज नहर मामले के चलते जब नेहरु ने ब्रिटेन की संयुक्त राष्ट्र में खिलाफत की तो ब्रिटिश ने महसूस किया कि बंटवारे के बाद भारत से यह खतरा है कि अगर भारत को पता चलता है कि ब्रिटिश राज में उसके साथ क्या-क्या किया गया तो तो वह आगे बढ़ कर सारी दुनिया के लिए समाधान निकालने में कामयाब भी हो सकता है| चीन की कठपुतली सरकार ने हम पर युद्ध थोपा और कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा काट कर अलग करने की हिमाकत कर डाली| चीन की चतुराई इसी बात में नजर आती है कि उसने कश्मीर को अवैध रूप से इस कदर बांटने की कोशिश की है जिससे कि चीन कश्मीर से होकर हमारे पश्चिमी पड़ोसियों से जुड़ सके| इसी समय रुसी कम्युनिज्म की खिलाफत में ईरान की लोकतान्त्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया गया| लेकिन इसके पीछे असल मकसद यही था कि ईरान और भारत के बीच संपर्क न हो सके| कैसे भी करके सोशलिस्ट ईरान भारत के साथ समाजवादी सम्बन्ध बनाने में कामयाब हो जाते तो सारे पर्शिया से भारत के रजनीतिक और कूटनीतिक सम्बन्ध बन ही जाने थे| तब भारत-ईरान की साझी विरासत दोनों मिलकर खोज लेते|

इनमे से ज्यादातर योजनायें कभी परवान नहीं चढ़ सकी क्योंकि माओ की आर्थिक नीतियों ने अकाल दर अकाल पैदा किये| एक बार फिर चीन खुद को बाकी दुनिया से अलग करके अपने ही नागरिकों के लिए नरभक्षी हो गया, साथ ही साथ बाहरी मोर्चों पर ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया के साथ गिरोहबंदी करके अपने ही कम्युनिस्ट भाई सोवियत रूस के खिलाफ काम करने लगा| मुद्रा प्रबंध और अर्थव्यवस्था के मोर्चों पर चीन ने अफीम के सौदगरों वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के कारोबार को अपनाया और स्वर्णिम त्रिभुज (बर्मा, थाईलैंड और चीन) के बाकी देशों को नशे के कारोबार से बर्बाद करने में लिप्त रहा|

नशे का कारोबार से बना खरबों का कालाधन निर्वासित चीनियों द्वारा सफ़ेद किया गया| गौरतलब है कि चीन के निर्वासित कारोबारियों पर चीनी खुफिया के साथ मिलकर बाल यौन शोषण के भी आरोप हैं, जिसमे दुनिया के तमाम देशों में उनकी संलिप्तता पायी गयी है| चीनी गैंग ही पूरे पश्चिमी जगत में चल रहे अधिकाश मसाज पार्लरों, वेश्यावृत्ति के अड्डों के संचालक हैं, जिन्हें चीनी खुफिया संचालित करता है| तमाम यूरोपीय देशों में मानव तस्करी के कारोबार में जांच करने पर पाया गया कि बाल यौन शोषण के लिए चर्च सहित तमाम सभ्य यूरोपियन ग्राहकों को बच्चे सप्लाई करने का काम लम्बे समय से चीन ही करता रहा है| यह बात जगजाहिर है कि नशे के उगाने बनाने और बेचने का कारोबार और तिब्बत के रास्ते गोल्डन क्रेसेन्ट (पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान) क्षेत्र से होते हुए यूरोप पहुँचाने का सिलसिला दो सदियों से होता आया है| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने जो काम पिछली सदी में किया, उन्ही पश्चिमी आकाओं की शह से चीन ने अमेरिका और ब्रिटेन में नशे और सेक्स का बाज़ार खुद खड़ा कर दिया| लेकिन नशे की काली कमाई चीनी अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं पड़ी और चीनी अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया| चीन में शानदार शिक्षा तंत्र है जिसमे दर्जा तीन से पीएच.डी तक कोई फेल नहीं होता, इसके बावजूद आज चीन में वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति रुकी हुई है|

हमारे दिल और आत्मा कश्मीर के टुकड़े होने के साथ देश की आज़ादी हुई, जो कुछ भी बाकी बचा उसी के साथ धीरेधीरे प्रगति करते हुए भारत ने हथियारों, अंतरिक्ष, विज्ञानं, कृषि और तकनीक में आत्मनिर्भरता के साथ उभरती हुई क्षेत्रीय शक्ति का रुतबा हासिल किया है| चीन के साथ हुए युद्ध में भीषण बर्बादी के बावजूद भारत ने वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, चिकित्सकों और कृषि विशेषज्ञों के रूप में तमाम सितारे पैदा किये जिन्होंने अपनी देशभक्ति के जज्बे से दिखा दिया कि भारत दुनिया में महाशक्ति का दर्जा हासिल कर सकता है और दुनिया में एक अहम् भूमिका निभाने के लिए एशिया की एक महाशक्ति के रूप में तैयार हो रहा है| चीन युद्ध से सबक लेते हुए भारत ने खाद्य और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को लक्ष्य बनाया और जय जवान जय किसान के नारे के साथ साथ दूसरों पर निर्भरता से मुक्ति पा ली| भारत और चीन के बीच फासला 1971 के बाद और बढ़ता गया|

चीन-युद्ध के बाद क्षेत्रीय शक्ति के रूप में आत्म निर्भर भारत का उदय

दुनिया की भूराजनीतिक शक्तियों ने जल्द ही महसूस कर लिया कि अगर कुछ नहीं किया जा सका तो भारत को रोकना असंभव हो जायेगा| इसलिए हम पर 1971 का युद्ध थोपा गया| इससे पश्चिमी उपनिवेशवादियों खास कर के ब्रिटिश को एक नया सबक मिला| इंदिरा गाँधी सरीखी भारतीय महिला ने अमेरिका और किसिंजर की ताकत को ठुकराते हुए साबित कर दिया कि अगर अमेरिकी लोग पाकिस्तान की समस्या नहीं सुलझा पाते हैं तो भारत सैम मानेकशा के साथ मिलकर मामले को सुलझाने में सक्षम हैं| यह जबर्दस्त जुगलबंदी थी—पर्शियन सेनाध्यक्ष ने भारत की जीत की कहानी लिख दी| यह जीत ईरान की आधी आबादी (ओरिजिनल पर्शियन, दरुज़े, बहाई और यहूदियों) के साथ संपर्क बढ़ाने में भी कारगर हो सकी| इस नतीजे के चलते भारत को पड़ोसियों के साथ युद्ध देखना पड़ा और पर्शिया के अधिकारियों की रिश्वतखोरी से अयातुल्ला के खिलाफ क्रांति हुई| इस युद्ध का मकसद उस भारतीय सेना का मनोबल तोड़ने का था जो सबसे ताकतवर युद्ध उपकरण के रूप में मौजूद है और परंपरागत युद्ध में सारी पश्चिमी सेना के खिलाफ लोहा लेने में सक्षम है|

जब ब्रिटिश ने अपनी ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत भारत पर कब्ज़ा किया तो उन्हें जल्द ही पता लग गया कि भारत को जीतना संभव नहीं क्योंकि भारत सैकड़ों राज्यों में बंटा हुआ था| उन्हें डर था कि वे राज्य दूसरी यूरोपीय ताकतों की मदद ले सकते हैं जैसा कि उन्होंने पहले के युद्धों में फ्रांसीसियों को साथ लेकर किया था, इससे ब्रिटिश के हार होने और भारतीय सीमा के बाहर खदेड़ दिए जाने का खतरा था, इससे उनका ग्रेट गेम भी ख़त्म हो जाता| इसलिए 1857 के बाद ब्रिटिश ने पूरे भारत पर कब्जे का फैसला छोड़ दिया|

इसकी बजाए वो व्यवस्था सुधारने के लिए बाजीराव प्रथम की तर्ज पर रजवाड़ा व्यवस्था लागू की| यह भारत के हर राज्य में पेशवाओं की एक आकस्मिक सेना मुहैया कराने की व्यवस्था थी जिससे वे राज्य ब्रिटिश की खिलाफत करने के लिए किसी विपक्षी का साथ न ले सकें, इन समझौतों के तहत पेशवा सेनाओं ने हर बाहरी आक्रमण से राज्य की सुरक्षा का बंदोबस्त किया| ब्रिटिश ने इस व्यवस्था को “थ्योरी ऑफ़ पैरामाउंटसी” या कहें कि आवासीय व्यवस्था का नाम दिया, जिसके तहत ब्रिटिश रानी या राजा की अधीनता स्वीकार करने के बाद वे किसी दूसरे राज्य का अधिग्रहण नहीं कर सकते थे, और अंग्रेज उनके लिए आवासीय सेना का बंदोबस्त करते थे ताकि वे किसी विपक्षी की मदद लेकर आक्रमण का ख्याल भी न कर सकें| आकस्मिक स्थितियों के लिए अंग्रेजों ने आज के नाटो (NATO) की तर्ज पर “एक के लिए सब और सबके लिए एक” का नारा ईजाद किया| भारतीय राजाओं को शांतिपूर्वक दरबार चलाने के लिए न चाहते हुए भी अंग्रेजी साहसिक कारनामों में चीन पर कब्जे के लिए अपनी सेनाएं भेजनी पड़ीं|

सैन्यबल की कमी के चलते उपनिवेश के सुनहरे समझौते को दरकिनार करने के अलावा ब्रिटिश के पास कोई रास्ता न था, यूरोपीय देशों के बीच एक समझौता यह था कि किसी भी उपनिवेश की सेना को युद्धकला की ट्रेनिंग नहीं देंगे ताकि गुलाम देशों की सेनाएं पश्चिमी सेनाओं से आगे न निकल जाएँ| गुलामी और शोषण के इतने लम्बे इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी देश की सेना ने स्थानीय सेनाओं को पश्चिमी युद्धकला के तौर-तरीकों की ट्रेनिंग दी हो, उन्हें इस बात का भय था कि वे बगावत न कर बैठें| यह भारत में अंग्रेजों की वह गलती थी जिसे बदला नहीं जा सका| आज़ादी के बाद के सालों में भारतीय सेनाओं को वह दौर देखने को मिला जब भारी भरकम हथियारों के बगैर अपने कौशल से युद्ध लड़कर देश की सुरक्षा करनी पड़ी| चीनी युद्ध के बाद भारत ने जल थल और नभ सेना के सभी उपकरणों की व्यवस्था की और उन्हें अपने बूते पर बनाना शुरू किया| इसके संयोग से भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन में एक बड़ी ताकत बनकर उभरा और उसने शीत युद्ध के पक्षकारों से अपना पीछा छुड़ा लिया| शीतयुद्ध में कैपिटलिज्म और कम्युनिज्म के बीच का कोल्ड वॉर कैथोलिक (रोम स्थित पश्चिमी चर्च) और पूर्वी (ग्रीक और रूस के) रुढ़िवादी चर्च के ईसाई खेमों की आपसी खींचतान थी जिसकी जद्दोजहद दो हजार सालों के इतिहास में देखने को मिलती है|

इसके बाद ब्रिटिश और उनके अमेरिकन दोस्तों के पास एक ही सूरत बचती है, वो भी हमेशा के लिए भारत के युद्ध उपकरण को बर्बाद कर देने की| जिस बहादुरी के साथ इंदिरा गाँधी ने पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर चुनौतियों का सामना करते हुए अर्थव्यवस्था, रक्षा और विज्ञानं तकनिकी में देश को तेजी से आगे बढाया उससे श्रीमती गाँधी और भारत के युद्ध उपकरण को बर्बाद करना जरुरी हो गया था| जितनी बारीकी से लड़ाई आगे बढ़ी उतनी ही तेजी के साथ समर्पित रुसी मदद मौके पर मिल गयी, जब रूसियों ने देखा कि युद्ध का संतुलन बिगाड़ने के लिए अमेरिकी बेड़ा पाकिस्तानी मदद के लिए आ रहा है तो उन्होंने अमेरिका को धमकी भी दे डाली कि अमेरिकी वापस चले जाएँ नहीं तो उन्हें रूस के साथ युद्ध करना होगा| 1971 में चीन की स्थिति पाकिस्तान को मदद देने की नहीं थी फिर भी अमेरिका को दी गयी रुसी धमकी को चीनियों के लिए भी चेतावनी माना गया| यह भारतीय सेना के लिए भी एक बड़ा सबक था जिसे सीखते हुए भारतीय सेना ने पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमाओं पर एक साथ मोर्चा संभालना पड़ा|

पश्चिम को सबसे ज्यादा दिक्कत तब हुई जब भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का नेता बनकर उभरा| अगर भारत अपने पड़ोस में हो रही समस्याओं में मानवीय पक्ष से कोई समाधान निकालने में कामयाब होता तो पश्चिमी ताकतों का रचा चक्रव्यूह बिगड़ जाना तय था| इसमें सबसे भयानक सम्भावना इस बात की थी कि 1971 युद्ध की जीत के नायक रहे पर्शियन जनरलों की दखल से अमेरिका की कठपुतली ईरानी सरकार को आजाद कराकर गैर इस्लामी समाजवादी लोकतंत्र की बहाली होती है तो हमारे पश्चिमी पड़ोसियों पर दबाव बनता|

एक अनोखी घटना और हुई, ईरान में मौजूद अमेरिकी कठपुतली सरकार को बेदखल करके ब्रिटिश दखल की अयात्तुल्ला सरकार बनी, जिसके शुरुआती तेवर गैर अमेरिकी ब्रिटिश विरोधी राष्ट्रवाद से प्रेरित मालूम होते थे, इससे ईरान के सभी सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट बगावत में उनके साथ हो लिए, इन समूहों ने मिलकर शाह सरकार को बेदखल किया और अयातुल्ला को सर्वोच्च नेता मान लिया गया|| लेकिन सत्ता की बेदखली ईरान को महँगी पड़ी, सभी कट्टरवादी लफंगे जो बगावत में शामिल हुए थे उन्होंने पिछली सरकार के तमाम लोगों को चुन-चुन कर मार दिया, इस प्रकार ब्रिटिश हितों के लिए खतरा साबित होने वालों को लम्बे समय के लिए नेस्तनाबूद कर दिया गया| इसी के साथ इन कट्टरवादी शासकों ने सत्ता शक्ति की बदौलत मानवाधिकारों के हनन और बहाई, दरुज़े जैसे लाखों गैर इस्लामिक अल्पसंख्यकों की संपत्तियां जब्त करने और नरसंहार को बढ़ावा दिया जिसके चलते इन समूहों ने अपनी सुरक्षा के लिए भारत में शरण लेना चाहा| ब्रिटेन का सबसे बड़ा भय यह था कि भारत और ईरान सांस्कृतिक और समाजवादी आदर्शों में साझेदारी न कर लें| यदि ऐसा सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है तो हजारों पांडुलिपियों का खजाना खुलेगा जिसे ईरान में बचा कर रखा गया था| जब कट्टरवादी शिया पिट्ठुओं ने शासन संभाला तो अंग्रेजों का यह भय भी जाता रहा| शिया कट्टरपंथी प्राचीन साहित्य, पांडुलिपियों, को जलाने और सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रतीकों को नष्ट करने में सऊदी के वहाबियों से भी ज्यादा बुरे साबित हुए, ज्यादातर गैर इस्लामी पर्शियन और बहा’ई लोग जो कुछ भी बचा साथ लेकर सुरक्षित जगहों पर चले गए| इन लोगों के काम को भी जर्मन, फ्रेंच और रूसियों ने ख़रीदा और सहयोग किया|

मध्य राज्य के उदय की शुरुआत

इससे पहले कि भारत के साथ शह और मात का खेल शुरू हो पाता विकास के सबसे बुरे दौर में ठहरा हुआ और शोषक चीन वैश्विक मंच पर नजर आने लगा| इस दौर में भारत को कभी सुकून में नहीं रहने दिया जाये| इसलिए अपने कठपुतली और अति भ्रष्ट असफल राज्य के सहारे पश्चिम मोर्चे पर और चीन के माध्यम से पूर्वी मोर्चे पर वामपंथी और दक्षिण पंथी आक्रमणों की वृहत योजना तैयार हुई| इसी के साथ साथ भाषाई कट्टरता वाले राजनीतिक दलों का उगना शुरू हुआ और उन्हें बेहिसाब समर्थन दिया गया| जो दक्षिणपंथी और वामपंथी कट्टरता किसी एक जिले में भी नहीं थी वह महज एक दशक में पांच सौ जिलों में फ़ैल गयी| आपसी सहयोग करने वाले राज्यों, उनकी केन्द्रीय पुलिस फ़ोर्स और सरकारों की संकुचित राजनीति के चलते इन दक्षिणपंथी और वामपंथी राजनीतिक खेमों का असर बढ़ता गया, राजनीतिक दबावों के चलते उनके उनकी जांच एजेंसियों को तब तक इंतजार करना पड़ता था जब तक उनके राज्य की सीमा में कोई गतिविधि न हो| इतना होने के साथ साथ चीनियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियों के सदियों पुराने तरीके से सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकियों की फंडिंग भी शुरू कर दी| इस तरह इन दक्षिणपंथी और वामपंथी खेमों के आतंकी अपने ब्रिटिश और अमेरिकन मालिकों के मुताबिक भारत को अस्थिर करने का काम करते रहे और उनकी उर्जा और समय का इस्तेमाल करके चीन को वैश्विक मंच पर एक ताकत बना के पेश किया गया|

पश्चिमी पड़ोसियों ने 1971 में हमसे मुंह की खायी और बदला लेने के लिए पश्चिमी आकाओं के सामने समर्पित हो गए, उन्ही का इस्तेमाल करके इस्लामी कट्टरवाद का पोषण किया गया| सऊदी पूंजी और ब्रिटिश अमेरिकी हथियारों की बदौलत सऊदी अरब का वहाबी छाप इस्लाम पहले से ही जारी था| हमारे पश्चिमी पडोसी के भ्रष्टतम हुक्मरानों को इस्लाम का यह संस्करण बहुत पसंद आया और इस तरह वो पश्चिम के नशे के साम्राज्य का हिस्सा हो गए|

पूर्वी सीमाओं पर मौजूद दक्षिणपंथी मिलिशिया की बदौलत नार्थ ईस्ट की आबादी के बेहिसाब धर्म परिवर्तन का सिलसिला शुरू हुआ जिसकी बदौलत भारत में खेतिहर कम्युनिस्ट नक्सलवाद आन्दोलन को हवा मिली| देसी संस्करण के दक्षिणपंथी और वामपंथी आंदोलनों का एक मजाक ये भी रहा कि उन्होंने संसाधनों से भरपूर, खनिजों से भरपूर, दुर्लभ खनिजों और धातुओं की खान वाले क्षेत्रों की घेरेबंदी की जिसके चलते इन संसाधनों से भारतीय सेना के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास अवरुद्ध हो गया| लेकिन उदारीकरण के बाद जैसे जादू हुआ हो, विदेशी निवेश से खड़ी हुई कंपनियों के लिए इन आंदोलनों का निपटारा हुआ और उन कंपनियों के स्थानीय साझीदारों ने इन संसाधनों का इस्तेमाल विदेशी मालिकों खास करके चीन के लिए के काम करना शुरू कर दिया| इन सबके बावजूद भारत वैश्विक मंचों पर विज्ञानं और तकनीकी की उभरती हुई ताकत बनकर आगे बढ़ता रहा|

घरेलू मोर्चे पर पंजाब के अकाली दल को समर्थन देकर श्रीमती इंदिरा गाँधी की भिंडरावाले सरीखे चरमपंथियों को उगाने का दांव उल्टा पड़ गया और वे सीधे पश्चिमी आकाओं के हाथों में औजार बन गए| पाकिस्तान ने सिख चरमपंथियों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और उन्ही से हथियारों और नशे की तस्करी का कारोबार भी परवान चढ़ा| जब श्रीमती गाँधी को इस चरमपंथी समीकरण में नशे की दखल समझ आई तो उन्होंने नशे के व्यापार का बड़ी बेरहमी से सफाया किया, चीन से आने वाली नशे की खेप बंद करवाई, जिससे चीन और ब्रिटिश इंटरनेशनल घरानों के ड्रग लॉर्ड्स को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ|

यद्यपि सिख चरमपंथ ठंडा पड़ गया लेकिन ब्रिटिश ने इन्हीं में से कुछ चरमपंथियों का इस्तेमाल करके श्रीमती गाँधी की हत्या करवा दी| उनकी हत्या के बाद अदालत में मामले सुनवाई हुई, जिसमे न तो हत्या के लिए स्व. श्रीमती गाँधी को न्याय मिल सका और न ही लाखों सिखों को जिनके साथ पंजाब से लेकर पूरे भारत में बेहिसाब हिंसा, लूट, बलात्कार और तमाम ज्यादतियां हुईं| हमारे आजाद भारत में ये मामले आज भी जिन्दा हैं, जिसके बेबुनियाद नतीजे में लोग कहते हैं कि बदला लेने के लिए सिखों ने इंदिरा की हत्या की| देश में सबसे उद्यमी और मेहनतकश पंजाबियों ने जितना हो सका उतना विरोध किया, बचने-बचाने की कोशिश भी की लेकिन आज पूरा पंजाब ड्रग लॉर्ड्स की गिरफ्त में है|

अदालती कार्यवाहियों की हालत उन्ही अदालतों और आयोगों जैसी हुईं जो महात्मा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चन्द्र बोस की हत्या के मामलों में बने और बुझ गए| इन अदालतों की कार्यवाही में जलियाँवाला बाग़ कांड की अदालती कार्यवाही की झलक मिलती है जिसमे आज़ादी के इतने सालों के बावजूद ब्रिटिश मालिकों के कानूनों के चलते सिर्फ अपराध करने वाले को सजा मिलती है, और इस तरह योजना बनाने वाले, इजाजत देने वाले, गुनहगार नहीं| इसके चलते हमारी संसद के साठ प्रतिशत से ज्यादा नेताओं पर अपराधिक मुक़दमे मौजूद हैं| हम भारत के न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत भूल जाते हैं जो अपराध करने वाले-कर्ता, अपराध की योजना बनाने वाले-कारयिता, अपराध को शह देने वाले या भड़काने वाले-प्रेरक और अपराध के अनुमोदक को भी सजा देने की घोषणा करता है|

कर्ताकारयिताचैव, प्रेरकश्चअनुमोदकः।
सुकृतेदुष्कृतेचैव, चत्वारःसमभागिनः॥

अगर किसी कार्य का परिणाम लोगों के या राज्य के विरुद्ध उकसाने भड़काने या योजना बनाने का हो तो उस कार्य करने वाले को अधिकतम दण्ड की सजा मिलनी चाहिए| जब ब्रिटिश ने हम पर शासन किया तो उन्होंने इस नियम को उल्टा कर दिया कि हर मामले में सारी जिम्मेदारी सिर्फ करने वाले की होगी| भारत के खिलाफ हुई सभी करतूतों में ब्रिटिश ने दूसरों से काम करवाए, वे भड़काने वाले या सलाह देने वाले की भूमिका में रहे| अपराध विज्ञानं के नियम को ताक पर रख कर ब्रिटिश लोग भारत में किये गए सभी अपराधों से बच निकले| हम भारतीय आज़ादी के बाद भी उन्ही के पदचिह्नो पर चलते रहे|

इस्लामिक कट्टरवाद के लिए उनका पसंदीदा तरीका रहा पामर्स्टन डॉक्ट्रिन जिसका उन्होंने भारत के खिलाफ, रूस और अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध में बार-बार इस्तेमाल किया और सफल हुए| तालिबान के खिलाफ अफ़ग़ानिस्तान की लड़ाई का असल सिजरा तो आईएसआई और पाकिस्तानी खुफिया ने तैयार किया, जिसमे हथियार का जिम्मा अमेरिका का था, सऊदी पूंजी और ब्रिटिश ट्रेनिंग के साथ साथ इजराइल की खुफिया ने मिलकर अराजकतावादियों /जिहादियों की पूरी श्रृंखला बनाई| ये भारत के खिलाफ बिना शासक के तमाम देश बनाने जैसी प्रक्रिया थी|

पामर्स्टन डॉक्ट्रिन का इस्तेमाल सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के खिलाफ भी किया गया| रूस के दिल जैसा हिस्सा है चेचेन्या, चेचेन्या में कट्टरवाद का उभरना पामर्स्टन डॉक्ट्रिन का शास्त्रीय उदहारण है| भले ही सऊदी पैसा खर्च करके भी नेतृत्व करने में कामयाब न हुए हों, टर्की भी इस अराजकतावादी ट्रेनिंग में शामिल हुआ, नतीजन रूस की नाक के नीचे ही उसे घेरने का कार्यक्रम चलाया गया| हमारे पडोसी को बने बनाये असंतुष्ट जिहादी मिल गए जिनका उसने कश्मीर में इस्तेमाल किया| इस कारस्तानी की योजना बनाने वाले पश्चिमी लोग दूसरे रास्ते देखते रहे जिसमे उनका लक्ष्य था रूस की घेरेबंदी करना|

किसिंजर डॉक्ट्रिन और देंग एरा

ब्रिटिश उपनिवेशवादी नीतियों के किताबी संस्करण यानि “लूटो, बांटो और काटो” की तर्ज पर किसिंजर ने चीन को संयुक्तराष्ट्र की सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बना दिया| इससे चीन को वैश्विक परिदृश्य में क्षेत्रीय शक्ति का दर्जा मिल गया| माओ के बाद देंग ने चीन के खंडहरों की कमान संभाली इससे माओ के अनुयायी निर्दोष साबित हुए| साथ ही साथ बुद्ध परम्परावादियों को ईसाई प्रशिक्षित कम्युनिस्ट पार्टी पर नियंत्रण का मौका मिला| चीनी और दूरस्थ समुदायों में फालुन डैन आन्दोलन का जन्म हुआ| करोड़ों विद्यार्थियों और आम लोगों ने बेहतर जीवन और लोकतंत्र के लिए प्रदर्शन किया| प्रदर्शनकारी राजधानी बीजिंग में तिआन्मेन चौक पर जमा हो गए| यह देंग ही था जिसने आन्दोलन कुचलने के लिए बड़ी बेरहमी से चीनी सेना को गोली चलाने का आदेश दिया| लोकतंत्र की चाह रखने वाले हजारों विद्यार्थी मारे गए| भारी रक्तपात हुआ|

इसके बाद अमेरिका ने दूसरी तरफ रुख किया| यूरोपीय दुनिया और चर्च भी अलग ताकते मिले| पार्टी को संतुष्ट करने के लिए और यह दिखाने के लिए कि चीन बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति कर रहा है, देंग ने सुधारों की घोषणा की| देंग ने मजदूरों, छात्रों, सैनिकों और किसानों की सभी डिग्रियों को निरस्त कर दिया, मास्टर्स डिग्री और पीएच. डिग्री को टेक्निकल सर्टिफिकेट बना दिया, देंग के ही राज में पहली बार यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में भर्ती करने के लिए प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था शुरू हुई| लेकिन विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों पर कड़े पहरे लगे, चीनी ख़ुफ़िया की देखरेख में सभी छात्रों को पश्चिमी देशों की राजधानियों में “पढने” के लिए भेजा गया और सावधानी से उनकी वापसी की भी व्यवस्था की गयी| उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को प्रमुख क्षेत्रों में नौकरियां दी गयीं|
मजदूर सुधारों का ढोल बजाते हुए चीन को वैश्विक मंच पर एक विकसित देश के तौर पर प्रस्तुत किया गया| (देंग के पहले मजदूरों को बारह घंटे काम करके महज खाने-और जीने भर का भुगतान होता था| (तनख्वाह इतनी कम होने के साथ साथ वेतन के अधिकारों और सुरक्षा भी मयस्सर नहीं थी)| देंग के सुधारों के बाद उन्हें सोने के लिए एक बिस्तर भी मिलने लगा| किसिंजर सरीखे चर्च समर्पित अमेरिकी व्यापारियों को चीनीं सुधारों में भारी मुनाफा नजर आया| क्योंकि सुधारों के बाद उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के भ्रष्ट अधिकारियों को कमीशन के सिवा कुछ और देने की जरुरत नहीं थी|

अमेरिका और तमाम यूरोपियन देशों ने मैन्युफैक्चरिंग को अपने यहाँ से लाकर चीन में स्थापित कर दिया, इससे उनको मजदूरी के बिलियन डॉलर्स की बचत होने लगी, इस बचत के साथ उन्होंने यूरोपियन उपभोक्ताओं सप्लाई जारी रखी| चीन में मजदूरों के इसी शोषण का नाम ग्लोबलाइजेशन और प्राइवेटाईजेशन है| सस्ते सामान की दुनिया में कन्वेयर बेल्ट पर चीनी खून पसीने की ग्रीस लगी है| करोड़ों मजदूरों के शोषण से बने इन सस्ते सामानों के दम पर चीन ने दूसरे देशों की मैन्युफैक्चरिंग को ध्वस्त कर दिया, इसी के साथ साथ भारत में अनुसन्धान और विकास भी अवरुद्ध हुआ| धीरे-धीरे चीनी खुफिया ने राजनीतिक हलकों के साथ साथ पश्चिम के व्यापारिक घरानों में भी अपनी दखल बढाई, पश्चिमी देशों में यह दखल उस हद तक रही जिससे टेक्नोलॉजी की चोरी की जा सके, यह चोरी उन्ही विद्यार्थी कुनबों की बदौलत कामयाब हो सकी जिन्हें देंग एरा में इस काम में लगाया गया था| इसी तकनीकी चोरी और सस्ते सामान के दर्शन से चीन का सैन्यीकरण और आधुनिकीकरण मुकम्मल हुआ| इसे ही चीन में महान मानव संसाधन विकास कहा गया और वह अचम्भा बताया गया जिसे पश्चिमी दुनिया पिछले सौ वर्षों में नहीं कर सकी, उसे चीन ने महज तीस वर्षों में करके दिखा दिया|

एक के बाद एक कैथोलिक और बैप्टिस्ट अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने उभरते चीनी उत्साह और अपने व्यापारियों के सहयोग में वाइट हाउस के बेडरूम पेश किये| चीन को दिए गए इस सहयोग को अमेरिकी अंग्रेजी में पोलिटिकल कंट्रीब्युशंस फॉर डेमोक्रेसी (लोकतंत्र के लिए राजनीतिक योगदान) कहा जाता है| अमेरिकी व्यापारियों ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग चीन में शिफ्ट की जहाँ मजदूरी नहीं के बराबर थी साथ ही साथ करों और पर्यावरणीय नियमों /प्रावधानों से किनारा कर लिया, पश्चिमी देशों में यह कीमत उत्पादन मूल्य में जुडती है| टॉयलेट पेपर से कार के पुर्जे तक सभी भौतिक वस्तुएं चीन से बनकर आयात होने लगीं|

चीनियों ने इनमे से ज्यादातर असेंबली लाइन तकनीकों का इस्तेमाल अपनी सैन्य क्षमताएं बढ़ाने में किया| डंडा चलाने वाली तीन करोड़ की पीपल’स लिबरेशन आर्मी 2017 तक कुछ करोड़ मेटल रोड युक्त हो गयी| माओ के समय चीनी सेना चार करोड़ आंकी जाती थी, जो कि सबसे बड़ी स्टैंडिंग आर्मी थी| एक करोड़ लोगों की बंदूकों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सेना डंडे या लकड़ी की छड़ी के सहारे थी क्योंकि तब चीन बंदूकों का खर्च उठाने की हालत में नहीं था| हालिया घटनाक्रम में दोक्लाम पठारों पर भारतीय सेना के खिलाफ जमी चीनी सेना स्टील की छड़ों के साथ पायी गयी| यह चीन का पिछले तीस वर्षों में बहुत प्रभावी विकास है!

एड्रिएटिक सागर से चीन की महान दीवार तक – असफल तुर्किश कू और सूर्या के विभाजन पर रोक

अमेरिका की रणनीति चीन का इस्तेमाल करके रूस को घेरने की थी| अमेरिका या तो महज दर्शक रहा या फिर चीनी ख़ुफ़िया की हरकतों के सहयोग में सक्रिय रहा, हाँ सावधानी इस बात की जरुर रखी कि चीनी ख़ुफ़िया अमेरिकी हथियारों की तकनीक या न्यूकलीअर हथियारों के डिजाईन न चुरा लें| चीनी रिवर्स इंजीनियरिंग के माहिर हो चुके हैं और चोरी की डिजाईन की हुबहू नक़ल बनाने में अव्वल हैं|

जब चीन चोरी के इन मॉडलों के साथ आगे बढ़ रहा था तो दो प्रधानमंत्रियों की हत्या के बाद डरा हुआ भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन को छोड़कर अपनी सुरक्षा के लिए बेहतर हथियार निर्माता अमेरिका के साथ हो लिया| यह हुआ कर्नल वेल्डन के मॉडल का अनुसरण करके, जिसमे कर्नल ने किसी भी राजनीतिक सत्ता के नियंत्रण के लिए स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव का रास्ता सुझाया है| इसका साधारण अर्थ है कि किसी देश की रक्षा क्षेत्र में सारे स्वतंत्र रिसर्च, आत्मनिर्भरता ख़त्म होनी चाहिए चाहे सहयोग हो से या सीधे युद्ध करके| यह हमारे घरेलू रक्षा अनुसन्धान को भी त्यागने के फरमान जैसा है|

चीन के सैन्य क्षेत्र के विकास के साथ चीन और टर्की दोनों मानव सभ्यता के बचाने वाले के रूप में सामने लाये गए| इसके लिए किसिंजर ने एक नया फार्मूला पेश किया जिसका नाम था एड्रिएटिक सी टू ग्रेट वाल ऑफ़ चाइना| अमेरिकी हथियारों और सऊदी वहाबियत की बदौलत टर्की को सुन्नी समुदाय का निर्विवाद नेता घोषित किया गया और चीन को मुक्त विश्व व्यापार का निर्विवाद नेता बताने के साथ साथ बचे खुचे कम्युनिज्म का नायक कहा गया| चीनियों को उस हद तक बढ़ावा दिया गया कि वे परंपरागत ओल्ड सिल्क रूट को OBOR के नाम से हड़प सके| इस हवाबाजी के नतीजे में चीन की जो अकड़ देखने को मिली| उसने अन्तराष्ट्रीय नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर कश्मीर में अवैध रूप से सड़क बना ली| इसके बाद चीनी महान शिया साम्राज्य के एक दूसरे विचार से जुड़े जिसका मकसद था जिसे एशिया के महान पर्शियन साम्राज्य को शिया के साथ तब्दील किया जाना, जिससे एशियाई देशों में शियाओं, चीन के मृतप्राय कम्युनिस्टों और हमारे पश्चिमी भाइयों का साझा कब्ज़ा बरक़रार रहे| गौरतलब है कि इसी तरह ग्रेट तूरान या ग्रेट एप्पल के एक फितूर में मृतप्राय ओटोमन साम्राज्य ने हद तक जाकर तमाम अराजकतावादी जिहादियो की ट्रेनिंग शुरू करवाई थी, जिससे सूर्या और रसिया को घेरा जा सके, जाहिर है कि ऐसा होने पर इराक और सूर्या का कण्ट्रोल अमेरिकी करते वो भी ब्रिटिश हितों के मुताबिक| इराक को तो पहले ही अमेरिकी-ब्रिटिश कब्जे में ले लिया गया और टर्की भी सूर्या को बर्बाद करके उनका भी यही हाल होने वाला था| लेकिन हमेशा बदलती तुर्किश कूटनीति कहें या ईश्वरीय हस्तक्षेप, फ़िलहाल के टर्की ने जब कुर्दों को मिल रहे ब्रिटिश अमेरिकी सहयोग के सवाल पर सब गौर किया तो उसके बाद की श्रंखलाबद्ध घटनाओं का अंत रुसी हस्तक्षेप से हुआ|

रूस की दखल से जागे टर्की ने तख्तापलट के साथ साथ सूर्या के टुकड़े होने से भी बचा लिया| अब ग्रेट बगदाद डमस्कस हाईवे रूसी सेनाओं के मजबूत कब्जे में है| हमे देखना होगा कि इस शतरंज के रूसी ग्रांडमास्टर और पर्शिया के सायरस, वहाबियत के नशे में डूबे हमारे पश्चिमी भाइयों को कैसे अपने वश में करते हैं|

रुसी लड़ाकू होते हैं, वे शुरुआत से ही सुस्त चीन और चीनी कम्युनिज्म के उदय और उसमे कैथोलिक चर्च की दखल और उनके रंग बदलने की नीयत को समझते हैं| उन्होंने चीन को एशियाई राज्यों को कम्युनिज्म से बर्बाद करते देखा भी है| चीन को आश्वासन दे पाना चीन की युद्ध क्षमता पर निर्भर करता है| कम्बोडिया में खमेर राजघराने को चीन का समर्थन है लेकिन वियतनाम के युद्ध (1979) में भी चीनी सेना वियतनाम के बेदखल खमेर राजा के सहयोग के लिए छः किलोमीटर से ज्यादा भीतर नहीं जा सकी थी| चीन ने हर कदम पर रूस का विरोध किया, कोल्ड वॉर के दिनों में रूस के प्रभाव में सेंधमारी करके उसे कम करने की कोशिश भी की और 1969 में रूस के साथ युद्ध भी किया| रूस यह सब जानते हुए भी वर्तमान में बहुध्रुवीय विश्व के लिए रूस के पास ब्रिक्स (BRICS) के अलावा और कोई रास्ता नहीं|

कर्ज में फंसे चीन का उदय, शोषण और विस्फोट के लिए तैयार चीन की सामाजिक उथलपुथल

अमेरिका और चीन के अलावा किसी भी देश ने चीन की अचानक बनी सैन्य और आर्थिक ताकत को अहम् नहीं माना है| न तो रुसी, फ़्रेन्च और जर्मन मानते हैं न ही जापानी, इनमे से किसी ने अपने उत्पादन को चीन में शिफ्ट भी नहीं किया है| जापानियों ने अपना कुछ उत्पादन कोरिया जरुर शिफ्ट किया है लेकिन चीन नहीं| रूसियों को तो चीन से कुछ ज्यादा ही कडवे अनुभव हुए हैं, फाइटर जेट Su27 चीन को बेचने के बाद उन्हें पता चला कि चीन ने इसकी रिवर्स इंजीनियरिंग करके J सीरीज के फाइटर जेट बना लिए| सस्ते माल के लिए दुनिया में मशहूर हुए चीन ने अपने मजदूरों का इस कदर शोषण किया है कि मजदूरों के अधिकार चीनी सुरक्षा बलों के कदमों से कुचल डाले हैं|

उदारीकरण भारत के नए व्यापारिक वर्ग का उदय और भारत की अर्थव्यवस्था बिगड़ने में उसका हाथ

किसी भी उत्पाद के बनाने में चार अवयव होते हैं: कच्चे माल की कीमत, लेबर की कीमत, रूपांतरण प्रक्रिया की कीमत और पूंजी की कीमत (ब्याज), प्रशासनिक और मार्केटिंग व्यय| उत्पाद की कीमत का औसत तीस प्रतिशत मजदूरी होनी चाहिए| चीन ने अपने श्रममूल्य की कीमत कम करके 1% कर दी क्योंकि वे मजदूरों को महज खाना, सोने की जगह और पहनने को कुछ कपडे भर देते हैं| कीमत कम होने का यह तरीका बहुत से व्यापारियों के लालच के लिए बड़ी वजह है, उन्हें लगता है कि देश के बनाने की बजाए सीधे चीन से आयत करके 29% मजदूरी की कीमत बचा सकते हैं|

यह एक बड़ा मार्जिन है जो रिटेल उत्पादों के 33% की सीमा के ऊपर है और थोक विक्रेताओं और डिस्ट्रीब्यूटर के 18% के मार्जिन से काफी ऊपर है| इसमें चीनी लेबर की कीमत और जोड़ दी जाए तो रिटेलर का प्रॉफिट 62% और व्होलसेलर या डिस्ट्रीब्यूटर का प्रॉफिट 47% होता है| इसमें मार्जिन में से 5% पोलिटिकल कंट्रीब्युशंस को जाता है जो कि इन उत्पादों के आयातक और लोकल नेता के बीच का गिरोह है| जब हम बिलियन डॉलर के व्यापार की बात करते हैं तो 1% लाभांश से दस मिलियन डॉलर यानि भारतीय मुद्रा में लगभग 6 करोड़ रुपये जाते हैं|
लेकिन यह अंकगणित घरेलू छोटे या मध्यम मैन्युफैक्चरिंग को गड़बड़ा देता है, साथ ही आखिरकार आयातक देशों के बड़े उद्योगों पर भी असर डालता है| कोई व्यापारी घरेलू उत्पादों को नहीं रखना चाहता क्योंकि इससे वे 29% क लाभ नहीं बना सकते, क्योंकि दुनिया का कोई देश अपने मजदूरों का इस कदर बंधुआ बनाकर बेहिसाब शोषण करने की इजाजत नहीं देता है| इसलिए इन व्यापारियों ने धीरे-धीरे राजनीतिक मजेदारी के चलते छोटे और मझोले उद्योगों, तकनीकी प्रक्रिया या क्नो हाउ, को मौत की नींद सुला दिया है|

गहराई से देखा जाए तो यही अमेरिकी और ब्रिटिश हितों का काम है| हर चीज के निजीकरण होने के बाद हर व्यापार नए उग रहे निजी हाथों में होगा जिनको सरकारी शाह भी मिली होगी| जो यह चाहेंगे कि सरकार हर चीज चीन से आयात करें जिससे वे 29% के लाभ से जल्दी और ज्यादा अमीर बन सकें, वो भी करोड़ों चीनी मजदूरों के खून पसीने से| चाहे कुछ भी हो यह नीति देश के छोटे और मझोले उद्योगों को गुमनाम और भुलक्कड़ कर देगी| भारत में इसका असर खास तौर से समुदाय आधारित व्यवसाय या इंजीनियरिंग व्यवसाय को सबसे ज्यादा झेलना पड़ेगा, जिन्हें आत्मनिर्भरता के काम से अलग होना पड़ेगा| यह सबसे बड़ा तथ्य है जो अनकहा रह गया| यही हालत देश में गरीबी बढ़ाएगी जिसे खेती की असफलता कहा जायेगा या कमजोर फसलों को दोषी कहा जायेगा| इसी कहा सुनी में आयात के लिए भी माहौल बनेगा| इससे देश की अर्थव्यवस्था में कृषि और खाद्य क्षेत्र की बर्बादी होनी तय है| इससे बचने के लिए छोटी जोत वाले किसान ख़त्म होते जायेंगे| इसमें नोटबंदी और सोने की जब्ती की बड़ी भूमिका होगी|

इससे किसी भी देश में नए व्यापारी वर्ग का जन्म होता है, इसमें बना व्यापारिक वर्ग अधिकांशतः लाभार्थी राजनीतिक संबंधों वाला भी होता है| जब व्यापारी राजनेताओं को डिक्टेट करने वाला हो जाता है तो कलम से बन्दूक तक हर चीज मेड इन चाइना होने लगती है| हर पोलिटिकल पार्टी वाले अपने खेमे के व्यापारियों की हिफाज़त करते हैं क्योंकि पार्टी को चंदा उन्ही से आता हैं| हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जब गुजरात के सीएम थे तो उनके कुछ व्यापारी चीन में जालसाजी के मामले में गिरफ्तार हो गए थे, उन्हें छुड़ाने के लिए चीनियों के साथ लॉबिंग की थी| चूँकि इन व्यापारियों को अपने फायदे के सिवा किसी और चीज की परवाह नहीं, इस हालत में कुछ समय के बाद देश में सभी आर्थिक गतिविधियां नष्ट हो जाती हैं|

चीनियों को पता है कि इन व्यापारियों को कैसे फंसाएं क्योंकि चीनी जानते हैं कि व्यापारी पोलिटिकल सर्किलों में भी जुड़े हैं इसलिए इस बात का ख्याल रखते हैं कि देश में चीन के खिलाफ माहौल न बने| चावल से रद्दी तक और मिसाइल के पुर्जों से वायरिंग तक हर चीज चीन से मंगवा रहे हैं क्योंकि वही चीज पश्चिमी देशों या रूस से आयात करना महंगा पड़ता है| निजीकरण के बाद 29% प्रतिशत लाभ के चलते बड़ी आबादी और सैन्य बलों की हिफाज़त ताक पर रख कर सौदेबाजी हो रही है| ऐसे में सवाल ये खड़ा होता है कि इन चीनी पुर्जों पर मेड इन इंडिया, या जर्मनी, या रसिया का ठप्पा लगाकर क्या हम भारत को इतना सक्षम बना पाएंगे कि हम चीन के खिलाफ युद्ध जीत सकें|

चीनी कर्ज के बुलबुले, मुद्रा छपाई और भ्रष्ट एशियाई देशों पर कब्जेदारी

अमेरिकियों ने चीन को सिर्फ सस्ते माल का हब ही नहीं बनाया है, उन्होंने चीन को मुद्रा छपाई और किसी अर्थव्यवस्था में कर्ज के तौर पर शामिल करना भी सिखाया, कर्ज से घरेलू उपभोग बढ़ता है| आर्थिक आंकड़ों का दुरूपयोग करके चीन ने मुद्रा में हेर-फेर करना शुरू किया, विनिमय दरें इस प्रकार तय करने लगे कि देश संसाधनों के मामले में कितना ही कंगाल हो जाए लेकिन पर्यावरण के लिए भारी खतरे, पब्लिक, प्राइवेट, कॉर्पोरेट और गवर्नमेंट के भारी कर्जों के बावजूद अर्थव्यवस्था चमकती रही| चीनी अर्थशास्त्र के चमत्कार के सबसे बड़े फायदे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को मिले, क्योंकि वो सत्ता प्रतिष्ठान के सबसे करीब थे, उनके बच्चों को भी मिस्टर 25% कहा जाने लगा| उनके हर अन्तराष्ट्रीय व्यापारिक समझौते के एवज में 25% इन्ही समूहों को मिलता था| पूरब का मुंह ताकने वाले भारतीयों को इस आर्थिक चमत्कार से शायद राजनीतिक सत्ता बढ़ाने का सबक भी सीखने को मिला|

इस गिरोहबंदी में बिलियन डॉलर्स की अकूत कमाई हुई जिसे कर बचाने के लिए जापान समेत कई देशों में निवेश किया गया| जिस तरह भारत के कालेधन का भण्डार इंग्लैंड, अमेरिका, दुबई की दोहरी नागरिकता वाले अनिवासी भारतीयों के पास है उसी तरह चीनी कालाधन भी दोहरी नागरिकता वालों ने ठिकाने लगाना शुरू किया| जिस तरह अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ पेट्रोडॉलर समझौता करके अपना कर्ज और महंगाई दूसरे देशों को सौगात दी, उसी तर्ज पर OBOR के माध्यम से चीन ने भी वही प्रक्रिया अपनाई| चीन के न्यू सिल्क रूट का मॉडल भारत के पुराने सिल्क रूट की हूबहू नक़ल है, जिससे भारत के इर्द-गिर्द बसे देशों को कर्ज देकर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में चीनी कर्जे की खपत होगी, इसके लिए चीन अरबों डॉलर लेकर तैयार बैठा है| चीन जानता है कि इसमें लगने वाला निवेश विदेश में जमा कालेधन से ही होगा| ऐसे में जिन भ्रष्ट सरकारों और व्यापारियों और नेताओं को अपनी अर्थव्यवस्था की असलियत का अंदाजा नहीं वे चीन की ही शरण में जायेंगे| रिपोर्टो से जाहिर है कि इन आर्थिक लाभों से चीन ने अपनी सेना को बेहतर करने के लिए भी कमर कस ली है, यह सेना भारत की घेरेबंदी वाले तमाम देशों में उसके निवेश और संपत्तियों की हिफाजत के लिए अहम् साबित होगी| श्रीलंका में हवाई अड्डे के लिए 2 बिलियन डॉलर और हमारे पश्चिमी भाइयों के लिए 55 मिलियन डॉलर का निवेश यानि कर्ज गौरतलब है| हमारे पश्चिमी भाइयों ने अवैध रूप से कश्मीर का एक हिस्सा चीन को किराये पर दे दिया है जिसमे चीन ग्वादर बंदरगाह से कश्मीर होते हुए चीन के मुख्य क्षेत्र तक काराकोरम हाईवे बना रहा है| भूटान भूभाग से अपना कब्ज़ा छोड़कर चीन ने एक शानदार चाल चली है जिसे भारत की क्षणिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, इसके एवज में चीन OBOR के लिए छूट की मांग कर सकता है जिसमे हम कश्मीर और पड़ोसियों का मामला भूलकर कोई दावा न कर सकें|
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हमारी उत्तरवर्ती सरकारें पार्टी के आर्थिक और राजनीतिक तौर पर देश के नए आयातक वर्ग के पैसों पर निर्भर हैं| लेकिन कश्मीर की हवाबाजी भी सामने है जहाँ जिहादियों और अराजकतावादी समूहों की भरमार है, अमेरिका ने इन समूहों को सूर्या में ISIS से निकाल कर उनको रेलोंकेट किया है|

पिछले बीस सालों से अमेरिका और चीन के वैध-अवैध संबंधों के नतीजे सामने हैं| वही आज भारत में हो रहा है| ट्रम्प के सत्ता में आते ही अरबों डॉलर के घोटाले सामने आ रहे हैं, इन्ही में से एक है “प्ले तो प्ले वाशिंगटन रूल बुक्स” जिसे ट्रम्प ने “वाशिंगटन का दलदल कहा” है| ऐसी ही शब्दावली का प्रयोग लगभग ढाई सौ साल पहले पेशवा बाजीराव प्रथम (उसने तत्कालीन दिल्ली का कीचड़ साफ़ करने की शपथ ली थी, इसके लिए पुणे के महल के मुख्यद्वार का नाम भी दिल्ली दरवाजा रखा ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी सनद रहे कि उनके पुरखों ने दिल्ली का कीचड साफ़ करना शुरू किया था) ने उन मुग़ल शासकों के खिलाफ किया था जिहोने ईस्ट इंडिया कंपनियों को दायें, बाएं और बीच में कीचड करने की इजाजत दी| आज दिल्ली के कीचड़ की हालत इतनी जटिल और भीमकाय है कि लगातार फैलते कीचड के सामने यमुना नदी भी सूख गयी हैं|

भारत के ऊपर फैले ड्रैगन के पंख

आजकल एक बेतुका चलन शुरू हुआ है| बहुत से एनजीओ और मीडिया आउटलेट प्रचार के लिए ग्राहकों को भावुक या प्रभावित करने के लिए बच्चों को प्रवक्ता बना कर पेश कर रहे हैं| बच्चों की भावुक अपील में चीनी सामान के बहिष्कार की मांग होती है क्योंकि चीनी उत्पादों का पैसा सीमा पर पाकिस्तान के लिए हथियार खरीदने में मददगार होगा| अपील करते इन बच्चों के माता-पिता चीनी और पाकिस्तानी सरहदों पर सेना के हिस्से हैं|

दूसरे युवक यह सोचते हैं कि चीनी उत्पाद को बाज़ार में जला देना चाहिए ताकि चीन को सबक सिखाया जा सके| इन सब घटनाओं में एक बात जो सामने नहीं आती वह ये है कि इनमे फुटकर दुकानदारों में से कोई भी चीन से सीधे सामान इम्पोर्ट नहीं करता इम्पोर्ट में तमाम कानूनी और तकनिकी प्रक्रियाएं होती हैं| वो महज इसलिए बेचते हैं क्योंकि वे अधिकतम लाभ पा सकें और उनको डिस्ट्रीब्यूटर बताते हैं कि इसमें अधिकतम लाभ है| डिस्ट्रीब्यूटर भी इसीलिए बेचते हैं ताकि वो पूंजी लगाने के बाद अधिकतम लाभ हासिल करें| उनके लाभ का मार्जिन इम्पोर्टर तय करता है| सिर्फ इम्पोर्टर ही कानूनी, तकनीकी और आर्थिक रूप से इतने बलवान होते हैं कि वे चीन से सामान मंगवा सके| इतने सारे फुटकर विक्रेताओं के साथ बहिष्कार करने की बजाये मुट्ठी भर इम्पोर्टर ये तय कर लें कि चीन से सामान नहीं लेना तो चीनी उत्पादों पर लगाम लगाना आसान हो जाए| अगर यही इम्पोर्टर भारतीय माल का प्रयोग करना शुरू कर दें तो चीन को जाने वाली भारतीय संपत्ति देश की तरक्की में लग सकेगी| लेकिन पिछले दो दशकों में भारत की मध्यम और छोटी उद्योग इकाइयां इस कदर बर्बाद हुई हैं कि भारत से कुछ हासिल नहीं होगा| आगे दो उदाहरणों में जाहिर है कि इन इम्पोर्टरों का लालच भारत का खून पीकर कैसे तृप्त होगा|

प्लास्टिक के चावल

कुछ महीनों पहले एक बड़ी खबर थी कि चीन प्लास्टिक के चावलों का निर्यात कर रहा है, और भारतीय इम्पोर्टर उसका आयात जैविक चावल की तरह कर रहे हैं और दुकानों में बेच भी रहे हैं, इस गिरोह के सञ्चालन का केंद्र केरल के आसपास था|जब तक खोजी पत्रकारों ने इसकी तफ्तीश करके जानकारी सामने नहीं रखीतब तक इम्पोर्टर और नेता भी इससे इंनकार करते रहे| जैसे ही घोटाला उजागर हुआ और उसके सबूत सोशल मीडिया पर मिलने लगे तब यह कहा गया कि यह लालची फुटकर व्यापारियों का काम है, अगर कोई ऐसा करता पाया गया तो उसे 5 साल कैद की सजा दी जाएगी| जबकि सच ये है कि कोई भी लालची फुटकर विक्रेता चीन से सामान नहीं आयात कर सकता| मतलब ये हुआ कि किसी ने मंगवा कर उन्हें बेचा| ऐसा करने वाले शायद ओपन लाइसेंस वाले इम्पोर्टर या कोई डिस्ट्रीब्यूटर ही हो सकते हैं| जिन्होंने आयात करते समय कस्टम विभाग को यह नहीं बताया कि वे चीन से प्लास्टिक चावल का आयात कर रहे हैं| जाहिर है कि प्लास्टिक का आयत किसी और नाम से या जैविक चावल के नाम से हुआ होगा|

बेचारे गरीब फुटकर व्यापारियों की गिरफ़्तारी या ठेलेवालो को सजा देने के बजाए एक गहन जांच की जरुरत है ताकि पता चले कि प्लास्टिक चावल मंगाया किसने? कहाँ पैक हुआ, कैसे बाजार में पहुंचा, कस्टम अधिकारीयों से ये हीला-हवाली कैसे हुई, जबकि सबको पता है कि भारत और चीन के बीच युद्ध जैसे हालात है| एक अहम् बात और है कि इसके बारे में किस मंत्रालय को पता है, जिसने इस घटना की इतने दिनों तक पर्देदारी की| हम मान सकते हैं कि हमारे मंत्री लोग चाहते हैं कि हमारे गरीब भारतीय जैविक और गुणवत्तापूर्ण चावल खाएं| लेकिन अगर देशभक्त मंत्री जी के इस भरोसे की आड़ में ये धोखा हुआ है तो हमारी सरकार को ये धोखा दिया किसने? क्या जो काम खोजी पत्रकारों ने कर डाला वह काम हमारी जांच एजेंसियां नहीं कर सकती हैं?

अगले उदहारण में प्रॉफिट के लिए इम्पोर्ट हाउस के बलिदान और देशभक्ति का ढोल बजते देख सकते हैं|
भारतीय तोपखाने के लिए चीन से मंगाए वायर रेस रोलर्स में “मेड इन जर्मनी” का ठप्पा – इम्पोर्टरों और नेताओं की गिरोहबंदी
लम्बे समय से मेक इन इंडिया का बाजा बज रहा है, भारत ने धनुष नाम से 155mm/45 कैलिबर की तोप बनाई, जो हमारी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, माना जा रहा था कि यह तोप कारगिल वाली बोफोर्स तोपों की जगह सेना में शामिल की जाएगी| लेकिन जैसे ही राष्ट्रवादी सरकार ने मेक इन इंडिया को सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित किया| तोपें फेल हो गयीं| जब बोफोर्स तोपों के परीक्षण में छः तोपें एक साथ चलाई गयीं तो एक गोले से तोप की नली टूट गयी| तोप का दोबारा परीक्षण किया गया फिर वही हुआ| यद्यपि इसके लिए स्वीडिश बोफोर्स FH-77B की निर्माण योजना और डिजाईन हासिल की गयी थी, फिर भी मेक इन इंडिया में इसे शामिल करने में विवाद है, क्योंकि इससे हमारे सालों पुरानी तोपें बदली जानी हैं, लेकिन बदलना बहुत ही जरुरी है क्योंकि हमारे सामने चीन की चुनौती हैं’| कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोपों ने तमाम रिश्वतखोरी के विवादों का मुंह बंद करवा दिया| खैर मेक इन इंडिया के प्रावधानों के तहत 80% पुर्जे देश में ही बनने हैं, बाकी बीस प्रतिशत में तोप के वायर रेस रोलर्स इम्पोर्ट किये गए| ऐसे दावे किये गए कि तोप के ये पुर्जे जर्मनी से इम्पोर्ट किये गए हैं, जो कि तकनीकी मामलों में उन्नत देश है| लेकिन बाद में खुलासा हुआ कि इम्पोर्टर्स ने सोचा कि वही चीज चीन से कम दामों में आ सकती है, फिर भी जर्मन यूरो में बिलिंग हुई और जो मूल्य का अंतर हुआ वह इम्पोर्टर की जेब में| खैर रेस रोलर एक रेस रोलर है अगर भारत में नहीं बनता तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि चीन से मंगाया जाता है या जर्मनी से ख़रीदा जाए? फर्क सिर्फ इस बात का है कि मंगाने वाले को फायदा कितना हुआ? जो रेस रोलर्स चीन से मंगाए गए वे डिफेक्टिव थे, पब्लिक और सेना के सवालों से बचने के लिए रोलर्स पर मेड इन जर्मनी का ठप्पा लगा दिया गया| अगर छः तोपों में से एक परीक्षण चक्र में फेल होती है तो मैदान में निश्चित रूप से तीन में से एक फेल होने के नतीजे मिलेंगे| इसका मतलब चाहे पूर्वी मोर्चा हो या पश्चिम का, युद्ध हारना तय है| जब बुल्गारिया से इम्पोर्ट हुई एके सीरीज की बंदूकें ऊंचाई और कम तापमान के चलते फेल हुईं तो एक हजार से ज्यादा बहादुर सिपाहियों की जान गयी दस हजार से ज्यादा लंगड़े लूले और अपाहिज हुए, यह इम्पोर्ट से मिले फायदों का कोलेटरल डैमेज था!
sputniknews.com/military/201708161056496597

इससे गंभीर सवाल उठते हैं| उक्त घटना कैग की रिपोर्ट में है| आर्मी को इसके बारे में पता कब चला? इन रोलर्स को किसने इम्पोर्ट किया? यदि यह किसी निजी फर्म ने इम्पोर्ट किया है तो यह भारत की सुरक्षा में निजी हितों से जुड़ा मामला है और इसको उच्चाधिकारियों के स्तर पर हल किये जाने की जरुरत है क्योंकि उनकी मर्जी के बिना ये सौदा एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकता| इस समय भारत की ख़ुफ़िया और मिलिट्री की खुफिया क्या कर रही थी? युद्ध के मामले में अग्रिम मोर्चे पर इन्हीं बंदूकों के चलते हमारे सिपाहियों की जानें जाती है उसके बावजूद इन डिफेक्टिव पुर्जों को लेकर सेना खामोश क्यों रही और उसने रक्षा मंत्रालय या उच्चाधिकारियों के सामने विरोध क्यों नहीं दर्ज कराया? क्या आर्मी के लोगों को ऐसे छोटे-मोटे बदलावों का अंदाजा नहीं? अगर इसमें तीसरा पक्ष या निजी लोग शामिल नहीं तो फिर यह जालसाजी का बहुत बड़ा मामला साबित होगा जिसमे पूरे देश को जोखिम में डाला गया और अगर ये काम खुद हमारी सेना ने किया है तो इसमें और भी गंभीर सवाल उठते हैं| क्या हमारी सेना तोप सरीखे बुनियादी हथियारों की गुणवत्ता इस हद तक सुनिश्चित नहीं कर सकती कि हथियार चीन से आये या जर्मनी से? जैसा कैग की रिपोर्ट में बताया गया वह गुणवत्ता नियंत्रण में हमारे उच्चाधिकारियों का आला दर्जे का भ्रष्टाचार है और सेना के लिए गंभीर समस्या है| यह पूरे देश की सुरक्षा के लिए भारी क्षति होगी| गुट निरपेक्ष आन्दोलन से हटने के परिणामस्वरुप हमारा देश पश्चिमी हितों का औजार भर साबित हो रहा है| इसमें कौन किस स्तर पर शामिल रहा है इसका पता नहीं| उन्हें बदला किसने? कब किया? यह अदला-बदली सेना की खुफिया, ग्लोबल मिलिट्री इंटेलिजेंस की किसी जांच में तब तक नहीं पकड़ा जा सका जब तक उस गड़बड़ी के लिए कैग ने जांच करके नहीं बताया| कैग की रिपोर्ट के बाद क्या यह सौदा रद्द हुआ? क्या कोई जांच बैठाई गयी? क्या हेर-फेर करके पैसा बनाने वाले मिल सके या नहीं?

सबसे ज्यादा अहम् सवाल उन्ही 20% पुर्जों के हैं जिन्हें मेक इन इंडिया या मेड इन इंडिया से बाहर रखा गया है, जिन पुर्जों पर मेड इन जर्मनी का ठप्पा लगा है और किसी दूसरे देश से मंगाया जा रहा है उन जरुरी पुर्जों के चीन से मंगाए गए संस्करण दोयम दर्जे के हैं जिनका हमारी सेना के इन्फ्रास्ट्रक्चर में इस्तेमाल हो रहा है| चीन के साथ युद्ध होने की दशा में इन पुर्जों से क्या असर पड़ेगा?
क्या किसी अध्येता ने यह नहीं सोचा कि ऐसे परिदृश्य में जब चीनी सेना और उनकी खुफिया यह जानती है कि हमारी सेना उनके बनाये दोयम दर्जे के रोलर्स का प्रयोग भारत की प्रीमियर दर्जे की तोप में कर रही है और उन्हें ये भी पता चल जाता है कि औसतन तीन या छः में से एक तोप नाकाम होनी है तो चीनियों या हमारे पश्चिमी भाइयों की सेना में हमारी भारतीय सेना का क्या भय रहेगा? इन दोयम दर्जे के उपकरणों से हमारी सेना की कितनी क्षमता बढ़ी, इन पुर्जों को किसने इम्पोर्ट किया, कितना पैसा किसे मिला, इनसे पोलिटिकल पार्टियों को कितना हिस्सा गया ये सब जानने के बाद क्या वे भारतीय सेना की असल ताकत की कोई परवाह करेंगे? यह सब विस्फोटक जानकारियां मिलने के बाद भ्रष्ट चीनी नेता क्या भारत के नेताओं को गुमराह नहीं कर सकेंगे? हमारे नेताओं ने सेना को सीमा पर पहुँचाने का काम किया और वापसी भी कराई| मीडिया के भोंपू ने बताया कि “चीनी घबराये” “वापस लौटे”| क्या हमारे राजनेता मीडिया की बयानबाजियों और जुमलेबाजी से आगे किसी भी मोचे पर कोई चुनौती पेश करने में सक्षम हैं?

इन “कभी न सुधरने वाली राजनीतिक परिस्थितियों” में भारतीय सेना ने दूसरे “जीवन रक्षक” तरीके ईजाद कर लिए हैं| अगर हमारे भ्रष्ट राजनेता कमीशन और दलाली भर के लिए बिलियन डॉलर्स के अनचाहे सौदे कर भी लेते हैं तो हमारी सेना न तो इन हथियारों का इस्तेमाल करती है और न ही ऐसे हथियारों को अपने देश में बनाने की बात करती है| जाहिर है कि चाहे कोई भी बजट खर्च हो, इनमे से अधिकांश सैन्य उपकरण गोदामों में पड़े जंग खाते हैं और एक मियाद के बाद सेना उन्हें कबाड़ में बेच देती है|

दोयम दर्जे के पुर्जों की खरीद में सबसे दुखदायी बात ये है कि इस प्रक्रिया से भारत का स्वदेशी अनुसन्धान उपेक्षित है, चीन या हमारे पश्चिमी भाइयों से युद्ध की जल्दबाजी में हम साल दर साल इजराइल, अमेरिका और ब्रिटेन के निष्प्रयोज्य या डिफेक्टिव हथियार आयात कर रहे हैं, महज दलाली या अंग्रेजी में कहें तो कमीशन के लिए हम अगले चरण की खरीददारी के लिए तैयार बैठे हैं|

रुढ़िवादी रुसी-फ्री मेसोनिक अमेरिकी और कैथोलिक ब्रिटिश का संघर्ष

रुसियों के सामने चार मकसद हैं- उनकी मातृभूमि के कर्त्तव्य, चर्च के कर्त्तव्य (ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स) रुसी लोगों के लिए कर्त्तव्य और बड़े परिदृश्य में मानवता के लिए उनके कर्तव्य| हालाँकि इन दायित्वों का समय के साथ एक दूसरे पर प्रभाव होता है लेकिन पिछले कई सालों से रूसियों ने विश्व शांति और समृद्धि के लिए इन चारों उद्देश्यों में संतुलन बनाया है| रुसी धार्मिक नेताओं का पहला नियम है कि उन्हें विवाह करना होगा, इससे कैथोलिक चर्च के बालयौन शोषण सरीखे कीचड से बच सके, भारत में कैथोलिक चर्च की तर्ज पर कुंवारेपन के कर्मकांड कई संगठनों में जारी है| दूसरा रूस को कैथोलिक चर्च और पश्चिम (यहाँ पश्चिम का मतलब उन देशों से है जो वेस्टर्न ऑर्थोडॉक्स या प्रोटोस्टेंट फिरकों के तौर पर छः सौ साल पहले अलग हो गए) के खतरों से वाकिफ है| तीसरा रूसियों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियों पामर्स्टन और किसिंजर के दस्तावेजों का भी पता है और वे ये भी जानते हैं कि रूस और अमेरिका में फ्री मेसोनिक राष्ट्रपतियों के होते हुए भी इन दस्तावेजों की बदौलत दोनों देशों के बीच जरुरी दोस्ताना रवैया और आपसी सहयोग कैसे दरकिनार किया गया|

चौथी बात कि रूस चीन की नशाखोरी के इतिहास और वर्तमान चीन के नशे के ब्यापार और वैश्विक मंच पर उभरते चीन पर अमेरिकी कैथोलिक चर्च के नियंत्रण से भी वाकिफ है| इसमें कोइ अचरज नहीं कि जिन हिलेरी क्लिंटन को, पूर्व की ओर देखो नीति के लिए, देवी का दर्जा देकर हमारे राष्ट्रवादी छातियाँ पीट रहे थे, उसी हिलेरी ने गॉड की सेवा के लिए कैथोलिक पुजारिन बनना तय किया है| पांचवीं बात रुसी राजा और उनके वर्तमान नेता कहीं ज्यादा अध्यात्मिक हैं जो हर छमाही दो हफ्ते अपने अध्यात्मिक मठों में पश्चाताप और साधना में बिताते हैं, जो कि भारत के अध्यात्मिक दलालों और परसेंटेज पॉलिटिशियन लोगों के लिए एक अचम्भा है| पहले अध्यात्मिक दलालों की नेतागिरी पर हम तभी ऊँगली उठाते थे जब उनके भारी भ्रष्टाचार पर कोई जांच एजेंसी कार्रवाई करती थी या फिर कोई खोजी पत्रकार उनके कारनामे उजागर कर पाता था| छठी बात रूस में चर्च दूसरे लोगों मजहबों को बदलकर उनकी आत्माओं का उद्धार भी नहीं करता क्योंकि उनका विश्वास है कि ईश्वर की मर्जी से ही किसी को ईसाई मजहब में जन्म मिलता है|

कैथोलिक चर्च को 10% के राजस्व वाले तरीके से जीसस के सच्चे अध्यात्मिक मिशन तक लाने के लिए रूसियों ने सदियों तक कैथोलिक चर्च के साथ बहुत जिरह की/लड़ाईयां लड़ीं| अब उनका विधान मिस्र की आदर्श आचार संहिता के दस अहम् बिन्दुओं में सिमट गया है| मैरी की वर्जिनिटी के विवादों के चलते वेस्टर्न चर्च (कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट) जीसस का जन्मदिन 25 दिसम्बर को मानते हैं जबकि ईस्टर्न चर्च (ग्रीक और रूसी) 7 जनवरी को| तारीखों के यही फर्क जीसस की मौत को लेकर भी बरक़रार हैं| पश्चिमी चर्च इसका आयोजन अप्रैल में करता है तो ईस्टर्न चर्च उसके दो हफ़्तों बाद मानता है| इन सभी मामलों के जानकार कैथोलिक चर्च की तारीखों के मुकाबले रुसी और ग्रीक परंपरा की तारीख और तवारीख को ज्यादा तार्किक बताते हैं|

हिंदुस्तान के बुद्धिजीवियों की सोच ऐसी है कि ब्रिटिश लोगों द्वारा भारत को दिया गया कैथोलिक तंत्र अंकगणितीय ज्योतिष वाली जीवन पद्धति, जिसका दुनिया का हर देश अनुसरण करता रहा, से ज्यादा वैज्ञानिक और बेहतर है| कट्टरपंथी शियाओं की वर्तमान संसद ने महानतम ज्योतिषी वराहमिहिर का सम्मान करते हुए उनकी तस्वीर अपनी मजलिस में लगायी है|

इससे ज्यादा बड़ा अचम्भा इस बात का है कि पूरे भारत में इस बारे में कहीं चर्चा भी नहीं| पब्लिक (सरकारी) स्कूल, प्रिंटिंग, पब्लिक डिबेट, प्रेस की बदहाली से मानसिक, मनोवैज्ञानिक, और अध्यात्मिक बदहाली भी दीगर हो रही है| हमारे सामान्य ज्ञान से गायब होते इन सवालों के चलते पूरे देश में बौद्धिक बेसुरेपन का माहौल है|

आखिरकार 2015 के आखिरी महीनों में रुसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के लीडरों ने वैटिकन के पोप के अनुरोध पर शताब्दियों पुराने संघर्ष से निपटने की एक आखिरी कोशिश क्यूबा में की| दोनों चर्चों के नेता इस सवाल पर अपने मतभेद नहीं समेट सके कि नयी सहस्राब्दि में ईसाइयों का नेता कौन होगा| रूसियों ने दावा कर दिया कि पिछले दो सहस्राब्दियों से ईसाइयत का नेतृत्व करने वाली कैथोलिक चर्च अध्यात्मिक मामलों में असफल रही है, इसलिए रूसियों का नेतृत्व भरोसा बहाल करने के लिए जरुरी है| लेकिन कैथोलिक चर्च ने अपने दुश्मन रूस को भरोसेमंदी की ताबेदारी देने से इनकार किया| इस बातचीत के असफल साबित होने के बाद दोनों चर्च अपनी-अपनी रणनीतिक भूमिकाओं में आ गए| कैथोलिक चर्च ने पहला धमाकेदार फैसला करते हुए सभी फ्री मेसन पादरियों को ट्रम्प के राष्ट्रपति चुनाव से निकालने का आदेश किया और फ्रीमेसन और रूसियों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी|

ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स के पोलिटिकल ज़ार और रुसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इन सभी घटनाओं का पटाक्षेप शताब्दियों से कैथोलिक चर्च और उनके नियंत्रण वाले देशों के मामले में एक अविस्मरणीय वक्तव्य के साथ किया|

8 अगस्त 2017 को क्रोंस्ताद्त के नौसैनिक अकादमी के निरीक्षण में यह साफ़ संकेत दिया है कि चर्च के दो हजार सालों के संघर्ष में कुछ भी नहीं बदला है:
“अगर आप गौर करें कि उन्होंने (कैथोलिक फिरके के मुखिया पोप, जिन्हें तकनीकी और अध्यात्मिक तौर पर नकार दिया गया| पोप बनने के लिए रोम का बिशप होना अनिवार्य है) कहा क्या है, तो साफ़ हो जाता है कि वे “भगवान के आदमी नहीं”| कम से कम ईसाई भगवान या बाइबिल के भगवान तो कतई नहीं”
(यह प्रभावशाली बयान संकेत देता है कि रुसी कैथोलिकवादियों के खतरों से वाकिफ हैं और उदारवादी, वैश्वीकरण और मृतप्राय कम्युनिज्म वाले चीन के साथ सम्बन्ध महज एक मोर्चा भर है|)

अमेरिका के फ्री मेसोनिक राष्ट्रपति दुनिया के नीतियों और युद्धों में उनकी भूमिका

लिंकन से कैनेडी तक अमेरिकी विदेश नीतियों के अंकगणित में चीन कहीं नहीं रहा| जब पामर्स्टन दस्तावेज को किसिंजर ने नए सिरे से गढ़ा तो मध्य राज्य दुनिया के मामलों का केंद्र बन गया, विकसित देश के साथ साथ एशिया की क्षेत्रीय सैन्य शक्ति के रूप में शोहरत बनाई गयी| यह सब अमेरिकी मकसद के तहत किया गया जिससे सभी गुट निरपेक्ष देशों को रूस को घेरने की चाल में फंसाया जा सके|
चीन को शाह देने का जो दूसरा मकसद है एशियाई देशों में कम्युनिज्म का प्रसार करना जिससे इन सभी देशों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत नष्ट होने से इन देशों से भारत का नैसर्गिक जुड़ाव हो| इन देशों का समर्थन करने के साथ साथ चीन उन देशों के इतिहास का ब्रिटिश संस्करण भी पुख्ता कर रहा है| अमेरिका में जब भी कोई फ्रीमेसोनिक प्रेसिडेंट होता है तो चीन का खतरा कम करके अमेरिकी हितों को कैथोलिक या बैप्टिस्ट प्रेसिडेंट से तीन गुना ज्यादा बढ़ा के करता है| ट्रम्प फ्री मेसोनिक दस्तावेजों के अपवाद नहीं हैं| इस कहानी में बस इतना मोड़ है कि इस बार भारत पश्चिम की गोद में है और अपनी सैन्य क्षमताओं को संघर्ष के लिए बढ़ा रहा है न कि अक्साई चिन में चीन के अवैध कब्जे के खिलाफ, न ही कश्मीर में अवैध रूप से बन रहे काराकोरम हाईवे के खिलाफ जहाँ हमारे पश्चिमी भाइयों का कब्ज़ा है| भारत उस भूभाग के लिए खतरा महसूस करता है जो परंपरागत रुप से भूटान की है|

भारत चीन परिदृश्य – कहाँ खड़ा है भारत

चीन (ब्रिटिश) का भारत में नशे का कारोबार—भारत का इस्तेमाल करके ब्रिटिश (ईस्ट इंडिया कंपनी) का चीन में नशे का कारोबार
जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि वैश्विक मुक्त व्यापार के नाम पर 1700 से 1900 के बीच गंगा के मैदानी क्षेत्र में उगाई गई अफीम से चीन के मध्यराज्य में नशे का कारोबार फैला| अपने साम्राज्य की राजधानी कलकत्ते में बैठे अंग्रेज इस कारोबार की देखरेख करते थे| इसके लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ जिसके असली मालिकों को हटाकर अंग्रेजी मालिकों के लिए भरोसेमंद नए लठैत रखे गए| इस कंपनी के लाभ की एकफसली व्यवस्था से कृषि की विविधता ख़त्म हो गयी और बंगाल और भारत के दूसरे हिस्सों के भीषण अकाल पड़े| कैसे भी करके व्यापार बढ़ा और जब चीनियों ने विरोध किया तो अफीम युद्ध हुए, अंग्रेजों ने ये युद्ध भारतीय राज्यों की सेनायें उधार लेकर लड़े| चीनी साम्राज्य ने खिलाफत की और चीनी राष्ट्रवादियों ने भी, भारतीय राष्ट्रवादियों ने भी चीन की बर्बादी की खिलाफत की| लेकिन वे सभी कंपनी के फायदे की राह में रोड़ा नहीं बन सके|

ईस्ट इंडिया कंपनी का राज पहला मौका था जब राजनैतिक हितों से कॉर्पोरेट हितों को सिद्ध किया गया जिनके पीछे अपार सैन्य बल मौजूद रहा| सरकारी तौर तरीकों में तब और अब के बीच कोई फर्क नहीं, आज सरकार विकास के मन्त्र के लिए कंपनियों के हितों की रक्षा कर रही है चाहे इसके लिए अपनी प्रजा को दबाना ही क्यों न पड़े| महात्मा गाँधी ने कांग्रेस का नेतृत्व करके भारत में अफीम उत्पादन के खिलाफ विरोध किया, ब्रिटिश ने अफीम के उत्पादन और खरीदने बेचने का ठिकाना अफ़ग़ानिस्तान में बना लिया| अफ़ग़ानिस्तान गोल्डन क्रेसेंट का केंद्र बन गया और चाइना स्वर्णिम त्रिभुज का| आज नशे का ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा बड़ा कारोबार ब्रिटिश, अमेरिकी और चीनी खुफिया के नियंत्रण में है| इस नशे के कारोबार का इस्तेमाल तमाम खुफिया मकसदों में होता है| यह कारोबार अमेरिकी और चीनी करेंसी को सहारा देने में भी काम आता है, उनके बांड खरीदकर और फर्जी कंपनियों में निवेश कर के नशे का कालाधन सफ़ेद करने का सिलसिला भी बदस्तूर जारी है|

भारत में सांस्कृतिक तौर पर और औषधि विज्ञानं में अफीम को एक पवित्र पौधा माना जाता रहा है, लम्बे समय से अफीम के पौधे के अलग अलग हिस्सों का प्रयोग तमाम दवाएं बनाने में होता रहा है| शराब और नशे के कारोबारियों की लॉबी के दबाव के चलते भारत सरकार ने दवाओं के अतिरिक्त अफीम के उत्पादन को अवैध करार दिया है|

आज उदारीकरण के बाद से ही भारत में नशे के कारोबार की समस्या बढ़ रही है, इस कारोबार में उन कारोबारियों और उनके तीमारदारों के लिए बिलियन डॉलर का फायदा भी शामिल है| पिछले दशक में सारे उत्तर पश्चिम पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के साथ साथ दक्षिण के तमाम मेट्रो शहरों को नशे ने जकड़ रखा है| न तो राज्यों में नशे के खिलाफ कोई ठोस नीति है और न ही पुलिस नशे के कारोबार की रफ़्तार रोक पा रही है| जब कोई हाई प्रोफाइल हादसा होता है तो कुछ गिरफ्तारियां जरुर हो जाती हैं| ज्यादातर मामलों में हम नाइजीरियन समूहों पर आरोप लगा के उन्हें नाइजीरिया भेज देते हैं, जो ज्यादातर विद्यार्थी होते हैं, अगली बार जब वो वापस भारत आते हैं तो दूसरे नाम और पासपोर्ट से आते हैं|

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, कि हम न्याय करने के लिए अपराध की योजना बनाने वाले और उसका साथ देने वाले को दंड नहीं देते, हमारी नजर में अपराध करने वाला ही अपराधी होता है| इसलिए कोई सवाल नहीं करता कि देश में नशे का व्यापार कैसे फल फूल रहा है| रिपोर्टें मौजूद हैं जिनमे बताया गया है कि सीमा पार से होने वाले आतंकवादी हमले नशे के कारोबार से भी ताल्लुक है| ताजा मामला पठानकोट का है जिसमे हमारे पश्चिमी भाइयों की मिलीभगत से नशे के कारोबार के सूत्र भी पाए गए हैं| तमाम खुफिया एजेंसियों के रिपोर्ट के मुताबिक ट्रिलियन डॉलर के इस कारोबारी गिरोह में बड़े नेता, अधिकारी और पुलिस भी शामिल है| भारत में होने वाला इस व्यापार से हमारे देश के मानवीय संसाधन खास तौर से युवाओं के लिए भारी खतरा है| हमारी सरकारें इन खतरों से आँख चुराकर देश के विकास के लिए ऍफ़डीआई लाने में व्यस्त हैं|

सभी जानते हैं कि 9/11 की घटना के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी कब्ज़ा हुआ तो अफीम का उत्पादन बेहिसाब बढ़ा जो कि तालिबानी शासन में बिलकुल नहीं था| भारत के सिवा सभी देश ये बात जानते हैं कि नशे का उत्पादन अमेरिकी सेना की निगरानी में होता है| अफीम उत्पादन, शोधन और बिक्री के नतीजों से न सिर्फ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के तमाम युवा बर्बाद हो रहे हैं, यूरोप, अमेरिका और रूस के युवाओं पर भी गभीर असर पड़े हैं| जब रूस ने अन्तराष्ट्रीय मंच पर इसकी खिलाफत की तो साफ़ हुआ कि कई देश नशे के कारोबार में फंसे हैं| अधिकांश गरीब अफ़्रीकी देश चीनी कर्ज में फंसे हैं, चीन अब अपने परंपरागत नशे के ज्ञान की बदौलत नशे को भारत भेज रहा है, शायद जो अंग्रेजों ने किया उसका बदला लेने के लिए या शायद युवाओं को बिगाड़ने और बर्बाद करने के लिए ताकि जरुरत पड़ने पर किसी भी तरह का विरोध न हो सके, ताकि चीन जो कुछ भी करे, सब लोग उसे राजी-ख़ुशी मान लें| नशे के इस मुफ्त व्यापार में खरबों डॉलर ठिकाने लगते हैं, इसलिए कोई अचम्भे की बात नहीं अगर हमारे नेता लोग गुपचुप तरीके से इस कारोबार में शामिल हों, लेकिन ऐसा होता है तो हमारी जांच एजेंसियों के लिए भी जरुरी कदम उठाना मुश्किल हो जायेगा|

उदारीकरण के बाद से ज्यादातर कॉर्पोरेट मीडिया और फिल्म उद्योग, अमेरिकी और ब्रिटिश हितों को साधने में लगे हैं, इसलिए इस विषय में कोई चर्चा नहीं हो रही कि नशे का कारोबार पिछले दो दशकों से हाईड्रा की तरह भारत में फैलता जा रहा है| हालाँकि तमाम गैर सरकारी संस्थानों ने आवाज उठाई है लेकिन नशे के इस कारोबार के खिलाफ कोई कारगर कदम नहीं उठाये जा रहे हैं| चीन को नशे से बर्बाद करने में अंग्रेजों को पचास साल लगे लेकिन चीनियों के कारनामे से हिंदुस्तान के बर्बाद होने में शायद कुछ ही दशक लगेंगे| यह चीन के महाशक्ति होने की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत अपने लालच के चलते उसने सारे एशियाई देशों के नियंत्रण का मकसद बनाया है वो भी अपने ब्रिटिश मालिकों के लिए!
ये सारी बर्बादी छोटे-मझोले उद्योगों और समुदाय आधारित व्यवसायों को ख़त्म करने की उस नीति के तहत हो रही है, जिसका मकसद है खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश| नगरों के विस्तार से ग्रामीण जीवन की संस्कृति बर्बाद हो रही है, उपजाऊ जमीने रियल एस्टेट को बेचकर भारी बेरोजगारी पैदा हो रही है, इस बेरोजगारी से राष्ट्रिय गौरव और निजी आय ख़त्म होने से आवाम के बीच भारी हताशा पनप रही है| आवाम के लिए नशा और शराबखोरी इस हताशा का आसान निदान मालूम होता है| नगरीय आबादी के प्रसार में बेरोजगारों की तादात भी बढ़ रही है| ऐसी हालत में युवाओं के पास नशाखोरी और नशे के कारोबार में लिप्त होने के खतरे हैं| ऐसा होता है तो बिना किसी युद्ध के सारे भारत की बर्बादी तय है| ऐसी हालत में बिना लड़ाई के ही समर्पण करने का आखिरी रास्ता बचेगा| नशाखोरी के इलाज के लिए तमाम रासायनिक दवाइयों और चलने वाले नशामुक्ति कार्यक्रमों की संचालक भी वही बहुराष्ट्रीय कंपनियां है जिन्होंने पहले समाज को नशाखोरी के दलदल में धकेला|

चीन का जल युद्ध- सारे एशिया खास कर भारत को मिटाने का खतरा है

चीन के पास नशे से अलग एक और हथियार ईजाद हुआ है जो दिखाई नहीं देता| इस हथियार से चीन बिना गोली चलाये ही सारी दुनिया की एक चौथाई आबादी को मिटा सकता है| जब सारा देश रिवर्स इंजीनियरिंग और नए सैन्य उपकरणों की बहस में उलझा हो तो बहुधा लोगों की नजर चीन के इस नए और खतरनाक हथियार नहीं पड़ती| ये नए हथियार हैं : बाँध
तिब्बत के पठार को दुनिया का तीसरा पोल (ध्रुव) कहा जाता है, दुनिया भर में मौसम और वर्षा पर इसका प्रभाव है, यही पठार दुनिया भर की दो बिलियन आबादी के लिए पेयजल और जीवन की स्रोत नदियों के उद्गम स्थल भी हैं| इन पठारों पर 87000 से ज्यादा बाँध बनाकर चीन ने दुनिया की दो बिलियन यानि दो सौ करोड़ आबादी के नरसंहार का हथियार तैयार किया है| तिब्बत के इन्ही जल स्रोतों पर साठ सालों से कब्ज़ा करके बैठा है चीन और सारा पश्चिमी समुदाय भी पूरे मामले में खामोश है| एक बटन दबा करके मध्यराज्य चीन अपने महाकाय बांधों से सैकड़ों करोड़ लीटर पानी छोड़ता है तो भीषण तबाही लाने वाली बाढ़ आ सकती है जिससे डाउनस्ट्रीम के सभी देशो के पारिस्थितिकीय तंत्र यानि आबो हवा बिगड़ सकती है, बहुत बड़ी आबादी मिट सकती है|

चीन के पास पानी से बर्बादी के प्रत्यक्ष अनुभव और ज्ञान है| दूसरे विश्वयुद्ध में आगे बढती जापानी फौजों को रोकने के लिए चीनी नेशनल आर्मी के कमांडर चांग काई-शेक येल्लो रिवर का एक बाँध तोड़ दिया जिसके चलते हजारो वर्गमील के क्षेत्र में बाढ़ आ गयी अनुमानित तौर पर 800000 चीनी मारे गए और लगभग चालीस लाख विस्थापित हुए| ये काम अगर वे अपने ही लोगों के खिलाफ कर सकते हैं तो सीधी लड़ाई में हार देखते हुए वे यह जरुर करेंगे|

ऊँचे हिमालय पर्वतों को एशिया का जल स्तम्भ यानि वाटर टावर्स ऑफ़ एशिया या तीसरा ध्रुव या केन्द्रीय ध्रुव (आर्कटिक और अंटार्कटिक पहले दो ध्रुव हैं) भी कहा जाता है|गंगा, ब्रह्मपुत्र, यांग्तज़े, सिन्धु, इर्रावडी (इरावती), मेकोंग सहित सात महाद्वीपों की सबसे बड़ी नदियाँ यहीं से जीवनधारा लेकर बहती हैं| तिब्बत के पठारों की बर्फ पिघल कर बड़ी नदियाँ बनाती है जो दक्षिण एशिया में आने के पहले चीनी सीमा में ही होती हैं|

कोयले की बजाए बांधों से बिजली बनाने का काम 1949 से ही हो रहा है| 1949 में ही बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन में कम से कम चालीस बाँध बन गए थे, लेकिन आज चीन में अमेरिका के संयुक्त राज्यों, ब्राज़ील और कनाडा के सभी बांधों से ज्यादा बाँध बन गए हैं|
मेकोंग के उपरी हिस्से में ही चीन ने सात महाकाय बाँध खड़े किये हैं और इक्कीस नए बाँध बनाने की योजना है| मेकोंग नदी पर चीन के नए बने सिर्फ एक बाँध की क्षमता विएतनाम और थाईलैंड की कुल बिजली बनाने की क्षमता से कहीं ज्यादा है|

चीन में बाँध बनाने की नाटकीय वृद्धि ने नीचे के देशों पर भारी पर्यावरणीय संकट खड़े कर दिए हैं|

पूरी के शंकराचार्य से लेकर ग्लेशियोलोजिस्ट तक ने इसे चिंता का विषय माना हैं, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के मिलाप चन्द्र शर्मा बताते हैं, “पर्यावरणीय चुनौतियों के साथ साथ तिब्बत के बाँध भारत के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं, उनका आवेश अचानक आये भूकंप की तीव्रता बढ़ा सकता है, इनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ युद्ध में भी किया जा सकता है|”

चीन के दक्षिणी पड़ोसियों की चिंता अकारण नहीं है| भारत पहले भी चीनीं बांधों की वजह से बाढ़ आने के आरोप लगा चुका है, नार्थ ईस्ट में आई कई बाढ़ों में से एक भयावह दृश्य में अनुमानित तौर पर तीस करोड़ का नुकसान हुआ और पचास हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए|
चीन में वर्षाकाल तब चीन द्वारा छोड़े गए पानी के चलते नीचे के सभी देशों में हाई अलर्ट होता है|

बाढ़ के साथ साथ चीनी बांधों को सूखे का भी जिम्मेदार बताया जा रहा है| पिछले साल निचले हिस्से के वियतनाम ने पानी की कमी के गंभीर संकट के चलते चीन से मेकोंग नदी पर बने युनान बाँध से पानी छोड़ने की गुहार की, जब चीन ने यह मांग स्वीकार की तब कम्बोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम में पानी प्रवाहित हुआ|

ये दोनों दिक्कतें न केवल चीनी बंधों के पर्यावरणीय प्रभाव की पोल खोलते हैं बल्कि सभी दक्षिण एशियाई पडोसी देशों पर चीनी बांधों के खतरे की चेतावनी भी देते हैं| ये नदियाँ दक्षिण एशियाई देशों में जीवन की आधार हैं, जिनसे पेयजल, सिंचाई, मत्स्य पालन और व्यापारिक यातायात होता है|

क्षेत्र के जीवन के रक्तप्रवाह को रोककर चीन अपार शक्ति इकठ्ठा कर सकता है जिसका बेजा इस्तेमाल भी करता है| इसका तरीका थाईलैंड के मेकोंग नदी के कार्यकर्ता तानासक फोश्रीकुन बताते हैं “जब कूटनीति की बात होती है तो चीन नदियों को सौदेबाजी की चिप की तरह इस्तेमाल करता है”|

जबकि चीन सीधे इनकार करता है कि जल युद्ध जैसा भी कुछ होता है, समझौते के बावजूद इस साल चीन ने अपने हाइड्रोलोजिकल आंकड़े साझा करने से इनकार कर दिया है| भारत के मानसून में इन आंकड़ों की खास अहमियत है| भारत में मानसून के दौरान इन्ही आंकड़ों का इस्तेमाल करके बाढ़ का सही सही अनुमान किया जाता है, जिससे स्थानीय निवासियों को बाढ़ की चेतावनी जारी की जाती है, ताकि जानमाल के नुकसान से बचा जा सके|

जाने या अनजाने में चीन पानी को एक निर्विवाद हथियार बना चुका है, जिसका फायदा उसे दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ संबंधों में मिलेगा| जैसे जैसे आबादी बढ़ने से शहरों में पानी की किल्लत बढ़ेगी, पानी की मांग जोरों पर होगी तो चीन की ताकत भी बढ़ेगी और संघर्ष भी|

दक्षिण एशियाई देशों की बेहतर साझेदारी के बावजूद नदियों का स्थायी और जिम्मेदारी भरा विकास नहीं हो सका है| तिब्बत के पठार पर नियंत्रण करके चीन ने भौगोलिक परिस्थितियों के वरदान का भरपूर इस्तेमाल किया है, अगर एशिया में पानी की बात होती है तो चीन आज पहाड़ का राजा है| निचले देश इस राजा के खिलाफ कुछ करने की हालत में नहीं|

यही वह सवाल है जो आजाद तिब्बत पर पिछले साठ सालों के चीनीं कब्जे में अहमियत रखता है| इस तिब्बती पठार के इर्द-गिर्द भारत की महानतम नदियाँ निकलती हैं, न कि उत्तराखंड से जहाँ इन नदियों का उद्गम बताकर हजारों करोड़ की अकूत सम्पदा बनाने का एक भारी भरकम बिजनेस मॉडल खड़ा कर दिया गया| कैलाश पर्वत और मानस सरोवर चीनी कब्जे में हैं जहाँ हर साल सिर्फ 5000 लोगों को जाने की अनुमति दी जाती है, और चीनी सेना का कड़ा पहरा रहता है| इतना जरुर है कि चीनी कब्जे में होने की वजह से उन पवित्र जगहों पर गन्दगी नहीं पहुंची है, लेकिन इससे यह भी साबित हो ही जाता है कि हमारा भारत महज उतना ही नहीं जो किताबों में हमे पढाया गया उससे भी ज्यादा बहुत कुछ सामने आना बाकी है जिसे हासिल करने के लिए जोर लगाना होगा|

हालिया भारत-चीन संघर्ष कहाँ जायेगा

ऊपर कहे गए उदाहरणों में भारत के राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य, सामाजिक और भौगोलिक जीवन में चीनी पकड़ तमाम साधारण भारतीय नहीं जानते, ऐसे में क्या हम चीन के खिलाफ युद्ध में जा सकते हैं? इस सवाल का जवाब हमे दो हिस्सों में मिलता है:
पहला क्या हम चीन के खिलाफ सैन्य या कूटनीतिक या राजनीतिक युद्ध का खर्च उठा सकते हैं?

सैन्य परिदृश्य – दो थिएटरों के दस्तावेज

1971 में हमारे पश्चिमी भाइयों के साथ हुई लड़ाई का सबक सामने है, जब चीन ने अमेरिकियों के साथ मिलकर इस युद्ध में दखल देने की कोशिश की लेकिन रुसी खतरे के चलते रुक गया| भारतीय सेना में दो थिएटरों की समझ बनी, जिसमे उन्होंने पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों के परंपरागत खतरों से विभिन्न आयामों में निपटने की रणनीति बनाई| हो सकता है कि सेना के बाहर किसी को भी ये बात पता न हो लेकिन यह भारतीय सैन्य बलों में मौजूद मेधावी महिलाओं और पुरुषों की सच्ची कहानी है जिसमे उन्होंने अपनी सीमाओं, कमियों, और तमाम खिलाडियों की तरफ से पड़ने वाले दबावों के बावजूद अपनी स्थितियां बदलकर दो थिएटरों के युद्ध की नजीर पेश की| दोयम दर्जे के हथियारों उपकरणों के बावजूद वे राजनेता भी शब्दबाण ताने रहते हैं जिन्हें पिस्टल और रिवाल्वर के बीच शायद फर्क तक न पता हो| लेकिन हमारी सेना ने इन दोयम दर्जे के हथियारों को या तो गोदामों में पड़े-पड़े बेकार होने दिया या फिर उनको अपनी ताकत बनाने के हिसाब से मॉडिफाई कर लिया ताकि वे आने वाले हालातों में काम आ सकें| इस तैयारी की वजह है वाल्डेन मॉडल का क्रियान्वयन जिसके स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव में भारतीय नेताओं को बार-बार पुचकारा जाता है ताकि वे ये मान बैठें कि हमारी सेनाओं की तैयारी तीसरे दर्जे की है| इसके पहले चरण में भारत में चल रहे सारे स्वतंत्र अनुसंधानों को समेट लिया गया, उन रिसर्च के मुखिया वैज्ञानिकों की हत्याए हुईं, ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट नीचे गिरे, उपग्रह प्रक्षेपण होने पर पहली कक्षा में गिर गए, प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक होमोसेक्सुअल हुए और आत्महत्या कर ली, इन हत्याओं और 26/11 सरीखे हाई प्रोफाइल मामलों के जांच में शामिल अधिकारी अचानक डिप्रेशन के शिकार होकर चलती ट्रेन से कूद जाते हैं, या फिर जेब से रुमाल निकालते हुए उनके रिवाल्वर से फायर हो जाता है, इन सबके बावजूद भारतीय सेना ने दोनों थिएटरों के लिए खुद को तैयार रखा है| लेकिन फिर भी यह कहना मुश्किल है कि आगे कितने सालों तक सेना यह स्थिति बरक़रार रख सकेगी|

सेना के परिदृश्य में देखा जाये तो युद्ध चाहे हमारे भाइयों के साथ हो या मध्य राज्य के साथ, हमारी सेना दोनों मामलों को एक साथ ठीक करने में सक्षम है| चीन के सुपर पॉवर होने का हौव्वा प्रेस्टीटयूट मीडिया का काम है जिससे हमारे राजनेता बन्दर के खिलौनों जैसे हथियार खरीदने का फैसला ले सकें, जिनके मालिक थैलीशाह इम्पोर्टर ही हैं| सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि हमारे थैलीशाह इम्पोर्टर और राजनेता अगर “मेड इन जर्मनी” जैसे गड़बड़ पुर्जे या हथियार खरीद लाते हैं और सेना को वही मिलता है तो कारगिल की तरह नतीजे होंगे, जहाँ आखिरकार हमने जीत दर्ज की| और अगर भ्रष्ट नेताओं की दखल के बगैर काम करने का मौका मिलता है तो हमारे सैनिकों को मैदान जीतने में देर नहीं लगेगी, जिस तरह सूर्या वालों ने सारा मामला एक साल के भीतर निपटा लिया| जो भी हो, पिछले साल सितम्बर की ज्यादातर जीतें जनरल सोहेल हसन के नेतृत्व में हुईं| भारतीय सेना में ऐसे तमाम छिपे हुए शेर हैं जो अपनी बारी आने पर जीत के नए आयाम बना देंगे|

दूसरी बात, क्या हमारे पास युद्ध के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति है?

हमारे राजनेता और उनके इम्पोर्टरों का परिदृश निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि न तो हमारे नेता इतनी मजबूत इच्छाशक्ति रखते हैं और न ही चीनी खुद कि वे युद्ध कर सकें| उन्हें व्यापार चाहिए| चीन भारत की मैन्युफैक्चरिंग बर्बाद करना चाहता है ताकि छोटे से लेकर बड़े तक सारी मैन्युफैक्चरिंग ख़त्म हो और वो अपना बनाया कूड़ा भी यहीं खपा सकें| यह स्थिति चीन के लिए इस लिहाज से भी जरुरी है क्योंकि वर्तमान चीनी राष्ट्रपति का रवैया रक्षात्मक है और वे तो चीन के साथ व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाने जा रहे हैं| अमेरिका की सभी देशभक्त कंपनियां राष्ट्रपति के मुताबिक काम करती हैं तो भी उनको फायदे का कारोबार करने के लिए भारत पर निर्भर रहना होगा| ऐसा होने की दशा में वे भारत में बड़ा बाजार बनाने की कोशिश करेंगे| इस कवायद में सारा थोक का कारोबार और आत्मनिर्भर क्षेत्र का खुदरा कारोबार चौपट हो जायेगा| सस्ते आयात से भारतीय कृषि का भी चौपट होना तय है| इस दिशा में तेजी देखी जा रही है| ऐसा ही आभास हमारे देश के प्रधानमंत्री चुनावों के पहले और बाद में दिए बयानों से भी होता है कि वे खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ावा देकर रहेंगे| चुनावों के पूर्व उन्होंने कहा कि एफडीआई का मतलब “फर्स्ट डिस्ट्रक्शन ऑफ़ इंडिया” और इसका विरोध कर रहे थे| लेकिन जैसे ही वो प्रधानमंत्री बन गए उन्होंने घोषित किया कि एफडीआई का मतलब फर्स्ट “डेवलपमेंट ऑफ़ इंडिया” हो गया है|

तमाम हीरा व्यापारी जालसाजी और दूसरे मामलों के चलते चीन में गिरफ्तार हुए| उस समय हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री थे| उन्होंने मामले में दखल देकर गुजराती व्यापारियों को चीन से छुड़ाया|

आज जब हम तोपखाने के पुर्जों से लेकर चावल तक चीन से इम्पोर्ट कर रहे हैं तो उसमे सैकड़ों इम्पोर्टर शामिल हैं, जिनका बिलियन डॉलर्स का व्यापार है| वही इम्पोर्टर पोलिटिकल पार्टियों को चंदा भी देते हैं| ऐसे में यह सोचना मुश्किल है कि हमारे नेता कभी युद्ध करने भर की इच्छाशक्ति जुटा भी पाएंगे| ये और बात है कि वे भावनात्मक तौर पर जनता को भड़काते रहें और मीडिया उनको देश की सीमाओं का सबसे बड़ा रखवाला नेता घोषित करता रहे| ऐसी ही सच्चाई चीन की भी है| चीनी यह भी जानते हैं कि भारत के साथ परंपरागत युद्ध जीतना कितना कठिन है| लेकिन वो ये भी जानते हैं कि असल युद्ध में भारत के रक्षा उपकरण कितने असुरक्षित हैं और कितने उपकरणों में गड़बड़ चीनी पुर्जे लगे हैं| उनके तमाम इम्पोर्टरों से भी रिश्ते हैं जिनकी मदद से उन्होंने बिलियन डॉलर्स की सेंधमारी की है ऐसी भी खबरें आई हैं जिनमे बताया गया है कि भारत की नोटबंदी में चीनी फर्मों ने अरबों के वारे-न्यारे किये| लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही ये रंगबिरंगा घोटाला सामने आये जिसमे उन इम्पोर्टरों की सूची हो जिन्होंने गड़बड़ डिफेक्टिव उत्पादों या कलपुर्जों को मंगवाकर सेना को सप्लाई किया और उन इम्पोर्टरों के राजनीतिक तंत्र के साथ संबंधों का भी खुलासा हो, अगर ऐसा होता है तो चीनी निश्चित रूप से भारत के साथ युद्ध रोकने के लिए कुछ भी कर डालेंगे|

ऐसी विधायी व्यवस्था के चीन के खिलाफ तो क्या भूटान के खिलाफ भी कभी युद्ध नहीं करने वाले, यहाँ तक कि हमारे भाइयों द्वारा अवैध रूप से किराये पर उठाई गई जमीन के लिए भी हमसे युद्ध नहीं होने वाला, अक्साई चिन में कब्ज़ा हुई हमारी जमीन की तो जाने दीजिये, तिब्बत के कैलाश पर्वत और मानस सरोवर के लिए भी हमसे कुछ नही होने वाला क्योंकि हमारी व्यापारी सरकारें जानती हैं कि युद्ध से व्यापार और लाभ दोनों का नुकसान होता है|

याद करिए कि 1971 की लड़ाई में कई निजी तेल कंपनियों ने सेना को तेल आपूर्ति के लिए इनकार कर दिया था क्योंकि उहे लगता था कि युद्ध से व्यापार और लाभ दोनों का नुकसान होता है| इसी के चलते उस समय तेल के उद्योग के राष्ट्रीयकरण की नींव पड़ी|

जी हाँ हम कुछ चीजें तो सबसे बढ़िया तरीके से कर रहे हैं—भावनात्मक प्रचार कर रहे हैं ताकि लोग चीनी उत्पादों को न खरीदें, सारी सेनाओं की छुट्टियाँ निरस्त की हैं, चीन के साथ लटके हुए युद्ध के लिए चंदा इकठ्ठा कर रहे हैं जिसके लिए फ़िल्मी अभिनेता सभी आर्मी कैम्पों में शो करेंगे, लेकिन हम किसी भी धार्मिक स्थल पर भारत के लिए दुआ नहीं कर रहे! और गर अमेरिका हमसे नौसैनिक अभ्यास युद्ध में शामिल होने को कहता है तो हम जरुर करते हैं, और हम सारे एशियाई देशों में हथियार बेच रहे हैं, साथ ही हमारे इम्पोर्टरों को क्रेडिट भी मुहैया करवा रहे हैं|

हम क्या नहीं करेंगे या जो कभी नहीं किया, हमने भारतीय खनिज लूटकर चीन भेजने वालों को कभी सजा नहीं दी, ओलिंपिक के नाम पर मंगवाए लौह अयस्क का इस्तेमाल चीन ने सैनिक उद्देश्यों में किया, खरबों की हेरफेर की, सीबीआई ने भी दोषी पाया, जिनकी संपत्तियां भी सरकार ने जब्त कर लीं, हाथ में एक भी पैसा नहीं बचा उसके बावजूद भी वही आदमी अपनी बेटी की शादी में दो सौ करोड़ की हीरे जड़ी साड़ी देता है! उसके बाद किसी भी देशभक्त, किसी भी नेता, किसी भी अर्थशास्त्री ने ने यह नहीं पुछा कि ये कैसे हुआ, जनता के बीच चंद चर्चाएँ जरुर हुईं|

भारत के उत्तरवर्ती प्रशासन की लेटर राइटिंग और कॉम्प्रिहेंशन की परीक्षा

चीन मामले के पिछले साठ सालों के संस्करण हों या हमारे पश्चिमी भाइयों की हरकतें भारत के प्रशासन से एक काम बड़ी साफगोई से किया है हमारे प्रशासनिक अधिकारियों ने चिट्ठियां लिखने की स्किल का बहुत उम्दा विकास किया है| जब भी हमने महसूस किया कि हमारे भाई या चीनी हमारी सम्प्रप्रभुता या जमीन के अधिकारों का उल्लघन कर रहे हैं चाहे तिब्बत पर कब्जेदारी हो, अक्साई चिन, कैलाश या मानसरोवर, अथवा अवैध रूप से कश्मीर की जमीन चीन को किराये पर देने का मामला हो| हमने सभी अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं को हमारे मसलों के लिए सुन्दर-सुन्दर चिट्ठियां लिखीं हैं|

हमने सभी संस्थाओं को तमाम चिट्ठियां लिखीं और उनकी प्रतियाँ सावधानी से सहेज कर रख ली हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अंग्रेजी की कक्षाओं में पढाई जा सकें| इस कूटनीतिक सफलता के अलावा, जिसपर अंग्रेज को भी हमारी भाषाई दक्षता पर इर्ष्या हो रही है कि उनकी अपनी पूर्व प्रजा ने चीन या अपने भाइयों के साथ पहले के ज्वलंत प्रश्नों पर कोई तरक्की नहीं की! राजनीतिक सत्ताधारी मानते हैं कि कि अगर कोई ज्वलंत समस्या नहीं तो सत्ता की ताकत और नारेबाजी की क्या जरुरत|

मध्य राज्य की आक्रामकता का उचित समाधान क्या हो?

संप्रभुता का अर्थ ये नहीं कि हम अपनी जमीनों की हिफाजत के लिए रंग बिरंगे एचडी नक़्शे बनायें| बल्कि जरुरी है कि उनके भौतिक अस्तित्व की रक्षा करें| खास तौर से जब हमारे सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान और सांस्कृतिक केन्द्र शारदा सर्वज्ञ पीठ और कैलाश मानस सरोवर सरीखे अवैध रूप से कब्ज़ा लिए गए हों| दोनों कब्जे वाले स्थल कश्मीर में हैं जो पश्चिमी भाइयों और चीन ने कब्जाए हैं| हमारे राजनेता इकट्ठे भूल बैठे कि शारदा सर्वज्ञ पीठ हजारों सालों से हमारा सनातन अध्ययन केंद्र रहा है लेकिन इतना तो याद होगा कि किसी साल हमारी राजनीति से जुड़े सिर्फ चार धर्मात्मा लोग ही कैलाश और मानसरोवर की यात्रा के लिए वीसा पा सके, ताकि वे अपनी मृत्युदोष और अध्यात्मिक स्नान के लिए जा सकें|

तो पहली चीज कि हमे इस बात की जरुरत है कि हम अपने पत्र लेखन व्यवसाय से समय निकालें ताकि उन जमीनों और अवैध कब्जेदारी के लिए कुछ गंभीर कदम उठाये जा सकें| जिन पर रंग-बिरंगे, परिधान-पगड़ी वाले, दहशतगर्दों, अंकगणितीय जिहादियों, उनके इंटरनेशनल स्पोंसर्स, नशे के बादशाह चीनियों का कब्ज़ा है| चाहे कूटनीति कहिये या युद्ध कुछ तो करना ही होगा| हमे पिछले सत्तर सालों की इस समस्या को सुलझाना ही होगा जिसमे कश्मीर में लोगों का नरसंहार, जिसमे 500000 सैनिक, जिसमे तमाम माल असबाब और जहाँ हमारी सेनाओं की नैतिकता घट रही है| इससे चीन का बदलाव रुक सकेगा| यह जरुरी है क्योंकि क्रूर, कम्युनिस्ट, निर्दयी, शोषक, नशाखोर, नवउदारवादी ड्रैगन एशियाई देशों के करोड़ों लोगों का खून चूस रहा है| चीन को मानवता की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत की भी फिक्र नहीं है|

उसकी शैक्षिक जद्दोजहद पूरी दुनिया को सिर्फ ये महसूस कराने के लिए है कि मानवता सिर्फ 5000 साल की बच्ची है जो अनजान आकस्मिक घटनाक्रम में अमीबा से विकसित हुई| मध्य राज्य की दखल वाले सभी हिस्सों के बीच संप्रभुता जरुरी है| एशिया के देशों में हुई बर्बादी की सफाई होनी जरुरी है, ताकि एशिया को फिर से एक सच्चे सार्वभौमिक सांस्कृतिक विरासत के लिए दुनिया की सच्चाई बनाया जा सके|

जहाँ एक बार कश्मीर का मामला हल होता है, तो फिर से सबके लिए भारत से सनातन संपर्क मार्ग, भूमार्ग आबाद हो जायेंगे| पहले यूरेशिया और उसके बाद अफ्रीका को रोशनी मिलेगी| इससे करोड़ों लोगों की जिंदगी में समृद्धि और समरसता आएगी| न सिर्फ भौतिक सुख सुविधाओं से समृद्ध इंसानी समझदारी के लिए बल्कि सत्य संधान और आत्म अनुभवों के लिए भी| लेकिन कश्मीर के समाधान के लिए आगे बढ़ने के पहले कुछ हिम्मत करनी होगी|

1. चीन के साथ सारा व्यापार बंद हो: ताकि जरुरत से अधिक माल और डिफेक्टिव माल के स्टॉक पर रोक लग सके| आधुनिकता के नाम पर हम अपने नए लड़कों, युवाओं को, युवतियों को सिखाने की बजाए देश को चीन का डंप यार्ड बना रहे हैं| यह शर्मनाक है, छोटे से छोटे बिजली के मीटर और तार , घर और पुलिस थानों के रेडियो सेटों का बेजा इम्पोर्ट भी चीन से हो रहा है| इस तरह हम अपने देश के संसाधन और संसथान चीन की तरफ फ़िज़ूल बहा रहे हैं, क्या इससे हमारे देश की व्यवस्था मजबूत होगी जब दुनिया के मानवता के दुश्मन की प्रगति हो रही हो|

चीन के साथ व्यापार को बढ़ावा देने वाली हर पार्टी व्यापारिक गिरोहबंदी में फंसकर देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन रही हैं| इसके लिए सभी व्यापारिक घरानों से बात करने की जरुरत है ना कि बेफिजूल के प्रचार और लोगों को जबरन उलझा कर| अगर ऐसा नहीं होता है कि हम रक्षा सौदों के बारे में लोगों को बताएं कि हमे चीन से क्यों नाहीं खरीदना चाहिए, क्योंकि भारतीय साथी उनको जर्मनी, या फिर अमेरिका का बना कर बेचने के लिए मानवता का कितना ही विनाश कर गुजरेंगे||

2. चीनी नशे के खतरे को रोकना होगा: पूरे होशोहवास में और समझदारी के साथ देश पर नशे की एक समग्र नीति बनाने की जरुरत है ताकि हमारे पड़ोसियों के शाह-मात के खेल की बजाये साझेदारी से काम और अफ़ग़ानिस्तान के मामलों में जिन्दादिली और जीदारी से इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ खड़े होने की जरुरत है जबकि चीनियों के इस्लामिक अधिकारियों ने तिब्बत पर कब्जे की तबाही रची|

3. चीनियों ने कश्मीर में अवैध तरीके से जमीनें किराये पर ली हैं और काराकोरम राजमार्ग बना रहे हैं ताकि ग्वादर से चीन तक भारत की घेरेबंदी की जा सके|जिसे भारत को रोकना होगा और हमारे भाइयों और चीन से एक साथ जूझना होगा| यही अति महत्वपूर्ण मामला है जिसके लिए कश्मीर मामले का निदान जरुरी है|

4. अन्तराष्ट्रीय मंचों पर हमे अपनी हजारों शताब्दियों की विरासत को चीन के हाथों में जाने से बचाना होगा| जिन्हें हड़पने के लगातार प्रयास में चीन पुराने सिल्क रूट को नया सिल्क रूट बनाकर बेचने में लगा है| चंद रईसों के फायदों के लिए चीन भारत के परम वैभव की छवि को बिगाड़ने के लिए लगा हुआ है|

5. हम मध्यराज्य को तिब्बत पुरी दुनिया के पानी पर कब्ज़ा करने नहीं दे सकते| और न ही हमे पूर्वी सभ्यताओं को चीनीं धमक में बर्बाद होने दे सकते हैं| चीन उन्हें जाहिर रूप से बर्बाद करना चाहता है उनकी बर्बादी के लिए भ्रष्टाचार और नशे के साथ तकनीक की चोरी की और चीनी सुपर पॉवर का दिवास्वप्न कम्युनिज्म या नव उदारवाद के लीडरों को बर्बाद कर देगा|

6. महात्मा का स्वदेशी और आज उस दौर से ज्यादा प्रासंगिक है जब उन्होंने इसे आज़ादी के बारे में कहा| हमे भारत में मौजूद हर चीज को जिन्दा करके हासिल करने की जरुरत है ताकि देश का गौरव फिर से सिद्ध हो सके, प्रतिष्ठा पा सके| सके लिए हमारे नेताओं को अवतार साबित करने की बजाये यह समझने में लगें कि उनकी कथनी करनी का सत्ता से पहले और सत्ता के बाद क्या फर्क हुआ| अगर वो भी हमारी भावनाओं से खिलवाड़ करके पिछले लुटेरों की तरह गुलाम बनाने का दुष्चक्र रच रहे हैं तो फिर भारतीयों को मजबूत होकर सत्ता की ताकत अपने हाथ में लेने की जरुरत है ताकि ऐसी पोलिटिकल पार्टियों को क्विट इंडिया का रास्ता दिखाया जा सके|

7. तमाम दशकों से या कहिये दो सौ सालों से भारत ने इन मामलों में पहले की तरह पूरी दुनिया की इंसानियत की तकलीफों के समाधान कोई अहम् भूमिका नहीं निभाई है| वह देश जो खुद को कायर और कमजोर मानते रहे, ऐसा सोचने वाले की हम सबसे कमजोर हैं, वे हमेशा लुटते रहे और एक के बाद एक कब्जे होते रहे| हमारे ऊपर काबिज लोगों ने जो फैसले किये वही हमारी भाग्य और भूमिका बन गए| जब हमारी तकदीर कोई और लिखने वाला हो तो हम गला फाड़कर कैसे उनके गुलामों की तरह इंडिया राइजिंग या जस्ट इंडिया के नारे कैसे लगा सकते हैं, और उनकी भूमिका शासकों से अलग कैसे हो जाएगी| आज भी किसी को नहीं पता कि इंडिया का क्या अर्थ है जिसे अंग्रेजी राज में ही कहा गया और इतनी शोहरत मिली| ब्रिटिश शासन के पहले, हिन्दुस्तानी जीवन शैली दुनिया का केंद्र थी| जिसने शोहरत या सुकून की समझदारी चाही वह भारत आये लेकिन जब यहाँ धार्मिक कट्टरता जड़ता बन गयी तो परंपरागत भूमार्ग बंद होते चले गए| वे इस देश को चाहे जानते हों या न जानते हों लेकिन उनकी स्थानीय भाषा में इसकी जिक्र और फिक्र मौजूद है क्योंकि सनातन के मार्ग भले ही बंद हो जाएँ लेकिन जो भावधारा भारत और दुनिया के तमाम देशों के बीच बही वही दुनिया की बहुरंगी संस्कृति के रूप में दिखाई देती हैं लेकिन इस धारा के मार्गों में बाधा बन रही कट्टरता से भारत के परम वैभव की छवि को धब्बा लगता है| अगर हमारी वर्तमान सरकार अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पाती तो हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह सभी भूमिकाओं के लिए उपयुक्त छवि वाले लोगों की खोज करें| इस देश की सवा करोड़ आबादी में ऐसी तमाम क्षमतावान प्रतिभाएं मौजूद हैं जो देश का सक्षम और बेहतर नेतृत्व कर सकें| संभव है कि समाधान इतनी आसानी से मिल सकें, लेकिन यह भी संभव है कि ब्रिटिश प्रशासन द्वारा जितनी भारी तकलीफ का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है, जैसा रंग हमारे दिमाग की नसों में घोला जा रहा है, उसकी काट निकल सके और मजबूत समझ बन सके| अंग्रेज हमेशा ऐसी आग लगाते रहे हैं जिससे भरत को ख़त्म कर सकें, उनकी आम राय साकार हो| दुनिया भर में स्वार्थ और लालच का साम्राज्य पसरे ताकि उनके निजी हित पूरे हो सकें, इसलिए वे लालच और निजी हितों का निदान समाधान नहीं चाहते| आइये हम एक उम्मीद के साथ नयी शुरुआत करें|

फुट नोट: { 5 सितम्बर को चीनी राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री की मुलाकात,}

Back to normal, business as usual,after a mega drama– Let’s import more from China and make more profits!
Xi Jinping-Narendra Modi meet set direction for China-India ties: envoy

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