वर्तमान मुद्दों

दो तोहफों की दास्तान

This post is also available in: English

दो तोहफों की दास्तान

बुद्धिजीवी गुलामों के मतभेद या खालिस जाहिलियत?

-शालिनी & श्री किडाम्बि

एक मूर्ति जिसका मंदिर नहीं और एक मंदिर जिसमें मूर्ति नहीं!!!

सभी असंभव ख़त्म कर दिए जाएँ तो जो भी संभव होगा वह सत्य ही होगा|

हमे तोहफे में जो मिला एक सुन्दर उपवन का इशारा था,

हमने दिया तोहफा जो रेगिस्तान में भयानक मौत का नजारा था… 

डेढ़ साल पहले हिंदुस्तान को एक तोहफा मिला, फितूर में सही उसी के मुताबिक हमने भी तोहफा दिया| काबिल-ए-गौर है दोनों तोहफों का किस्सा उनकी तारीख, तवारीख और निशानी जिसकी गहराई में बहुत कुछ दफ्न है| तेजी से घटती हिन्दुस्तानी जेहनियत में जो कुछ भी बाकी बचता है, उसी से बहुत से सवाल खड़े होने चाहिए| तोहफे की कलाकृतियों में जो इशारे मिलते हैं वे या तो गहरी समझ के मायने बताते हैं या फिर खालिस जाहिलियत के| यही जाहिलियत उस मानसिक गुलामी की देन है जिसे हिंदुस्तान की रियाया ने पिछले दो सौ सालों में देखा जिया और महसूस किया है|

पहले किस्सा  दस्तकारी की दास्तान

5 अक्टूबर 2015, जर्मन चांसलर एंजेला मेर्केल ने हिंदुस्तान आकर अधिकारिक तौर पर एक तोहफा दिया| तोहफा था महिषासुरमर्दिनी मर्दिनी की एक मूर्ति का| महिषासुरमर्दिनी को हिन्दू देवी दुर्गा का एक अवतार माना जाता हैं| खबरों के मुताबिक यह मूर्ति कश्मीर के पुलवामा जिले के “किसी” गाँव के मंदिर से लूटी गयी थी| लूट का समय नब्बे के दशक में बताया जाता है|

दिल्ली के हैदराबाद हाउस में र जर्मन चांसलर एंजेला मेर्केल हिन्दू देवी दुर्गा की दसवीं शताब्दी की एक मूर्ति के साथ| स्रोत: पीटीआई

तेंगपुरा दुर्गा की इस लूटी हुई मूर्ति वापसी को हिंदुस्तान और जर्मनी की सरकारें कूटनीतिक पर्देदारी से ढकने में लगी हैं| जर्मनी के लिंडन म्यूजियम में मूर्ति की शिनाख्त होने के तीन सालों के बाद आखिरकार यह मूर्ति हिंदुस्तान को वापस तो मिली|

इस कहानी के कुछ बिंदु गौरतलब हैं: आइये पहले हम घटनाक्रम पर गौर करते हैं…

  1. पद्मश्री पुरस्कार विजेता डॉ. प्रतापादित्य पाल ने अपनी किताब में इस मूर्ति का जिक्र किया है| महिषासुरमर्दिनी की वही मूर्ति डॉ. पाल को वर्ष 2010 में एक एंटीक स्टोर में मिलती हैं|
  2. डॉ. पाल से मिली जानकारी के मुताबिक राकेश कौल 2011 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को दुर्गा मूर्ति की जानकारी देते हैं| दूसरी खबरों में बताया गया है कि भारतीय अधिकारीयों कों मूर्ति की जानकारी राहुल नाम के भारतीय कलाप्रेमी से मिली| (http://www.tribuneindia.com/news/jammu-kashmir/community/state-to-get-back-10th-century-durga-idol/206778.html)
  3. कुछ महीनों बाद कौल दोबारा बताते हैं कि डॉ. पाल ने लिंडन म्यूजियम का दौरा किया| वो मूर्ति को लिंडन म्यूजियम में देखकर अचम्भित हुए और उन्होंने फ़ौरन इसके बारे में राकेश कौल को बताया|
  4. कुछ महीनों बाद 2012 में कौल हिंदुस्तान आते हैं और हिन्दुस्तानी अधिकारियों को इसकी जानकारी देते हैं|
  5. 2014 में भारतीय अधिकारियों का एक दस्ता लिंडन म्यूजियम रवाना होता है, वहां जाकर संभवतः सारी जानकारियां देता है लेकिन भारतीय अधिकारियों का दस्ता लौट के वापस आता है खाली हाथ|
  6. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक बी आर मणि के मुताबिक तेंगपुरा दुर्गा मूर्ति की पंजीकरण संख्या राज्य सरकार के अधिकारियों से मंगवा कर लिंडन म्यूजियम को भेजी गयी| साथ में मूर्ति चोरी की ऍफ़आईआर भी लगाई जो कि मूर्ति चोरी के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस ने दर्ज की थी| दस्तावेजों में मूर्ति की तस्वीरें भी भेजी गयीं जो कि “इण्डियन अर्कियोंलोजी, ए रिव्यु” नाम की एक पत्रिका में पहले प्रकाशित हुई थीं|
  7. लिंडन म्यूजियम से बरामद इस मूर्ति की प्रामाणिकता के तीन सूत्र हैं: पहला डॉ. पाल की पुस्तक “गॉडेस दुर्गा, पॉवर एंड द ग्लोरी” का मुखपृष्ठ; दूसरा वर्ष 2013 में प्रकाशित जॉन सिउड्मैक की एक किताब “हिन्दू-बुद्धिस्ट स्कल्पचर एंड इट्स इन्फ़्लुएन्सेस” का एक चित्र; तीसरा सिउड्मैक का चश्मदीद गवाह जिसने तस्वीर बनाई|
  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा म्यूजियम अधिकारियों को मुहैया कराये गए दस्तावेजों में जॉन सिउड्मैक के चश्मदीद गवाह का भी ब्यौरा शामिल है| एशियाई कला के विद्वान जॉन सिउड्मैक के चश्मदीद गवाह को सबसे अहम् माना जा रहा है| उनका एक दावा ये भी है कि उनके चश्मदीद गवाह ने चोरी होने के पहले इस दुर्गा मूर्ति को तेंगपुरा मंदिर में देखा था|
  9. आखिरकार अक्टूबर 2015 में जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने आधिकारिक तौर पर दिल्ली जाकर मूर्ति वापसी मुकम्मल की|

मूर्ति के मामले में हुई इन बेतरतीब घटनाओं को थोडा और बारीकी से देखते हैं, तो हैरान करने वाला नजारा सामने आता है| माना जाता है कि यह मूर्ति नब्बे के दशक में जारी रहे आतंकवाद के चुराई गयी| अगर मूर्ति नब्बे के दशक में चुराई गयी तो तब से क्या यह कपूर आर्ट गैलरी में मौजूद थी? या फिर यह दूसरे रास्तों से वहां पहुंची? जाहिर है कि सुभाष कपूर एक जाने माने कलाप्रेमी हैं, चुराई गयी ऐतिहासिक कलाकृतियों का दुनिया भर में कारोबार करते हैं| प्राचीन भारतीय मंदिरों से चोरी हुई मूर्तियों के कारोबार में वो ऐतिहासिक कलाकृतियों के प्रमाणिक दस्तावेज भी मुहैया करवाते हैं| पुराने मामलों में देखा गया है कि वे इस कारोबार से लाखों डॉलर का मुनाफा भी कमाते हैं| लेकिन ये मामला पहले से अलग है..

  • आंकड़े गवाह हैं कि अप्रैल 2005 में इण्डियाना म्यूजियम ने फेस्टिवल ब्रोंज में शिव-पार्वती की तांबे की मूर्तियाँ एक लाख डॉलर में खरीदी| तस्वीरों से मिली जानकारी में पता चला कि कपूर ने ये मूर्तियाँ 2004 में खरीदीं|
  • अदालती मामलों में दिए गए दस्तावेज बताते हैं कि उमा परमेश्वरी की मूर्ति हिंदुस्तान के अरियालुर जिले के एक शिव मंदिर से वर्ष 2005 या 2006 में चुराई गयी ये अदालती दस्तावेज कपूर गैलरी के मेनेजर आरोन फ्रीडमैन ने पेश किये| खबरों के मुताबिक वर्ष 2007 में वही मूर्ति सिंगापुर के एशियाई सिविलाइज़ेशन म्यूजियम में बेचीं गयी|
  • मई 2006 में अमेरिका के द टोलेडो म्यूजियम ने एक गणेश प्रतिमा कपूर से खरीदी, संभवतः यह मूर्ति 2005 के अंत में या वर्ष 2006 की शुरुआत में तमिलनाडु के एक शिवमंदिर से चुराई गई|
  • तमिलनाडु की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक जिस मंदिर के ताले बीते दस सालों से खुले ही नहीं वहां से तांबे की चार फीट ऊंची एक नटराज प्रतिमा एक मंदिर से चुराई गई| यह घटना हुई तमिलनाडु के अरियालुर जिले के श्रीपुरंतन गाँव में| बताया जाता है कि यह चोरी असोकन ने की और मूर्ति को वर्ष 2006 में कपूर को बेचा| वर्ष 2008 में कपूर ने उसी मूर्ति को ऑस्ट्रेलिया की नेशनल आर्ट गैलरी को बेचा|

इन घटनाओं से जाहिर होता है कि सुभाष कपूर के लिए जिन कलाकृतियों के प्रेम और संग्रह का दावा किया जा रहा है उसके मायने हैं चोरी की मूर्तियों को अच्छी कीमत लेकर बेचना| सुभाष कपूर की खरीद फरोख्त की मियाद कुछ महीनों से लेकर चाँद सालों तक ही होती है| लेकिन इस मामले में माना जाता है कि मूर्ति नब्बे के दशक से गायब है जिसे वर्ष 2000 में लिंडन म्यूजियम को बेचा गया| कपूर के ऊपर आरोप है कि उसकी संलिप्तता कश्मीर के तेंगपुरा में मिली महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति चोरों के साथ भी हैं| एक संदिग्ध ऍफ़आईआर के साथ मूर्ति चोरी होने का बीस सालों से ज्यादा लम्बा समय गुजरा| उसके बाद वर्ष 2010 में डॉ. पाल ने उस मूर्ति को पहले आर्ट ऑफ़ द पास्ट गैलरी में देखा फिर लिंडन म्यूजियम में वर्ष 2011 में| चोरी होने और बिकने की मियाद में जो फासला हैं वह दस सालों से ज्यादा का होता है| ऐसे में संदेह पैदा होना लाजिमी है..

  1. अगर कपूर ने मूर्ति नब्बे के दशक में चुराई तो बेचने में इतना ज्यादा समय क्यों लगाया? क्या वह इस घटना में शामिल नहीं? क्या वह मूर्ति किसी और ने लूटी और बाद में कपूर की गैलरी में पहुंचा दी? अगर ऐसा हुआ भी हो तो लूटने का अभियुक्त कपूर कैसे बना? यह मान भी लिया जाए कि मूर्ति

किसी और ने लूटी और फिर कपूर को पहुंचाई तो भी 1990 से लेकर इतने लम्बे समय तक रखी क्यों?

एक आदमी जो 1990 में मूर्ति चुराता है वह 18-20 साल तक उसे अपने पास रखने के बाद कपूर को बेचता है या कपूर उस मूर्ति को इतने लम्बे समय तक अपने पास रखने के बाद गैलरी में जाहिर करता है|या फिर  यह ऍफ़आईआर जम्मू कश्मीर पुलिस ने जल्दबाजी में बनाई गयी ताकि मूर्ति के मामले में लीपापोती की जा सके?

  1. जब डॉ. पाल ने न्यूयॉर्क की आर्ट ऑफ़ द पास्ट गैलरी में मूर्ति को देखा और एएसआई को तत्काल सुचना दे दी तो फिर राकेश कॉल के बयान का क्या मतलब कि उसने डॉ. पाल से जानकारी 2010 में हासिल की और एएसआई को सूचना दी 2012 में? कुछ भी हो लेकिन इन दो सालों के इन्तेजार में मूर्ति न्यूयॉर्क से जर्मनी जरुर पहुंचा दी गयी| इन्ही महानुभावों ने पहले मूर्ति न्यू यॉर्क में देखी उसके बाद उन्होंने ही मूर्ति को जर्मनी में भी पहचाना|
  2. जबकि उसी मूर्ति के जो दस्तावेज जर्मनी के लिंडन म्यूजियम से मिले हैं, उनसे जाहिर होता है कि मूर्ति को लिंडन म्यूजियम वालों ने सुभाष कपूर से वर्ष 2000 में ख़रीदा वो भी 224000 यूरो देकर| राकेश कौल के बयान की मानें तो डॉ. पाल ने मूर्ति को 2010 में न्यूयॉर्क की एक गैलरी में देखा था| सवाल खड़ा होता है कि अगर मूर्ति वर्ष 2000 में लिंडन म्यूजियम ने खरीदी थी तो फिर डॉ. पाल को मूर्ति न्यूयॉर्क में कैसे मिली?

क्या यह माना जाए कि तमाम रास्तों से होती हुई वह मूर्ति न्यूयॉर्क से जर्मनी पहुंची और वो भी डॉ. पाल के पहुँचने की तारीखों के हिसाब से? गौरतलब है कि भारतीय कला के अमेरिकी प्रेमियों ने 200 से अधिक कलाकृतियाँ हमारे प्रधानमंत्री जी को वापस कीं और अगर यह मूर्ति उससे अलग थी तो फिर मूर्ति को अमेरिका से वापस लाने के प्रयास क्यों नहीं किये गए?  अगर मूर्तियाँ अलग-अलग थीं तो फिर डॉ. पाल ने इस मामले में अपना बयान क्यों दिया, वह तो निहायत गैर जरुरी हो जाता है? ऐसे में इस बयान का क्या मतलब है कि पहले वह मूर्ति न्यूयॉर्क गैलरी में सुभाष के संग्रह में देखी फिर लिंडन म्यूजियम में जिसे जर्मनी वालों ने उसी सुभाष से वर्ष 2000 में ख़रीदा था|

    1. इंडियन अर्कियोलोजी, ए रिव्यु नाम की पत्रिका में वर्णित लेख भी तेंगपुरा दुर्गा की कोई प्रमाणिकता बयान नहीं करता है, और ऐसा कोई भी चित्र उपलब्ध नहीं जो कि यह साबित कर सके कि जर्मनी से जो प्रतिमा मिली वह तेंगपुरा दुर्गा ही थी| पत्रिका के वर्ष 1980-81 के के एक अंक में यह जिक्र जरुर मिलता है:


“25. MEDIEVAL SCULPTURES, JUNGPURA, DISTRICT PULWAMA,—S.N. Jaiswal and S.N. Kesarwani of the North-western Circle of the Survey noticed stone sculptures of Mahishamardini and Vaikuntha-Narayana at Tengpura belonging to circa tenth-eleventh century AD. The sculptures are now placed in the modern temple of Mata, “

मध्यकालीन कलाकृतियाँ, जंगपुरा, जनपद पुलवामा शीर्षक के इस कथन का हिंदी तर्जुमा बताता है कि “उत्तर पश्चिम के सर्वेक्षण में एस.एन. अगरवाल और एस.एन. केसरवानी ने तेंगपुरा के सर्वेक्षण में महिषासुरमर्दिनी और वैकुण्ठ नारायण की प्रतिमाएं दर्ज की जो कि दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी से सम्बंधित हैं| ये कलाकृतियाँ अब माता के नए मंदिर में विराजमान हैं|”

जाहिर है कि दसवीं शताब्दी की एक मूर्ति तो थी लेकिन यह नहीं स्पष्ट है कि वह उसी मंदिर में मौजूद थी जिसे प्रत्यक्षदर्शी विदेशी गवाह ने दावा किया, उपरोक्त कथन से यह भी स्पष्ट होता है कि मूर्तियों को किसी दूसरी जगह पर पहुंचा दिया गया| माता मंदिर का जिक्र मौजूद नहीं होने से ये पता करना मुश्किल है कि मूर्ति किस जगह मौजूद रही| अगर यह मूर्ति वही है जिसका एएसआई ने किया तो फिर सिउड्मैक के गवाह ने वही मूर्ति 1990 में तेंगपुरा के जाली से घिरे एक छोटे मंदिर में कैसे देखी?

  1. इतिहासकार और एएसआई के लोग जम्मू-कश्मीर के तेंगपुरा से चुरायी गयी दुर्गा मूर्ति का कोई चित्र प्रस्तुत नहीं कर सके| माना जाता है कि मूर्ति की लूट कश्मीर के चरम आतंकवाद के समय में पुलवामा जिले के एक छोटे से गाँव तेंगपुरा से लूटी गयी| उपलब्ध चित्र भी उस उस मूर्ति के नहीं जो कि चोरी हुई और वापस मिली|
  1. इंडियन एक्सप्रेस ने अपने एक लेख में डॉ. पाल की पुस्तक के मुखपृष्ठ पर छपी मूर्ति को ही तेंगपुरा दुर्गा के नाम से बयान किया है| यह चित्र एक कांस्य प्रतिमा का है जो कि तेरह सौ साल पुरानी अट्ठारह हाथों वाली दुर्गा प्रतिमा के तौर पर दिखाया गया है, नौवीं शताब्दी की वह प्रतिमा जो जर्मनी से वापस मिली उसके बारे में इस प्रकार की सूचना देना क्या अफवाह फैलाना नहीं?

या फिर ये वही कांस्य प्रतिमा थी जो डॉ. पाल ने न्यूयॉर्क में देखी? अगर ऐसा है तो फिर उन्होंने यह दुष्प्रचार क्यों किया कि वही मूर्ति जर्मनी से वापस आई है ? या फिर डॉ. पाल बुढ़ापे में सठिया गए हैं? या फिर यह एक अफवाह थी? अगर यह अफवाह थी तो डॉ. पाल ने इसका दुष्प्रचार क्यों किया? एएसआई को बहकाया क्यों गया? यदि एएसआई को बहकाने का यह काम कौल ने किया तो क्यों?  क्या यह शरारत सुभाष कपूर की थी, जिसे ज्यादा पुरानी दूसरी मूर्ति के पीछे पड़े दूसरे लोगों  पर पर्दा डालने के लिए लगाया गया?  या फिर यह सुभाष कपूर ही था जिसने दोनों मूर्तियों की चोरी करवाई जिसमे से एक को जर्मनी और दूसरे को अमेरिका को बेचा गया?

  1. कौल के मुताबिक लिंडन म्यूजियम के जर्मन क्यूरेटर डॉ. गर्ड क्रेइसेल ने बताया कि सभी दस्तावेजों के साथ कपूर ने वो मूर्ति म्यूजियम को बेचीं थी| इसी तरह के एक दूसरे मामले में जब डॉ. पाल ने ऑस्ट्रेलिया में नटराज की प्रतिमा की पहचान की तो उन्होंने तत्काल एएसआई को खुद बताया था| लेकिन इस मामले में उन्होंने कौल को बताया जो कि एएसआई और प्रत्यक्षदर्शी के बीच मध्यस्थता कर रहा था?

क्या डॉ. पाल एएसआई को सीधे संपर्क नहीं कर सके? मूर्ति के बारे में बताने के लिए कौल को हिंदुस्तान क्यों आना पड़ा ? क्या सरकारी विभागों की तरह एएसआई को संपर्क करना वाकई इतना कठिन है? इस मूर्ति के बारे में डॉ. पाल ने पहले कोई खुला बयान क्यों नहीं दिया?

  1. कुछ सवाल उस जॉन सिउड्मैक के इर्द-गिर्द भी घुमते हैं, जिसे एएसआई ने प्रत्यक्ष गवाह करार दिया, जिसके बारे में माना जाता है कि उसने मूर्ति को 1990 में तेंगपुरा मंदिर में देखा था|

क्रिस्टी का पुराना इतिहास है जिसे अंग्रेजों ने एशिया और अफ्रीका की लूट को दुनिया भर में बेचने के लिए बनाया| अंग्रेजी सैनिकों से लेकर वाइसराय तक जो भी पिछले दो सौ सालों में इंग्लैंड से भारत आया सिद्धांततः उसने जो कुछ यहाँ पाया उसे यूरोप ले जाकर क्रिस्टी में बेचा और बेहिसाब पैसा बनाया| भारत से लूट कर लन्दन में बेचने का कारोबार न कर पाने वाले को निकम्मा और असफल करार दिया गया|

सफलता का एक आलम यह भी था कि हिंदुस्तान में अपनी मियाद पूरी करने के पहले वह अधिकारी अपनी साठ पुश्तों के लिए पैसा जमा कर ले|

प्राइवेट आर्ट कंसलटेंट होने पहले सिउड्मैक क्रिस्टी में हिन्दुस्तानी और इस्लामिक कलाओं का इनचार्ज रहा| 1979 के अंत में उसने क्रिस्टी छोड़ कर पुरानी कलाओं के कंसलटेंट के तौर पर अपना कारोबार शुरू किया| अपने छत्तीस सालों के कारोबार में उसने तमाम कलाओं की खोज की, तमाम अहम् कलाकृतियों को दुनिया भर में बेचा|

इस कारोबार में ईस्ट इंडिया कम्पनी के पदचिन्हों पर चलते हुए उसने भारी मात्रा में पैसा बनाया| उसका दावा है कि उसने दुर्गा की मूर्ति को तेंगपुरा गाँव में देखा, 1990 के आस-पास| उसके साथ दो और लोग भी प्रत्यक्षदर्शी थे महान ओरिएण्टल स्कॉलर प्रोफेसर साइमन डिग्बी और अस्सादुलेह बेग जो कि श्रीनगर के प्रताप सिंह म्यूजियम के क्यूरेटर भी थे| विडम्बना है कि बाकी दोनों गुजर चुके हैं (इसलिए किसी बात की तस्दीक नहीं की जा सकती)|

सिउड्मैक ने राकेश कौल को एक इ-मेल लिखा जिसमे उसने मंदिर के लोहे के बाड़े में होना बताया| साथ ही यह भी बताया कि गाँव वालों को चोरी के डर से किसी को तस्वीर नहीं लेने दी| मूर्ति की तस्वीर बेग ने लाकर दी जिसका उसने अपने पी.एचडी की थीसिस में इस्तेमाल किया| आतंकवाद की शुरुआत में सिउड्मैक को पता चला की मूर्ति चोरी हो गयी| अपनी ई-मेल में सिउड्मैक ने यह भी बताया कि चोरी का पता चलने पर बेग की दी गयी तस्वीरें उसने एहतियातन उसने मार्टिन लेर्नर और स्टेन जुमा को दे दीं| डॉ. पाल को यह बात 1994 से पता थी और वे ही सिउड्मैक के एग्जामिनर थे|

संभवतः एएसआई ने इसी ई-मेल के संवाद का प्रयोग किया| कहा जाता है कि इस पूरे प्रकरण में सिउड्मैक साथ रहा और एएसआई की बोलती बंद रही, अचम्भे की बात है कि आज भी एएसआई के पास कोई मौलिक सूचना नहीं है|

अर्कियोलोजिकल रिव्यु पत्रिका 1980-81 के मुताबिक अगर मूर्ति नए माता मंदिर में पहुँच गयी फिर बेग ने उसकी तस्वीर तेंगपुरा गाँव में कैसे हासिल की? जो प्रतिमा नए मंदिर में शिफ्ट हो गयी हो उसके दस साल बाद सिउड्मैक ने उसे तेंगपुरा में कैसे देखा? ऐसा तो नहीं कि प्रतिमा नए माता मंदिर से फिर से चोरी की गई हो?

या फिर माता मंदिर में कोई दूसरी प्रतिमा तो नहीं? अगर ए एसआई उक्त प्रतिमा के बारे में 1981 में लिखता है कि प्रतिमा माता मंदिर में है तो ऐसा कैसे संभव है कि 1990 में हुई मूर्ति की चोरी के बारे में उसे पता ही न चले| जब सिउड्मैक लिखता है कि गाँव वालों ने मूर्ति की तस्वीर नहीं खींचने दी तो फिर बेग को तस्वीर कैसे मिल गयी| माना कि बेग म्यूजियम का क्यूरेटर था इस लिहाज से उसने मूर्ति की फोटो ले भी ली हो तो भी म्यूजियम में देखी गयी तस्वीर के अलावा और कोई तस्वीर क्यों नहीं प्रस्तुत की गयी?

एएसआई के पास ऐसी कोई तस्वीर नहीं जो इनकी समीक्षा में छपी हो| जैसा कि एएसआई का दावा है कि उसके मुताबिक कोई तस्वीर या सूचना मौजूद नहीं| तेंगपुरा दुर्गा की एकमात्र समीक्षा वही है जो 1980-81 की पत्रिका में छपी, उसके बारे में यह दावा किया गया कि यह 9-10वीं शताब्दी की मूर्ति है| इसी मूर्ति को सिउड्मैक ने आठवीं शताब्दी की बताते हुए अपनी किताब में जगह दी|

इसके साथ ही बताया गया था कि इस मूर्ति के साथ वैकुण्ठ नारायण की भी एक प्रतिमा मौजूद है जिसे नए माता मंदिर में शिफ्ट किया गया| सवाल है कि नारायण की प्रतिमा कहाँ है? क्या ये एएसआई के कब्जे में है, जर्मनी में है या फिर अमेरिका में या सुभाष कपूर सरीखे किसी कद्रदान के पास जहाँ मूर्ति के खरीददार का इन्तेजार हो?

समीक्षा में स्पष्ट नहीं कि मूर्ति किस माता मंदिर में है और कश्मीर के किस हिस्से में या कहीं बाहर मौजूद है| इससे एक विरोधाभास पैदा होता है कि जिस मूर्ति को लेकर सिउड्मैक ने बयान दिया कि उसने मूर्ति को तेंगपुरा में देखा वह मूर्ति वहां कभी रही भी या नहीं| अगर ऐसा कोई मंदिर था भी तो एएसआई ने उसकी हिफाजत करने की बजाये कहीं और कैसे शिफ्ट कर दिया? अगर ये मंदिर का हिस्सा थी तो मंदिर का बाकी हिस्सा कहाँ है? किसी कलाप्रेमी ने मंदिर के बाकी ज्यादा पुराने हिस्सों को क्यों नहीं देखा सिर्फ एक मूर्ति को ही क्यों? कोई भी आदमी उस मूर्ति की लूट कैसे कर सकता है जिसे वहां से पहले ही शिफ्ट किया जा चुका हो? उसने वैकुण्ठ नारायण को पीछे क्यों छोड़ दिया जबकि वह उसी मंदिर में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा के साथ मौजूद रही?

यह बयान कि प्रतिमा एक छोटे पीठ में लोहे के बाड़े में मिली यह भी संदेहास्पद मालूम होता है| अट्ठारह भुजाओं वाली यह दुर्गा प्रतिमा दुर्लभतम है जिसका समय आठवीं शताब्दी या दसवीं शताब्दी का हो दो सौ सालों का यह फर्क आम बात है(हो सकता है कि मूर्ति और भी पुरानी हो क्योंकि हिन्दुस्तानी हुक्मरानों ने इतिहास के 3000 सालों वाले ब्रिटिश संस्करण को ठीक करके समझना आज तक स्वीकार ही नहीं किया)|

कश्मीर ने ललितादित्य और अवन्तिवर्मा का स्वर्णिम शासन देखा जिसने वहां के तमाम पुराने स्मारकों और वेधशालाओं की मरम्मत करवाई| संभव है कि उक्त मूर्ति महज लोहे के बाड़े में बंद एक सामान्य प्रतिमा भर न हो| कोई तर्क कर सकता है कि मंदिर तो मुस्लिम आक्रान्ताओं अथवा धर्म परिवर्तित मुसलमानों ने बर्बाद कर दिए गए, इसलिए इस प्रतिमा की हिफाज़त स्थानीय लोगों द्वारा की जाती रही| ऐसा होने की दशा में मंदिर के खंडहर भी मिलने चाहिए और उसके दस्तावेज भी जो कि कश्मीरी राजाओं, अंग्रेजों या फिर एएसआई की जिम्मेदारी बनते हैं जिनका काम है कि उस स्मारक को सुरक्षित रखें! ऐसे किसी खंडहर या स्मारक का कोई जिक्र तो नहीं मिल पाया है| जैसा हमे इतिहास में बताया गया कि चौदहवीं शताब्दी में एक धर्म परिवर्तन करके इस्लाम होने वाले ब्राह्मण राजा ने कश्मीर को बर्बाद किया! ईरान या अरब के समकालीन स्रोतों में ऐसा कोई जिक्र नहीं मिलता जिससे धर्म परिवर्तन और विनाश का यह कथ्य मौजूद हो|

इस हिसाब से यह कहानी भी संदेहास्पद मालूम होती है| अगर हम कहानी को सच भी मान लें तो भी यह कहानी जिसमे मंदिर का विनाश मिलता है उसमे यह कैसे संभव है कि मूर्ति को कोई नुकसान न हुआ हो? क्या मूर्तियों को इसलिए छोड़ दिया गया कि उन्हें तथाकथित कला प्रेमियों को बेच कर लाखों डॉलर के वारे-न्यारे किये जा सकें|

  1. और फिर जैसा कि सिउड्मैक बताता है कि यह सूचना डॉ. पाल को वर्ष 1994 से थी, क्योंकि वे ही सिउड्मैक के परीक्षक थे| इसका अर्थ यह हुआ कि शैक्षिक क्षेत्र को मूर्तियों के गायब होने का पता होने के बावजूद 2010 तक किसी ने कुछ भी नहीं किया| यह बात आम लोगों की समझ के परे है|अचम्भे की बात यह भी है कि उनमे से किसी के पास भी तेंगपुरा मंदिर या माता मंदिर की कोई जानकारी या तस्वीर मौजूद नहीं| ये सारी सूचनाएं भारतीय गणतंत्र के इक्कीसवीं शताब्दी के दस्तावेजों की सच्ची कहानी है| पहले डॉ. पाल भी अपने बयानों में भारत सरकार की लाल फीताशाही को लेकर मुखर हुआ करते थे और ऐसे कई मामलों में वे कलाकृतियों के हिमायती भी रहे जिन्हें कई सौदागरों ने वापस भी किया| लेकिन इस मामले में सभी मौन हैं!

इस मामले पर लिंडन म्यूजियम के निर्देशक डॉ. इनस दि कास्त्रो कुछ इस तरह की व्यंग्यात्मक टिपण्णी करते है कि उन्हें पता नहीं कि यह मूर्ति कैसे हिंदुस्तान के बाहर गयी और उन तक कैसे पहुंची और कैसे न्यूयॉर्क में दिखी| जर्मनी पहुंची एएसआई की टीम बताती है, हमे मूर्ति वापसी का भरोसा है, लेकिन हम जर्मनी के कानूनों के मुताबिक कदम उठाएंगे| अभी तक जर्मनी  की ओर से कोई औपचारिक कार्यवाही नहीं हुई है| दोनों पक्षों को सही से खोजबीन करने की जरुरत है| जबकि म्यूजियम के क्यूरेटर के मुताबिक बिक्री के समय कपूर ने असली और प्रमाणिक दस्तावेज दिए हैं|

क्या ये दस्तावेज चुरायी गयी कलाकृतियों को लेकर सरकारों की सहायता से जुटाई गयी सूचनाओं की तरह ही हैं जिन्हें प्रमाणिक बताया जा रहा है? क्या म्यूजियम के अधिकारियों ने खरीदने के पहले कोई जांच नहीं की? जर्मनी के विज्ञानं, अनुसन्धान और कला मंत्रालय के एक प्रतिनिधि आर्दंट ओसमान्न ने जरुर कहा, “लिंडन म्यूजियम वालों ने इसकी जांच जरुर की कि कलाकृति कहाँ से आई लेकिन उसकी शुरूआती जानकारी मौजूद नहीं| न्यूयॉर्क का सुभाष कपूर कलाकृतियों का भरोसेमंद सौदागर है|”

इस बयान से जाहिर होता है कि प्राचीन कलाकृतियों के उस चोर के सरकारों के साथ रिश्ते बहुत गहरे हैं|  यह भी जाहिर है कि किसी भी देश के पास कोई ठोस कानून नहीं है जो कि कलाकृतियों की तस्करी पर रोक लगा सके| इसके चलते उनके मकसद से ही यह लूटमार ब्रिटिश शासन से लगातार जारी है!

हालाँकि जर्मनी, फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड में कानून है कि वहां मियाद ख़त्म होने के पर कलाकृतियाँ खरीदने के लिए प्रमाणिक होना जरुरी है| इसी के चलते वहां चोरी गयी कलाकृतियों की वापसी भी आसान होती है| हालाँकि चुराई गयी कलाकृतियों के लिए कोर्ट के बाहर के आपसे समझौते भी होते हैं| यह कानून जर्मन लोगों के लिए एक वरदान है जिससे वे हिंदुस्तान और अफ्रीका की प्राचीन कलाकृतियों की खरीददारी और संग्रह करते हैं| साथ ही क्रिस्टी सरीखी ईस्ट इंडिया कंपनी वाले घराने भी कलाकृतियों का व्यापार करते हैं| ऐसे कानूनों के बगैर हजारों साल पुरानी कलाकृतियों और ज्ञान का सुरक्षित रह पाना बहुत मुश्किल है| विडम्बना इस बात की है कि हिंदुस्तान के कानून के अंग्रजों द्वारा लिखे विधान वही हैं, इसलिए जो लूट पहले गोरा अंग्रेज करता था वही आज भूरा भारतीय करता है| इतने संघर्षों के बाद मिली आज़ादी के बाद भी बुनियादी ढांचा न बदले जाने की वजह से आज चाहे अंग्रेज कितना ही दूर क्यों न हो परदे के पीछे से सत्ता चलाने में कामयाब है|

  1. जब ऍफ़आईआर दर्ज हुई उस समय की कोई खबर मौजूद नहीं| मौजूद खबरों से जाहिर होता है कि नब्बे के दशक में किसी समय|
  2. गौरतलब है कि सुभाष कपूर के खिलाफ मूर्तियाँ चुराने का एक मामला तमिलनाडु में दर्ज है| उक्त मामले में अगर एफआईआर दर्ज हुई तो फिर वह दूसरे मामलों के आरोप पत्र के साथ शामिल क्यों नहीं किया गया?
  1. क्या कानून में यह अनिवार्य नहीं कि एफआईआर दर्ज होने के छः महीने के भीतर जांच होनी चाहिए? फिर एफआईआर दर्ज करके कश्मीर पुलिस पंद्रह सालों से ज्यादा समय तक हाथ पर हाथ धरे बैठी क्यों रही? या फिर वह एफआईआर तब दर्ज हुई जबकि उसी तरह की दो-तीन कलाकृतियाँ न्यूयॉर्क और जर्मनी में बरामद हो गयीं| संयुक्त राष्ट्र सम्मलेन में घोषणा हुई कि सांस्कृतिक संपत्तियों का अवैध कारोबार, आयात निर्यात और मिल्कियत पर पाबन्दी लगे, इतना सब होने के बावजूद हिंदुस्तान में ऐसा कोई डाटाबेस नहीं जिसमे यह हिसाब लगाया जा सके कि क्या क्या सांस्कृतिक विरासत बची है और क्या खो चुकी है या चोरी जा चुकी है|

दस्तावेजों में महिषमर्दिनी प्रतिमा का जिक्र आठवीं और दसवीं शताब्दी का मिलता है| इंडियन एक्सप्रेस, डेक्कन क्रॉनिकल इसका कालखण्ड दसवीं शताब्दी का बताते हैं तो लिंडन म्यूजियम के मुताबिक भी यह दसवीं शताब्दी की ही है| सिउड्मैक ने अपनी किताब में तेंगपुरा गाँव में मौजूद इस मूर्ति का समय आठवीं शताब्दी का बताया है| ये मामले एएसआई के हैं, जिसने मूर्ति के लिए कोई भी बयांन नहीं दिया है|

मूर्ति की मियाद में इस दो सौ साल के फर्क के क्या मायने हैं? हिन्दुस्तानी मीडिया, लिंडन म्यूजियम, एएसआई और सिउड्मैक के निष्कर्षों का आधार क्या है? वे एक ही मूर्ति की बात कर रहे हैं या मूर्तियाँ अलग-अलग हैं? जब एएसआई ने मूर्तियों की डेटिंग को जाहिर नहीं किया और मुर्तिया किसी के व्यक्तिगत संग्रह में नहीं हैं तो फिर मीडिया इसे दसवीं शताब्दी का कैसे बता रहा है? और सिउड्मैक इसे आठवीं शताब्दी का कैसे बताता है? फिर म्यूजियम ने इसे दसवीं शताब्दी का कैसे बताया है?

ए एस आई ने ऐसे कोई भी दस्तावेज नहीं दिए जिनसे साबित हो सके कि लिंडन म्यूजियम में मौजूद मूर्ति हिंदुस्तान से ही निकल कर अवैध रूप से म्यूजियम पहुंची| जर्मन म्यूजियम ने भी ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली जिससे जाहिर हो सके कि चोरी की मूर्ति का रहस्य क्या है?

मूर्ति पुलवामा जिले के तेंगपुरा गाँव की है यह भी ब्रिटिश गवाह की कहा सुनी की बातें हैं| यह टीएस इलियट के उस कहा सुनी के इतिहास के जैसा है जिसके दम पर अंग्रेज इतिहासकार और उसके शिष्यों ने हिंदू मुसल्मान की प्राचीन संस्कृति की हालत बयान की है| ये हालत है हिंदुस्तान के इतिहास के अनुसंधानकर्ताओं की|

तेंगपुरा गाँव और बाड़े वाला मंदिर एसपीएस म्यूजियम से महज पांच किलोमीटर दूरी पर है| 1898 में बना ये म्यूजियम एएसआई के संरक्षित स्थल अवन्तिपुरा से पैंतीस किलोमीटर दूरी पर है जहाँ 79595 कलाकृतियाँ मौजुद हैं| इन कलाकृतियों में पुरातत्व, सजावटी कलाओं, हथियार और रक्षा कवच की कलाकृतियाँ, पेंटिंग्स और कपड़ों पर नक्काशी के काम म्यूजियम में मौजूद हैं| अचम्भे की बात ये है कि आठवीं या दसवीं शताब्दी की दुर्गा की यह मूर्ति एएसआई, राज्य के पुरातत्व विभाग या एसपीएस म्यूजियम को कभी नजर नहीं आई जिसके बारे में सिउड्मैक कहता है कि चोरी होने के पहले यह उसी तेगपुरा गाँव में ही किसी बाड़े में सुरक्षित मौजूद थी|

कश्मीर ने ललितादित्य के स्वर्णिम शासन को देखा, वह राजा जिसने उत्तर पश्चिम में कैस्पियन सागर से लेकर पूर्व में प्रागज्योतिष असम और दक्षिण में कावेरी नदी घाटी तक विस्तृत क्षेत्र में शासन किया| उस राजा ने तमाम नगर बसाए और प्राचीन मंदिरों का पुनर्निमाण करवाया, उन मंदिरों में से एक है अनंतनाग का मार्तण्ड मंदिर| नीलम घाटी में स्थित शारदा मंदिर का जीर्णोद्धार भी ललितादित्य का ही काम था शारदा पीठ का वह मंदिर आज की तारीख में पाक अधिकृत कश्मीर में मौजूद है| कश्मीर जो किसी समय वैदिक ज्ञान की सांस्कृतिक विरासत का केंद्र रहा वह आज बदहाली की नजीर है| कश्मीर की ये हालत किसने की यह कोई नहीं बताता| हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियां हमारे नाक कान और आँखें हैं, वह बताती हैं कि यह काम आतंकवादियों ने किया और हम मान लेते हैं| वे कहती हैं कि यह हमारे पडोसी का काम है और हम मान लेते हैं, वे कहती हैं कि यह कश्मीर के इस्लामी राजाओं का काम है और हम मान लेते हैं| कश्मीर की बर्बादी को लेकर पागलपन के तमाम अजीबोगरीब किस्से हैं, जिनसे लगता है कि ये कहानियां अपराधियों या मनोरोगियों ने  ईजाद की हैं| टी.एस. इलियट के भारतीय इतिहासकारों के पसंदीदा संस्करण के मुताबिक एक ब्राह्मण ने धर्म परिवर्तन कर लिया, उसने कश्मीर का राजा बन कर अपने मंत्री की सलाह पर बदला लेने के लिए हर चीज नेस्तनाबूद कर दी| उसने सेना की सबसे मजबूत टुकड़ियों को मार्तंड मंदिर और सौर वेधशालाओं को बर्बाद करने में लगाया लेकिन यह हो न सका क्योंकि वह मंदिर पत्थरों का था इसलिए उसकी सेना ने मंदिर को आग के हवाले कर दिया| कश्मीर की बर्बादी का गुनाहगार दूसरा मुख्य चरित्र है कासिम| उसने और उसके अरब अनुयायियों ने कश्मीर की बेहिसाब बर्बादी की|

यह किस्सा महिषमर्दिनी के सरकारी किस्से से ज्यादा बेतुका है जिसकी तारीखें, घटनाक्रम और वजह उन देशों के किसी भी ऐतिहासिक दस्तावेज से मेल नहीं खाती जहाँ से आक्रान्ता आये|

तेंगपुरा गाँव शारदा पीठ से कुछ ही किलोमीटर की दुरी पर है| क्या ऐसा भी संभव नहीं कि वह मूर्ति शारदा मंदिर या अवन्तिपुरा मंदिर से ही सम्बंधित हो? कश्मीर के रॉयल ऑक्शन हाउस में नीलाम हुई कलाकृतियों से भ्रष्ट नेताओं, कला के ‘कद्रदान’ और दलालों और तस्करों ने इंटरनेशनल म्यूजियम वालों को बेचकर बेहिसाब पैसा बनाया| क्या ये संभव नहीं कि उन सभी हिस्सेदारों, एएसआई और कश्मीर के राजाओं की जाहिलियत के चलते भारत की यह सांस्कृतिक विरासत तेंगपुरा गाँव में पहुँच गयी हो!

आज़ादी के बाद जब कश्मीर का बंटवारा हुआ और पश्चिमी समर्थित ताकतों ने कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया तो शारदा मंदिर परिसर पाक अधिकृत हिस्से में चला गया जिसे किसी भी इंटरनेशनल बॉडी ने कश्मीर नहीं माना| उसी समय इस मूर्ति की तरह हजारों कलाकृतियों को संभवतः शारदा मंदिर परिसर से उठा लिया लिया गया या फिर तस्करी करके तमाम जगह ले जाया गया| क्या ये संभव नहीं है कि इनमे एक मूर्ति तेंगपुरा गाँव भी आई हो! इसके बाद सुभाष कपूर सरीखे लोगों ने जिस तरह दस्तावेज बनाकर तस्करी करते हैं किया ही होगा! हालाँकि मंदिर पर पहरेदारी पाकिस्तानी सेना की है लेकिन क्या ये संभव नहीं है कि वहां पर कलाकृतियों की तस्करी का रैकेट हो और उनके तार अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों तक जुड़े हों? क्या ये मूर्ति इस तरह बाहर नहीं आ सकती?

अंग्रेजी हुकूमत के समय से ही भारतीय कलाकृतियों की तस्करी जोरों पर थी, वह शुरुआत थी जब अंग्रेजों ने परंपरागत राजाओं को बेदखल करके कठपुतली नरेशों को सत्ता सौंपी| पैरामाउंटसी कानून के तहत राजा बने कठपुतली नरेशों ने पुराने राजाओं की संपत्तियां बेहिसाब तरीके से लूटी, साथ ही साथ अंग्रेजी अंग्रेजों के लिए कलाकृतियों का भी कारोबार तैयार कर दिया| ये कलाकृतियाँ “कलाप्रेम” के नाम पर हिंदुस्तान से बाहर ले जाई गयीं, उस समय एक सिपाही भी कलाकृतियाँ लेकर ब्रिटेन जा सकता था क्योंकि वे जानते थे कि इन कलाकृतियों की सही कीमत ब्रिटेन के नीलामी घरों में ही मिल सकेगी|

पुलवामा के तेंगपुरा गाँव में मिली अट्ठारह हाथों वाली विलक्षण दुर्गा मूर्ति के मामले में सरकारी बयान संतोषजनक नहीं| यह मूर्ति महाराजा ललितादित्य के कालखण्ड की मालूम होती है (अधिक सम्भावना है कि मूर्ति शारदा सर्वज्ञानपीठ की हो जो कि कश्मीर में अट्ठारहवीं शताब्दी तक सार्वभौमिक अध्ययन केंद्र रहा)| यह मूर्ति कश्मीर की प्रमुख देवी शारदा या सरस्वती के विस्तृत मंदिर परिसर का एक अंश थी| मंदिर के सार्वभौमिक अध्ययन केंद्र ने पूरी दुनिया को आकर्षित किया हर कोने से विद्वानों ने आकर इस प्रांगण में शिक्षा प्राप्त की| 1835 तक इस मंदिर परिसर में पूजा होती रही| यह मंदिर और विश्वविद्यालय परिसर इतना विस्तृत रहा कि इसका कोई आकलन नहीं हो सका| अभी हाल ही में रूस और जर्मन विद्वानों के एक दल को विश्वविद्यालय परिसर की बाहरी परिधि का नक्शा बनाने में सफलता मिली|

भारतीयों को बताया जाता है कि शारदा पीठ को इस्लामी आक्रमणकारियों ने बर्बाद किया| इतिहास के इस तथ्य से तमाम सवाल खड़े होते हैं| अगर इस तथ्य को सच मान भी लिया जाए तो भी यह मूर्ति कैसे बची रही और जर्मनी पहुंची? या फिर यह माना जाए कि 1947 के बाद की लड़ाई का मकसद शारदा पीठ और मधुमती घाटी, नीलम घाटी की क्षेत्रीय विरासत को बर्बाद करना था जिसमे मूर्ति की भी लूट हुई? अगर ऐसा है तो भारत की राष्ट्रीय सरकारों को इसके बारे में जानना चाहिए और जरुरी है कि भारत के लोकतान्त्रिक संस्थान अपने लोगों में इस विषय में जागरुक करें| अन्यथा में देखा जाए तो कॉर्पोरेट मीडिया ने इस सच को सामने आने ही नहीं दिया या फिर ये मान लें कि 1947 के बाद कुछ हुआ ही नहीं|

 युद्ध तो हुआ, लेकिन मंदिर परिसर के विनाशकारी लोग कौन थे? कश्मीर की पहली लड़ाई (1947) में भारतीय सेना इस मंदिर परिसर से महज चार किलोमीटर की दूरी तक पहुँच गयी थी, क्या सेना इस अति महत्वपूर्ण शक्ति पीठ पर कब्ज़ा नहीं कर सकती थी? या फिर सेना को कब्ज़ा करने से मना किया गया? किसके आदेश से सेना मानी?  

भारत में पढाये जाने वाले ऐतिहासिक मजाकों में से एक यह भी है कि इस परिसर की सुरक्षा अफगानी कबीलों के हाथ थी जो उस समय इस परिसर कोई भारतीय सेना के कब्जे में सौंपने को तैयार थे|

भारतीय सांस्कृतिक विरासत का बहुत बड़ा हिस्सा इसी अध्ययन केंद्र में लिखा गया| शारदा लिपि में लिखी भारतीय मेधा और ज्ञान के अधिकांश मूलपत्र पिछले एक सौ पचास सालों से लापता हैं| सही मायनों में तो वे तब से गायब हैं जब अंग्रेजों ने उनका पुस्तकालय लाहौर में बनाया और धोखे से शारदा विश्वविद्यालय की सारी मूलप्रतिलिपियाँ वहां पहुंचा दीं, इस काम के लिए जब जरुरी लगा सेना का इस्तेमाल किया| इस मामले को महज एक संयोग मानने के बजाए भारत के लिए बेहतर तो यही रहेगा कि इस मामले की ठीक से जांच करे|

अगर ये आक्रमण किसी मध्य एशियाई आक्रान्ता के नहीं तो फिर इस मंदिर परिसर की बर्बादी का गुनाहगार किसे माना जाए जिसने “बुतपरस्तों की मूर्तियों” को बर्बाद करने का काम किया| कश्मीर के इस विशाल परिसर की मूर्तियों, खजाने और कलाकृतियों को हटाने के लिए आक्रमण किसने किया? ये सांस्कृतिक संपत्ति हिंदुस्तान से बाहर कैसे गयी, और कौन ले गया विदेश? आज की दिनुया में इन मूर्तियों और प्रतीकों की क्या भूमिका बनती है? या फिर ये मूर्तियाँ म्यूजियम में सजी महज कुछ वस्तुएं भर हैं?    

अगर हम मानते हैं कि इस अध्ययन केंद्र का विनाश किसी मध्य एशियाई या अन्य विदेशी आक्रमणकारी ने किया तो हमे यह भी मानना होगा कि इस विश्वविद्यालय की बर्बादी के बावजूद अक्रमंणकारियों ने पांच सौ सालों से ज्यादा समय तक इसे सहेज कर रखा| इसी दौरान इन्हें हिंदुस्तान से मध्य एशिया ले जाया गया, जहाँ से कोई पाञ्च सौ सालों बाद यूरोप पहुंची, वो भी महज बेचने और भारी मुनाफे के लिए| गौरतलब है कि 1700 में कश्मीर में महाराजा रणजीत सिंह और उनके डोगरा शासकों का राज था| जबकि हमे बताया जाता रहा है कि राजाओं ने कोहिनूर हीरे को हिंदुस्तान वापस लाने के लिए तमाम प्रयास किये, क्या यह वजह काफी है जिसके चलते इन राजाओं या डोगरा शासकों ने मंदिर की बेहिसाब कलाकृतियों और सांस्कृतिक संपत्तियों को दरकिनार कर दिया? या फिर ये वजह है जिससे साबित किया जा सके कि वे राजा उस सांस्कृतिक विरासत को लेकर जाहिलियत नहीं रखते थे? या फिर कोहिनूर के साथ कोई खास भावनात्मक जुडाव था जिसके चलते उन्होंने कोहिनूर को वापस लाने की तमाम कोशिशें की|

अगर ये तस्करी होती रही है तो हिंदुस्तान से यूरोप तक के रास्ते में इसके तमाम पड़ाव भी मौजूद रहे ही होंगे क्या चीनी व्यापारियों ने यूरोप के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल नहीं किया? या चीनी व्यापारी इस तस्करी से अनजान ही रहे? या फिर हमे चीन से भी इसी तरह की सौगात मिलने वाली है? ओह… चीनी तो इस रास्ते गए ही नहीं! जर्मनी को छोड़ भी दीजिये तो वो तस्कर क्या ईरानियों से बच सकते थे? ईरानियों ने सैकड़ों सालों तक इस रास्ते की बादशाहत संभाली है| क्या वे भी इस तस्करी से अछूते रहे? या फिर इस तरह की कहानियां बनाने वालों ने पर्शिया से किनारा करके रूसी जार के विशाल साम्राज्य के बीच से रास्ता बनाया? या फिर हमे रूस से भी ऐसी ही किसी सप्रेम भेंट का इन्तेजार करना चाहिए? अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर…?

खैर पूरे यूरोप में ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जो दावा करता हो कि 1700 से 1900 के बीच लन्दन के क्रिस्टी सरीखे ऑक्शन हाउसों को छोड़कर मध्य एशिया या अरब में कोई इस्लामी ऑक्शन हाउस मौजूद रहा! जाहिर है कि ब्रिटिश ऑक्शन हाउस के अलावा कोई और ठिकाना नहीं था जिसमे अंग्रेज अधिकारीयों और सैनिकों द्वारा अफ्रीका और एशिया में की गयी लूट को बेचकर भारी मुनाफाखोरी की जा सके| इंसानी खोपड़ी से लेकर मंदिरों की स्थापत्यकला के खजाने और बहुमूल्य पांडुलिपियों तक की बेहिसाब तस्करी करके लन्दन में बेचा गया| क्रिस्टी सरीखे इन्हीं सौदागरों ने देश की सांस्कृतिक सम्पदा की कलाकृतियों के बारम्बार दोहन से अपनी किस्मत चमकाई|

इस बेहिसाब बरबादी की गवाह रही यूरोप की ही गैर औपनिवेशिक सत्ताओं ने ज्ञान केन्द्रों का ये हाल देख कर उन कलाकृतियों को खरीदकर सुरक्षित रखने और अध्ययन करने का काम शुरू किया| ताकि ज्ञान और संस्कृति की प्राचीन धरोहर मिट न जाए|

जो कुछ भी यूरोपियन ऑक्शन हाउस में बिका उसको खरीदने के इस मिशन में अगुआ बना जर्मनी| इस खरीददारी के अलावा जब जर्मनों को महसूस हुआ कि ब्रिटिश तो मानवता के उस बहुमूल्य खजाने की लूटपाट करके बेच रहे हैं, जो सच्चे अर्थों में पूरी दुनिया की विरासत है तो उन्होंने खोजी दलों को भी भेजा जिन्होंने ब्रिटिश सौदागरों को दरकिनार करके सीधे असली हकदारों से ख़रीदा| सच्चे अर्थों में यह कदम हिंदुस्तान के इतिहास में मौजूद ज्ञान सम्पदा को सुरक्षित रखने से जोड़कर देखा जाना चाहिए|

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद वे राजा कश्मीर सहित कश्मीर में मौजूद हर चीज बेचने को तैयार बैठे थे, उपलब्ध सूचनाओं से जाहिर होता है कि जर्मनी ने कश्मीर के डोगरा राजाओं से शारदा लिपि में लिखी हजारों पांडुलिपियाँ खरीदीं| अट्ठारहवीं शताब्दी में हुई इस खरीद फरोख्त में कीमत चार रुपये से शुरू होकर हजारों रुपये की रही|

सबसे उम्दा अर्कियोलोजिस्ट और अनुसंधानकर्ताओं के साथ मिलकर एक इंटरनेशनल प्रोजेक्ट में जर्मनी ने सारी दुनिया के ज्ञान केंद्र का पता लगाया साथ ही साथ उसके परिसर की नाप जोख करके हालातों की भी ताकीद की| ऐसे प्रोजेक्ट के लिए पाकिस्तानी सेना ने अनुमति भी दी| थोडा और ठहरिये! यह पाकिस्तानी सेना ही थी जिसने शारदा सर्वज्ञानपीठ में जो थोडा बहुत बचा उसकी हिफाजत की वो भी आज़ादी के बाद 67 सालों तक! लेकिन कार्पोरेट पूंजी से पोषित मीडिया ने हमेशा यही दावे किये कि पाकिस्तानी सेना हमारी पीठ में छुरा मारती है, विडम्बना यह है कि मीडिया के शोर में हिन्दुस्तानी अवाम को उरी के नाम पर जो दीखता है उसी कहानी पर भरोसा करना पड़ता है|

यह भी एक बड़ी विडम्बना है कि जब अध्येताओं ने इसकी मैपिंग शुरू की और इस अन्तराष्ट्रीय प्रोजेक्ट की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की तो उड़ी हमला हुआ और जवाबी कार्रवाई में किये गए सर्जिकल स्ट्राइक उसी क्षेत्र में हुए जहाँ इंटरनेशनल रिसर्च टीम को काम करना था| यह घटना होने के साथ वो सभी संभावनाएं नेस्तनाबूद हो गयीं जिनसे उस इलाके की तफ्तीश करके कुछ पता लगाया जा सके|

यह हमारे साथी हिन्दुस्तानियों का एक जवाब है, उस तोहफे के बदले में जो जन्नत के बगीचे का रास्ता गुमराह करके रेगिस्तान में मिली भयानक मौत के साथ ख़त्म हुआ!!

संक्षेप में, महिषमर्दिनी की पुनःप्रतिष्ठा के इस किस्से में तीन अहम् सवाल हैं जिनका जवाब जानना निहायत जरुरी हो जाता है,

  1. डॉ. ने महिषमर्दिनी की मूर्ति को वर्ष 2010 में न्यू यॉर्क में कैसे देखा जबकि मूर्ति वर्ष 2000 से लिंडन म्यूजियम, स्टुट्गार्ट, जर्मनी में मौजूद थी? क्या जर्मन मूर्ति खरीदने के दस साल बाद इसे जर्मनी ले गए?
  2. हेडली जो पाकिस्तान में जन्मा अमेरिकी आतंकवादी था, उसके जब अमेरिकी सरकार ने लिए भारत को 26/11 के आतंकी हमले की जांच के लिए भी इजाजत नहीं दी, वहीँ अमेरिकी सरकार हिंदुस्तान में जन्मे अमेरिकी नागरिक, जो कैंसर से पीड़ित भी है उसके लिए तमिलनाडु की अदालत के चल रहे कलाकृतियों की चोरी के मामले में तफ्तीश की इजाजत दे देती है| वह आदमी वर्ष 2012 से तमिलनाडु की जेल में बंद है| एक चोरी के मामले में अनुमति देने वाली अमेरिकी सरकार आतंकी को क्यों बचाती रही? क्या इसके पीछे कोई भूराजनैतिक वजह है?
  3. भूराजनीतिक शब्दावली में बहुचर्चित शब्द है “प्रोमेथियन मूव”| जर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे यह आकलन करने में बड़े उस्ताद होते हैं कि दुनिया के भविष्य में दशकों आगे क्या होने वाला है! ऐसे में गलत होने के बावजूद, गुमराह करने वाले अधूरे दस्तावेजों के साथ जर्मन महिषमर्दिनी की मूर्ति भारत को क्यों वापस करेंगे? जर्मंस की इस चाल के पीछे क्या वजहें हैं?

इस तरह ख़त्म होती है पहली कलाकृति की संदेह जनक कहानी जिसमे लिंडन म्यूजियम से मिली महिषमर्दिनी की मूर्ति, जिसके पीछे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब तलाशना ही होगा…

दूसरी सौगात का किस्सा

इस बार मिलने वाले तोहफे का नहीं बल्कि दूसरे रास्ते से हिंदुस्तान से बाहर जाने वाले तोहफे की कहानी है जो हिंदुस्तान की सरकार ने खुद दिया|

यह तोहफा हिन्दुस्तानी हुकूमत ने दिया सऊदी अरब के शेखों को! इस तोहफे की जमीन है कश्मीर से ढाई हजार किलोमीटर दूर बसा राज्य केरल|

पहले तोहफे में मूर्ति मिली थी मंदिर का पता नहीं था, इस तोहफे में मंदिर तो है लेकिन मूर्ति नदारद है! पहले मामले में मूर्ति बरामद हो गयी थी इस मामले में मूर्ति की शिख्नाख्त होती बाकी है!

यह सौगात है ज्ञान की देवी के मंदिर का एक सुनहरा प्रतीक, जिसके बारे में कहा जाता है कि धर्म परिवर्तन करने वाले एक बादशाह ने मुहम्मद साहब से मिलने के बाद पहली मस्जिद बनवाई| यह वाकया हुआ 600-700 इसवी में जिसकी मस्जिद आज भी केरल में मौजूद है|

मस्जिद के बारे में माना जाता है कि इसे मुहम्मद साहब के शिष्य मालिक बिन दीनार ने बनवाया जो कि केरल के शासक चेरमण पेरूमल के समकालीन था| मस्जिद के इर्द गिर्द मिलने वाली तमाम राजनीतिक सत्य कथाओं में यह भी सुना जा सकता है कि पेरूमल ने मक्का की यात्रा की, पैगम्बर मोहम्मद से मिले और इस्लाम स्वीकार कर लिया| सबसे ज्यादा चर्चित कहानियों में यह भी मिलता है कि जब राजा चेरमण पेरूमल ने इस्लाम कबूल किया तब राज्य की राजधानी  कोदुन्गल्लूर थी|

उस राजा की ओमान में मौत हुई, मौत से पहले उसने मालाबार के शासकों को चिट्ठियां लिखीं और अपने एक मित्र के हाथों भेज दीं| इन चिट्ठियों में स्थानीय राजाओं को तमाम जगहों पर मस्जिद बनाने की इजाजत दी गयी थी|

आश्चर्यजनक रूप से उसकी वापसी पर बननेवाले सभागृह रूपी मस्जिद इलाके के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है, हजारों सालों से मौजूद यह पवित्र जगह अधिकांश लोगों के लिए विद्या की देवी को समर्पित है| किसी समय एक बेमिसाल मंदिर रही यह खास ईमारत अरथली को समर्पित है, जो कि शारदा का ही एक रूप है| इस मंदिर की संरचना 1987 तक यथावत रही, उसके बाद इसका जीर्णोद्धार करके मीनारों सहित एक नए मस्जिद के रूप में बदल दिया गया| सऊदी राजा को दिया गया तोहफा उसी मस्जिद या मंदिर की एक कलाकृति थी जिसे बाद में एक इस्लामी सभाग्रह में बदल दिया गया|

मंदिर में मौजूद मुख्य दीपक एक सोलह सौ साल पुराना अखंड दीपम है जो आज भी प्रज्ज्वलित होता है| केरल के तमाम परंपरागत परिवार आज भी अपने बच्चों को अक्षरभास्य या वर्णाक्षरों की शुरुआत के लिए वहां लेकर जाते हैं| जहाँ दुनिया भर के सभी मस्जिदों का मुहं मक्का की ओर होता है वहीँ इस मस्जिद/मंदिर का मुहं पूर्व की ओर है क्योंकि वास्तविकता में यह ईमारत एक मंदिर ही हुआ करती थी| मस्जिद की आतंरिक बनावट में आज भी हिन्दू चिह्न मौजूद हैं, दीपक जैसी आकृतियाँ जो अक्सर हिन्दू मंदिरों में ही मिलती हैं, मस्जिद के अन्दर आज भी यथावत है|

वहां मौजूद जलाशय मंदिर में मिलने वाली परंपरागत संरचनाओं का एक जीता जगता प्रतीक है| सवाल है कि मंदिर में मौजूद अर्थली और दूसरी प्रतिमाओं का क्या हुआ? उन्हें तोड़ दिया गया या देश के बहार बेच दिया गया? मोहम्मद ने किसी को जबरन धर्मान्तरण के लिए नहीं कहा ऐसे में यह सोच से परे हो जाता है कि उनके शिष्यों ने प्रतिमा को बाहर कर दिया और उस पर भी वहां की धार्मिक जनता ने कोई विरोध नहीं किया! ऐसे में यह पूरी कहानी संदिग्ध नजर आती है|

हालाँकि इस कहानी के व्याख्याकारों ने तत्कालीन आर्थिक सामाजिक कारणों का हवाला देकर सच्चा करार दिया है| इसी कड़ी में इतिहासकारों ने भी नम्बूदरी ब्राह्मणों की क्रूरता को हिन्दू परंपरा के विघटन का जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन यह व्याख्या ब्रिटिश कूटनीति के “फूट डालो और राज करों” की परंपरा के उस पहलू को ही उजागर करती है जिसमे उच्च शिक्षित वर्ग को बदनाम करने की साजिश ब्रिटिश साम्राज्य की रणनीति का एक हिस्सा रही| इस कूटनीति के चलते देश के शिक्षित वर्ग की समाज में जरुरत और महत्वपूर्ण योगदान वाले तथ्यों को दरकिनार कर दिया गया| ऐसा किये बगैर हिन्दुस्तानी मानस पर नियंत्रण करना संभव न था|

यह सच हो सकता है कि लोग शोषण से तंग आ गए हों और इस्लाम क़ुबूल करके मंदिर और मूर्तियों का विनाश करने लगे हों| अगर इस सच को स्वीकार कर भी लिया जाए तो लोगों का यह विरोध नम्बूदरी समाज के खिलाफ होना चाहिए था न कि मूर्तियों और मंदिरों के खिलाफ! और अगर मंदिरों का विनाश करना ही था तो पूरा मंदिर टूटता जबकि मंदिर के कई हिस्से अभी तक यथावत मौजूद हैं| लगता है कि इन कहानियों को जल्दबाजी में रचा गया! एक सम्भावना यह बनती है कि मंदिर के ऊपर मस्जिद बनाने का आदेश इसलिए किया गया हो ताकि इस्लाम का अस्तित्व शंकराचार्य जैसे सुधारकों से भी पहले का साबित किया जा सके, ताकि इस्लाम को दुनिया के दूसरे धर्मों से बेहतर साबित किया जा सके!

अंग्रेज इतिहासकारों के ऐसे भी दावे हैं कि जिस जगह आज मस्जिद मौजूद है वहां कभी बुद्ध विहार हुआ करता था| चूँकि केरल में बौद्ध धर्म पहले ही ख़त्म हो चूका था इस लिहाज से यह जगह अरब व्यापारियों के नए मजहब के नाम हो गयी| अगर यह बुद्ध विहार होता भी तो वहां बुद्ध की प्रतिमा या मूर्ति होनी चाहिए जो कि विहार क्षेत्रों में अमूमन मिलती है| क्या परिसर में कोई बुद्ध की मूर्ति कहीं मौजूद है? या बुद्ध प्रतिमा भी नष्ट कर दी गयी अथवा विदेशों को बेच दी गयी? ज्ञात स्रोतों के मुताबिक केरल में बौद्ध धर्म बारहवीं शताब्दी तक फला फूला!

दुसरे किस्सों में यह भी बताया जाता है राजा चेरमण पेरूमल ने खुद ही इस ईमारत को मंदिर से मस्जिद बनवा दिया वो भी खुद अपनी कपोल कल्पनाओं के आधार पर!

मंदिरों के तोड़े जाने पर छाती पीटने वाले लोगों की बुद्धिमानी पर अचम्भा मानिये, एक ऐसा मंदिर मिल जाए जिसे तोडना तो दूर छुआ तक न गया हो, मस्जिद बन गया हो उसका नमूना सउदियों को नजराने में देते हैं! शायद एक गलत और झूठे तथ्य की राजनीतिक सत्यता स्थापित कर सकें| हिन्दुस्तानी हुकूमत के नजराने में सउदियों को मिली यहीं भेंट ब्रटिश हुक्मरानों की भी राजनीतिक सच्चाई बयां करती है| हिंदुस्तान के इतिहास को तहस नहस करने वाले अंग्रेज नौकरशाहों के सामने हिन्दुस्तानी जमातों को “बाँटने और राज करने” के लिए इतिहास को गोल मोल करने का जो सिलसिला चलाया वही आज की हिन्दुस्तानी हुकूमत की सरकारी तहजीब है|

लेकिन आम आदमी की नजर से देखा जाए तो क्या इतने विवादों वाली मस्जिद का नमूना भेंट करना निहायत जरुरी था? जो इतिहास साबित न हुआ हो उसे सच दिखाने के लिए? क्या हिन्दुस्तानी हुक्मरानों को कोई और तोहफा नहीं मिला जो सउद के राजा को हिंदुस्तान की बेमिसाल विरासत की नजीर के तौर पर दिया जा सके?

या फिर ये तोहफा सउद के राजा अथवा वहाबी इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की मंशा की राजनीति के तहत दिया गया, वो भी किसी भी कीमत पर? या फिर इस करामात के पीछे कोई और मंशा थी? इस जाहिलियत की वजह क्या है? हमारी अपनी सरकार केरल के एक विवादित मंदिर/मस्जिद का मॉडल तोहफे में देकर बाकी देश को क्या सन्देश देना चाहती है?  वो भी ऐसी मस्जिद जो एक प्राचीन मंदिर पर बनी हो? क्या नौकरशाहों को इस मस्जिद का तोहफा देने से ज्यादा बेहतर नजीर नहीं मिली जो हिंदुस्तान की बेमिसाल साझी विरासत दिखा सके? क्या ऐसे नजीरों से दुनिया में हमारी छवि नहीं बनती बिगडती? क्या दुनिया हमारे नेतृत्व की ऐसी कुटिल छवि पसंद करेगी? क्या ऐसी छवि से देश की साख को बट्टा नहीं लगेगा? इतने विवादित मस्जिद की नजीर देकर हिन्दुस्तानी इतिहासकारों की बेहूदगी, असल की खोज में नाकामी, दिखाने की बजाये उस विरासत की नजीर दिखा पाते जो पूरी दुनिया के ज्ञान का केंद्र रही है! वह केंद्र जो दुनिया के हर मामले का हल करने की काबिलियत रखता है|

क्या यह बाकी दुनिया के लिए हिन्दुस्तानी नेतागिरी की बेहूदगी साबित नहीं होगा? क्या हम खुद को जाहिल और बीमार गुलामो की तरह नहीं पेश कर रहे?

चेरमण पेरुमाल के होने या न होने के भी विवाद हैं और उसके मक्का जाने के भी| उसके धर्मान्तरण की भी कहानियां हैं और उस मंदिर को मस्जिद बनवा देने की भी| चार सौ साल में एक से ज्यादा चेरमण पेरुमाल होते रहे हैं| हिंदुस्तान पर हमलावर हर देश के इतिहासकार ने उसके धर्मान्तरण का किस्सा लिखा है (कुछ तो कहते हैं कि चेरमण पहले क्रिस्चियन बना)| और फिर चेरमण शब्द किसी राजा का नाम नहीं बल्कि एक उपाधि है, ऐसे तमाम किस्से मिलते हैं|

अगर हम इस्लामी हमले का शोर मचाते हैं तो फिर यह कैसे इनकार कर सकते हैं कि मालाबार के राजा के राज्य में एक प्राचीन मंदिर के अलावा और कोई कुंवारी जगह नहीं थी|

हम राममंदिर की बात करते हैं बाबरी मस्जिद के विवाद को जिन्दा करते हैं राजनीतिक मकसद के लिए, हम इतनी आसानी से कैसे मान जाते हैं कि एक मंदिर का भी मस्जिद में धर्मान्तरण होता है? क्या हिंदुस्तान के हुक्मरानों ने अंग्रेजी हुकूमत से सिर्फ “फूट डालो और राज करो” भर ही सीखा है? या फिर इस देश की हर चीज राजनीतिक शतरंज की बिसात पर एक सिक्के भर की है?

हम अंधभक्ति में स्वीकार कर जाते हैं कि इस्लामी शासकों ने हमारे हर प्राचीन मंदिर को तोडा और बरबाद किया|  हम यह भी मान लेते हैं कि हमारे वेद-पुराणों के इतिहास के लिए अंग्रेजों ने जो लिखा वही सच है| हम वेद और पुराणों को काल्पनिक मान लेते हैं| हम यह भी मान लेते हैं कि महज सत्रह साल के लड़के मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर कब्ज़ा महज इस बात के लिए किया कि सिंध के कब्जे से एक अरबी महिला को छुड़ाया जा सके| जबकि ये भी पक्का नहीं कि सिंध का राजा दाहिर ब्राह्मण था या समुद्री डाकू!

इस कपोल कल्पना में क्या हमे उनकी फूट डालो और राज करो की मंशा नजर नहीं आती? क्या ऐसे ही लोगों के हाथ में पड़कर इतिहास उनके निजी स्वार्थों के हिसाब से बनता बिगड़ता रहता है?

यह भी अजूबा किस्सा है कि सिंध पर कब्ज़ा करके कासिम बगदाद पंहुचता है जहाँ उसे गिरफ्तार करके बंधक बना लिया जाता है और मार दिया जाता है|  अरब में मिलने वाले ऐतिहासिक दस्तावेजों में मोहम्मद की मौत के बाद के सभी घटनाओं को सावधानी से सहेजा गया है| उन दस्तावेजों में यह कहीं नहीं मिलता कि उनका कासिम ने कभी अरब को छोड़ा| अरब और फारसियों के बीच तमाम झगडे हुए| उनको सहेजकर मौजूद साहित्य में, ईरान के दस्तावेजों में कासिम के किसी झगडे का जिक्र नहीं| मौजूद दस्तावेज कासिम नाम के किसी भी चरित्र का इतनी बड़ी सेना लेकर फारस में जाने की कोई जानकारी नहीं देते| जबकि फारसियों ने अरब को झुलसाकर खोजबीन करने की करतूत की थी, यही उनकी अरब के लिए विदेशनीति थी| और अरब तो बारहवीं शताब्दी तक ईरान और सिन्धु नदी पार न कर सके|  जबकि हम ये मानते हैं कि मुल्तान का आदित्य (सूर्य) मंदिर दूसरे मंदिरों की तरह ही लूटा गया| लेकिन ये भूल जाते हैं कि किसने, और कब और किसलिए और कैसे बरबाद किये गए?

इसी तरह हम ये भी आँखें बंद करके स्वीकारते हैं कि शब्दराज चेरमण पेरूमल ने पूरी प्रजा को धर्मान्तरण के लिए मजबूर किया और पूरी कोदुनगल्लुर की प्रजा ने मिलकर अर्थली के प्राचीन मंदिर को मलिक बिन दीनार को दान किया, वो भी एक मस्जिद बनवाने के लिए, ताकि इस्लाम का प्रचार हो सके| जबकि पैगम्बर के ही शब्द हैं कि किताबी या किताब के लोगों को न छेड़ा जाए| हमे मानना पड़ेगा कि राजा या तो पागल था या फिर लोग बेवक़ूफ़ थे जिन्होंने मंदिरों को मस्जिद में बदल जाने पर कोई विरोध तक नहीं कीया| या फिर दोनों! यही लोग और राजा मार्तंड वर्मा के शासन में एक हजार सालों बाद डच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नौसेनिक बेड़ों को हराते हैं| राजा मार्तंड वर्मा के शासन में डच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियों पर जीत का एक डाक टिकट भी जारी किया है| हजार सालों बाद हारी हुयी कंपनियां आज देश के कोने कोने में फ़ैल चुकी हैं|

हम मानते हैं कि हिंदुस्तान के इतिहास की बरबादी एलियट का सफल प्रयास है, जो उसी के मुताबिक दुनिया की सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं और नैतिक मूल्यों को नष्ट- भ्रष्ट करके रख देगा| ऐसा ही तरकीब एलन डुलस ने सोवियत संघ को बरबाद करने के लिए अपनाई| सौभाग्य से वे अपनी हालत से उबरने में कामयाब हो गए| लेकिन हम हिन्दुस्तानी इतने अंधे बन गए कि मिलने वाली किसी भी चीज के लिए बेसुध हो गए|

अपनी शिक्षाओं और परम्पराओं को नकार के जाहिल बन बैठे| हमारी प्राचीन शिक्षाए मिलने वाली पूरी सभ्यता को हर चीज पर गहरे मौलिक सवाल करने लायक बनाती रही हैं| सारी शिक्षाओं में शैलियों के साक्ष्य और कहने सुनने की तमाम तकनीकें मौजूद हैं|

भूतकाल से वर्तमान तक हम अपने औपनिवेशिक मालिकों के किस्सों पर अंधभक्ति करके भरोसा करते रहे, उम्मीद हैं कि हम जल्द ही अपनी सोचने समझने की क्षमता दोबारा हासिल करेंगे| हम यह स्वीकार करते रहे कि हमारी अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता निराधार और अतार्किक है तथा क्रिश्चियनिटी और इस्लाम के मूल्य ही सत्य और दयालुता के प्रतीक हैं| इन मजहबों के खिलाफ शोर मचाते हुए दैनिक जीवन में भी हम उन्ही के सिद्धांतों का अनुकरण और अनुसरण करते हैं|

भूतकाल से वर्तमान तक हम अपने औपनिवेशिक मालिकों के किस्सों पर अंधभक्ति करके भरोसा करते रहे, उम्मीद हैं कि हम जल्द ही अपनी सोचने समझने की क्षमता दोबारा हासिल करेंगे| हम यह स्वीकार करते रहे कि हमारी अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता निराधार और अतार्किक है तथा क्रिश्चियनिटी और इस्लाम के मूल्य ही सत्य और दयालुता के प्रतीक हैं| इन मजहबों के खिलाफ शोर मचाते हुए दैनिक जीवन में भी हम उन्ही के सिद्धांतों का अनुकरण और अनुसरण करते हैं|

चेरमण के किस्से में भी समयकाल का फर्क दो सौ वर्षों का है| इस तरह की गलतियों में तारीखों का कोई हिसाब किताब और कलाकृतियों का कोई औपचारिक संग्रह नहीं होने का है|

इन तथ्यों में इतिहास की यह दुर्गति सामने है| इन घटनाओं का समय से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है| आज सभी तकनीकें हाथ में होते हुए भी आजाद मुल्क की मेधा और आजाद सरकार महिषमर्दिनी की मूर्ति की तारीख के सम्बन्ध में कोई ठोस और वैधानिक निष्कर्ष निकालने की हालत में नहीं| न ही यह तय करने में कि यह मूर्ति पुलवामा कैसे पहुंची, कैसे हिंदुस्तान के बाहर गयी, किसने चुरायी, किसने बेचा, किसने ऍफ़आईआर दर्ज करवाई और उसमे आधे अधूरे दस्तावेजों के बावजूद यह मूर्ति हिंदुस्तान क्यों लाई गयी?

कुछ ऐसा ही वाकया हुआ गाँधी के चश्मे और कलम के बारे में भी जो कि हिन्दुस्तानी कब्जे से निकलता है और वर्ष 2010 में अचानक क्रिस्टी के नीलामी घर में नजर आता है|  इतने सालों तक ये चीजें कहाँ थीं? उन्हें वापस क्यों नहीं लाया गया? क्या यह हिंदुस्तान की अमानत नहीं? हिंदुस्तान आज भी रोबर्ट क्लाइव का सम्मान करता है, हमारे म्यूजियम में उसकी औपनिवेशिक कलाकृतियों का जखीरा भरा पड़ा है लेकिन क्या हमे अपने उन नेताओं की परवाह नहीं जिनके संघर्ष से हमे आज़ादी मिली? ये चीजें हिंदुस्तान से बाहर कैसे निकलीं? किसी ने राष्ट्रपिता से जुडी इन चीजों कलम और ऐनक को कैसे चुराया और पचास सालों बाद लाखों डॉलर में उनको बेचने का कारोबार किया? उनको हिंदुस्तान के अग्रणी नेता से क्या वास्ता और अहम् बात तो ये भी है कि हम खुद अपनी चीजों और अपने नेताओं के बारे में सोच क्यों नहीं पा रहे?

हाल के सालों में एक अजीब वाकया हुआ, सुब्रह्मण्यम स्वामी ने हिंदुस्तान से प्राचीन कलाकृतियों की चोरी का मामला दर्ज करवाया जिसमे दावा किया गया कि ये कलाकृतियाँ हिंदुस्तान से तस्करी करके मिलान के दो केन्द्रों  में बेचीं जा रही थीं| इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद जब सीबीआई को मामले की जांच करने का आदेश हुआ तो न जाने किन कारणों के चलते सीबीआई अधिकारियों ने रिपोर्ट लगा दी कि इटली में ऐसे कोई स्टोर नहीं और आगे की जांच बंद हो गयी|

आज जब इक्कीसवीं सदी के आजाद हिंदुस्तान में ऐसी दुविधाएं हैं जिनका समाधान नहीं तो गौर करिए कि पहले की परिस्थितियों में क्या हाल रहा होगा? हमारे लिए छोड़ा गया इतिहास ऐसी दुविधाओं का एक पुलिंदा भर है! क्या यह इतिहास गलत होते हुए भी भूराजनीतिक मकसदों को सजाने वाला नहीं ? आजाद होते हुए भी हमारा देश क्या इन गलतियों से सबक लेकर सुधार पाने की हालत में नहीं? क्या ऐसी कलाकृतियों स्मारकों और दस्तावेजों पर गंभीर अनुसन्धान करके हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना कतई संभव नहीं? ऐसे में एएसआई की क्या भूमिका जो हिंदुस्तान में मौजूद पुरातात्विक अवशेषों सबूतों से सीरियस रिसर्च करने में सक्षम नहीं? ऐसी जाहिलियत किसलिए? भारत के स्वर्णिम अतीत का दावा करते हमारे नेता उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करते? अंग्रेजी हुकूमत से चल रही कलाओं की तस्करी के बावजूद हम पश्चिमी देशों की चालों को समझ पाने या सवाल करने की हालत में क्यों नहीं हैं?

इन प्रतीकों में भारतीयों की सांस्कृतिक विरासत एक अहम् बात रही जिसके चलते अंग्रेजी हुकूमत ने हर चीज को बरबाद करके छोड़ा, क्योंकि ये प्रतीक राष्ट्रिय गौरव की याद दिलाते हैं| ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान के इतिहास को लेकर अग्रेजों की न तो समझ साफ़ है, न ही मानवता के इतिहास पर भरोसा| अपने पूर्वाग्रहों को बनाये रखते हुए उन्होंने हिंदुस्तान की सोच का भी “सुधार” करने की कोशिशें लगातार की हैं| अपनी श्रेष्ठता के इसी पूर्वाग्रह के चलते उन्होंने शाश्वत सनातन भारत के इतिहास को पांच हजार सालों में समेट दिया और इस समय सीमा के इतर होने वाली बातों को मिथक या ख्याली पुलाव तक करार दे डाला| लेकिन हिंदुस्तान और इसकी संस्कृति का आकार इतना बड़ा कि वे कामयाब नहीं हुए| कोई भी स्रोत या कलाकृति मिलती है और उसकी डेटिंग और उसके ज्ञान का पता चल जाएगा तो पिछले दो सौ साल की पढाई बरबाद हो जाएगी| मजे की बात तो ये है कि हिंदुस्तान में निरर्थक कहा जाने वाला ज्ञान तमाम देशों में ले जाकर संभाल कर रखा जाता है| और जो कुछ भी लेकर जा नहीं सके उसको बरबाद कर दिया गया| इसका सीधा अर्थ यह है कि सिर्फ इसको बरबाद करना मकसद नहीं, बल्कि वो चाहते हैं कि ज्ञान के अमूल्य स्रोत हिन्दुस्तानियों को न मिल सकें| उनके मुताबिक यही तरीका है किसी गुलाम देश का पश्चिमी सांचे में विकास करने का! उनका ये भी मानना है कि ऐसा होता रहा तो भविष्य में कोई भी भारतीय अपनी “आदिम और असभ्य” संस्कृति का दावा नहीं कर सकेगा|

उनको ये स्वीकार करना कभी गवारा नहीं रहा कि उनके अश्वेत भारतीय ज्ञान और मेधा में उनसे आगे रहें| मुल्क आजाद होने के बाद भी हमारे नेतृत्व के लिए इस विनाश से बचना संभव नहीं रहा क्योंकि आज भी महज चार​ डॉलर्स के लिए बेशकीमती कला बेचना या तस्करी करना जारी है|

हिन्दुस्तानी जनता हर मामले में गुमराह क्यों होती रही? क्या हमारे देश के नेतृत्व ने जानबूझ कर जनता को दुविधा में रखा?

यह हर जिम्मेदार हिन्दुस्तानी की जिम्मेदारी है कि वह सोच-विचार करे और अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा रचे  हर इतिहास पर सवाल करे| “दो तोहफों का किस्सा” अंग्रेज के रचे ऐसे ही इतिहास की पोल पट्टी खोलता है, दुविधा और भावनाओं में बहकर गुमराह होने वाले देशवासियों के लिए यह चर्चा आँखें खोलने का काम करेगी| कोई भी धार्मिक या सांस्कृतिक संगठन इस सच को खोजने का काम नहीं कर रहा, क्योंकि देश का अक्षम नेतृत्व सेवा की बजाये शासन करने के मजे लेने में व्यस्त है| नतीजा ये निकलता है कि हमारा देश जाहिलियत के समुद्र में डूबने को तैयार बैठा है| ऐसे में जब देश किसी खरगोश का पीछा भावुक होकर करने लगे समझदार लोगों को दिलोदिमाग खोल कर भावनाएं भड़काते नारों की अंधभक्ति छोडनी ही होगी और ज्यादा गंभीरता से समझने काम लेना होगा|

 देश काल परिस्थितियों के आकलन में समाज को गुमराह करने वाली ताकतों के बारे में

देश काल परिस्थितियों के आकलन में समाज को गुमराह करने वाली ताकतों के बारे में कहना जरुरी हो गया है| मूल रूप से यह ब्रिटिश, चर्च, फ्री मेसोनिक व्यवस्था और फ्रांसीसियों के बीच की लड़ाई है, जिसको हमारा देश भारत भुगत रहा है|

मनोविज्ञान समझने का एक सिद्धांत है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है| जिस समाज में हम रहते हैं उसमे मौजूद लोग, घर-परिवार, बड़े-बुजुर्ग, सामाजिक प्रतिष्ठा वाले लोग सब मिलकर हमारी सोचने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं| हिंदुस्तान में आज भी लोग समाज विरोधी गतिविधियों का दिखावा नहीं करते, लेकिन पश्चिम की व्यक्तिवादी धारणाओं ने दुविधा पैदा कर दी है|

हम भारतीयों को यह भी समझना होगा कि पश्चिम के नितांत व्यक्तिवादी उनके समाज की सहज प्राकृतिक व्यवस्था नहीं| बल्कि यह स्थिति चर्च द्वारा उनकी शिक्षा व्यवस्था के साथ सौ सालों से जारी छेड़छाड़ से बनी है| यह हालत चर्च और उसके दुश्मनों प्रथम दृष्टया फ्री मेसोनिक व्यवस्था के बीच संघर्ष से पैदा हुई है| यह सांप छछूंदर की लड़ाई है जिसमे दोस्त दुश्मन बदलते रहे हैं|

इस व्यवस्था में यूरोप के युवा मानस के नियंत्रण की कोशिशें दो तरीके से की जा रही हैं| १. सीमित विचारों और क्षमताओं को रोपना और सूचनायें बदलकर विचारों को तोडंना-मरोड़ना| २. सुचना ग्रहण करने की प्रक्रिया को गुमराह करना और सच्चाई और वैधता को बिगड़ना|

इस दूसरे तरीके के चलते बड़ी संख्या में हमारे विद्यार्थी सामाजिक अध्ययन को निरर्थक मानते हैं क्योंकि उनको मिलने वाली सूचनाएं समाज की सच्चाई से जुदा हैं और मन मष्तिष्क के लिए इनको सच मान लेना संभव नहीं|

इसलिए उनका नियंत्रण चार प्रक्रियाओं पर होता है, पब्लिक स्कूल सिस्टम, प्रिंटिंग, पब्लिक के बीच चर्चा-परिचर्चा और इस प्रकार से सरकार और प्रेस|

गौरतलब है कि फ्री मेसन द्वारा चर्च पर हमले की रणनीति के जानकारों ने चर्च और ब्रिटिश को मिलाकर भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर डाली| इसकी शुरुआत हुई फ़्रांस की क्रांति से| फ्रांसीसियों ने चर्च द्वारा थोपे गए सिद्धांतों को स्वीकार नहीं किया क्योंकि समय और अंतरिक्ष की उनकी धारणाओं का सीधा सम्बन्ध भारत से था| यह फ़्रांसीसी क्रांति की मूल वजह थी जिसमे नेपोलियन का उदय हुआ जिसने पोप की घोषणा के विरोध में खुद को राजा घोषित किया|

लेकिन अगर उसके सिद्धांतों से व्यवस्था बनती तो चर्च का अब तक बरबाद होना तय था| ऐसा न होने की वजह रही कि चर्च ने लड़ाई में वापसी की| इस लड़ाई की युद्ध भूमि बना भारत और अमेरिका| चर्च की गिरफ्त में आने पर अमेरिका में नितांत व्यक्तिवादी सिद्धांत बढे| अमेरिका का कॉर्पोरेट मीडिया इन्हीं सिद्धांतों का एकांगी प्रसारण करता है| हिंदुस्तान में लड़ाई ने दूसरा मोड़ लिया| तत्कालीन विश्व में हिंदुस्तानी ज्ञान सम्पदा का विशाल भण्डार मौजूद रहा| इसलिए यहाँ ब्रिटिश ने चर्च के साथ मिलकर सारी ज्ञान सम्पदा को नष्ट करने का काम किया|

हिंदुस्तान में हर चीज को बकवास बताकर भारतीय मानस को बौद्धिक रूप से पंगु बनाना अंग्रेजों की चाल थी| हिंदुस्तान में अंग्रेजी राज के बहुत पहले से भारत के फ़्रांस से व्यापारिक सम्बन्ध रहे, फ्रांसीसियों ने अंकगणित, विज्ञानं और औषधि विज्ञानं के तमाम साहित्य का अनुवाद भी किया| इससे समाज में अंकगणित और विज्ञानं की अहमियत समझ में आई| खास असर ये रहा कि उन्होंने ईसाइयत की कहानियों में तारीखों और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की अवधारणाओं की अवैज्ञानिकता के बारे में जाना|

फ़्रांस में धर्म की धोखाधड़ी को वैज्ञानिक तरीके से दरकिनार किया गया| क्रांति के दौरान समाज को जोड़ने वाली ताकत के रूप में क्रिश्चियनिटी को दरकिनार करके हिन्दुस्तानी ज्योतिष का सहारा लिया| वोल्तिरे से लेकर अन्य तमाम विद्वानों ने इस चलन को ठोस धरातल के रूप में अपनाया, जिसके बाद फ़्रांस की क्रांति बौद्धिक उपलब्धियों और आत्म ज्ञान के साथ बराबरी, आज़ादी और भाईचारे के नारों के साथ परवान चढ़ी| चर्च से गणतंत्र होने की इस घटना से कैथोलिक संप्रदाय की नींव हिल गयी| इससे ब्रिटिश और कैथोलिक चर्च के बीच बेमेल साझेदारी बनी जिसमे फ्रांसीसियों और नवजात जर्मनी की राज्य की व्यवस्था में ज्ञान की अवधारणा को नाकारा जा सके| चर्च और अंग्रेजों की कवायद रही कि चर्च के पूर्वाग्रहों के खिलाफ बने जनमत को कैसे झुठलाया जा सके|

प्राचीन ज्ञान को नकारने के लिए ब्रिटिश ने कैथोलिक चर्च के साथ समझौता किया जिसके बदले में भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापारिक प्रतिद्वंदिता ख़त्म की गयी| वर्ष 1785 की शुरुआत में अंग्रेजों ने एक व्यवस्थित तरीका अख्तियार किया ताकि भारत को बौद्धिक, अध्यात्मिक और मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा सके| यह तकनीक मैकाले के ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिए गए प्रस्ताव से बहुत पहले ही ईजाद कर ली गयी थी| और 1815 में वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन की हार के साथ अंग्रेजों ने फ़्रांस की भारत में मौजूदगी ख़त्म कर दी|

हिन्दुस्तानियों को यह भी ख्याल करना चाहिए कि यूरोप महाद्वीप के सभी देशों ने ब्रिटिश को हमेशा बर्बर माना और उनको सभी सभ्य गतिविधियों से बाहर ही रखा| अब ब्रिटिश बाकी यूरोप को दिखाना चाहते हैं कि वे भी सभ्य बनाने वाले, विज्ञानं के पक्षधर और तरक्कीपसंद हैं| इसके लिए ब्रिटिश और चर्च ने एक नापाक समझौता किया| गौरतलब है कि चर्च ने फ़्रांस की क्रांति करवाई जो फ़्रांसिसी पुनर्जागरण की वजह से हुई, जिसका आधार रहा फ़्रांस को भारत से मिला ज्योतिष का ज्ञान|

इस नापाक समझौते की शर्तों में यह भी शुमार हुआ कि अगर ब्रिटेन किसी भी तरीके से फ़्रांस को ठिकाने लगाने में कामयाब होता है और चर्च को फ़्रांस से होने वाले खतरे से बचाता है तो ब्रिटेन को साम्राज्य में शामिल कर लिया जायेगा और उसे बर्बर नहीं माना जायेगा| इसी नापाक समझौते के चलते हिंदुस्तान में हम देखते हैं कि… ज्योतिष ही चर्च के लिए प्रमुख खतरा रहा जिसकी नजीर फ़्रांस की क्रांति है… वे सभी यूरोपियन जो विद्वान के रूप में वेद पढने आये वे सभी कैथोलिक थे, और उनके ब्रिटिश कंट्रोलर और फाइनेंसर्स प्रोटोस्टेंट|

इस प्रकार ब्रिटिश ने दो तरफ़ा रणनीति अपनाई| पहली फ़्रांस में सैन्य आधिपत्य और दूसरी उस स्रोत को नष्ट करना जिससे फ़्रांस की क्रांति हुई| इससे हिंदुस्तान में ज्ञान स्रोतों की बरबादी शुरू हुई|

भारत में ज्ञान सम्पदा की बरबादी चार चरण की नीति रही| पहले चरण में सभी अध्ययन केन्द्रों की वित्तीय व्यवस्था नष्ट करना| दूसरा सभी पांडुलिपियों को हिंदुस्तान से बाहर ले जाना| ज्योतिष वेधशालाओं, मंदिरों, वैज्ञानिक नजीरों को लूटना और धुल में मिला देना (साथ ही इसका आरोप मुसलमानों पर लगाना ताकि आपसी लड़ाई जारी रहे और अंग्रेजों की लूट का एहसास तक न हो सके) ताकि आने वाली पीढ़ियों को आभास ही न हो कि इतिहास में उनकी स्थिति क्या रही|

उन्होंने भारतीय सभ्यता के सारे कालक्रम को 2000 से 3000 सालों में समेट दिया|उन्होंने सारे ऐतिहासिक दस्तावेजों को इस तरीके से बिगाड़ा कि सारा ज्ञान भौगोलिक तौर पर ब्रिटिश भारत में ही सीमित हो जाये| चुराई गयी उन हजारों पांडुलिपियों अभिलेखागारों, पुस्तकालयों, जन शिक्षण को अपने कब्जे में करके उन्होंने सिर्फ 636 पुस्तकों को प्रकाशित किया| इन 636 पुस्तकों में उनका दावा यह रहा कि भारतीय सभ्यता किसी काबिल नहीं| इन 636 पुस्तकों से ईसाइयत के विचारों को भारतीय मानस में भरने का काम शुरू हुआ, नया धर्म बना कर| इस नए धर्म का नाम हुआ HINDUS : Her Majesty’s Indians, DUmb and Stupid.

पुरे यूरोप महाद्वीप में फ्रेंच और जर्मन लोगों ने भारतीय ज्ञान सम्पदा की बेहिसाब बरबादी का विरोध किया| लेकिन यूरोप के राजनीतिक विघटन में अंग्रेजी तानाशाही का कोई पुख्ता विरोध न कर सका|जब हिन्दुस्तानियों सहित कोई भी विरोध करने में सक्षम नहीं रहा तो अंग्रेजों ने पूरी भारतीय सभ्यता की उपलब्धियों को बाइबिल की तर्ज पर 2000 सालों के काल क्रम में नए सिरे से तैयार किया| इस तरह सारी सभ्यता की समय सीमा 5000 साल मुकम्मल हो गयी|वेदों के प्राचीनतम साहित्य से लेकर हर चीज 2000 साल के इसी काल-क्रम में पुनर्स्थापित किया गया| फिर यह जन शिक्षण द्वारा एक तथ्य बनाकर प्रचारित किया गया| इस तरह बने भारतीय मेधा के वे “बुद्धिजीवी जो सवाल न कर सके”| ज्ञान के स्रोतों के न होने और उनकी खोज न कर पाने के चलते हिन्दुस्तानियों ने सवाल करने की अपनी मौलिक गुणवत्ता समर्पित कर दी और हर उस चीज को कमोबेश स्वीकार करते रहे जो उन्हें पढाई गयी|

यह नया धर्म हिंदुत्व पूरी तरह वर्गीकरण और शोषक साबित हुआ जिससे सवाल न करने वाली जाहिलियत सभी स्कूल जाने वाले बच्चों और महिलाओं के दिमाग में भरी गयी| यही जाहिलियत गुलामी की ओर गिरावट का सबब बनी|

भारतीय समाज की बरबादी महिलाओं की स्थिति बेजार होने से और भयावह होती चली गयी| अंग्रेजों ने महिलाओं की गैर बराबरी को हवा दी और संपत्ति और उत्तराधिकार का कानूनों को पुरुष प्रधान बना दिया| इससे महिलाओं की समाज में स्थिति बच्चा पैदा करने की मशीन या पुरुषों पर निर्भर वस्तु जैसी हो गयी और उनका जीवन समाज के सभी दायरों से अलग हो गया| यह ईसाइयत के विचार जैसा ही कानून था|

प्राचीन साहित्य से शिक्षा का कोई रास्ता बाकी नहीं रहा तो परंपरागत शिक्षण केंद्र नष्ट हो गए| हिन्दुस्तानी मानस दो विरोधी ध्रुवों के बीच फंस गया जिसमे एक तस्वीर थी महिलाओं के दैवीय गुणों की तो दूसरी स्याह तस्वीर में महिलाएं यौन सेविकाएँ नजर आती थीं| इस तरह हिंदुस्तान में महिलाओं की चुप्पी से पुरुष प्रधान समाज ईजाद हुआ|ब्राह्मण विधवा रानी लक्ष्मीबाई के अंग्रेजों के सबसे शातिर जनरल ( कार्नवालिस) से लड़ने के उदहारण बावजूद पिछले पचास वर्षों में महिलाओं का स्तर गिरते गिरते गृहस्थी का भार ढोने वाली सेविका तक सीमित होकर रह गया|

शुरुआती दौर में अंग्रेजों की भूमिका व्यक्तिगत चल अचल संपत्तियों को हड़पने की रही| बारहवीं शताब्दी में याज्ञवल्क्यस्मृति के एक सूत्र मिताक्षरा का सहारा लेकर पचास प्रतिशत की आधी आबादी का संपत्ति में अधिकार समाप्त कर परिवार के पुरुष सदस्य को दे दिया गया| उसके बाद बहु विवाह और बहुपत्नी प्रथा को समाप्त करके एक पुरुष एक पत्नी की परंपरा को राष्ट्रीय वैधता दे दी गयी| इस कानून के तहत निःसंतान दम्पत्तियों को बच्चा न होने पर दूसरा विवाह करना अवैध करार दिया गया क्योंकि ऐसा करना ब्रिटिश कानून में विधिसम्मत नहीं था| ऐसा करते हुए वही अंग्रेज या भूल बैठे कि पंद्रहवीं शताब्दी के राजा जेम्स ने खुद को कैथोलिक चर्च से इसलिए अलग कर लिया और अपनी खुद की बाइबिल बनाई क्योंकि कैथोलिक चर्च ने उस राजा की तीसरी पत्नी को वैधानिक दर्जा देने से मना कर दिया था|

इसी कानून के तहत कोई संतान न होने पर राजा या रानी की संपत्ति ईस्ट इंडिया कंपनी को मिल जाती थी| प्राचीन भारत के गोद लेने के सभी कानून नकार दिए गए और गोद लेने के किसी भी मामले में ब्रिटिश अनुमति कानूनन जरुरी कर दी गयी| अगर कोई संपत्ति नहीं थी तो गोद लेने की कोई दिक्कत नहीं लेकिन संपत्ति होने की दशा में गोद लेने की मंजूरी नहीं थी| यही कानून सभी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के लिए भी बरक़रार रहा| वैध उत्तराधिकारी होने पर संपत्ति यथावत रहती थी लेकिन वैध उत्तराधिकारी न होने की दशा में संपत्ति चली जानी थी| इन्ही कानूनों के चलते रानी लक्ष्मीबाई को विद्रोह करना पड़ा| तमाम धार्मिक और अध्यात्मिक संस्थानों ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया या फिर रिश्वत देकर अपनी संपत्तियां बचाईं, साथ ही अंग्रेजी तरीके से अध्ययन और कार्यशैली स्वीकार कर ली| ऐसा ही भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार का शासन हिंदुस्तान में आज भी जारी है| झाँसी विद्रोह के बाद तमाम भारतीयों ने सामुदायिक और औद्योगिक क्षेत्र में अग्रणी वर्गों के साथ स्थापित होना शुरू किया| अंग्रेजों के राज में ही काले धन का किस्सा शुरू होता है| जब राजस्व के रूप में 80 प्रतिशत से ज्यादा लगान लेकर बेहिसाब शोषण शुरू किया तो उनके पास प्रगति के उनके अपने मानक और सिद्धांत थे| कराधान के विषय में प्राचीन सिद्धांत है कि राजा को कर उस तरह लेना चाहिए जैसे सूर्य जलाशयों से जल लेता है और फिर सब पर बराबर बरसता है| ऐसे नैसर्गिक सिद्धांत को दरकिनार करने से प्रजा का बेहिसाब शोषण जारी रहा| आज़ादी के बाद भी ज्यादातर कानून यथावत रहे या फिर ऐसे कानूनों की खेप ईजाद हुई जो अंग्रेजी कानूनों की ही तर्ज पर थे| व्यापारिक घरानों को इन कानूनों से जमाखोरी का सहारा मिला और बेहिसाब काला धन बनाया गया|

आजाद हिंदुस्तान में सरकारों को जब भी पैसे की जरुरत महसूस हुई उन्होंने इन्ही अंग्रेजी कानूनों का सहारा लिया और लोगों को उनके अधिकारों से बेदखल किया| विमुद्रीकरण का हालिया अध्याय अंग्रेजी तर्ज पर की गयी लूट का ही एक नया उदहारण है| जबकि आज हमे विमुद्रीकरण की नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के कानूनों से छुटकारा पाने की जरुरत है ताकि हमे उन आसान संहिताओं के कानूनों से सुरक्षा मिल सके जो अंग्रेजों के पहले हुआ करते थे|

ऐसा नहीं होने से हिन्दुस्तानी मानस को तीन धाराओं के बीच जूझना पड़ रहा है| पहली चुनौती टुकड़ों में मिलने वाले इतिहास की है जो परंपरागत रूप से प्राप्त हो रही है| दूसरी चुनौती है जन शिक्षण व्यवस्था की| तीसरी चुनौती है आज की दुनिया की| इन तीनों में से कोई भी छुपाने योग्य नहीं| हमारी पीढ़ी न देखा कि हमारे दादी नानियों के संपत्ति और पारिवारिक फैसलों में बराबर अधिकार रहे और उनकी बराबरी भागीदारी भी रही| उन्होंने देखा कि कैसे इन अधिकारों के लिए एक विधवा ब्राह्मणी ने अंग्रजों के सबसे काबिल सेनानायक से महीनों लोहा लिया| इसके एक विरोधाभास में हम देखते हैं कि समाज में महिलाओं के अधिकार सीमित हो गए| इसी के एक दूसरे विरोधाभासी घटनाक्रम में हम यह भी देखते हैं कि पश्चिमी परस्त सुधारों के अगुवा महिलाओं को बराबरी देने की वकालत करते हैं| रानी लक्ष्मीबाई, वर्तमान न्यायिक व्यवस्था और जन शिक्षा व्यवस्था के बीच की यह दुविधा या त्रिविधा समाज की महिलाओं के व्यवहारिक नहीं| पहली बात हम साबित नहीं कर सकते इसलिए इसमें पड़ना संभव नहीं, दूसरी बात का नतीजा दर्दनाक हताशा है और तीसरी बात प्रकृति के नियमों के खिलाफ जाती है जो मन स्वीकार नहीं कर सकता जिसकी कोई वजह भी नहीं|

अगर हम अपनी याददाश्त (रानी लक्ष्मी बाई) के आधार पर फैसला करते हैं तो इसे साबित करना मुश्किल है| यह भरोसा कर पाना बहुत मुश्किल है कि अपना राज्य वापस पाने के लिए एक महिला ने अंग्रेज सत्ता को चुनौती दे डाली (इंदिरा गाँधी को एक अपवाद रूप में ले सकते हैं)| अगर वर्तमान न्यायिक व्यवस्था को स्वीकार करते हैं तो इसके साथ जीवन बिताना मुश्किल है क्योंकि यह महिलाओं के उत्पीड़न को चिरकालिक सत्य बना रही है| अगर हम शिक्षा व्यवस्था के आधार पर महिलाओं की स्थिति का आकलन करते हैं तो इतिहास और वर्तमान सच्चाई के बीच बहुत बड़ा फासला नजर आता है|

जैसा भी हमारे स्कूलों में पढाया जाता है उससे यह विरोधाभास और बढ़ता है| इस दुविधा की हालत में हम तात्कालिक परिस्थितियों के मुताबिक फैसले लेकर जीने को मजबूर हो जाते हैं… यह गुलामों की वह स्थिति है जिसमे रोटी कपड़ा मकान भर की कवायद में जिंदगी गुजर जाती है|

जब अंग्रेज ने हिंदुत्व का नया कानून बनाया तो उसी के साथ सुधारवादी और अध्यात्मिक आंदोलनों की धारा भी चली| इस धारा में पनपने वाला राष्ट्रीय स्वाभिमान भी अंग्रेजों को ही फयदा करे यह भी सुनियोजित किया गया| इस धारा में तमाम संस्थान उगे| इन संस्थानों के उत्पाद चाहे हिन्दू रहे हों या मुसलमान सभी एकसमान दुविधा में रहे| इस धारा में तमाम धार्मिक, राजनीतिक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक नेताओं का भी उदय हुआ लेकिन शिक्षा व्यवस्था, प्रेस, परिचर्चा समेत सारे तंत्र पर अंग्रेजी नियंत्रण हो जाने की दशा में सभी दिशाविहीन साबित हुए| सिर्फ वे ही धार्मिक और अध्यात्मिक संस्थान ही जारी रह सके जिन्होंने अपनी कार्यशैली अंग्रेजी राज के समक्ष समर्पित हो गए| उनकी दशा और दिशा भारतीय इतिहास, दर्शन और संस्कृति को अंग्रेजी तरीके से प्रचारित करने भर की बाकी बची|

जिसने विरोध किया उनके संस्थान नष्ट कर दिए गए और सारी तमाम कानूनों के तहत संपत्तियां ईस्ट इंडिया कंपनी ने हड़प लीं| क्या यह कम अचम्भा नहीं कि जब हम इन्ही अध्यात्मिक और धार्मिक संस्थानों का उपलब्ध साहित्य पढ़ते हैं तो उसमे भी भारतीय इतिहास और संस्कृति का काल-क्रम 2000 से 3000 सालों का ही मिलता है जो कि अंग्रेजों ने ही रचा| कुछ ऐसे भी है जो वैज्ञानिक तौर पर 197 करोड़ सालों का भी दावा करते हैं, जिसे भी अंग्रेजों ने ही बढ़ावा दिया लेकिन बाद में इसे गलत भी साबित किया गया क्योंकि यह पृथ्वी की कुल आयु सीमा के समतुल्य समय का एक हिस्सा है|

दुविधा में एक युवक अध्यात्मिक गुरु के पास जाता है जो कि खुद मर्दवादी ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था से उपजा है, जाहिर है उससे युवक की दुविधा ही बढ़ेगी| हमारे प्रधानमंत्री ही नहीं हर युवा को एक मनोवैज्ञानिक के पास जाने की जरुरत है जो इस व्यवस्था में दुविधाग्रस्त महसूस करता है, जिसमे हमे समाज और उन मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का भी कोई पता नहीं जिन्हें हम पढ़ते हैं|

ब्रिटिश राज में इस मानसिक पराभव के नतीजे में निकली नौकरशाही, दिशाहीन सेना, व्यर्थ वैधानिक प्रक्रियाएं और लक्ष्यहीन ख़ुफ़िया सेवाएं| हालाँकि इन सेवाओं में तमाम लोग बेहतर काम करने का ईमानदारी से प्रयास करते हैं, लेकिन मुट्ठी भर ऐसे लोग गायब होते जा रहे हैं| इस व्यवस्था में जो लोग दुविधा में नहीं है वे ब्रिटिश मानसपुत्र हैं हमारे नेतागण, ये लोग ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के उन अधिकारीयों की परछाईं की तरह हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य है अपने ब्रिटिश मालिकों की सेवा करने का, जिससे वे जनता की गाढ़ी कमाई हड़प कर अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अकूत दौलत जुटा सकें|

यह भी सच है कि आज़ादी के बाद हमने इन बदतर हालातों की यथासंभव मरम्मत जरुर की है| लेकिन इतिहास के समयकाल में वह बहुत छोटा दौर था, उदारीकरण के बाद शिक्षा व्यवस्था, प्रेस, परिचर्चा समेत सारे तंत्र की बदहाली हमे गुलामी की दिशा में पीछे धकेल रही है|

अग्रेजी तरीके से चलने वाली शिक्षा व्यवस्था, प्रेस, परिचर्चा समेत सारे तंत्र की हालत उदारीकरण के बाद निजी हाथों में जाकर नए चलन की बन रही है| अब जन शिक्षण निजी हाथों में है, मिशनरी पत्रकारिता से बनी प्रेस निजी हाथों की कठपुतली हो गयी है| साहित्यिक अभिलेखागारों की जगह निजी विश्वविद्यालयों ने ले ली है| जन परिचर्चाओं की जगह निजी कॉर्पोरेट चैनलों के नियंत्रण वाली परिचर्चाएं आम हो गयी हैं|

ज्योतिष और गणित ज्ञान के भारतीय गौरव को धूल में मिलाने के लिए अंग्रेज मिशनरियों और प्रशासन ने तमाम चालें चली, उज्जैन के कुछ विद्वानों को रिश्वत देकर कहा कि वे दावा करें कि सूर्य ग्रहण दो दिन बाद पड़ने वाला है| या बात सभी सरकारी पत्रों में छपी जिसे पढ़कर लाखों लोग सूर्य ग्रहण पर नदी में स्नान करने जमा हो गए| जब सूर्य ग्रहण नहीं पड़ा तो वहां मौजूद ब्रिटिश एजेंट और कैथोलिक पादरी सामने आये और गुमराह किया कि लाखों लोगों को पढाया जाने वाला भारतीय ज्योतिष ज्ञान झूठा है| और अंग्रेजों ने सुचना दी कि श्रेष्ठतम ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने गणना की है कि सूर्य ग्रहण अगले तीन दिनों में होगा जो कि सत्य साबित हुआ और लोगों के लिए यह अचम्भा था|

लेकिन यह मनोवैज्ञानिक युद्ध और धोखाधड़ी तब पकड़ में आई 1985 में जब जर्मन और फ्रेंच विद्वानों ने ज्योतिष गणनाओं का एक विषद अध्ययन करके तथ्य सामने रखे| एक दशक पहले नासा ने अपनी गणनाओं के लिए भारतीय ज्योतिष को अंगीकार करने की घोषणा की है लेकिन इससे भी भारतीयों का खोया हुआ गौरव आज तक वापस नहीं लौट सका|

जिन यूरोपियाई लोगों ने भारतीय ज्ञान के विनाश को लेकर अंग्रेजों को चुनौती दी उनको मनोविज्ञान का सहारा लेकर ठिकाने लगा दिया गया| हिंदुस्तान के मानस को दागदार बनाने के लिए अंग्रेजों ने जो किया उसके गवाह रहे फ़्रांस और जर्मनी जिन्होंने अपनी सीमाओं में रह कर जो कर सकते थे वो किया भी| फ़्रांस और जर्मनी ने अंग्रेजों के लालच की भरपाई करके हिंदुस्तान से मूल्यवान वस्तुएं हासिल कीं| पूरी एक शताब्दी तक पांडुलिपियों से कलाकृतियों और मूर्तियों की जो नीलामी लन्दन के मशहूर नीलामी घरों में होती रही उसको खरीदकर भुगतान करने वाले ज्यादातर फ़्रांसिसी और जर्मन ही थे|

हमारी शिक्षा प्रणाली चिरकालिक दुविधा की जननी है| यह दुविधा नौकरी पाने की पहली शर्त है| इस दुविधा में न केवल समय और स्थान के बारे में हमारी समझ चकनाचूर हो चली है बल्कि आधुनिकता बनाम परंपरा का भी घनघोर संकट है| इसके चलते हमारी मजबूरी है कि हम एक गुलाम की तरह तात्कालिक जीवन को प्राथमिकता बनायें और जियें|

हमे पढाया जा रहा है कि हमारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं, हमारा इतिहास महज पांच हजार साल पुराना है, हमारी कोई सांस्कृतिक प्रतिष्ठा नहीं, हमे जो संस्कृति मिली वो विदेशियों की कृपा से| हमारा मानस यम मानता है कि जो अंग्रेजी में है वह विज्ञानं है और जो अंग्रेजी में नहीं है वह विज्ञानं नहीं और पश्चिम मतलब अंग्रेजी|

ये सच है कि हमारी पुस्तकों में कुछ ऐसे प्रयास हुए जिनमे आर्यभट्ट और रामानुजम को लेकर कुछ किस्से गढ़े गए, लेकिन ये सब नितांत आभासी है न कि कोई ठोस आधार| आर्थिक और अध्यात्मिक सम्पदा में भारत एक धनी देश रहा है| सिर्फ हिलेरी क्लिंटन ही अकेली महिला नहीं जिन्होंने पूर्व की ओर देखो की नीति चलाई| सिकंदर से लेकर जीसस, जीसस से लेकर मोहम्मद तक सभी ने पूर्व देखने की नीति में भारत के अध्यात्मिक और भौतिक सम्पदा का आकर्षण माना| जब फारसियों को कट्टर इस्लामी ताकतों से जूझना पड़ा तो उन्होंने भी भारत का रुख किया| जब यहूदियों को धर्म युद्ध करते ईसाईयों और कट्टरवादी अरबों ने भगाया तो उन्होंने भारत की शरण ली| सिकंदर के समय से जारी रहे भारत से यूरोप के रास्ते के ऑट्टोमन साम्राज्य के समय बंद होने तक पूरे यूरोप ने पूर्व की ओर देखने की नीति ही अपनाई| वास्को द गामा और कोलंबस की यात्रा का उद्देश्य हिंदुस्तान तक के लिए रास्ते की तलाश करना था| ईस्ट इंडिया कंपनी बनी तो उसका उद्देश्य हिंदुस्तान के साथ व्यापार करना ही था|डच ईस्ट इंडिया कंपनी का पूर्व की ओर देखने का मकसद औषधीय और वानस्पतिक शास्त्रों को डच में अनुवादित करने का ही रहा| हर क्रिस्चियन मिशनरी और जेसुइट का मकसद हिंदुस्तान के ज्योतिष और गणित के ज्ञान को हासिल करना ही था| ये सब हासिल करने के पहले उन्होंने एक भी भारतीय का धर्मान्तरण नहीं किया| 1947 के पहले तक ब्रिटिश और ईस्ट इंडिया कंपनी का पूर्व की ओर देखने का मकसद आर्थिक संपत्तियों और सोने की लूट करना था|

कुछ देशों ने पश्चिम की ओर भी देखा| चीन, जापान, कोरिया, ने पश्चिम की ओर देख कर चिकित्सकीय और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया| आज भी बचे हुए कोरियाई राजसी परिवारों में अयोध्या में विवाह करने की परंपरा है|

तमाम ऐसे भी रहे जिन्होंने दक्षिण में देखा| रूसी और मध्य एशियाई देशों ने दक्षिण में देखा यहाँ भारत से उन्हें अध्यात्मिक और भौतिक सम्पदा मिली| आज़ादी मिलने के बाद पूरी दुनिया के लिए ज्ञान और समृद्धि का प्रकाश लेकर जीता देश बिखर कर बरबाद हो गया, तब इस देश ने अपने अन्दर झांक कर खुद कोबनाने और मजबूत करने की ठानी| उदारीकरण के उदय के साथ साथ हर देश ने अपने व्यापारिक लाभ के लिए भारत की ओर देखना शुरू किया| इसके साथ ही उदारीकरण के बाद हर अपराधी, शातिर खुफिया एजेंट, आतंकवादी और तख्तापलट करने वाली षडयंत्रकारी ताकतों ने भी हिंदुस्तान की ओर देखना शुरू किया| नतीजन हमारा हिंदुस्तान दुनिया भर की इंटेलिजेंस के छद्म युद्ध का मैदान बन गया| अचम्भे की बात है कि देश की राष्ट्रवादी पार्टी के प्रवक्ता अचानक ही हिलेरी क्लिंटन के शब्दों को महसूस करते हैं कि नाहक ही वे अब तक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पश्चिम की ओर देख रहे थे जब कि हजारों हजार सालों से पूरा विश्व अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हिंदुस्तान की ओर देखता रहा है| देश की संस्कृति की रक्षक होने का दावा करने वाली राष्ट्रवादी पार्टी की समझ पर धिक्कार है जो उनको हिलेरी क्लिंटन के बयान से देश की अहमियत समझ आई|

संभव है कि उनका कहना ठीक हो कि भारत के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक समूहों को पूर्व की ओर देखना चाहिए, सफाई के लिए सिंगापुर, भ्रष्टाचार मुक्ति के लिए जापान, देश को महाशक्ति बनाने के लिए समर्पित चीन, गैर पारंपरिक युद्ध के लिए उत्तरी कोरिया जो कि महज 2.8 करोड़ की आबादी के साथ पूरी दुनिया पर अपनी धाक जमा रहा है| अगर राष्ट्रवादी पार्टी के प्रवक्ता के बयान का यही मतलब है तो हो सकता है कि कुछ लोग इस बात से सहमत हो|

लेकिन इन्ही बयानबाजियों के बीच हो हुई आर्थिक धांधलियों के चलते देश विरोधी तमाम आतंकी समूहों को हिंदुस्तान में पनाह मिल गयी| हाल ही के घटनाक्रमों में अमेरिकी और इजराइल की मध्यस्थता के तहत कुछ रंग बिरंगे दक्षिणपंथी समूह भारत में घुसने में कामयाब हो गए| ये समूह मिडिल ईस्ट, यूरोप और मध्य एशिया में सरकारों को बनाने बिगाड़ने, आतंकी संगठनों की फंडिंग करने और मानव संसाधन उपलब्ध कराने में लिप्त रहे हैं| इसी सन्दर्भ में गौरतलब है कि टर्की के हुए एक तख्तापलट के घटनाक्रम में टर्की के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री और राजदूत ने भी पूर्व की ओर देखा ….भारत की ओर|

भारत के बाबा बाजार में तमाम तरह की अव्यवहारिक आध्यात्मिकता मौजूद है जो कि अंदरूनी तरीके से निरर्थक और बाहरी तरीके से खर्चीली है| प्रवर्तन निदेशालय ने इशारा दिया है कि देश में तमाम अध्यात्मिक और धार्मिक संस्थान हैं जिनको देश-विदेशों से हजारों करोड़ रूपया मिलता है| अधिकांश मामलों में वे काले धन को ठिकाने लगाने के लिए राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, काले धन वाले लोगों और खुफिया एजेंसियों का पवित्र गठजोड़ है|  देश में ऐसी परिस्थितियां बन रहीं है जहाँ मजहब और आध्यात्मिकता हमारी जनता या नेता के लिए कोई समाधान निकलने में सक्षम नहीं, भारत समेत तमाम देशों में नेताओं की ही जय जयकार होती है, लोग उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं, ऐसे में बेहतर यही होगा कि देश के नागरिक ऐसी ताकतों को पहचान कर अपने नेतृत्व को सहयोग करें|

हिंदुस्तान बहुत अहम् मोड़ पर है| हमारे सामने दो रास्ते हैं| नीचे का रास्ता शिक्षा के धार्मिक होने, सभी सामाजिक इकाइयों के बिखराव, धोखेबाजी और मानसिक स्वस्थ्य पर नियंत्रण की ओर जाता है| ऐसा करने में मनोवैज्ञानिकों की अहम् भूमिका होगी जो स्वयं ही दुविधाग्रस्त हैं जिसके चलते वे आयातित दवाओं का निर्बाध रूप से इस्तेमाल करवाएं इससे हमारी सोच शून्य हो जाती है| इस तरीके से हमारी ज्ञान आधारित व्यवस्था लुट पिट जाएगी और उसमे से लोगों को जड़ से उखड़ कर दोबारा रोपना संभव न होगा| टुकड़ों में मिलने वाले ज्ञान से हमारी पूरी आबादी विदेशी कॉर्पोरेट कंपनियों के गुलाम की तरह काम करने को मजबूर हो जाती है, उनकी जिंदगी का हर मामला उन्ही कंपनियों के नियंत्रण में हो जाता है| वही हालत हो जाती है जो कभी जहाज के गुलामों की हुआ करती थी जिसमे: “हमे जिन्दा रहने के लिए नाव चलानी है, ठीक से चलाएंगे तो जिन्दा रहेंगे”| हम हिन्दुस्तानियों का यही हश्र होना है क्योंकि यही रास्ता हमने खुद चुना है|

लेकिन अगर हम ऊपर उठने की सोच पाते हैं तो थोडा कठिनाई जरुर होगी लेकिन जो होगा ठीक होगा, हमे सारा सिजरा दोबारा से समझना होगा और फिर अपनी शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ठीक करना होगा| हमे अपनी स्थिति और समय का दुनिया के हिसाब से सही सही आकलन करना होगा| लुटेरों के जहाज के गुलामों की बजाये हमे सारी दुनिया को सच्चाई की राह दिखानी होगी| एक गणतंत्र के तौर पर आगे बढ़ने का निर्णय हमारा अपना है, एक राष्ट्र के तौर पर हमे वैश्विक गाँव में अपने देश की प्रतिष्ठा फिर से हासिल करनी है| इसके लिए दुनिया भर की सांस्कृतिक विरासत के बीच आज मौजूद समस्याओं के समाधान खोजने होंगे चाहे वो समस्या किसी भी स्तर की हो|

Share:
error: Content is protected !!