अर्थव्यवस्था

भारतीय नोटबन्दी

This post is also available in: English

२०१६ भारतीय नोटबन्दीवरदान हे या श्राप​ ?

-शालिनी & श्री किडाम्बि

 

नोटबंदी का यह दौर इतने बड़े छल और बेहिसाब लूट का यह समय ईस्ट इंडिया कंपनियों की गुलामी के दौर से ज्यादा बुरा है|

हिंदुस्तान को महाशक्ति बनाने में काम आने वाले ट्रिलियन डॉलर पश्चिमी देशों की असफल अर्थव्यवस्था बचाने और बनाने के काम आ रहे हैं|

नोटबंदी की एक गोली की शिकार हुईं पाँचों चिड़ियाँ

भारत से कालेधन की लूट पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था को छूट

देशवासियों की बचत से कॉर्पोरेट के कर्ज की जमानत कालाधन बनाने का नया दौर

राजनीतिक दलाली के लिए पूंजीवाद की दलाली

पहले के मालिकों के लिए निजी और संस्थागत सोने की उगाही

खेती की बर्बादी और दांव पर  लगी खाद्य सुरक्षा

ईस्ट इंडिया कम्पनीज ऑर मल्टीनेशनल कारपोरेशन ऑपरेटेड डिस्ट्रक्शन ऑफ़ इंडिया (ई-मोदी)

परिचय

नोटबंदी का यह दौर देश भक्ति के बड़े स्वांग के साथ सामने रखा गया| दावा किया गया कि नोटबंदी से निकला कालाधन देश के विकास में लगेगा साथ ही नकली नोट छापकर देश की अर्थव्यवस्था बिगाड़ रहे पडोसी पर नकेल लगेगी| इतना ही नहीं नोटबंदी होने से नकली नोटों से चल रहे आतंकवाद पर लगाम लगेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी| साथ ही हमे यह भी बताया गया कि नोटबंदी से ही व्यवस्था मे शीशे जैसी पारदर्शी भी हासिल हो जाएगी| नोटबंदी के साथ जीएसटी लागू करने और डिजिटलीकरण से कैशलेस सोसाइटी ईजाद करने को यूँ बेचा जा रहा है जैसे भारतभूमि पर स्वर्गलोक सीधे उतर आने वाला हो| पिछली सरकारी नीतियों में जैसे शाइनिंग इंडिया, डेवलपिंग इंडिया के नारे ईजाद हुए उसी तर्ज पर डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया की शुरुआत हुई| कॉर्पोरेट मीडिया और उनके मिशनरी प्रेस्टीटयूट इन जुमलों और नारेबाजी में उलझकर रह गए| आज वो सभी आरोपी हैं जो उनके मुताबिक जी हुजूरी में नहीं| खबरंडी तबके ने नोटबंदी की खिलाफत करने वाले सभी लोगों को गैर देशभक्त करार देना शुरू किया, इतना ही नहीं ऐसे लोगों को वे आतंकवादी बताने से भी गुरेज नहीं करते|

यह सब है क्या? कालेधन के लिए अभी इतनी फिक्रमंदी क्यों? जबकि हर प्रधानमंत्री ने देश के बाहर मौजूद कालेधन को देश में लाने के वादे किये लेकिन देश के भीतर मौजूद कालेधन के लिए इतनी बेसब्री क्यों?

हिंदुस्तान में कालेधन का कुल जमा कितना है? इसमें से कितना देश के अन्दर मौजूद है और कितना देश के बाहर? देश से बाहर गया पैसा उन देशों में है जो तीसरी दुनिया के देशों को भ्रष्टाचारियों (बहुधा राजनेता और नौकरशाह और उनसे जुड़े क्रूर व्यापारी) का पैसा मानते हैं| वहां ये पैसा विशुद्ध सफ़ेद पैसा हो जाता है और उसको तीसरी दुनिया के ही जरूरतमंद देशों को कर्ज के रूप में दिया जाता है| जाहिर है पैसे की भी घर वापसी होती है, उन्ही देशों में जहाँ से इसे लूटा गया| अहम् बात ये है कि ऐसे कालेधन का कितना हिस्सा देश में मौजूद है और कितना देश के बाहर? इसी पैसे का कितना हिस्सा असल कारोबार जैसे रियल एस्टेट और सोने में बदल दिया गया? देश में काली और सफ़ेद अर्थव्यवस्था कुल कितनी है?

वित्त मंत्रालय से लेकर अर्थव्यवस्था और मुद्रा के शीर्ष सलाहकार और विशेषज्ञ जाने अनजाने में ब्लैक मनी अर्थात कालेधन, ब्लैक असेट्स यानि काली कमाई, ब्लैक कैश यानि अवैध नकदी और ब्लैक इकॉनमी यानि स्याह अर्थव्यवस्था जैसे शब्द प्रयोग करते हैं| यहाँ गौरतलब है कि इन सभी शब्दों के खास मायने हैं, इनका मतलब अंकों में हो सकता है और किसी भी समय उनकी नाप जोख की जा सकती है|  इस प्रक्रिया में वे सभी महानुभाव अपने ज्ञात संदेह और समझदारी का व्यापार करते हैं, आदान प्रदान करते हैं| इन भारी भरकम अज्ञात शब्दावली की सरकार को खास जरुरत है, ताकि उसे आसानी से भुलाया जा सके| लगता है कि सरकार चाहती है कि जनता सब कुछ भूल जाये, रूचि न ले|

इसलिए हम सुधी यानि समझदार पाठकों के लिए इससे जुड़े बुनियादी लेकिन सरल विचारसूत्र रख रहे हैं, उम्मीद है कि इससे घटना और उसकी शब्दावली समझना आसान होगा| इसे समझने के लिए महज जोड़, घटाना, गुणा, भाग की सहज समझ भर की जरुरत है, और ये तीसरे दर्जे की पढाई में सिखा दिया जाता है|

इकोनॉमिक्स और भारतीय सन्दर्भों में इसकी बदलती परिभाषाये

इकोनॉमिक्स एक ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका असल अर्थ है “घरेलू हिसाब किताब” या “गृह प्रबंधन”| इसी को बढाकर मानते हैं कि सारा देश एक घर है| किसी आम, अनपढ़ अशिक्षित घर का मुखिया यही सलाह देगा कि या तो अपनी आय में जरूरतों को पूरा करिए या फिर अपनी आय बढ़ा लीजिये| वही आम आदमी आपको यह भी बता देगा कि आप लगातार कर्ज लेकर घर परिवार नहीं चला सकते| और अगर आप अपना कर्ज नहीं चूका सके तो मनी लेंडर आपको या तो अदालत ले जायेगा या फिर आपकी प्रॉपर्टी के पीछे पड़ेगा| या फिर आपकी प्रॉपर्टी बेचकर अपना कर्जा सूद समेत वापस लेगा|

घर का कोई भी आदमी ये बता देगा कि भविष्य के किसी भी खतरे में नियमित आय और बचत की क्या अहमियत है| आम लोगों में समृद्ध ही नहीं, गरीब परिवार के लिए भी सोना और संपत्ति आकस्मिक उद्देश्यों के लिए ही होते हैं|

लेकिन पिछले पच्चीस सालों में जिसने भी शासन किया और उदारीकरण और निजीकरण को बेहिसाब हवा दी| साथ ही में हम “जीरो सेविंग” यानि एकदम “शून्य बचत” की उलटी नीतियों को प्रोत्साहित कर रहे है| इतना ही नहीं बचत की बजाए “निर्बाध खर्च” “भारी भरकम कर्जे” और लोगों को कसीनो सरीखे स्टॉक मार्केट में निवेश की नीतियां भी प्रोत्साहित की जा रही हैं| क्या हमारे देश के अर्थशास्त्री चाहते हैं कि हमारी सरकारें ऐसी नीतियों को आँख बंद करके मान ले? क्या ऐसी नीतियों के क्रियान्वयन में और अर्थशास्त्री साहेबान की घरेलु नीतियों में फर्क नहीं? हमारे अर्थशास्त्री खुद तो जुआ खेलने की बजाए बचत करते हैं, संपत्ति बनाते हैं| फिर वही अर्थशास्त्री सरकारों को इस बात की इजाजत क्यों दे देते हैं कि वे देश के आर्थिक स्वास्थ्य से  खिलवाड़ करें?

क्या देश की बुनियादी आर्थिक सेहत दुरुस्त रखना सरकारों की जिम्मेदारी नहीं? ऐसे में उन्हें देश की बुनियादी आर्थिक सेहत के खिलाफ हो रही कारस्तानी क्यों नहीं दिखती? क्या ये उनकी कथनी करनी में फर्क नहीं? या फिर इकोनॉमिक्स का भारतीय अंग्रेजी में ऐसा मतलब होता है कि “निर्भय होकर दूसरे के पैसे से जुआ खेलो, कोई जिम्मेदारी नहीं, जवाबदेही नहीं और इसके  दंड देश को गरीबी हटाओ के आसान जुमलों या देशभक्ति में दबा दो”?

किसी अर्थव्यवस्था में क्या है पैसा (M) और काला पैसा (BM)

पैसा किसी मूल्य का संचय है और विनिमय का साधन है|

यह विचार बदला गया जब सरकारों ने पैसे की आपूर्ति और व्यवस्था पर अपना नियंत्रण करना चाहा और पैसे को नाम दिया नोट| संयुक्त राज्य अमेरिका के फेडरल रिजर्व नोट का अर्थ है, “ऑब्लिगेशन या कृतज्ञता पत्र” या फिर “कर्ज”| वहां ये मुद्रायें केन्द्रीय बैंकों द्वारा छापी जाएगी जिसकी जमानत राजकीय बैंकों को लेनी होगी| जाहिर है कि हिंदुस्तान के मामले में ऐसा होता है तो यह सरकारों की आपसी कृतज्ञता बन जाती है|

जब लोग सरकारों पर भरोसा नहीं करते तो वे अपनी संपत्ति के वैकल्पिक तरीके भी बनाते हैं, ताकि समय पर उनकी कीमत वापस मिल सके| तमाम मामलों में यह निवेश सोने या किसी और रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट होगा|

इस मनी (M) यानि पैसे कोई कई यमों (Ms) में विभाजित है, फ़र्ज़ करिए कि नकद हिस्सा M0 बाकी हिस्सा कर्जे, साख और और सरकारी पैसे की छपाई के हिस्से M1 से M4 तक के चार हिस्से हुए| इन चरों हिस्सों की गुणवत्ता और मात्रा के मुताबिक ही उसमे सरकार का पूरा नियंत्रण हो सकता है| सामान्य तौर पर सरकारों का M0 यानि व्यवस्था के नकदी वाले हिस्से पर कोई नियंत्रण नहीं होता, ये देश की अर्थव्यवस्था में ही चलता है| अर्थव्यवस्था की नकदी वाले हिस्से और उसकी चाल यानि वेग की गुणात्मकता से धन, समृद्धि और आम लोगों क लिए सुरक्षा का अंदाजा लगता है| सभी सरकारें इसकी परवाह नहीं करते हुए इन चारों चीजों पर पूर्ण स्वामित्व बनाने के लिए M0 पर रोक अथवा कराधान लागू करती हैं|

क्योंकि इस यम M0 यानि नकद रुपये में सुरक्षा चूक इस कदर हो सकती है कि कोई भी किसी भी सरकार का रूपया छाप के जारी करवा दे| अर्थव्यवस्था में जाली मुद्रा के खतरे अलग हैं यही वजह है कि इसे नकली मुद्रा या जाली नोट कहा जाता है|  इस मुद्रा का जीडीपी में सीधा सम्बन्ध होता है| जीडीपी यानि उत्पादन के लिए रुपये की जरुरत होगी ही| पैसे रुपये की यही जरुरत मंदी और कालाबाजारी दोनों से हो सकती है| इसकी जड़ें कालेधन के साम्राज्य से भी जुड़ी हैं|

इसका एक समाधान कनाडा की सरकार ने निकाला, नकली मुद्रा रोकने के लिए उन्होंने प्लास्टिक होलोग्राफिक मुद्रायें चलाई| इन नोटों ने धूल गन्दगी और फटने की दिक्कत से निजात दिलाई| प्लास्टिक की इस मुद्रा का जीवन औसतन बीस साल हुआ| इतने समय में कम से कम बीस प्रतिशत नोट ख़राब होते हैं, जाहिर है कि ये बचत हुई| इतनी बचत हर साल नहीं बढती, कागज की नाव एक दिन नहीं चलती, बीस प्रतिशत नोट हर साल ख़राब हो जाते हैं|

यह पैदा जीडीपी की जरुरत के मुताबिक हर साल छापा जाता है| जीडीपी में इस मुद्रा का कुल मूल्य देश की सकल घरेलू वस्तुएं और सेवाएं होती हैं| किसी आर्थिक गतिविधि का एक हिस्सा कर के रूप में लिया जाता है| इसीलिए सरकार को रोजनामचा बनाकर सभी मामले देखने पड़ते हैं| सही कराधान के लिए सरकारें सभी आर्थिक गतिविधियों की गहन जानकारी रखती हैं|

ऐसा करने के दूसरे तरीके हैं जिन्हें खास कर के चीन और अमेरिका जैसे पश्चिमी देश करते हैं, वे नोट छाप कर अर्थव्यवस्था में आपूर्ति करते हैं, वे देश ये पैसा उधार अथवा विदेशी निवेश अथवा दान-दाताओं या फिर उनके अपने केन्द्रीय बैंकों से उधार लेकर पूरा करते हैं| इस पैसे से उनके भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पूरे होते हैं, भारत में यह सिलसिला आज़ादी के बाद पहले बीस सालों तक जारी रहा| इससे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी वस्तुओं और सेवाओं समेत आर्थिक गतिविधियां बढ़ी| इससे सकल घरेलू में छपे हुई मुद्रा की कीमतें तय हो सकीं| इससे अर्थव्यवस्था की उडान तो दिखाई देती है लेकिन लम्बे समय तक ऐसा होने पर सकल घरेलु उत्पाद की साख कमजोर होती है, क्योंकि अर्थव्यवस्था के बुलबुले फूट जाते हैं| इस स्थिति में घनघोर मंदी होती है और फिर सरकारों को सारी मुद्राएँ निरस्त करके नए बड़े मूल्य की नयी मुद्राएँ बनानी पड़ती हैं| द्वितीय विश्व युद्ध के समय ऐसा ही एक मामला जर्मनी में हुआ, हाल के समय में यही वेनेज़ुएला में हो रहा है|

सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि या जीडीपी की गतिशीलता को इस प्रकार पता करते हैं कि जीडीपी की एक यूनिट के लिए कितनी मुद्रा खर्च हुयी| इससे किसी देश की आर्थिक सेहत का अंदाज़ा लगता है| प्रति यूनिट जीडीपी बढ़ने पर खर्च किया गया पैसा  सकल घरेलू उत्पाद की एक यूनिट से कम होना चाहिए| अगर खर्च किया गया पैसा सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा हो तो मानिये कि व्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं| उदहारण के लिए अमेरिका में वर्ष 2016 में सकल घरेलू उत्पाद की एक यूनिट के लिए 4 डॉलर की जरुरत होती थी| यद्यपि चीन विनिर्माण आधारित अर्थव्यवस्था है लेकिन यही अनुपात चीन में भी लागू होता है| लेकिन इसके लिए तमाम छल प्रपंच करके चीन दुनिया को यह दिखाता है कि उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे बेहतर है|

मुद्रा की गति या चलनीयता

नकदी आधारित अर्थव्यस्थाओं में यह सबसे अहम् विषय है| साधारण तौर पर यह एक आकलन है कि नकद मुद्रा की एक इकाई दिन भर में कितने हाथों से गुजरती है| यह दिए गए समय में कुल आर्थिक गतिविधियों की गुणक है जिसका रोजाना के हिसाब से आकलन किया जाता है| मुद्रा की गति या चलनीयता M0 से M4 तक के वर्गीकरण से अलग है| हिंदुस्तान की नकदी की चाल लगभग 60 है जिसका मतलब है कि एक रूपया दिन भर में साठ लोगों के हाथों से गुजरता है| इस तरह एक रूपया दिन भर में साठ रुपये का कारोबार करता है| दुनिया के ज्यादातर देशों में मुद्रा की चाल तीन से भी कम है| रुपये की चाल से भी आर्थिक सेहत का पता चलता है क्योंकि एक रूपया सकल घरेलु उत्पाद में रोजाना साठ रुपये का योगदान करता है| कालेधन के मामले में रुपये की चाल की खासी अहमियत होती है| अगर सरकार सारी सफ़ेद मुद्रा को दरकिनार करके कैशलेस सोसाइटी बनाना भी चाहे तो भी सोने, चांदी अथवा रियल एस्टेट से विनिमय होने वाली मुद्रा अपने गुणक के मुताबिक ही चलेगी, इसका अर्थ ये हुआ कि ये सब सफ़ेद अर्थव्यवस्था से अलग होगी| यही वजह है कि जब कोई भी देश कालेधन पर लगाम लगाने के लिए नोट बंद करता है तो नियमानुसार सारे बड़े नोट निरस्त करती है| आहरण की सीमा से जोड़कर जारी नहीं करती| और अगर लोगों के पास सोना ज्यादा हो तो उसकी जब्ती भी करती है|

इसी दृष्टिकोण से निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि नोटबंद करने का फैसला कालेधन पर नियंत्रण के लिए नहीं| अर्थशास्त्र के पहले दर्जे का विद्यार्थी भी जानता है कि दोगुने या चार गुने मूल्य के नोट जारी करने से कालाधन दोगुना या चार गुना बढेगा ही बढेगा| अचम्भे की बात तो ये है कि नोटबंदी के इस दौर में कालाधन बढ़ाने के उद्देश्यों के साथ ही साथ कुछ और चालबाजी भी हुई जिससे आम लोगों अथवा संस्थाओं के पास मौजूद सोना जब्त किया जा सके| जाहिर है कि नोटबंदी आम भारतीय के लिए तो कदापि नहीं न ही यह भारत देश के लिए उचित है|

कालेधन अथवा अवैध नगदी के स्रोत

जब करों का समुचित भुगतान नहीं होता तो उस हिस्से के पैसे का सरकारों को पता नहीं लगता, इसे ही कालाधन कहा जाता है|

जब प्रगतिशील करों के नाम पर सरकारी कराधान निगम केयीनी तरीकों से लोगों से 60% से 75% तक ज्यादती कर लेने लगते हैं तो लोग करों की चोरी करते हैं या फिर कम आय दिखाकर कालाधन बनाते हैं|

जब रिश्वतें नकदी या अन्य तरीकों से दी जाती हैं तो वे भी आय के तौर पर नहीं होती, इस तरह वो सभी आर्थिक गतिविधियाँ कालाधन बनाती हैं|

जब किसी सरकारी सौदे के होने पर अधिकारी या नेताओं को हिस्सेदारी या नजराने के तौर पर दिया जाता है तो इस तरह की आर्थिक गतिविधियाँ भी कालेधन के दायरे में आती हैं| ये गतिविधियाँ करके विदेशी कंपनियों ने भी बेहिसाब कालाधन बनाया है|

जब विदेशों में काम करने वाले भारतीय अपनी कमाई विनिमय के गैर बैंकिंग तरीकों या सेवाओं से भेजते हैं तो ये किसी बैंक में जमा न होकर किसी भी प्रकार के कराधान से बच जाती है| यह पैसा भी कालाधन ही बढ़ाता है|

सरकार द्वारा बनाया कालाधन/ गंदे नोटों का चलन

सरकारी व्यवस्था में भी कालाधन बनता है, यह भारत में होने वाली अपने आप में अनूठी घटना है जिसे दुनिया के तमाम देश फॉलो करते हैं|   

कागज की मुद्रा के साथ अहम् दिक्कत ये भी है कि हर साल 5% से 20% गंदे, कटे-फटे, ख़राब हुए नोट केन्द्रीय बैंकों को वापस लौटा दिए जाते हैं| आईबीजीसी की रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था में ये सभी नोट कुल मिला के बीस प्रतिशत होते हैं| एक सिद्धांत के मुताबिक इस पैसे को पूरी तरह से जलाकर या नष्ट करके उनकी जगह नए नोट चलाये जाते हैं|

इस तरह के नोटों के विषय में एक भ्रष्टाचार का मामला पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौडा द्वारा सामने लाया गया| यह सिलसिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के समय से जारी था जब टी.ए. पई उनके सलाहकार थे| इन गंदे और कटे फटे नोटों को नष्ट करने के बजाये सत्तासीन राजनीतिक दल को वापस कर देता था| राजनीतिक दल इस मुद्रा को अपने निजी कामों में प्रयोग करते थे| चालीस सालों में इस अनकहे भ्रष्टाचार में कटे-फटे गंदे नोटों से छप्पन ट्रिलियन रुपये बने, यानि 0.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का कालाधन भारतीय अर्थव्यवस्थ में वापस आया| ये रूपया राजनीतिक दलों द्वारा रियल एस्टेट अथवा दूसरे आय के साधनों के तौर पर इस्तेमाल हुआ| चुनावी खर्चों में भी कतिपय प्रयोग जरुर हुआ|

जाहिर है कि यह कालाधन लाभ कमाने में भी लगा|

जब इस कालेधन को अर्थव्यवस्था से बाहर ले जाकर विदेशी बैंकों में जमा किया गया या फिर विदेशी खरीद में अथवा जॉइंट वेंचर सौदों अथवा विश्व बैंक या फिर आईएम्ऍफ़ के प्रोजेक्ट्स में लगा| ऐसे में पैसा सीधे उनके अथवा कई देशों में उनके रिश्तेदारों अथवा भरोसेमंद लोगों के खातों में पहुंचा| उन देशों में यह पूरी तरह सफ़ेद पैसा माना जाता है, सुरक्षित रखा जाता है| यही पैसा घरेलू कालेधन का अन्तराष्ट्रीय हिस्सा बन जाता है|

संक्षेप में:

काला धन (BM)     = संपत्तियां + नकदी = BM D घरेलू (संपत्तियां + नकदी) + BM I अथवा अन्तराष्ट्रीय (संपत्तियां + नकदी)

BM  = BM D + BM I

किसी भी समय कुल कालाधन दो हिस्सों में होता है- पहला वो कालाधन जो देश में बना (BM D) और दूसरा वो कालाधन जो विदेश (BM I) पहुंचा| वह कालाधन जो देश के बाहर पहुँच जाता है वो काला नहीं रहता, वे देश उस पैसे को बिलकुल सफ़ेद धन के रूप में प्रयोग करते हैं| इस तरह जब यह कालाधन धुलकर साफ़ होकर भारत पहुंचता है तो इसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि ऍफ़डीआई कहा जाता है|

काली अर्थव्यवस्था: किसी कालखंड की वे आर्थिक गतिविधियाँ जिनसे कालाधन बनता है| इन गतिविधियों में कालेधन की उत्पादकता और उससे जुड़े लाभ भी शुमार हैं|

नकदी में कालेधन की गणना किसी कालखंड में हुए सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में की जाती है| अलग-अलग देशों में कालेधन के स्रोत और प्रतिशत भी अलग अलग हो सकता है कहीं कालाधन दस प्रतिशत है तो कहीं सौ प्रतिशत| अन्तराष्ट्रीय एजेंसियों की मानें तो भारत में सामान्य आर्थिक गतिविधियों में लगने वाले पैसों के जितना ही बड़ा है कालेधन का कारोबार यानि भारत की काली अर्थव्यवस्था 100 प्रतिशत है| हालाँकि बहुत सी राजस्व इकाइयाँ किसी कालखंड में कालेधन का मूल्य 50% से 70% के बीच मानती हैं| यह इस साल का अनुमान है| इसमें पिछले वर्षों में बने कालेधन और उसके निवेश की कोई हिस्सेदारी नहीं

नोटबंदी क्या है?

नोटबंदी बड़े नोटों को निरस्त करने की प्रक्रिया है जिससे कालाधन रखने वालों से पैसा वापस निकाला जा सके| ऐसा नहीं होने से कालेधन के कारोबारी सरकारी नीतियों और निर्णयों पर भी भारी पड़ सकते हैं| पुरानी मुद्रा निरस्त करके सरकार उसी मात्रा में कम मूल्य के नए नोट जारी करती है| नए नोटों का देश की अर्थव्यवस्था में अहम् भूमिका निर्धारित है| इस प्रक्रिया में सिफ कालेधन की नकदी भर का हिस्सा शामिल होता है| कालेधन से बनाई गयीं संपत्तियां, सोना अथवा रियल एस्टेट, या फिर वो कालाधन जो विदेश चला गया उसे निरस्त नहीं किया जा सकता| न ही इस काली कमाई से बनी संपत्तियां या विदेश में जमा धन निरस्त किया जा सकता है|

कुछ दशकों पहले जब पहली बार नोटबंदी हुई तो हमने यही किया- सौ रुपये से ज्यादा मूल्य के सभी बड़े नोट निरस्त किये गए| पहली बार नोटबंदी हुई तो देश में 1000, 5000, 10000 मूल्य के रुपये का भी चलन था| पहली बार नोटबंदी हुई तो मकसद यह था कि कालेधन पर सरकार का नियंत्रण हो| क्योंकि कालाधन राष्ट्र निर्माण में नहीं बल्कि निजी हितों के काम आता है| इस लिहाज से सौ रुपये से ऊपर के मूल्य के सभी नोट निरस्त कर दिए गए| लम्बे समय तक बड़े नोटों का चलन नहीं हुआ—जब तक कि हिंदुस्तान में उदारीकरण और निजीकरण का काल नहीं आ गया|

जाहिर है कि नोटबंदी एक महत्वपूर्ण आर्थिक कदम है, हाल ही में तमाम देशों में यह प्रक्रिया लागू की गई, जिनमे प्रमुख हैं स्पेन, ऑस्ट्रेलिया और वेनेज़ुएला| हालाँकि वेनेज़ुएला में घनघोर मंदी का दौर रहा, किसी भी देश में बड़े मूल्य की मुद्रा या फिर समान मूल्य की मुद्रा का भी चलन नहीं हुआ| नोटबंदी के पहले और बाद में भी आहरण की रोक न्यूनतम भर की रही, ताकि नयी छपी मुद्रा दोबारा चलन में आये और देश की आर्थिक गतिविधियाँ बहाल हों|

नोटबंदी के मामले में समर्थन और विरोध पूरी दुनिया में कोई नई बात नहीं| कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने पहले कभी अपनी मुद्रा बदलने के प्रयास भी किये| लेकिन मुद्रा प्रबंधन के इतिहास में सबसे अचम्भे की बात यह रही कि हिंदुस्तान की सरकार ने निरस्त करने के बाद उसी मूल्य के नोटों को दोबारा जारी किया| इतना ही नहीं सरकारी हुक्मरानों ने और भी ज्यादा बड़े मूल्य के नोट जारी किये| यह घटना दुनिया भर के सभी मामलों से विरोधाभासी है| अर्थशास्त्र के सभी सिद्धांतों को तो छोडिये सामान्य ज्ञान यानि कॉमन सेंसको भी ठिकाने लगा कर हमारी सरकार ने इसे कालेधन के खिलाफ युद्ध कहा| इसी तरह की नारेबाजी करते हुए सरकार ने चालू मुद्रा से भी ज्यादा बड़े नोट भी जारी कर दिए|

इस विषय में हमे पूरे भारतवर्ष में किसी भी अर्थशास्त्री का कोई स्पष्टीकरण सुनने या देखने को नहीं मिला| इस विषय में जो कुछ भी मिला वो जनहित मामलों से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया में साझा किया|

सभी संस्थानों के आर्थिक गुरु और अरबों के अर्थशास्त्री भी कोई संतोषजनक जवाब न दे सके| उनके लिए यह बताना आसान नहीं कि निरस्त किये गए नोटों को नए कलेवर में दोबारा जारी कर देने भर से कालाधन बनना कैसे बंद हो जायेगा? वो भी तब जबकि निरस्त हुई मुद्रा से चार गुनी कीमत के नोट खुद सरकार चला रही है| यह बात और है कि मौजूदा नकदी का कालाधन जरुर बाहर आया| लेकिन आपने 2000 रुपये के मूल्य की जो मुद्रा जारी की उसमे साफ़ सन्देश है कि आप अगले पांच सालों में अपना कालाधन दोगुना करें|

भारत में कालेधन का अनुमान

सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य लेकिन आज भी हिंदुस्तान में कालेधन का कोई अनुमान मौजूद नहीं है|

कालाधन कैसे बनता है, कैसे जमा होता है और कैसे पश्चिमी देशों की मदद के लिए बाहर पहुंचा दिया जाता है… और फिर प्रत्यस्क्ष विदेशी निवेश के तौर पर फिर से वही पैसा वापस आता है बेहिसाब ब्याज बनाने के लिए| किसी सरकारी एजेंसी के पास भी कोई तर्क नहीं जिससे देश में मौजूद कालेधन का हिसाब हो सके| इसके बावजूद हर राजनीतिक दल छाती पीट-पीट कर कहता है कि हम बाहर से कालाधन वापस लायेंगे|

जबकि सच तो यह है कि किसी को पता तक नहीं कि कितना कालाधन बाहर है और कितना देश के अन्दर| जबकि वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि संभवनाएँ है कि विदेश में मौजूद कालाधन निवेश के रूप में भारत आये, और वहीँ रुक जाये| किसी भी जांच एजेंसी ने आकलन नहीं किया कि कितना कालाधन देश के बाहर मौजूद रहा जिसकी किसी भी तरीके से हिंदुस्तान में घर वापसी हुई|

तमाम पश्चिमी अर्थशास्त्री बताते रहे कि भारत में कालेधन का सालाना कारोबार या काली अर्थव्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद के बराबर है| इस लिहाज से काली और सफ़ेद अर्थव्यवस्था मिला कर हिंदुस्तान दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था है, न कि चौथे या पांचवे नंबर की जैसा कि हमारे देसी अर्थशास्त्री मानते हैं|  अगर हम पिछले पच्चीस सालों में बने कालेधन को जोड़ दें तो कुल अनुमान 30-40 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का बैठता है| इतना पैसा अमेरिका, यूरोप और ब्रिटिश शासन के साथ साथ चीन के कर्जों को चुकाने के लिए काफी है|

ऐसे में यह कोई अजूबा तो नहीं कि अचानक से हर पश्चिमी देश हिंदुस्तान के साथ व्यापार करना चाहता है|अचानक जब उनकी अर्थव्यवस्था चौपट होने लगती है तो उनको इस चालीस ट्रिलियन डॉलर वाली प्रेमिका पसंद आ जाती है| लेकिन ये चालीस ट्रिलियन डॉलर उन सभी मेहनती ईमानदार और फिक्रमंद हिन्दुस्तानी जनता के हैं, दुर्भाग्यवश आज ये पैसा चंद व्यावसायिक, राजनितिक, औद्योगिक, व्यापारी घरानों और उनके चाटुकारों और नौकरशाहों के हाथ में हैं| यही वजह है जिसके चलते हर देश का अर्थशास्त्री इस लूट को शाइनिंग इंडिया अथवा डेवलपिंग इंडिया कहता है|

सफ़ेद अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा अधिकारिक रूप से रक्षा सौदों आदि के नाम से सभी पश्चिमी देशों को दिया जा चूका है| भले ही इससे हमारी अर्थव्यवस्था और मानव संसाधन चौपट हो कर गरीबी के दलदल में पहुँच जाए| इसका नतीजा सामने है, बहुत बड़ी आबादी की तकदीर अन्तराष्ट्रीय एजेंसियां और मिशनरियाँ तय कर रही हैं|

हमारी बैंकिंग व्यवस्था में आज़ादी से अब तक कितना रूपया छपा, सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो ये बात रिजर्व बैंक बड़ी आसानी से बता सकता है| गंदे ख़राब हुए और कटे फटे नोटों और विदेशी मुद्रा विनिमय इत्यादि को घटा कर एक आकलन किया जा सकता है कि “अगर सभी लोग ईमानदार हों” तो आज तक कितनी मुद्रा का प्रयोग हुआ| ऐसा करने से कुछ नहीं तो हमारी अर्थव्यवस्था में मौजूद कालेधन का एक संकेत जरुर मिल सकता है| इस साधारण आकलन के अलावा दूसरे स्रोतों से कालेधन का सही सही पता लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है| ऐसा नहीं कि ऐसा आकलन किया नहीं जा सकता, ऐसा होता है तो फिलहाल की तथाकथित वैज्ञानिक बहसों में कम से कम “पहले दर्जे अनुमान” तो हो ही जाएगा|

असल में ये हमे बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था, उदहारण लेते हैं वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट का जिसके जटिल आंकड़ों में तमाम अर्थशास्त्री उलझे हुए हैं, वित्त मंत्रालय की अपनी रिपोर्ट में ही अर्थशास्त्री एकमत नहीं हो पा रहे हैं| जाहिर है कि अर्थशास्त्रियों के मतभेद से देश भर की आबादी का संशय बरक़रार है, ऐसे में चुनावी वादों में यह कहना कि कालाधन वापस लायेंगे यह कहाँ की समझदारी है, जिन्हें ये तक नहीं पता कि देश में कितना कालाधन है, वो देश के बाहर से कालाधन वापस लाने का दावा करें तो मजाक ही माना जायेगा|

न केवल देश के अर्थशास्त्रियों बल्कि वित्त मंत्रालय खुद मानता है कि “ऐसा आकलन असंभव है” “तमाम दूसरी धारणाएं हैं”, “आंकड़े मौजूद नहीं इसलिए हम कह नहीं सकते” ऐसे में अर्थशास्त्र की क्या अहमियत बचती है? फिलहाल की नोटबंदी में देश में मौजूद कालेधन का 86% निश्चित रूप से ठिकाने लगा है, हमारा अपना दावा है कि सर्वोच्च तकनीकों का इस्तेमाल करके ऐसा संभव हुआ| जाहिर है कि फिलहाल के हालातों में कम से कम 86% तक के शुद्ध आंकड़ों के साथ तो ऐसा किया ही जा सकता है| तो क्या नोटबंदी के बाद आज, हम देश में मौजूद कालेधन या कालेधन के बनने की चाल का कोई अनुमान लगा सके? 

नोटबंदी के बाद सफलता तो तब होगी जब हम देश में मौजूद कालेधन या काली कमाई का सही-सही अनुपात पता कर सकें या फिर उसके लिए कोई ठोस अध्ययन हो| अध्ययन या आकलन में मिला यह अनुपात हमे आगे होने वाली नोटबंदी के लिए सही जानकारी देगा|

कालेधन के आकलन में दूसरी अहम बात है अर्थव्यवस्था में रुपये की चाल या चलनीयता| इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में मौजूद रूपये से कितनी आर्थिक गतिविधियाँ चलती हैं जिनसे काले या सफ़ेद कारोबार किये जाते हैं| किसी भी कालखंड में काले और सफ़ेद धन का एक अनुमान इससे भी लगता है| अगर हम रुपये की गति, चाल या चलनीयता का आकलन करने में सक्षम नहीं है तो हम काले और सफ़ेद धन के सालाना आकलन में कभी कामयाब नहीं होंगे| कारण चाहे जो भी हों लेकिन एक अचम्भे की बात ये भी है कि वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में तक में भारतीय रुपये की रुपये की गति, चाल या चलनीयता का कोई जिक्र नहीं! सिर्फ इतना ही नहीं, कालेधन, काली कमाई और काली अर्थव्यवस्था की शब्दावली में भी बहुत संदेह पैदा करती है, रिपोर्ट एक अवधारणा से शुरू होती है कि इन शब्दों का कोई स्वीकृत मानक या परिभाषा नहीं| ऐसे में एक शब्द यहाँ तो दूसरा दूसरी जगह प्रयोग करते हुए रिपोर्ट को बेहद थ्रिलर और संदेहजनक बनाने का प्रयास किया गया है|

कालेधन के आकलन में दूसरी अहम बात है अर्थव्यवस्था में रुपये की चाल या चलनीयता| इसका अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में मौजूद रूपये से कितनी आर्थिक गतिविधियाँ चलती हैं जिनसे काले या सफ़ेद कारोबार किये जाते हैं| किसी भी कालखंड में काले और सफ़ेद धन का एक अनुमान इससे भी लगता है| अगर हम रुपये की गति, चाल या चलनीयता का आकलन करने में सक्षम नहीं है तो हम काले और सफ़ेद धन के सालाना आकलन में कभी कामयाब नहीं होंगे| कारण चाहे जो भी हों लेकिन एक अचम्भे की बात ये भी है कि वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में तक में भारतीय रुपये की रुपये की गति, चाल या चलनीयता का कोई जिक्र नहीं! सिर्फ इतना ही नहीं, कालेधन, काली कमाई और काली अर्थव्यवस्था की शब्दावली में भी बहुत संदेह पैदा करती है, रिपोर्ट एक अवधारणा से शुरू होती है कि इन शब्दों का कोई स्वीकृत मानक या परिभाषा नहीं| ऐसे में एक शब्द यहाँ तो दूसरा दूसरी जगह प्रयोग करते हुए रिपोर्ट को बेहद थ्रिलर और संदेहजनक बनाने का प्रयास किया गया है|

कालेधन के आकलन का तीसरा अहम हिस्सा है भारतीयों द्वारा देश या विदेश में रखे गए कालेधन (नकदी और संपत्तियों) का अनुपात| इसकी अहमियत नोटबंदी के दौरान पता लगेगी| इतना ही नहीं इस जटिल अनुपात के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा भी जुड़ी है| क्या हमारे पास इस अनुपात का कोई आकलन है?

कालेधन (यानि नकदी और संपत्तियों) आंकने के लिए तीसरा अहम् पहलू है भारतीयों द्वारा देश और विदेश में जमा की गयी रकम का अनुपात| यह दीगर बात नोटबंदी के दौरान निकल कर सामने आएगी| इसकी अहमियत कालेधन भर की ही नहीं इसके तमाम मामले राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़े हैं| क्या हमारे पास इस अनुपात के आकलन की क्षमता मौजूद नहीं?

क्या यह उस दावे की तुलना में कोई अहमियत रखता है जिसमे बताया गया है कि “मोटे तौर पर 72.2 प्रतिशत अवैध संपत्तियां विदेशों में मौजूद है जिसमे भूमिगत अर्थव्यवस्था भी शामिल है”| यह आंकड़ा ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी की एक रिपोर्ट के मार्फ़त लेकर वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुच्छेद 2.7.4 में शामिल किया गया है| अगर वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किये गए इन आंकड़ों को सही माना जाए तो क्या भारत के भीतर की गयी नोटबंदी का कोई अर्थ निकलता है है, क्योंकि भारतीय कालेधन का 72% तो देश के बाहर उन देशों में मौजूद है जहाँ यह कालाधन सफ़ेद हो चुका है! क्या इसका अर्थ यह नहीं कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने न ही तो वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट पर कोई गौर किया और न ही कोई जिम्मेदारी उठाने को तैयार है! उसके बावजूद हिंदुस्तान में कालेधन की शाह और मात के लिए नोटबंदी का दौर जारी है|

चौथी अहम् बात यह होनी चाहिए कि देश में मौजूद कालेधन  में सोने और नकदी का अनुपात कितना है? इन दोनों चीजों पर महंगाई का असर अलग-अलग तरीके से पड़ता है! हमारे पास न ही तो इस अनुपात का कोई अंदाज़ा है न ही इस बात का कोई आकलन है कि देश में कितना सोना मौजूद है| अगर ये सब आंकड़े नहीं पता किये जा सकते हैं तो फिर हमारे अर्थशास्त्री या वित्त विशेषज्ञ किस आधार पर दावा कर रहे हैं कि नोटबंदी से कालेधन की समस्या हल हो जाएगी? और किस आधार पर वे यह तय कर रहे हैं कि एक रुपये की कीमत 65.5 रुपये है और किस आधार पर यह दर हर रोज घटती बढती है?

अगर वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट खुद ही सालाना जीडीपी में बननेवाले कालेधन का आकलन करने में कारगर नहीं और कालेधन के घटने बढ़ने का अनुमान 100% बताती है साथ ही कालेधन और कालाधन बनने को लेकर संशय पैदा करती है तो फिर यही रिपोर्ट महंगाई का अनुमान कैसे निश्चित कर रही है? क्या उन्होंने इसके सभी पहलुओं का आकलन किया है, कदापि नहीं|

अगर इस अर्थव्यवस्था में 0.25 ट्रिलियन डॉलर सफ़ेद और 4.75 ट्रिलियन डॉलर कालाधन शामिल हो जाता है तो महंगाई की दर क्या होगी, यह परिस्थिति तब है जब कालाधन बनी पेपर करेंसी नोटबंदी में रद्द कर दी गयी? अगर ये रद्द नहीं होता है या आंशिक रूप से रद्द होता है तब अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा और दोबारा बनती है तब रद्द करने का क्या अर्थ रह जाता है? फिलहाल के हालातों से क्या इसका दूर-दूर तक कोई अनुमान होता है? इस हालत में महंगाई की दर क्या होगी? कालेधन के लिए प्रधानमंत्री जी के दिए गए संकेतों की बजाये न्यूनतम को भी आधार मान कर हिसाब करें तो विदेश में मौजूद कालेधन और भारत में मौजूद कालेधन का अनुपात 72:28 का निकलता है ऐसे में क्या महंगाई से निजात मिलना संभव हो पायेगा?

भारत में कालेधन की स्थिति (अनुमानित तौर पर)

  1. सड़े-गले नोटों से सरकार द्वारा बनाया गया कालाधन

इस बार की नोटबंदी में आम जनता द्वारा चौदह ट्रिलियन (लगभग 0.25 ट्रिलियन डॉलर) रूपया  दिया गया| इस हिसाब से इतनी कीमत के नोट तो इस साल चलन में रहेंगे ही| मान लिया जाए (आईजीबीसी की रिपोर्ट पेज 53) कि साल के अंत तक इसमें से बीस प्रतिशत नोट कट फट जाते हैं या ख़राब होकर वापस आ जाते हैं तो उनको राजनीतिक दलों द्वारा दोबारा चलन में लाया जायेगा| जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के मामले में ऊपर बताया गया| इस हिसाब से पिछले चालीस सालों में 56 ट्रिलियन (0.9 ट्रिलियन डॉलर) रूपया चलन में लाया गया|

कालेधन का यह सबसे छोटा आंकड़ा है,जो पिछले चालीस सालों में निकल कर सामने आया| गौरतलब है कि इसका एक चौथाई हिस्सा ही नोटबंदी से वापस हासिल हो सका है|

  1. सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत में

भारत में जीडीपी की तुलना में कालेधन का प्रतिशत बीस प्रतिशत से सौ प्रतिशत तक होता है| शायद इसकी वजह यह है कि कालेधन और काली अर्थव्यवस्था जैसे शब्दों का अदल बदल कर प्रयोग किया जा रहा है जो कि गलत है| (विभिन्न स्रोतों के के मुताबिक मुद्रा की गति और काली कमाई के किसी भी आंकड़े के न होने की दशा में) पहली बार हुए विमुद्रीकरण के बाद से अब तक अनुमानित तौर पर 30-70 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की मुद्रा मौजूद होनी चाहिए| ऐसा विता मंत्रालय की रिपोर्ट और मुद्रा की चाल के बारे में ऊपर कहा जा चुका है|

  1. देश के बाहर जमा कालाधन

महज दस प्रतिशत रूपया बाहर जमा हुआ, सहज रूप से यह मान कर और उपलब्ध अन्तराष्ट्रीय सूचनाओं के आधार पर अनुमान कर सकते हैं कि देश में मौजूद कालेधन का अनुमान कर सकते हैं|

  1. सीबीआई की रिपोर्ट में ही जिक्र मिलता है कि पांच सौ बोल्लिओं डॉलर कालाधन देश के बाहर मौजूद है| ये महज वो आंकड़ा है जिसके बारे में सीबीआई ने जांच की है, यह आंकड़ा न्यूनतम अनुमान भर है| इसका सीधा अर्थ यह निकल सकता है कि नकदी और संपत्तियों को मिला कर कम से कम पांच ट्रिलियन डॉलर कालाधन देश में ही मौजूद है|
  2. वर्ष 2009 के चुनावों के ठीक पहले भारतीय मीडिया में रिपोर्ट आई कि कम से कम 1.4 ट्रिलियन डॉलर कालाधन अवैध रूप से विदेशों में जमा है| यह आंकड़ा ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट जैसा है| इसके आधार पर अनुमान लगाने पर हमे चौदह ट्रिलियन डॉलर कालाधन (नकदी और संपत्तियों के रूप में) देश में ही मौजूद होने का अंदाज़ा मिलता है|
  3. देश की पहली नोटबंदी के दौरान मिली सूचनाओं से पता लगता है कि बैंक में जमा होने वाले हर रुपये के साथ दस रूपया धार्मिक संस्थानों से आया| उसी आंकड़े को इस बार भी मानक के तौर पर लेते हैं तो इस बार बैंकिंग चैनल से आने वाले रुपये का हिसाब 250 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के पार चला जाता है| इसका बीस गुना सूदखोरों की तरफ से जमा हुआ—जो कि छद्म वेश में धार्मिक संस्थान सरीखे ही हैं| इन सबका आकलन हमे अनुमानित तौर पर पांच ट्रिलियन डॉलर कालाधन देश में ही मौजूद होने का संकेत देता है!
  4. अन्तराष्ट्रीय स्तर पर हवाला कारोबार और पनामा दस्तावेजों के मामले में जर्मन, कैनेडियन और फ्रेंच रिपोर्टों की मानें तो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद कालेधन की नकदी में भारतीयों का हिस्सा सात ट्रिलियन डॉलर का है, यह अनुमान देश के बाहर के बैंकिंग सिस्टम में कुल जमा संपत्तियों के बराबर है| इस अंदाजे से विदेशों में मौजूद कालेधन (नकदी और संपत्तियों) का आंकड़ा पंद्रह ट्रिलियन डॉलर बैठता है| इसके आधार पर देश में मौजूद कालेधन का अनुमान करें हैं तो 150 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का संकेत मिलता है|
  5. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हेर्वे फेल्सियानी कहते हैं कि भारत सरकार ने एक छोटा हिस्सा ही लिया है साथ ही उनका दावा है कि उनके पास देश के बाहर मौजूद “मिलियंस ऑफ़ क्रोर्स” कालाधन होने के आंकडे उपलब्ध हैं| इस जानकारी के मुताबिक मिलियंस का अर्थ महज पांच मिलियन ही लेकर, भारतीय रुपये में अनुमान करें तो पता लगता है कि लगभग एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर कालाधन हर साल हवाला के जरिये विदेश जाता है| यद्यपि वे इस कालेधन की सालाना गतिविधि का दावा नहीं करते लेकिन वर्ष 2002-06 के बीच हुए आकलन से ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी ने अनुमान लगाया है कि विकासशील देशों से हर साल लगभग एक ट्रिलियन डॉलर रूपया देश के बाहर जाता है(इसका जिक्र हमारे वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में भी मौजूद है)| विकासशील देशों की इस उपलब्धि में भारत का हिस्सा सबसे ज्यादा है| इस आकलन को आधार मानें तो लगभग पच्चीस ट्रिलियन डॉलर की रकम विदेशों में मौजूद मालूम होती है, यह हालिया वर्षों की न्यूनतम रकम है| इसके हिसाब से देश के भीतर 250 ट्रिलियन डॉलर कालाधन होने का अनुमान मिलता है, यह आंकड़ा आम आदमी को विचार शून्य कर देने वाला है|
  6. हमारे प्रधानमंत्री द्वारा कालेधन का आकलन

हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी ने खुले तौर पर वादा किया कि विदेश में मौजूद कालेधन से हर भारतीय नागरिक को पंद्रह लाख रुपये मिल सकते हैं| अगर एक परिवार में पांच लोग हैं और प्रत्येक को या पूरे परिवार को पंद्रह लाख रुपये दिए जाते हैं तो इतना करने में 5-25 ट्रिलियन डॉलर लग की जरुरत होगी| इस हिसाब से हमारे देश में कालाधन 50 से 250 ट्रिलियन डॉलर कालाधन मौजूद होना चाहिए|

इस प्रकार देश में मौजूद कालाधन जहाँ कहीं भी हो उसका आंकड़े 5-14-100-150-250 ट्रिलियन डॉलर बनते हैं| सीबीआई की जांच में मिली न्यूनतम की जानकारी को सही माना जाए तो भी पश्चिमी देशों के अर्थशास्त्रियों को नजर अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए| तीसरी दुनिया के देशों के आर्थिक चिंतन से चूँकि उनको कोई प्रत्यक्ष हितलाभ नहीं इसलिए उन्हें महज पश्चिमी अर्थशास्त्री नाम कर नजर अंदाज कर देना उचित नहीं होगा|

इस हिसाब से देश में मौजूद कालेधन का सही-सही अनुमान 150-250 ट्रिलियन डॉलर माना जा सकता है| यह आंकड़ा सिर्फ हमारे प्रधानमंत्रीजी ने ही ज्यादातर जर्मन फ्रेंच और कनाडियन अर्थशास्त्रियों की भी खोजों से पुख्ता होता है|

आरबीआई ने उपरोक्त तमाम प्रश्नों का जवाब देने से मना कर दिया है क्योंकि उनके मुताबिक इससे उसकी जान को खतरा हो सकता है| उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? जाहिर है या तो रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्री भारत के लोगों के लिए अपना कर्त्तव्य भूल बैठे हैं या फिर देश की सुरक्षा व्यवस्था उनके लिए अपर्याप्त कही जा सकती है जिससे उनको सत्य का उद्घाटन करने का साहस नहीं रहा| वजह चाहे कुछ भी हो ऐसे हालातों में परिवर्तन की खासी जरुरत है|

अगर इन सवालों का जवाब मौजूद नहीं और न ही कोई आंकड़े उपलब्ध हैं तो जाहिर है कि नोटबंदी में जो मकसद बताये गए वो असली मकसद नहीं, और इसी से आईआईएम सरीखे प्रबंधन संस्थानों, अर्थशास्त्र के व्याख्याताओं और वित्त विशेषज्ञों की असफलता जगजाहिर होती है, जिन्होंने ठोस गणनाओं और अर्थशास्त्र के सिद्धांतों की बजाये भ्रामक नारेबाजी भर का काम किया है|

अगर ये महज जानकारी की कमी या उपेक्षा का मामला है तो बेहतर होगा कि इससे जुड़े सभी लोग कुछ गंभीर अध्ययन करें क्योंकि वे जनता का पैसा खर्च करने के ही विशेषज्ञ बताये जाते रहे हैं जिसका उन्हें यथोचित सम्मान भी मिला है| लेकिन अगर वे सब कुछ जानते हैं और उन्होंने सही सही गणनाएं नहीं कि हैं तो यह ज्यादा गंभीर बात है| चाहे वे यह काम भय से न कर पा रहे हों अथवा अपने स्वार्थ से वे धोखेबाजी और भारत के लोगों के खिलाफ आर्थिक अपराधों को अंजाम दे रहे हैं, ऐसे में उनके और उनके राजनैतिक सरपरस्तों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा किया जाना चाहिए|

पहले दौर की नोटबंदी का प्रभाव

कालाधन सफ़ेद और शुद्ध हुआ – सैफरनगेट-1

अपेक्षाकृत विनम्र, नैतिक उत्कृष्टता और विश्वास पर अडिग करने वाली भारतवर्ष की धार्मिक और अध्यात्मिक चेतना को समूल भ्रष्ट करने का सिलसिला पहली दफा शुरू हुआ उज्जैन में| 180 साल पहले उज्जैन में अंग्रेजों ने विद्वानों को खरीदकर सूर्यग्रहण की तिथियों में हेर-फेर करने की कोशिश की ताकि धार्मिक आस्था रखने वाले लाखों लोगों को बहकाया जा सके| फिर तारीखों को सुधार करके उनके ज्योतिष ज्ञान और धार्मिक विश्वास को तोड़ा जा सके|

यह भ्रष्टाचार अब तक ज्ञात भ्रष्टाचार के मामलों से कहीं ज्यादा बड़ा उदहारण है जिसे पहला भगवाकांड या अंग्रेजी में कहें तो पहला सैफरन गेट कहा जा सकता है, क्योंकि यह भारत देश को अध्यात्मिक रूप से दुनिया के देशों में सबसे भ्रष्ट देश बनाने का सीधा मामला था, यही सर्वश्रेष्ठता हमारी वह विशेषता है जो आज तक किसी और क्षेत्र में हासिल नहीं की जा सकी|

इसी तरह जब पहला दौर हुआ नोटबंदी का तो सौ रुपये के ऊपर के सभी बड़े नोट अवैध घोषित कर दिए गए, और दोबारा जारी भी नहीं किये गए| इस तरह देखा जाए तो नोटबंदी करके कालेधन के खिलाफ उठाया गया ये कदम सैद्धांतिक रूप से सही कहा जायेगा| तब की नोटबंदी में कालेधन वालों के खिलाफ हुई कारवाई से दिक्कत हुई लेकिन हालिया नोटबंदी में तो कालेधन वालों को सफ़ेद करके बड़े नोटों में बदलने का बेशुमार मौका दिया गया|

पहले दौर की नोटबंदी में कई राज्यों के तमाम धार्मिक संस्थान अधिकारीयों के पास आये| उन्होंने धर्मभीरु भक्तों और दानदाताओं के चंदे में मिली रकम जमा करने में छुट मांगी| अमूमन इन धार्मिक संस्थानों में किससे कितना दान मिला इसकी बहुत ज्यादा परवाह नहीं होती, लिहाजा सरकार ने उन्हें नियत समय में जमा करने की बजाए मियाद और पैसे की मात्रा दोनों में छूट दी| तब भारत में आम लोगों को यह छूट नहीं थी|

फिर भी इस छूट से धार्मिक संस्थानों की असली कारसाजी का पता लगा, साथ ही राजनैतिक-कॉर्पोरेट-अपराधिक गिरोहों का भी| कालेधन वालों ने दानखातों में जो पैसा दिया वह संस्थानों के विशेषाधिकार से सफ़ेद हो गया, इस प्रक्रिया में गिरोहों के सभी हिस्सेदारों ने अपनी अपनी कीमत भी हासिल कर ली| धार्मिक संस्थानों के हिस्से में भी हजारों करोड़ आ गए|

उसके बाद ये धार्मिक संस्थान पक्के तौर पर माफिया हो गए, अचानक मिले पैसे को जमीनों और आर्थिक गतिविधियों में लगा कर तमाम पैसा बनाया| कुछ धंधेबाज बाबा तो बहुराष्ट्रीय हो गए और उन्होंने भ्रष्ट राजनेताओं और कॉर्पोरेट के कालेधन को ठिकाने लगाने का व्यापार ही शुरू कर दिया, इसी के साथ उन्होंने भारत देश के बाहर के तमाम देशों जैसे अमेरिका, कनाडा, न्यूज़ीलैण्ड, इंग्लैंड आदि देशों में और द्वीपों तक में अपना कारोबार बढ़ा लिया| इस तरह बाबा बाज़ार खड़ा हुआ| करचोरी, कालाधन सफ़ेद करने और पनामा पेपर्स आदि मामलों में जर्मनी फ़्रांस और कनाडा की सरकारों ने ऐसे लोगों को, राजनेताओं और कोर्पोर्रेट को भारत सरकार को वापस पहुँचाने का प्रस्ताव भी दिया| तमाम आजाद ख्याल पत्रकारों इन गिरोहों में वापस की कारसाजी की जांच पड़ताल की जो कि वर्ष 2015 तक जारी रही|

राजनीतिक धार्मिक और अध्यात्मिक जगत में स्थापित और कालेधन के मामलों में छाती पीटने वाले, कालाधन वापस लाने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने वाले सभी महाशय जर्मनी और दूसरी सरकारों या खोजी पत्रकारों से मिली सूचियों पर चुप्पी साध गए|

प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले पांच सालों में तय किया है कि ज्यादातर और तमाम धार्मिक संस्थानों को हिंदुस्तान के बाहर से हजारों करोड़ रुपया मिलता है, जिसकी न तो कोई जांच होती है और न ही जनता में कोई जिक्र, उनके आपसी सदस्य भी कोई सवाल नहीं करते| न ही कोई मुकदमा दर्ज होता है और न ही कोई सजा होती है|

नोटबंदी का दूसरा दौर:

हालिया दौर की नोटबंदी का असर

देश की हैरतअंगेज अर्थव्यवस्था से एंग्लो-अमेरिकन चमत्कारों तक

टूटी फूटी आज़ादी मिलने के बाद से अब तक सारे देश की आवाम के खून पसीने की कमाई ही हमारी हैरतअंगेज अर्थव्यवस्था है, जिसे अन्तराष्ट्रीय बैंकिंग के गिद्धों और पूंजीखोर सामंतों के हवाले कर दिया गया| जब नए देश का जन्म हुआ तो उसे महज सौ करोड़ रुपये देकर छोड़ दिया गया| उसके तुरंत बाद हमे विभाजन और भयानक युद्ध की त्रासदी थोप दी गयी, जिसमे हमने अपनी कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर की संपत्तियों की बर्बादी देखी| हम उससे उबर भी न पाए थे कि महात्मा गाँधी की हत्या हो गयी, इससे जो देशवासियों के लिए जो मनोवैज्ञानिक त्रासदी हुई उसमे लोगों के मन भी बंट गए| यह स्थायी मानसिक बंटवारा हुआ समाजवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच| ये दोनों समूह भी अंग्रेजी कूटनीति फूट डालो और राज करो की तकनीक से बने| राजनीतिक धार्मिक समुदाय और सामाजिक नेतागण महात्मा गाँधी की हत्या और विभाजन की त्रासदी के बाद भारी ह्रदय से और एकल मनोयोग के साथ राष्ट्र निर्माण में जुट गए लक्ष्य था कि अगले पच्चीस सालों में हमारा राष्ट्र एक विश्व शक्ति बने|

इस स्थिति में दूरदर्शी नेतृत्व और भारत के लोग एक परिवार की तरह कंधे से कन्धा मिला के राष्ट्र निर्माण में उद्यत हुए, दृढ निश्चय यह था कि देश को बचा कर प्राचीन विरासत के वैभव तक पहुँचाना है| ब्रिटिश इतिहासकारों, भाषाविदों, विशेषज्ञों  और प्राच्यवादियों की करतूतों के बाद बचे खुचे ज्ञान स्रोतों से यह काम आसान तो न था|

उन दूरदर्शी लोगों ने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए एक समाजवादी आदर्श अपनाया और खाद्यन्न आत्म निर्भरता के लिए कृषि को आदर्श बनाया| पब्लिक सेक्टर में भारी निवेश करके लक्ष्य तय किया कि अपने हथियार खुद बनायेंगे| लेकिन निरंतर जारी जालसाजियों के चलते भारत में पूंजी निर्माण अवरुद्ध हो गया|

फ़िरोज़ गाँधी ने एक मास्टर स्ट्रोक से सारे इंश्योरेंस उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करके भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) का भीमकाय संस्थान खड़ा कर दिया| इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जरुरी पूंजी की व्यवस्था देश के लोगों की बचत से होनी शुरू हो गई| हम पर चीन का युद्ध थोपा गया, इसके दो मकसद थे, पहला हमारी सेना का मनोबल तोड़ना और दूसरा देश के संसाधनों  को लूटना| लाखों भारतीयों ने अपना पहना हुआ सोना दान कर दिया ताकि इस युद्ध में वित्तीय व्यवस्था हो और हमारी सुरक्षा मुकम्मल हो सके| चीन के साथ हुए युद्ध के बाद हमने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और 1971 के युद्ध के बाद भारत ने आयल इंडस्ट्री का राष्ट्रीयकरण करने के साथ-साथ आम आदमी की जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए तमाम दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का विस्तार किया|

विदेशी कर्ज से एक भी पैसा लिए बगैर भी भारत ने आतंरिक उपक्रमों से लाखों करोड़ रुपये बना कर आर्थिक, खाद्य, और सैन्य मोर्चों पर उल्लेखनीय स्वावलंबन हासिल किया| जब देश के आतंरिक सुरक्षा उपकरणों ने अनुभव किया कि जिन ब्रिटिश एजेंटों की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण किया गया, वे कालेधन और काली अर्थव्यवस्था के संचालक बनकर देश को खोखला कर रहे हैं, ऐसे में कालेधन के खिलाफ चली कलम से सारा पैसा जनता की जवाबदेही में लाकर देश की तरक्की में लगा और देश ने विज्ञानं अंतरिक्ष न्युक्लीअर एनर्जी में भारत दुनिया का प्रमुख देश बना|

हम फिर से दोहराते हैं कि पिछले दौर (1978) की नोटबंदी में में बड़े मूल्य की मुद्रा निरस्त करके दोबारा नहीं की गई| गरीब और ईमानदार आम भारतीयों के खून पसीने और मेहनत की कमाई को फौलादी इच्छाशक्ति और देश भक्ति से सम्मान मिला| देश के फैसले के लिए जरुरी थी, भूराजनीति और अन्तराष्ट्रीय उपनिवेशों के विनाश और बर्बादी की गहरी समझ जो भारत ने एक शताब्दी की जद्दोजहद करके बनाई, जिसके आधार पर अपना आर्थिक विकास का यंत्र बनाया जिसमे मैन्युफैक्चरिंग और कृषि की मजबूती से (उदारीकरण के पहले) 1.2 ट्रिलियन डॉलर की वैध और इतने ही मूल्य की काली अर्थव्यवस्था आबाद हुई|

लेकिन उसी दौर में दुनिया की तथाकथित अर्थव्यवस्थाएं कर्जों के बोझ से टूट रही थीं, जिसके चलते उन्होंने जालसाजी और लालच का ताना-बाना बुना| उनके रणनीतिकारों ने ये नतीजा निकाला जिससे इण्डियन इकनोमिक मिरेकल द्वारा पिछले साठ सालों में भारतीयों द्वारा कड़ी मेहनत से बनाई पूंजी को लूटा जा सकता था| निजीकरण और उदारीकरण से ये लूट शुरू हुई| निजीकरण के तमाम आयामों में ईस्ट इण्डिया कंपनी के मालिक जैसे बैंक ऑफ़ इंग्लैंड भी शामिल है| ऐसा करके उन्होंने चर्चिल को किये गए माउंटबेटन के उस वादे को पूरा किया जिसमे उसने कहा था कि,” अब अगर चर्चिल भारत को बिना शर्त आज़ादी के सिद्धांत पर कायम रहते हैं तो आने वाले पचास सालों में सिर्फ ब्रिटिश इण्डिया ही नहीं बल्कि सारे भारत पर दोबारा कब्ज़ा होगा”| शायद ये अकेली घटना है जिसके लिए वो अंग्रेज अपने वादे पर कायम रहे|
उदारीकरण और निजीकरण के शुरुआती दौर में इंग्लैंड में मॉनिटर ग्रुप बना जिसे भारत के निजीकरण की प्रक्रिया की देखभाल का जिम्मा सौंपा गया वह ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों और फॉरेन ऑफिस के साथ नजदीकी से जुड़ा रहा| धीरे धीरे ब्रिटिश दूतावास ने योजना आयोग के पंचवर्षीय योजनाओं को बनाना शुरू किया| और आखिरकार हाल ही में हमने योजना आयोग को ही नकार दिया, शायद हर चीज की देखभाल ब्रिटेन ही करे, भारतीय सोचने लगे कि कर्मचारियों का वेतन महज पैसे की बर्बादी भर है|

बीसवीं शताब्दी के बीच में उपनिवेश सिमटने लगा और दुनिया में समाजवाद गणतंत्रों की बहार चली| लम्बी गुलामी से आजाद हुए और नए बने देशों ने महसूस किया कि देश की अर्थव्यवस्था फिर से बनाने की जरुरत महसूस की| उन्हें समाजवाद का मॉडल फॉलो करना था जिसमे बचे संसाधनों का इस्तेमाल करके सरकारों को सबकी भलाई करने का जिम्मा उठाना था|

1920 से 1970 तक चालीस से ज्यादा देशों में उनकी सरकारों के नियंत्रण और देखरेख में बेहिसाब संपत्ति बनाई गयी| यद्यपि इसमें धन हिसाब किताब में हेर-फेर के आरोप भी लगे लेकिन कुल मिलाकर इन देशों में खरबों डॉलर की संपत्तियां बनाई गयीं| ये संपत्तियां गुलामी की सीमाओं के बाहर थीं|

वस्तुओं के मुक्त व्यापार न होने की दशा में, औपनिवेशिक ताकतों के भूखे मरने की नौबत आ गयी, अमेरिका, जो दूसरे विश्वयुद्ध की क्षतिपूर्ति के लिए बचा रहा, को छोड़कर उन देशों का अपना आर्थिक खांचा सांचा बरक़रार रखना मुश्किल होने लगा| समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं पर जोर लगना पचास के दशक से ही शुरू हो गया, जिसमे फ़िल्मी तर्ज पर नेताओं की जगह कठपुतली सरकारों को स्थापित करना जारी हुआ, कठपुतली सरकारों ने अपने देशों की संपत्तियों को कौड़ी के दामों पर बेचने का सिलसिला शुरू किया|

इस दौरान हर युद्ध और समाजवादी गणतंत्रों के हर तख्तापलट में उनके संसाधनों को हड़पने का मकसद कामयाब होता रहा, और वो देश न ठीक होने वाले नुकसान झेलते रहे| ये सब हुआ पश्चिमी अर्थव्यवस्था और जीवनशैली को पालने के लिए जो कि गलत आर्थिक सिद्धांतों की देन थीं| जब ऐसे तीस देश बरबाद हो गए तो “फूट डालो और राज करो” की इस प्रक्रिया का नया नामकरण हुआ “निजीकरण और उदारीकरण”| इस खांचे सांचे का सैद्धांतिक पक्ष बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के चेयरमैन ने 1971 के दौरान प्रस्तुत किया था| इस प्रक्रिया के आखिरी मोर्चे के देश थे रूस और भारत, जिनके संसाधनों की लूट आखिरी मोर्चे पर थी|

अस्सी के दशक में रूस के संसाधन निशाना बने जिनकी कीमत लगभग 75 ट्रिलियन डॉलर थी| औपनिवेशिक ताकतें रूस पर कब्ज़ा करने में लगभग कामयाब हो चुकी थीं लेकिन व्लादिमीर पुतिन के युग आने के साथ उन का सफाया शुरू हुआ| एक एक करके पुतिन ने उनको दरकिनार करके मातृभूमि रसिया की आत्मनिर्भरता बहाल की|

इसी बीच दक्षिण कोरिया का आर्थिक चमत्कार नेस्तनाबूद हुआ और पूरा देश अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों के भरोसे हो गया| रूस के हाथ से निकल जाने के बाद आँखे लगीं एक निर्बाध संसाधन संपन्न देश पर, जिसने ठगों, चोरों, लुटेरे सामंतों और इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसियों के हजारों सालों के निरंतर लूट के बाद भी अज्ञात और अपार संसाधनों की प्रचुर संभावनाएं मौजूद हैं… वह देश है भारत|

एक एक करके दो प्रधानमंत्रियों की हत्या के बाद निजीकरण और उदारीकरण का मंच तैयार हुआ जिसमे मूल मन्त्र बना “विकास” मानो यह देश कोई अजूबा हो|

इस देश में कालेधन (संपत्तियों और नकदी) अनुमानित तौर पर सत्तर ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा है| यह रूस के कुल प्राकृतिक संसाधनों के बराबर होता है| किसी को भी नहीं पता कि लोगों धार्मिक और अध्यात्मिक संस्थानों के पास कितना सोना है, कितने हीरे-जवाहरात, कितने रत्न-माणिक्य और कितनी बहुमूल्य धातुएं हैं,  न ही कोई यह जानता है कि देश की रत्नगर्भा वसुंधरा कितना सोना अपने गर्भ में छिपा रखा है|

न ही तो किसी को ये मालूम कि भारतीय उपमहाद्वीप में धरती के नीचे दुर्लभ खनिजों की मात्रा कितनी है और न ही कोई ये जानता है कि हजारों लाखों सालों से इसका इस्तेमाल किन तकनीकों से होता रहा है| हम महज इतना जानते हैं कि 1870 में जब ईस्ट इण्डिया कंपनी ने घोषित किया कि इस देश में कहीं भी हीरे की खानें नहीं है उसके बाद उन्होंने हीरे के लिए दक्षिण अफ्रीका का रुख किया| लेकिन पिछले पांच सालों से हम अचानक यह कहने लगे कि एक भारत से बिलियन डॉलर मूल्य से ज्यादा के हीरे और कीमती रंगीन पत्थरों का निर्यात हर साल हो रहा! ये कहाँ से आये? हीरे की नईं खानों से या धार्मिक सांस्कृतिक संस्थानों से लूटकर जिन्हें नयी खोज के तौर पर दिखाया जा रहा है?

यही वजह है कि जब दुनिया की संस्थायें जब पूरी दुनिया की संपत्तियों का लेखा जोखा करती हैं तो उसमे भारत का जिक्र कभी नहीं होता न ही भारत के संसाधनों का कोई हिसाब किया जाता है| शायद सभी संस्थानों को पता है कि भारत आज भी ब्रिटिश हुकूमत के अधीन है और ये गणनाएं करने के लिए ब्रिटेन की इजाजत की जरुरत होगी| फिर भी चीन जिसकी कुल संपत्तियां 23 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की हैं और दुनिया में उसकी अर्थव्यवस्था की हैसियत दुसरे नंबर की बताई जा रही है, एशिया की एक वैश्विक शक्ति है और भारत से आगे है| जबकि असल में चीन के कुल संसाधनों की कीमत भारतीय अर्थव्यवस्था के कालेधन के हिस्से का एक तिहाई है| फिर भी हमे लुक ईस्ट कह कर बरगलाया जा रहा है और सब देख भी रहे है, भगवांन जाने कि वे भारत में पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण कहाँ से और किस तरीके से तय कर रहे हैं!

पश्चिमी देशों को जो तथ्य और आंकड़े पता हैं वे आज़ादी के बाद के हैं और हम भारतीयों को अनदेखी की खानदानी बीमारी है इसीलिए आज़ादी के पहले हमारे पास आर्थिक और मानवीय संसाधन क्या-क्या थे ये कोई जानना नहीं चाहता| सिर्फ कर्णाटक में धार्मिक और अध्यात्मिक संस्थानों का मूल्य 30-50000 हजार करोड़ रुपये (लगभग 7.5 बिलियन डॉलर) आँका गया| तिरुवनंतपुरम के श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के सिर्फ एक वाल्ट से मिले सोने की कीमत सबसे रुढ़िवादी तरीके से आंकी जाए तो भी ट्रिलियन डॉलर के ऊपर निकलती है| पहले के आंध्र प्रदेश राज्य में महज वेश्यालयों के अखाड़े तीस हजार करोड़ से (लगभग 4.5 बिलियन डॉलर) ज्यादा कीमत के हुआ करते थे, जिनसे एक हजार करोड़ (155 मिलियन डॉलर) से ज्यादा की आय होती थी|

तिरुमाला मंदिर के टूटे और निष्प्रयोज्य आभूषणों के रजिस्टर में दर्ज हीरे-जवाहरातों की कीमत 500 बिलियन डॉलर से ज्यादा आंकी गयी है| सिर्फ हिंदुस्तान में यह सुना जाता जाता है कि हीरे में टूट-फूट होती है, और ज्यादा समय तक प्रयोग न किया जाये तो बेकार हो जाते हैं| लेकिन तिरुमाला में सबको पता है कि ये टूटे और निष्प्रयोज्य आभूषण और हीरे की गर्द चेन्नई, कोलकाता और दुबई में भारी कीमत में बेचीं जाती है| एक दशक से ज्यादा शासन में रहे हर मुख्यमंत्री ने 50000 करोड़ रुपये (7.5 बिलियन डॉलर) से ज्यादा कीमत की संपत्ति बनाई| 35 सबसे बड़े घोटालों में कुल 8 लाख करोड़ रुपयों (120 बिलियन डॉलर) से ज्यादा का हेर-फेर हुआ|

स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया द्वारा माफ़ किये गए एनपीए (राजनीतिज्ञों और बड़े व्यापारिक घरानों के वे कर्ज जिसे बेचारे बैंक वापस नहीं ले सके) का मूल्य 280,000 करोड़ (लगभग 42 बिलियन अमेरिकी डॉलर) है| पिछले पचास सालों में तीस बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा की गयी कर चोरी तीन लाख करोड़ (लगभग 45 बिलियन डॉलर) की है| यह अचम्भे की बात नहीं कि इतने ज्यादा शून्यों के साथ दिखने वाले पैसे की आम भारतीय के लिए कोई खास अहमियत नहीं, लेकिन पश्चिम की धराशायी होती अर्थव्यवस्थाओं को जानने वालों को जरुर है और उनको पता है कि भारत आने वाले सौ सालों तक दुनिया की हर अर्थव्यवस्था को जीवन दे सकता है| हमारे पास क्या है और हमारा क्या जा रहा है अगर इसकी सूची बनायीं जाए तो भारत के भ्रष्टाचार के तमाम संस्करण तैयार हो जायेंगे|

आज भारत की अर्थव्यवस्था 1.2 ट्रिलियन डॉलर की है, जो हमारी वैध अर्थव्यवस्था है और लगभग इतनी ही अवैध अर्थव्यवस्था के भी दावे हैं, लेकिन हमारा कुल राष्ट्रिय कर्ज 90 बिलियन डॉलर का है|

अगर इण्डियन इकनोमिक मिरेकल के नाम से बहुत बड़े पैमाने पर ऐसे ही संपत्तियां चूसते रहे तो इस भारी भरकम पूंजी से वेस्टर्न इकनोमिक मिरेकल तो हो ही जायेगा| यह प्रक्रिया 1985 से शुरू हुई, जिसके तहत पूरी हिंदुस्तानी आवाम को बुद्धू बनाने का छद्म प्रचार और नारों में गुमराह करके उनको लोकतंत्र में सहभागी बनाने की बजाये ध्यान हटाने का षड़यंत्र आज भी जारी है|

मल्टीनेशनल कंपनियां और चीन की वेस्ट इण्डियन कंपनियां दोनों ही ईस्ट इण्डियन कंपनियों के नए अवतार हैं लेकिन हर रिसर्च और आत्म निर्भरता के हर विकल्प को दरकिनार करके महज 10% से 25% की दलाली के चलते कृषि से लेकर देश की सुरक्षा तक के हर प्रोजेक्ट दुगुने तिगुने कीमत पर मल्टीनेशनल कंपनियों के हवाले किये जा रहे हैं| जिन्होंने इसका विरोध किया ऐसे तमाम वैज्ञानिकों को समय से पहले ही रिटायर कर दिया गया| भले ही इसके लिए भारत को आत्म निर्भर बनाने वाले अनुसन्धान को दरकिनार करके देश को गरीबी में धकेल दिया जाए लेकिनइन करारों से पश्चिमी अर्थव्यवस्थाएं और उनके वैज्ञानिक खुश हैं, क्योंकि उनकी नौकरियां सुरक्षित हैं| इन शिकायतों को चुप कराने के लिए भारतीय सरकारें सबके लिए आय जैसे आकर्षक नारों का सहारा ले रही हैं|

2016 की नोटबंदी का असल मकसद

  1. भारत के कालेधन को लूटकर पशिमी अर्थव्यवस्था और लोक कल्याण को बहाल करना

इस दौर की नोटबंदी बड़े पैमाने पर लूट का पहला आयोजन है| थोडा नजदीक से देखें| सतही तौर पर हमने 500 और 1000 रुपये मूल्य के के नोट बंद किये, अधिकारिक तौर पर लगभग चौदह ट्रिलियन रुपये आम जनता के पास से निकलकर बैंक व्यवस्था में पहुंचे| फिर हमने पांच सौ के नोट दोबारा जारी किये और साथ ही निरस्त किये एक हजार के नोट के बदले 2000 रुपये के नोट जारी किये, पूरी दुनिया में हुई नोटबंदी में इन दोनों घटनाओं की कोई नजीर नहीं मिलती, मतलब ऐसा किसी भी देश में आज तक कभी नहीं हुआ| कुछ लोग दावा करते हैं कि वुनेज़ुएला में बहुत बड़ी कीमत के नोट जारी किये गए लेकिन वो हुआ वहां की भारी महंगाई के चलते न कि कालेधन की वजह से|

उसके बाद हमने पैसा निकलने पर रोक लगा दी और बहुत ही कम रुपये निकालने की सीमा तय की जिससे सारी नकदी बैंक में ही बनी रही| ऐसे में मुद्रा की गति का क्या हुआ? मुद्रा की गति बहुत बड़े पैमाने पर कम हुई| ज्यादा रोचक बात तो ये है कि कालेधन की गति का क्या हुआ? हालाँकि बैंकों में जमा पैसा इलेक्ट्रॉनिक भुगतानों से जोड़ा गया| हर भुगतान एक छोटे कमीशन से होना है, ये कमीशन तो न सरकार को जाता न ही बैंकों को, यह पैसा जाता है निजी क्लीयरिंग घरानों को, जो कि महज क्लीयरिंग की प्रक्रिया से रोजाना सैकड़ों करोड़ कमीशन बनाते हैं|

यह बात गौरतलब है कि बैंक के सिस्टम में जमा चौदह ट्रिलियन रूपया ईमानदार और मेहनतकश आम लोगों का है जिनमे से ज्यादातर लोग कालेधन वाले नहीं हैं| कालाधन इसके दसियों गुने से ज्यादा है जो भ्रष्ट अधिकारियों, राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों, हवाला कारोबारियों और तमाम गिरोहों के पास हैं जो सीधे बैंक नहीं जा सकते, अगर ऐसा नहीं हुआ तो जरुर एक बड़ी समस्या है| फिर ये कहाँ गया?

यहीं से कालेधन का मौद्रीकरण शुरू होता है|

भारी मात्रा में मौजूद कालाधन कहाँ गया? यह वो सीधा सवाल है जो जिसका जवाब सभी जानते हैं, सरकार के आलोचक और देशभक्त नेता, ईमानदार और मेधावी अर्थशास्त्री भी जानते हैं कि इसमें हुआ क्या है… यहाँ तक कि सड़क पर एक रिक्शावाला भी बता देगा कि कालाधन कहाँ गया? लेकिन अचम्भे की बात है कि इसके लिए न तो हमारे कॉर्पोरेट मीडिया ने न ही भारतीय अर्थशास्त्रियों ने और न ही भारत के बैंकरों ने इस सवाल को कोई चर्चा की,हिंदुस्तान की पब्लिक ये सब जानती है|

फिर भी आगे की पंक्तियों में नोटबंदी के बाद की तस्वीर आर साफ़ हो जाएगी| 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर में शामिल उन गिरोहों के ज्यादातर लोगों का पैसा बैंक नहीं गया बल्कि अवैध रूप से पैसा बदलने वालों ने चालीस प्रतिशत तक लेकर उस कालेधन को सफ़ेद करवाया| मनी एक्सचेंज करने वाले वे लोग तमाम राजनीतिक दलों से भी जुड़े हैं और देश भर में सोने के बदले कर्ज, डॉलर, पाउंड, हीरे और मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त हैं, उन्होंने गुजरात के पश्चिमी तट, राजस्थान, दिल्ली और तमिलनाडु और केरल के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्रों में 40% कम कीमत पर नकदी की खरीद की| ऐसे में अगला सवाल ये बनता है कि क्या ये काम अवैध मनी एक्सचेंज करने वालों ने किया, जिनकी विस्तृत सूची प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, सीबीआई, पुलिस, इंटेलिजेंस ब्यूरो के पास दर्ज और सरकार के पास मौजूद है| उन्होंने भारी भरकम मुद्रा क्यों खरीदी?

अवैध मनी एक्सचेंज करने वालों ने मूल्यहीन हो चुकी मुद्रा का किया क्या? क्या वे लोग संत हो गए जिन्होंने कालाधन रखने वाले जाहिलों और भारत देश के उन लोगों की मदद में ऐसा किया जो बैंक नहीं जा सकते थे?

जाहिर है नहीं, वो लोग जो हर अन्तराष्ट्रीय और हर देश के कानून को धता बता के भारत के आम लोगों का खून चूसने का काम करते हैं वो संत तो हरगिज नहीं! उन्होंने चालीस प्रतिशत कम कीमत पर भारतीयों का पैसा ख़रीदा वो लोगों की पीड़ा कम करने के लिए तो नहीं| फिर उन्होंने इस अवैध कैश का क्या किया? क्या उन्होंने इसे कहीं बदला? इस पैसे को बदला किसने? ये पैसा बदला कैसे गया? इस कालेधन और भ्रष्ट भारतीयों की मदद से वे रातोरात तीस प्रतिशत में बदलकर रईस हो गए| आखिरी तीन सवालों के जवाब में हमे मिलेगा नोटबंदी की बड़ी महान जालसाजी जिसे सबसे ऊपर के घेरों में सभी जानते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मिलता है “चीन प्रेमी पाकिस्तान जिसे आतंकवादियों से हमदर्दी है”|

कई लोगों ने बैंकों पर भी उँगलियाँ उठायीं, खासकर प्राइवेट बैंकों और उनमे भी वे बैंक जो इंग्लैंड की शाही मदद से बने जिनसे इस दौर का पायरेटीकरण या निजीकरण होना था| लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जब नकदी जमा करने और निकालने के इतने नियम कानून हैं, दस रुपये के लिए भी दर्जनों दस्तखत होते हैं तो फिर सरकार और राजनैतिक घेरे के ऊपर वालों के सहमति और सहयोग के बिना ईमानदार हवालेबाजों के हजारों करोड़ की अदला-बदली कैसे हो सकती है?

इसलिए हमे यह मानना पड़ेगा कि जब आम लोग पैसा जमा करने या महज 4000 रुपयों को निकालने के लिए घंटों धूप में खड़े होकर सरकार के आदेशों का पालन कर रहे थे, तब तक भ्रष्ट बैंकर ने उच्च प्राथमिकता के मुताबिक नयी छाप के नोटों को कालेधन वाले गिरोहों को बेचकर अपनी दोस्ती निभा चुके थे| दक्षिण भारत के एक राज्य में हुए खुलासे में विपक्षी दल के छुटभैये नेता के पास हजारों करोड़ बरामद हुए जिसके लिए देशभक्त नेताओं ने तुरन्त बैंकरों पर आरोप लगाना शुरू कर दिया, सरकार ने भी उन्ही के खिलाफ जांच बैठा दी| लेकिन जब उसी राज्य के लौह अयस्कों के अवैध निर्यात के मामले में जेल में बंद एक दूसरे देशभक्त नेता ने जिसने अपनी बेटी की शादी में 500 करोड़ रुपये खर्च किये तो देशभक्तों को तनिक भी ख्याल नहीं हुआ कि यह दैवीय सम्पदा कहाँ से आई?

इसके बाद बैंकों से वैध हुए इस पैसे को हवाला कारोबारियों ने डॉलर, पाउंड, सोना और हीरे खरीद कर अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड और इजराइल पहुँचाया| अन्तराष्ट्रीय मार्केट में भारत से हुई इस पैसे की आवक ने सोने के दाम में अचानक बढ़ गए, साथ ही साथ डॉलर और पाउंड की विनिमय दरें भी बढीं| कनाडा और ऑस्ट्रलिया में रियल एस्टेट की कीमतें पचास प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ गयीं जबकि इन देशों में ये व्यापार दो सालों से लगभग ठप्प पड़ा था, आज यूरोप और अमेरिका में किसी के पास इसका पुख्ता जवाब नहीं कि ये कीमतें बढीं कैसे? ब्रेक्सिट के बाद हर अर्थशास्त्री का आकलन था कि पाउंड की कीमतें बहुत हद तक गिरेंगी तो फिर ब्रेक्सिट के बाद ये अमेरिकी और यूरोपियन अर्थशास्त्रियों के लिए तो ये बहुत बड़ा अचम्भा हुआ कि पाउंड की कीमतें कैसे बढीं और ब्रिटेन ने घोषणा की थी कि वे ब्रेक्सिट के बाद अपना घाटा पूरा कर लेंगे|

इसी समय में अमेरिका और कनाडा ने अपने लगभग मरे हुए रियल एस्टेट कारोबार के पुनर्जीवन की भविष्यवाणी की, और उनके लम्बे समय से लटके इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के क्रियान्वयन की भी कवायद शुरू हुई 2 ट्रिलियन डॉलर की भारी भरकम धनराशि से!

इसलिए अमेरिकी और ब्रिटिश दृष्टिकोण से देखा जाए तो उनका मकसद साफ़ हो जाता है, हो भी क्यों नहीं.. ब्रिटेन और अमेरिका अपने स्थायित्व और पुनर्जीवन के लिए क्यों न करें| इसे पूरा करने के लिए ये करने उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था में से लोगों के गाढ़ी मेहनत की कमाई के 4 ट्रिलियन डॉलर अपनी अर्थव्यवस्था में पहुंचाए| ये सब हुआ महज एक से तीन हफ़्तों में, ईस्ट इण्डिया कंपनियों के लूट के इतिहास में यह उल्लेखनीय प्रगति है, ईस्ट इण्डिया कंपनियों को इस भारी भरकम धनराशि का दसवां हिस्सा सोने अथवा नकदी में ले पाने में दो सौ साल लग गए! कौन कहता है कि भारत में संचार और यातायात की क्रांति नहीं हुई, हमारे प्यारे विकासशील भारत देश में मल्टीनेशनल कंपनियों के आदेश से हुए विकास में ही तो सबसे बढ़िया पायरेटीकरण या निजीकरण हो सका है|

नोटबंदी के विषय में और ज्यादा मनोरंजक और अछूता विषय रहा है नोटबंदी के दौरान इंग्लैंड की प्रधानमंत्री और इजराइल के राष्ट्रपति का भारत में होना| अध्ययन और रणनीतिक विमर्श की बजाए मीडिया द्वारा इस उपस्थिति को बहुत मसालेदार और रंगबिरंगा बना का प्रस्तुत किया गया|

हमारी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गाँधी को पूरी के मंदिर में महज इसलिए नहीं घुसने दिया गया एकदम फ़िल्मी तर्ज पर क्योंकि उन्होंने एक पारसी (जो कि कमोबेश हमारी अपनी संस्कृति के हिस्से जैसे ही हैं) से शादी की थी लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री जो कि एक विदेशी और यहूदी आस्था वाली हैं उन्हें हमारे अपने ही पुरोहितो ने मंदिर के गर्भगृह में देवी दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया क्योंकि तब नोटबंदी का दौर जारी था!

नोटबंदी की ये गाथा समझना भारतीय अर्थशास्त्रियों के लिए इतनी जटिल है कि हमारे प्रधानमंत्रीजी ने तय किया कि उन पर भरोसा न करके सारी प्रक्रिया इजराइली अर्थशास्त्रियों और अमेरिकी अर्थशास्त्रियों  के हवाले कर दी जाए और उनके सलाहकारों को छुट्टियाँ मानाने के लिए जापान भेज दिया जाए|

हमारे नोटबंदी के अपने ऐतिहासिक फैसले में प्रधानमंत्री भारतीय अर्थशास्त्रियों से सलाह लेने की बजाए इजराइली अर्थशास्त्रियों, अमेरिकी थिंक टैंक और ब्रिटेन के मित्रों और परिवारिक समूहों पर निर्भर होना ज्यादा पसंद करते हैं|  अगर प्रधानमंत्रीजी भारतीय अर्थशास्त्रियों को इतना गया गुजरा मानते हैं तो भारत में अर्थशास्त्र की पढ़ाई में सुधार के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? क्या देश के सर्वमान्य नेता का यह कदम देश के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचता? चाणक्य जैसे अर्थशास्त्रियों के इस देश के लिए क्या यह शर्मनाक स्थिति नहीं? क्या यह सच है कि भारत देश ऐसा कोई भी सक्षम अर्थशास्त्री पैदा करने में सक्षम नहीं जो कि देश को बेहतर बनाने में प्रधानमंत्रीजी को सहयोग कर सके?

स्पेन सहित जिन देशों ने नोटबंदी की, उन सभी ने उसी मूल्य के या ज्यादा कीमत के नोटों को दोबारा नहीं चलाया, अपवाद है वेनेज़ुएला| हाल का मामला वेनेज़ुएला का है तो 1930 की घटना  जर्मनी की है जब सारी मुद्रा को निरस्त करने के बाद महंगाई के चलते ज्यादा बड़ी कीमत के नोट चलाये गए| जर्मनी में महंगाई का ये आलम हुआ कि कुछ मार्क में बिकने वाली चॉकलेट की कीमत सैकड़ों और हजारों मार्क की हो गयी| दौर में ऐसे भी वाकये देखे गए जब नोटों के बण्डल लदे ट्रक खुले आम सडकों पर दौड़ते थे और कोई देखने वाला भी नहीं होता था|  कई देशों ने पैसा निकलने की सीमायें भी निर्धारित कीं जो भी हो उनका मकसद यही रहा कि निरस्त की गई मुद्रा दोबारा छपने के बाद राष्ट्र निर्माण में काम आ सके|

  1. देसी बचत की जब्ती, एनपीए बढ़ाते कॉर्पोरेट को राहत और कालाधन बनाकर राजनीतिक दलाली के लिए क्रूर पूंजीवाद

बैंकों में जमा पैसे का छोटे स्तर पर क्या हुआ? जिक्र मिलता है कि जब पैसा सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों में जमा हुआ, तो नकदी निकालने पर रोक लगा दी गयी| भले ही बैंकों के कर्ज डूबते रहे हों और भले ही बैंकों के एनपीए बढ़ते रहे हों लेकिन औद्योगिक घरानों और नेताओं के जो कर्जे थे उनमे से एक पैसा भी वापस नहीं मिल सका, इसके बावजूद लाखों करोड़ के बड़े बड़े कर्ज माफ़ हुए, और उदारीकरण के बाद हर सरकार और नेता वर्ग के लिए यह पहली वरीयता का काम साबित हुआ| इस पैसे का ज्यादातर हिस्सा ब्रिटेन, अमेरिका, यूरोप के डूबते उद्योगों के लिए राहत बना जिसमे बैंकों को एक पैसा भी वापस नहीं मिला| इन कर्जों के निरस्त होने से भारत के सफ़ेद पैसे से भारी मात्रा में कालाधन बना, यही कालाधन पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था में लग कर सफ़ेद हो गया|  इस किस्से में एनपीए का निरस्त होने से करोड़ों गरीब अनपढ़ भारतीयों की जमा पूंजी भी कालाधन का हिस्सा बन गयी|

ईमानदारी को सजा बेईमानी को मजा

इस किस्से में नकदी जब्त होने की सबसे ज्यादा दिक्कत अनाम और गरीब प्रवासी मजदूरों को उठानी पड़ी, जिनकी कोई आवाज नहीं सुनी गयी| विदेशों में बड़ी मेहनत से काम करके बनाई पूंजी को उन्होंने अपने घर-परिवार में बड़े बुजुर्गों के लिए भेजते रहे| उनके पैसे कभी नियमित बैंकिंग व्यवस्था से नहीं आ सके| इसलिए ये पैसा वैध भी नहीं बन सका| भेजे गए पैसों को उन्होंने हवाला कारोबारियों के जरिये भेजा, जिन्होंने मामूली सी या लगभग बराबर की बैंकिंग विनिमय दर से पैसे को उनके घरों या रिश्तेदारों तक पहुंचाया| इस पैसे का नियम यही है कि ऐसे पैसे को बैंक में बिला वजह नहीं रख सकते इसलिए उनके ज्यादातर रिश्तेदारों ने इस पैसे को बैंक में रखने के बजाए बदले में रियल एस्टेट या सोना ख़रीदा, उधार दिया या जरुरत पड़ने पर किसी को दिया| इस दौर की नोटबंदी में जब बेचारे माता-पिता को बैंक में जमा करने की नौबत आई तो उन्हें हर पांच लाख रुपये पर इस धन के स्रोत के दस्तावेज दिखने को कहा गया, जो नहीं दिखा सके उनका धन जब्त कर लिया गया| यह उनके अपने बच्चों की गाढ़ी कमाई का पैसा था जिन्होंने विदेशों में पसीना बहा कर अपने माँ बाप के सहारे के लिए भेजा था| हर पोलिटिकल पार्टी चाहती है कि वे प्रवासी पैसा भेजें क्योंकि इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है

इस तरह की जब्ती भी शायद हजारों करोड़ की हो, यह पैसा बैंक अधिकारीयों और उनके राजनीतिक आकाओं और एनपीए बढ़ाते व्यापारियों के लिए के लिए बोनस जैसा ही है, क्योंकि इससे बैंक के कर्ज का बोझ भी नाटकीय तरीके से सही, कम तो हुआ ही! निजीकरण का यह क्या खूब चमत्कार है!

बुद्धिमान बैंकर आज तक नहीं बता सके कि आम आदमी के लिए एटीएम से पैसा निकलने की सीमा 4000 रुपये की ही क्यों की गयी, जबकि नेतागिरी की दुनिया से जुड़े उद्योगपति हजारों करोड़ निकालते रहे और इंग्लैंड और अमेरिका में निवेश करके वहां के के बीमार उद्योगों की दवाई देते रहे? इतना जरुर है कि बैंकिंग व्यवसाय के मुखिया कहते रहे कि वे किसी का कर्ज निरस्त नहीं कर रहे और ऐसे कर्जों को एस्क्रो खातों में रखेंगे और बाद में वसूलेंगे, लेकिन ऐसा का दावा करने वाले खुद नहीं जानते कि कर्ज दिए गए पैसे कब और कैसे वापस आयेंगे| जो पिछले साठ सालों में नहीं हो सका वो आगे कब होगा ये भी देखा जायेगा|

जाहिर है कि सब चाहते हैं कि बैंक और सरकारों की तरफ से ऐसी सहूलियत बनी रहे| इसके लिए हाल के फाइनेंस बिल से राजनीतिक दलों ने दानदाताओं के नाम और उनके चंदे जाहिर करने की बात हटा दी| जाहिर है कि ऐसा करने से राजनीतिक दलों को चुनाव खर्चों के लिए जितना पैसा चाहिए वो मिलता रहेगा|

लेकिन इसके नतीजे में क्या हासिल होगा उसका आकलन करें, तो मिलता है कि बैंक महज 2.85 लाख करोड़ के एनपीए पर ही नहीं बैठे, बल्कि उससे सौ गुनी ज्यादा संपत्तियों पर भी बैठे हैं, एकाउंटिंग में जिनकी कीमत शून्य है| लेकिन अनुभवी अकाउंटेंट, इंटरनेशनल बैंकर कुटिल नेता और ईस्ट इंडिया कंपनियों के उत्तराधिकारी जानते हैं कि उनके लिए इस संपत्ति की कीमत क्या है| सरकार बैंकों का निजीकरण करना चाहती है, भारत-प्रेमी, भारत के पक्षकार और भारत के विकास की चीख-पुकार करते गिरोह इन सरकारी उपक्रमों को इस कर्ज के साथ नहीं खरीदना चाहते| इसलिए वे कर्ज को शून्य कर देना चाहते हैं, ताकि बैंक के साथ-साथ इस अदृश्य संपत्ति को भी खरीद कर निकल सकें| इसलिए छोटे स्तर पर ही सही घरेलू मामलों में जमा सफ़ेद पूंजी कालेधन में तब्दील हुई भले ही इस पूंजी का स्तर देश के बाहर हुए कारनामे के बराबर न हो|

इस मामले में और भी कुछ है जिसको ऊपर दिखाई तस्वीर में शामिल नहीं किया गया| अगर बैंकों को चौदह ट्रिलियन रुपये जारी हुए तो इसकी कुल कीमत 200 बिलियन डॉलर होती है, इस तरह रिजर्व बैंक महज 200 बिलियन डॉलर के नोट छाप सकता है| लेकिन अमेरिका और ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में नकदी पहुंची 4 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा| तो बाकी मुद्रा कहाँ से आई? उन्हें किसने छापा? ये मुद्रा कहाँ छपी? हमारी संसदीय समिति की रिपोर्टों में भी बताया गया है कि मुद्रा छपाई का काम एक से ज्यादा देशों को एक से ज्यादा बार दिया गया| संसदीय समिति की रिपोर्टों से यह बात बहुत बाद में पता लगी| अहम् सवाल तो यह है कि क्या इस नोटबंदी के लिए मुद्रा की छपाई देश के बाहर हुई? क्या हमारे वित्तीय केन्द्रों से मिले आंकड़े सही हैं जो भारतीय जमा धन के बारे में दावा करते हैं कि कुल नकदी के बराबर कालाधन बरामद कर लिया गया है!

इस राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की पूरी प्रक्रिया में भारतीय अर्थशास्त्रियों और आईआईएम की अहम् भूमिका न होना संकेत देती हैं कि बयान भी अहमियत नहीं रखता क्योंकि इस प्रक्रिया में उनमे से किसी की सीधी निगरानी नहीं रही| न ही किसी ने उनको ऐसा कोई प्रस्ताव पेश करते देखा और न ही इसके बारे में कोई स्पष्टीकरण देते हुए, यहाँ तक कि देश की जिस आवाम ने इस फैसले का परिणाम सहा उसे भी सरकार ने भरोसे में नहीं लिया गया|

ऐसा क्यों नहीं ह सकता कि स्वतंत्र आर्थिक विशेषज्ञों का एक पैनल बने जो कि रिजर्व बैंक की कार्यवाहियों का अध्ययन करे और देश को बताये कि असल में ये सब हो क्या रहा है? ऐसा  पैनल बने तो क्या हर दो साल में बदलकर दूसरे विश्वविद्यालयों के विद्वानों को शामिल नहीं किया जा सकता?

  1. व्यक्तिगत और संस्थागत सोने की जब्ती

जब पाबन्दी लगी तो मोटे तौर पर देश की 86% आर्थिक गतिविधियाँ नकदी में हुईं | अनुमानित तौर पर देश में अधिकृत सालाना कारोबार 19 बिलियन डॉलर का है और लगभग सौ गुना कारोबार का कहीं जिक्र नहीं या यूँ कहें कि कालेधन से होता है| लेकिन ऐसा लगता है कि भारत सरकार (केन्द्रीय बैंक) अपने नागरिकों की संपत्तियों का ख्याल रखने की ज्यादा कीमत चाहती है| पारदर्शिता की की बहानेबाजी और कॉमन मार्किट बनाने की प्रक्रिया में सोने पर नए कर लगाये जा रहे हैं, नए नियम लागू हो रहे हैं, अपना सोना घोषित करने के बदले आर्थिक बाज़ार आकर्षक लाभों की बरसात हो रही है|

लगता है कि भारत सरकार सोने की नीति दोबारा बनाने के लिए सोने के खास सौदागरों के साथ मेलजोल बढ़ा रही है, नियम, नियंत्रण और कराधान इस नयी नीति के मूलमंत्र हैं| वित्त मंत्रालय और उद्योग मंत्रालयों ने औद्योगिक समूहों के साथ मिलकर इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए मार्च तक का समय तय किया है|

भारत में एक जुलाई से लागू होने वाले वस्तुएवं सेवा कर की दर 3% रखी गयी जब कि सोने पर 5% जीएसटी की उम्मीद की जा रही थी| इससे गुलाम मानसिकता का खुमार भी देखने को मिला जब बाजारों में इसे उम्मीद से कम दर के त्यौहार के तौर पर मनाया गया| ऐसा करके एक कॉमन मार्केट जरुर तैयार होगी जो कि भारत के लोगों की निजी पूंजी से इंग्लैंड की संपत्तियों के बढ़ानेवाली होगी|

कम्युनिस्ट देशों की सरकारों के उदारीकरण और वैश्वीकरण के अनुभवों से सबक लिया जाए तो यह लोगों और उनकी संपत्तियों का पूरा नियंत्रण करके देश में तानाशाह खड़ा करने की प्रक्रिया है, जिनके मकसद साफ़ हैं, “ अगर तानाशाही करनी है तो किसी उद्योग की ताकत का केन्द्रीकरण किया जाए, पहले बड़े व्यापार को भयभीत करके उनको अपने गिरोह में शामिल करिए, जैसे से ही कॉमन मार्केट तैयार होता है, तब कॉमन मार्केट को बरबाद कर दिया जाए” और फिर उनको सुरक्षा देने के लिए पारदर्शिता बने”| यह फार्मूला हर बार काम करता है| आखिरी रास्ता है कि न मानने वालों को बलपूर्वक मनाने का|

सुनारों के लिए बाजार और खास किस्म के बैंक बनाने की प्रक्रिया में लगता है कि सरकार की जरुरत ही नहीं| लेकिन अगर नागरिकों के अघोषित की निगरानी, डेटाबेस और जासूसी करनी है, तभी इसका असल मतलब निकलता है|

ब्लूमबर्ग इसे और साफ़ करता है कि नई नीतियों का मकसद है कि नागरिकों के सुस्त सोने को बाज़ार वित्तीय तंत्र में लाने के लिए प्रोत्साहित करना|

यह फ्रंकलिन रूजवेल्ट के कार्यकारी आदेश 6102 की याद ताजा करवाता है जिसमे “स्वर्ण मुद्राओं, गोल्ड बुलियन, गोल्ड सर्टिफिकेट, को रखने से मनाही की गई” जिससे मौद्रिक स्वर्ण रखना अपराधिक कृत्य करार दिया गया| नागरिकों को सरकारी खजाने से पैसा लेकर जबरन सोना वापस लिया गया| यह सब देखने के लिए हमे थोडा इंतजार करना होगा!

क्रेडिट स्विस ने ताकीद की है कि सरकार के हालिया कदम सोने के व्यापार को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ने और साझेदारी बनाने के लिए है ताकि केंद्र सरकार स्वर्ण उद्योग की निगरानी और कराधान सुनिश्चित कर सके|

इससे वही आभास मिलता है जैसा कि क्रेडिट स्विस के विश्लेषक अर्नब मेहता और रोहित कदम ने पहले भविष्यवाणी की थी| स्वर्ण उद्योग में आने वाले बदलावों के बारे में उन्होंने कहा था कि आने वाले दो से तीन सालों में नए कराधान से छोटे और असंगठित व्यापारी कर के दायरे में आ जायेंगे, तभी उनको मूल्य निर्धारण में फायदा मिलेगा, इससे बाज़ार में बड़े और संगठित व्यापारियों की दखल बढ़ेगी”|

वैसा ही हुआ| नकदी रहित भुगतान नियंत्रण का एक प्रमुख तरीका है| नियम तो यह है कि राज्य के नियंत्रण के बाहर कोई आर्थिक गतिविधि नहीं होनी चाहिए| लेकिन सरकारें इसका उल्टा कर रही हैं, जिन गिरोहों को सरकारी शाह है वे बाज़ार की ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल कर रहे हैं, जो ऐसा नहीं करते वे देशद्रोही घोषित किये जायेंगे और खबरंडी मीडिया उन्हें आतंकी भी घोषित कर देगा|

ऐसा तभी जारी रह सकता है जब गुस्साए नागरिकों को परंपरागत तरीके से सोना इकठ्ठा करने खरीदने और उपहार देना छोड़ने के लिए राजी कर लिया जाए|

नोटबंदी के दौरान महंगाई या मुद्रा का संकुचन और धन, कालेधन और सोने पर इसका असर

मुद्रा की आपूर्ति में कमी के चलते मुद्रा का संकुचन होता है तो इसका बाज़ार पर सीधा असर पड़ता है| सोने, और रुपये या डॉलर पर इसका असर पश्चिमी विश्लेषकों के अनुमान से बिलकुल अलग है लेकिन भारतीय अर्थशास्त्रियों को इसकी भनक तक नहीं| यद्यपि नोटबंदी के पहले या बाद में इस विषय में कोई आकलन किया ही नहीं गया, दुर्भाग्यवश ज्यादातर विश्लेषक सोने या नकदी की असल कीमत करने से चूक रहे हैं| अमेरिकी डॉलर हो, यूरो हो या भारतीय रूपया हो उनके गड़बड़ सिद्धान्तों के चलते, उपलब्ध आंकड़ों से भी गलत गड़बड़ या बेतुके नतीजे निकलते हैं|

इसकी वजह है गलत मौद्रिक सिद्धांत और मांग और आपूर्ति करने वाली शक्तियां| अंशकालिक तुअर पर मौद्रिक सिद्धांतों और मांग आपूर्ति करने वाली शक्तियों के असर वस्तुओं और सेवाओं पर पड़ते जरुर हैं| पिछले सौ वर्षों में वस्तुओं और सेवाओं पर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है उर्जा की| उर्जा में भी प्रमुख रूप से तेल और प्राकृतिक गैस की जिन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज किया जाता रहा है|
फेडरल रिजर्व, व्यावसायिक बैंकों, मुद्रा छपाई, कर्ज या कालेधन की  की बात करने वाला कोई भी विश्लेषक उर्जा की बात नहीं करता| ज्यादातर आर्थिक विश्लेषक मौद्रिक आंकड़ों के सतही अध्ययन में व्यस्त हैं जिसके चलते वे मौलिक समस्या की गहराई तक जाकर आकलन नहीं कर पाते हैं|

ऑस्ट्रियन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के जानकार भी अपने अध्ययन विश्लेषण में उर्जा की भूमिका तय करने में असफल होते हैं| आश्चर्यजनक तौर से अधिकांश विश्लेषक ऐसा मानते हैं कि यह दुनिया मुफ्त यानि मुक्त उर्जा से चलती है| सस्ती और टिकाऊ उर्जा और निर्बाध उर्जा के बगैर मौद्रिक विज्ञानं और मांग-आपूर्ति की ताकतें व्यर्थ हैं|

आर्थिक बहसों में ऐसा कहा जाता है कि दुनिया में महंगाई, अति महंगाई या मुद्रास्फीति बढती जाएगी और दुनिया को इसका सामना करना पड़ेगा| इसके लिए हमे समझना पड़ेगा कि भारत में मौजूद सोना निजी बैंकों में केन्द्रित करने की वजह क्या है?

क्या इसकी वजह कर्ज और लूट है जिसके तहत ये सोना अमेरिका और ब्रिटेन में जमा होगा या फिर रिजर्व बैंक इसकी सुरक्षा करने में सक्षम नहीं?

सोने की जरुरत अमेरिका और ब्रिटेन दोनों को है| यह जरुरत है उनकी कर्ज की अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए| अब वो भारत के सोने पर नजर गडाए बैठे हैं और हम अपना सोना देकर वापस न लेने को भी राष्ट्रभक्ति से जोड़ने को तैयार हो रहे हैं| आज तलक पता नहीं चला कि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में सुरक्षित रखने के लिए भेजे गए 1000 टन सोने का क्या हुआ? इसके बावजूद अब हम आम लोगों से बीस हजार टन सोना इकठ्ठा करने को लेकर तैयार हो रहे हैं| ऐसे में संस्थानों के पास मौजूद सोने का क्या होगा?

संस्थानों के पास मौजूद सोना सबसे अहम् है जिसका जिक्र सरकार ने भरी अनिच्छा के साथ किया है| सोना किन संस्थानों के पास है? सोना न तो रिजर्व बैंक के पास है और न ही सरकारी एजेंसियों के| संस्थानिक तौर पर सोना पुराने मंदिरों के पास है और यह सोना उनके पास सैकड़ों वर्षों से है| आजकल इस सोने के खिलाफ पोलिटिकल पार्टियों ने आन्दोलन छेड़ रखा है कि मंदिरों में मौजूद सोने को जब्त करके उन मंदिरों की संपत्तियों को बहुप्रचारित योजनाओं में खर्च किया जाये| या यूँ कहिये कि अन्तराष्ट्रीय बाजार में बेचकर भारी मात्रा में कालाधन बनाया जाए|

सोने की जब्ती का एक सबब ये भी है कि जब लोग आर्थिक गतिविधियों से पैसा निकालने लगते हैं तो मुद्रा का संकुचन इस पर निर्भर करता है कि वे अपना पैसा किस मद में खर्च करते हैं| रियल एस्टेट और सोना ऐसे दो विकल्प हैं| सोना मौलिक रूप से अपने उत्पादन मूल्य भर भर का मूल्य दे ही देता है| इसलिए यह कागज की मुद्रा जैसे डॉलर से ज्यादा बेहतर है|

यह समझने के लिए कि आगामी महंगाई से सोने और अमेरिकी डॉलर पर क्या असर पड़ेगा इसके लिए मुद्रा और अर्थशास्त्र के सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर समझने की जरुरत है|  परंपरागत आर्थिक सिद्धांतों को मानने वालों और नहीं मानने वालों के लिए एक जैसे नतीजे मिलेंगे| महंगाई होने की दशा में अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये दोनों की कीमत गिरेगी| अमेरिकी डॉलर की कीमत कहीं ज्यादा गिरेगी| चूँकि सभी वस्तुओं की कीमत उनके उत्पादन में लागत मूल्य के मुताबिक तय होनी है ऐसे में जबकि सौ बिलियन डॉलर का लागत मूल्य सिर्फ 13.4 सेंट हो तो गिरावट का अंदाज़ा 99 प्रतिशत से ज्यादा तक हो सकता है|

चीजों की असल कीमत तो उनके उत्पादन की लागत पर निर्भर करती है, न कि मांग और आपूर्ति पर| ऐसे में घाटे के साथ उत्पादन कौन करना चाहेगा?

यहाँ एक आखिरी उदहारण रखते है, वर्ष 2016 सोने के खानों की कुल आपूर्ति 103.6 बिलियन डॉलर की आंकी गयी| 2017 के विश्व स्वर्ण सर्वेक्षण से मिले स्वर्ण उपभोग के आंकड़े बताते हैं कि कुल 3,222 मेट्रिक टन खनिज सोने की आपूर्ति की गयी| इतने सोने के उत्पादन का अनुमानित मूल्य हुआ 92.2 बिलियन डॉलर हुआ|

इस हिसाब से सोने का बाज़ार भाव इसके उत्पादन मूल्य पर कहा जा सकता है| दूसरी तरफ अमेरिकी कोषागार में 151.7 बिलियन की 100-100 डॉलर के नोट की छपाई की कीमत होती है 235 मिलियन डॉलर (0.235 बिलियन डॉलर), इसका मतलब ये हुआ कि अमेरिकी कोषागार में जारी 151.7 बिलियन डॉलर में से महज 0.13% मुद्रा ही   लागत मूल्य के अनुपात में है, जाहिर है कि इस साल छपी मुद्रा में बाकी के नोट नकली यानि आभासी हैं|

लोगों को समझना होगा कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था कर्ज की अर्थव्यवस्था है, यह अर्थव्यवस्था उर्जा खर्च से आगे बढती है| इस हिसाब से उर्जा=मुद्रा वहां का आसान समीकरण है| अमेरिकी औ बाकी दुनिया के कर्ज बढ़ने का अर्थ है उर्जा का उपभोग बढ़ना जिससे दुनिया में विघटन हो रहा है| ज्यादा कर्ज होगा तो ब्याज कम लगेगा, लेकिन यह एकल दिशा मार्ग है|

आने महंगाई में स्टॉक, बांड, रियल एस्टेट और कागजी मुद्राओं के मूल्य बिगड़ने तय हैं, रियल एस्टेट की कीमतें सीधे गिरेंगी क्योंकि उनकी लागत 20-30 साल कर्जे की मियाद में मिला उत्पादन से उसके लागत मूल्य की वापसी नहीं| क्योंकि इस कीमत में उर्जा उपभोग का व्यय जोड़ा नहीं गया| ऑटोमोबाइल और तमाम दूसरी वस्तुओं की भी यही हालत होने वाली है|

पारदर्शिता के बहाने सोने की जब्ती

ब्रिटेन में बैठी जिन ताकतों ने इस दौर की नोटबंदी और नकदी की लूट का आयोजन किया, गौर से देखा जाए तो वो लोग ये मकसद बिना नोटबंदी के भी हासिल कर सकते थे| अगर मुद्रा की छपाई देश के बाहर होती थी और जिस तरह अभी हो रही है और आगे भी होगी उसके हिसाब से तो ये चार ट्रिलियन डॉलर की फेर-फेर बड़ी आसानी से हो सकती थी, वो भी बिना नोटबंदी के संदेह के| ऐसे में सवाल ये बनता है कि पूरी तरह से नोटबंदी क्यों की गयी? इस सवाल का जवाब मिलता है यूआईडी आधार के प्रोजेक्ट और हालिया नोटबंदी के प्रायोगिक परीक्षणों को एक साथ समझने से|

ये दोनों प्रयोग भारतीय नागरिकों को मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह में उलझाने जैसे हैं, इसका मकसद नागरिकों को अनर्गल, अतार्किक और निराश करने वाली नारेबाजी में उलझाना भर है| जैसा कि पहले कहा जा चूका है कि आबादी को बरगलाये बिना किसी भी देश को लूटना संभव नहीं| देश के लोग उदारीकरण और निजीकरण में मिली सुविधाओं से में लिप्त है| वे लोग और ज्यादा सुविधाओं की मांग करेंगे, हताशा में डूबेंगे या खुद को इस चक्रव्यूह से आजाद करेंगे इस बात की तस्वीर मिलती है तभी लोग सही बात के लिए मांग या विरोध कर सकेंगे|

अर्थव्यवस्था में विश्व के नामचीन संस्थानों के मुताबिक पिछले दो सौ सालो में लगभग 160,000 टन सोने की खुदाई हुई| इसमें से 120,000 टन सोना यूरोपियन यूनियन, बैंक ऑफ़ इंग्लैंड और अमेरिका में है| महज 40000 टन सोना बाकी दुनिया में है|

वर्तमान मूल्य से हिसाब करते हैं तो हम पाते हैं कि 1 टन= 30 मिलियन डॉलर इस हिसाब से सोने की कुल कीमत 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बैठती है| दुनिया की अर्थव्यवस्था इससे कहीं ज्यादा बड़ी है, उसकी सोने से तुलना संभव नहीं| जैसा ऊपर कहा गया कि यह आकलन भारत में कालेधन की न्यूनतम सीमा की राशि के जितना होता है| फिर सोने के बारे में उठ रहे शोर का क्या अर्थ है? लेकिन अगर यही सच होता तो सोने की कीमत वर्तमान मूल्य से कहीं ज्यादा होती, आज की कीमत से कुछ सौ गुना ज्यादा तो सिर्फ एक अनुमान है|

इस सवाल का जवाब हमे भारत में मिलता है| अन्तराष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक हर साल 650 टन सोने का उत्पादन होता है, जिसका 80 प्रतिशत एशिया के बाज़ार में आता है जिसमे से 70% केवल भारत में| ये सिलसिला आज़ादी के बाद से जारी है| इस हिसाब से देखें तो आज़ादी के बाद से भारत में 15000 टन सोने का आयात हुआ, जिसके बदले में 500 बिलियन डॉलर कीमत अदा की गयी| यहाँ के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं|यही हमारी सरकार भी कहती है, जिसके चलते 20000 टन सोने की बाज़ार में वापसी की बात चल रही है| अगर सारा सोना बाज़ार में आ जाता है तो उसे चीन भी आयात कर सकता है जिसका उपयोग वह हमे मिटाने में ही करेगा|

लेकिन इससे कुछ ज्यादा भी है जहाँ हमारी नजर होनी चाहिए| ऊपर दिए गए आंकड़े महज आज़ादी के बाद आयातित सोने के हैं, आज़ादी के पहले भारत में मौजूद सोने के साथ हमारे देश और संस्कृति की सुरक्षा भी जुड़ी हुई है| आइये इसका आकलन करते हैं|

आज़ादी के पहले देश में कितना सोना

सिर्फ एक मंदिर का उदहारण लेते हैं, अमरावती राज्य जब अंग्रेजों के चंगुल में आया तो इसे बेहिसाब लूटा गया| उस समय उस छोटे से राज्य की राजधानी में, जो आज के आंध्र प्रदेश के चार जिलों से जितनी थी, सभी घर स्वर्ण जड़ित थे| तब अंग्रेजी सेना ने सात हजार घोड़ों को लूट का सोना ढोने में प्रयोग किया| ये तथ्य हमारी इतिहास की किताबों में नहीं| लेकिन इसके तेलुगु साहित्य और फ्रेंच दस्तावेजों में मौजूद हैं| इस तथ्य को ब्रिटिश से हटाकर गज़नी के किस्से में जोड़ दिया गया कि उसने सोमनाथ को लूटा और सात हजार घोड़ों पर लूट का सामान लादकर अपने देश ले गया| शायद इसी वजह से आन्ध्र प्रदेश के हमारे वर्तमान मुख्यमंत्री ने उसी जगह राजधानी बनाई जहाँ उस भव्य राजधानी की लूट की गई थी|

एक दूसरा उदहारण लेते हैं ईस्ट इंडिया कंपनी के एक क्लर्क के परपोतों को जब पैसों की कमी पड़ी तो उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट के एक गोदाम को खोल के उसमे से छः चीजें निकालीं, उसको लेकर वो लन्दन के मशहूर नीलामी घराने में गए, जहाँ बेचकर उन्हें पांच मिलियन पाउंड मिले| इस खबर का हर भारतीय न्यूज़ मीडिया में भी खूब तमाशा हुआ| महज कुछ चीजों की अगर इतनी बडी कीमत है तो फिर पूरे गोदाम की कीमत क्या होगी? अब जरा सौ सालों की लूट के बाद ईस्ट इण्डिया कंपनियों के नाविकों, क्लर्कों, अधिकारियों, सामंतों और गवर्नर जनरलों के गो दामों की कीमत का अंदाज़ा लगाइए! इस अंदाज़े के एक अनुमान मिलेगा कि भारत से कितनी बेहिसाब संपत्ति लूट कर ले जायी गयी| लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि भारत में संपत्ति कितनी थी| जब उन्हें भारत से कुछ नहीं मिला तो ईस्ट इण्डिया कंपनियों के अभागे कर्मचारियों ने मंदिरों की कलाकृतियाँ, देवताओं की मूर्तियाँ, पांडुलिपियाँ, गणितीय साहित्य, औषधीय साहित्य, खनिजों का साहित्य जो कुछ भी मिला, जिस भी भाषा में मिला उठा ले गए| सौभाग्य से उन्होंने इन कलाकृतियों और तमाम वस्तुओं को क्रिस्टी और लन्दन के दूसरे नीलामी घरों में को बेच कर लाखों पाउंड बनाये| तमाम भारतीयों ने भी आर्ट डीलर, आर्ट कलेक्टर और आर्ट लवर्स के नाम से कलाकृतियाँ बेचने की यह गौरवशाली परंपरा जारी रखी| इनमे से तमाम व्यक्ति हैं तो भारतीय लेकिन उन्हें अमेरिका, ब्रिटेन या अंग्रेजी भाषी दूसरे देशों की दोहरी नागरिकता हासिल है|

नीलामी की इन कलाकृतियों को जर्मन और फ्रेंच विद्वानों ने ख़रीदा जिन्होंने उनकी अहमियत को समझा और जब उन्होंने ये महसूस किया कि ब्रिटिश उस वैज्ञानिक भारतीय सांस्कृतिक विरासत को बरबाद कर रहे हैं जो मानव सभ्यता की प्रगति की प्रकाशस्तम्भ है| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कुछ कलाकृतियाँ रूस को भी मिलीं जिसे उन्होंने यथावत संभाल कर रखा| किसी भी धार्मिक या अध्यात्मिक गुरु को भान नहीं था कि उनके संस्थानों से क्या खोया है| कश्मीरी मंदिर से चोरी गयी एक कलाकृति को जर्मनी वालों ने वर्ष 2000 में नीलामी में ख़रीदा और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जर्मनी गए तो उनको तोहफे में दिया!

पशिमी देशों की राजधानियों में ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं जिनमे सभी ईस्ट इंडिया कंपनियों के ब्योरे शामिल हैं: वर्ष 1847 से 1947 तक हर दिन भारत से दो सौ टन सोना चुराया| सौ सालों की मियाद के मुताबिक सोने का यह आंकड़ा छः सौ मिलियन टन से ज्यादा होता है| इसी सोने के कुछ हिस्से से चीन और भारत की बरबादी के किस्से रचे गए| कुछ साल पहले हमे मुंबई में एक डूबा जहाज मिला जिसमे दो सौ टन सोना मौजूद था| जब सरकार ने सोना जब्त करने की कोशिश की तो ब्रिटिश लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई ये कहते हुए कि ये सोना उनका है क्योंकि ये जहाज उनकी ईस्ट इंडिया कंपनी का है, और बिना किसी सवाल के हमने सोने को वापस कर दिया|  जब हमने कोहिनूर की मांग की तो ब्रिटिश लोगों ने कहा कि इस बारे में चर्चा की जाएगी, और हम ख़ुशी से उछल पड़े|

हालिया नोटबंदी में पश्चिमी कारसाजो का रवैया रहा कि 0.25 ट्रिलियन डॉलर दिखा कर 3.75 ट्रिलियन डॉलर जनता से की नजर से बचाने” का रहा| सोने के लिए यह नीति 160,0000टन या 20000 टन दिखा के 6 मिलियन टन सोने को छिपा लेने की रही| आज हम यह बात खुले मंचों पर कहते हैं कि उन्हें 6 मिलियन टन सोने को जनता के सामने लाकर खुले बाजार में पेश करना चाहिए|

कमोबेश दस्तावेजों के मौजूद आंकड़ों के मुताबिक मंदिरों और राज्यों के खजाने से जब्त कर भारत के कुल सोने का 30% सोना हासिल किया| यह आंकड़ा सिर्फ सोने का है, जेवर, जवाहरातों, माणिक्य और हीरों का हिसाब अलग से| छः मिलियन टन सोने की कीमत 180 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर, की तुलना अन्तराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था में कुल कर्ज 217 ट्रिलियन डॉलर और कुल जीडीपी का तीन गुना है| अंग्रेजों के आने के पहले के सोने के आंकड़े में से ये 6 मिलियन टन कैसे कम हुआ ये तथ्य सामने है| क्या इसके बावजूद हमे मेक इन इण्डिया जैसे उपकरणों के लिए हमे विदेशी मदद की जरुरत रह जाती है?

कुल बचे सोने का सत्तर प्रतिशत अभी भी देश में है, इस हिसाब से आकलन करें तो भारत में चौदह मिलियन टन सोने की मौजूदगी होनी चाहिए… ये आंकड़ा सिर्फ सोने का है, हीरे जवाहरातों की कोई गिनती नहीं| ऐसे में कोई अचम्भा नहीं होना चाहिए कि इस देश की धरती को स्वर्णगर्भा या रत्नगर्भा वसुंधरा क्यों कहा जाता है| यह सोना आज भी लोगों के पास है मंदिरों के पास है| आज एक ब्रिटिश पाउंड की कीमत भारत के सत्तर रुपयों के बराबर है, अगर भारत अपने रुपये को सोने के बदले कर दे तो स्थिति एकदम उलटी हो जाएगी, एक रूपया सत्तर ब्रिटिश पाउंड के बराबर हो जायेगा| देश में बचे हुए सोने की कुल कीमत पूरी दुनिया के कुल कर्जे की दुगुनी कीमत का है| इसे कौन नहीं लूटना चाहेगा? इस लूट का नारा है डिजिटल इंडिया|

इसी वजह से संस्थाओं में मौजूद सोने की स्थिति भयावह है| क्या आजाद भारत में हम भारतीयों की स्थिति विदेशी लुटेरों से भी गई गुजरी है, जो अपने ही सोने को, महज कुछ प्रतिशत की दलाली के लिए व्यक्तियों और संस्थानों से जब्त करके विदेशी मालिकों को सौंपने को तैयार हैं? केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर के भूमिगत वॉल्ट में मौजूद सिर्फ एक मंदिर के सोने की कीमत एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा आंकी जा रही है!

वर्ष 2010 में केन्द्रीय खनिज मंत्री दासारी नारायण राव ने संसद के एक लिखित जवाब में बताया कि अनंतपुर जिले के सिर्फ एक ब्लाक संख्या D-51/D-52 में मौजूद 8.8 मिलियन औंस  खनन योग्य सोने की मौजूदगी है| मोटे तौर पर 30 औंस= 1 किलो के हिसाब से सोना हुआ 300 टन| ऐसे सैकड़ों दूसरे ब्लाक भी मौजूद हैं|वही मंत्री गर्व से सर उठा के कहते हैं कि भारत में किसी भी कंपनी के पास सोने के खनन की तकनीक नहीं इसलिए यह ठेका विदेशी कंपनियों को दिया जा रहा है|

आर्थिक संकेत और विशेषज्ञों के बयानों के आधार पर कहा जा रहा है कि एंग्लो-अमेरिकी देशों के स्वर्ण भंडार ख़त्म हो रहे हैं|इसीलिए बैंक ऑफ़ इंग्लैंड या फ़ेडरल रिज़र्व नहीं चाहते कि कोई ऑडिट हो, ऐसा होने से दुनिया को पता चल जायेगा कि वहां कोई सोना है ही नहीं|कई अर्थशास्त्री इस बात का भी संदेह करते हैं कि सोने की खानों के ख़त्म होने के आंकड़े भी उन्ही के खुद बनांये हुए हैं ताकि सोने का दाम बढ़ा के सोने की कीमतें बढ़ सकें और बढ़ी हुई कीमतों पर दुनिया को खास कर भारत और चीन को बेचा जा सके| इस प्रक्रिया से उनके अपने देशों में मुद्रा की स्थिरता बनी रहेगी|

जब सोने का कोई भौतिक आवाजाही नहीं हुई तो हाल ही में कई देशों ने भौतिक रूप से अपने क्षेत्रों में सोने की आवक की माँग की| चीनियों और जर्मनों ने जब अपने देश में सोना पहुँचाने के लिए कहा तो किसी दूसरी धातु को मिला कर मिलावटी सोना दे दिया गया|

ऐसे बहुत से देश हैं जो बहुध्रुवीय विश्व में विश्वास करते हैं, उन्होंने आपनी मुद्रा को डॉलर से अलग करने की घोषणा की, डॉलर से अलग करके उन्होंने सोने से जोड़ना सही माना| ईरान, इराक, लीबिया, सीरिया चीन के बाद अब रूस ने भी यही रुख अपनाया है| पुचले दो दशकों से दुनिया में हुए युद्धों में मुद्रा को सोने से जोड़ना युद्ध की एक बड़ी वजह साबित हुयी है| युद्धग्रस्त देशों में आम बात ये रही कि उन्होंने अपनी मुद्रा को डॉलर से अलग करके सोने से जोड़ना शुरू किया| चाहे इराक या लीबिया की बात हो या फिर सीरिया की सबके युद्ध कहीं न कहीं डॉलर छोड़ के सोने से जोड़ने की वजह से हुए| सीधे टकराव के साथ साथ एंग्लो-अमेरिकी गिरोहों ने देशों के साथ वित्तीय जालसाजियाँ और स्टॉक्स के भी तमाम कारनामे किये| लिबोर घोटाले में हुई ब्याज दरों की हेर-फेर में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड को दोषी पाया जिस पर भारी जुर्माना लगने वाला था लेकिन ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन से निकल गया| यह ब्रेक्सिट की बुनियादी बात है|

मुद्रा में हुई यही हेर-फेर, जिसमे मुद्रा के लिए सोने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया, 2008 से 2012 के बीच हुई आर्थिक बर्बादी की प्रमुख वजह बनी| जो देश यूरोपियन यूनियन के नहीं उन सबको युद्ध की विभीषिका झेलनी पड़ी जिन्हें हम गोल्ड-पाइपलाइन वार्स कहा जा सकता है| इन युद्धों में इराक लीबिया सिर्फ हारे ही नहीं उनका स्वर्ण भंडार भी जब्त कर लिया गया| जिन चार देशों ने पिछले दशकों में सोने को दरकिनार किया एंग्लो अमेरिकन देशों ने उन्हें ही आरोपी बना दिया| ये चार देश हैं सीरिया, ईरान, रूस और नार्थ कोरिया|

सत्ता बदलने की वजह बना सोना

अमेरिका में और रूस में दुश्मनी ठनी है, अमेरिका ने रूस को अपराधी साबित करने में कोई कसर नहीं रखी| इस रस्साकसी की वजह मिडिल ईस्ट के अमेरिकी मामलों में रूस की दखल नहीं, बल्कि इसकी वजह ये है कि रूस ने दुनिया की सर्वमान्य मुद्रा भण्डार पर अमेरिकी एकाधिकार को चुनौती दे डाली|

रूस के पास इसे हासिल करने के दो रास्ते हैं, पहला ओपेक पर अपना असर बना कर  पेट्रो डॉलर पर अमेरिकी कब्ज़ा हटा कमजोर कर दे| दूसरा रूबल को सोने से जोड़कर, ऐसा करने से रूस की मुद्रा दुनिया में सबसे मजबूत होगी और दुनिया में अमेरिकी डॉलर का एकाधिकार ख़त्म हो जायेगा|

अब तमाम पश्चिमी विश्लेषक उन्ही की जुबान में कह रहे हैं कि आज की दुनिया में सोने से जुडी मुद्रा व्यवस्था हासिल कर पाना असंभव है, क्योंकि उनके हिसाब से पूरी दुनिया की मुद्रा के लिए असली सोने का बंदोबस्त ही संभव नहीं, यही सोच गड़बड़ है| उनकी गलतबयानी की वजह ये भी है कि स्वर्ण आधारित मुद्रा नीति उनके सरकारी कर्ज की राह में रोड़ा है, जिसके जरिये उनकी सरकारें बेहिसाब कर्ज लेती हैं और उसे वापस भी नहीं करती|

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जब हम पूर्व राज्य सचिव हिलेरी क्लिंटन के उन इ-मेल्स को देखते हैं जिन्हें विकिलीक्स ने जारी किया तो हमे उसमे लीबिया पर आक्रमण और उसके बाद लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफ़ी की हत्या का जिक्र मिलता है, कि ये सब इसलिए हुआ क्योंकि उसने स्वर्ण आधारित मुद्रा चलने की प्रक्रिया शुरू की| इस पहल से न केवल अफ़्रीकी देशों की आर्थिक मजबूती बहाल होनी थी बल्कि लम्बे समय से जारी यूरोपीय गुलामी से भी आज़ादी मिलनी तय थी| ऐसा होने से उस काले महाद्वीप में अमेरिकी और यूरोपीय हस्तक्षेप भी खत्म हो सकते थे|

रक्षा विभाग द्वारा नए साल पर जारी किये गए तीन हजार ई-मेल्स से खुलासा हुआ है कि नाटो के गद्दाफी को हटाने के पीछे पहला कारण स्वर्ण आधारित अफ़्रीकी मुद्रा का चलन रोकना था दूसरा वजह लीबिया के तेल के कुएं|

रक्षा विभाग की सचिव हिलेरी क्लिंटन को उनकी अनधिकृत सलाहकार सिडनी ब्लुमेंथल सवालिया लहजे में भेजे गए ई-मेल का शीर्षक है,“ फ़्रांस’ज क्लाइंट एंड गद्दाफी’ज गोल्ड”

फॉरेन पालिसी जर्नल से:

इस ई-मेल की यूँ शिनाख्त की जा रही है कि गद्दाफी पर हमले का नेतृत्व करते हुए फ्रेंच प्रेसिडेंट निकोलस सरकोजी के पांच इरादे थे: लीबिया का तेल, उस क्षेत्र में फ़्रांस की हैसियत बढ़ाना, सरकोजी की घरेलू अहमियत, फ्रेंच सैन्य शक्ति का प्रदर्शन, फ्रंकोफोंन अफ्रीका में गद्दाफी के असर को कम करना या रोकना”| एक लम्बे हिस्से में गद्दाफी के सोने और चांदी के भण्डारों से भारी खतरे को भांपते हुए उनका आकलन ये रहा कि “143 टन सोने और लगभग इतने ही चांदी के विशाल भंडार के चलते फ्रांसीसी मुद्रा को अफ्रीका की प्रमुख मुद्रा के रूप में चलाने में दिक्कतें होनी थी|

सीरियन एडवेंचर में यह महसूस किया गया कि युद्ध का परिणाम अनिश्चित है| फिर भी यह तो तय है कि अमेरिका और ब्रिटेन गंभीर आर्थिक संकट में हैं| उन्हें सोने की जरुरत है ताकि उनकी वित्तीय व्यवस्था और अर्थशास्त्र के साथ साथ बैंक ऑफ़ इंग्लैंड और फेडरल रिज़र्व सरीखे वित्तीय संस्थानों के ढांचे को बचाया जा सके| इस तरह उनको सोने की जरुरत दो वजहों से है: युद्ध लड़ने के लिए और उनके वित्तीय संस्थानों की आर्थिक सेहत दुरुस्त करने के लिए|

हमे 20-30 ट्रिलियन डॉलर कीमत के सोने की दरकार है या यूँ कहें कि ऐसी असली मुद्रा की जरुरत है जिससे सोना ख़रीदा जा सके| इसलिए सीधा सवाल ये है कि: जिन छः देशों से हमे लड़ना हैं उनमे से असली मुद्रा या सोना किसके पास है?” सीधा जवाब है: केवल भारत| इसलिए पहले झटके में 4 ट्रिलियन डॉलर निकले और ये उनके लिए समझदारी भरा कदम था| जिस तरह ईस्ट इण्डिया कंपनियों ने पिछले सौ सालों में किया उसी तरह अब वे लोगों के घरों में रखे सोने के पीछे पड़े हैं| अगर वे लीबिया के 143 टन सोने के लिए युद्ध कर सकते हैं तो फिर भारत का क्या…? लेकिन यहाँ उन्हें युद्ध की जरुरत नहीं| आजाद भारत में तो उन्हें अपने कठपुतली शासकों के लिए बस फरमान जारी करना है| और हम अपने नागरिकों को सिखाने बहलाने का काम कर लेंगे कि हम जो कर रहे हैं वही सबसे बड़ी देशभक्ति है, बाकी ढिंढोरा पीटने के लिए मीडिया मौजूद है|

एक आरटीआई में पूछे गए सवाल के जवाब में रिजर्व बैंक अधिकारियों ने खुले आम बताया है कि वे नोटबंदी के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकते क्योंकि इससे उनकी जान को खतरा है|

यह समय सवाल उठाने का है क्योंकि बात इतनी बड़ी है जिसके लिए रिजर्व बैंक के अधिकारी ने आरटीआई के सवालों के जवाब में “जान को खतरा” बताया| कुछ अख़बारों में यह खबर छपी भी| लेकिन भारतीय जनता को न तो इससे कोई सरोकार मालूम होता है और न ही सही सवाल उठ रहे हैं| आम भारतीय जनता को रिजर्व बैंक की कोर टीम की “जान के खतरे” को गंभीरता से महसूस करने की जरुरत है| जरुरत है की बैंक स्टाफ को यथोचित सुरक्षा मुहैया कराई जाए| साथ ही साथ राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जनता कप जागरुक किया जाए और इस मामले से जोड़ा जाए, क्योंकि यह जनता का भी दायित्व है|

सेना की जिम्मेदारी सीमाओं की सुरक्षा की है, बाहरी खतरों से बचाने की है| उन्हें सिर्फ अंग्रेजों द्वारा बनाई गयी काल्पनिक रेखाओं वाले भारत को बचाने की बजाये समय और अंतरिक्ष के एक भौगोलिक क्षेत्र की हिफाज़त करनी चाहिए| यह भौगोलिक क्षेत्र महज जमीन का टुकड़ा नहीं, यह लोगों और संसाधनों से भरपूर है| बाढ़, भूकंप, दंगे, हडतालों के दौरान जिस फुर्ती से और तेजी से उन्होंने अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया है, उसी तरह यह उनका परम कर्तव्य है कि ऊंचे ओहदे पर बैठे लोग अगर संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने में “जान को खतरा” मानते हैं तो सेना को चाहिए कि आतंरिक खुफिया के साथ मिलकर ऐसे खतरे को नेस्तनाबूद करे|

लेकिन हमारे यहाँ के वर्तमान हालातों में ऐसा कुछ भी देखा सुना नहीं गया| इससे जाहिर होता है कि हमारे लोगों की भारतीय गणतंत्र को होने वाले बाहरी खतरें पर साफ़ नजर नहीं| यही खतरा सीमाओं पर भी मुखर हो रहा है|

बिकाऊ मीडिया और दलाल पत्रकारों की भूमिका

भविष्य में हो सकता है कि कोई कद्दावर नेता साहसिक कदम उठा कर घोषणा कर दे कि भारत में स्वर्ण आधारित मुद्रा चलाई जाएगी| शायद भारत को आतंकी देश घोषित करने में भी भारतीयों को ख़ुशी भी हो| तब वे भारत से भी लड़ेंगे| यहीं दिक्कत है: देश के एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों की आपस की लड़ाई होना और इराक, सीरिया और लीबिया के युद्ध में फर्क है| इसलिए तीन सूत्री रणनीति अख्तियार की गयी: पहला, भारतीय सेना को चौथे दर्जे की, अयोग्य और राजनीतिक तौर पर लिप्त सेना बनाया जाए| यह जनरल वेलेस्ली क्लार्क का सिद्धांत है जिसे स्ट्रेटेजिक डिफेन्स इनिशिएटिव के नाम से जाना गया| इससे यही सुनिश्चित किया जाना है कि जब कभी लड़ाई हो तो भारतीय नामर्द साबित हों| दूसरा, सोने को भारत से बाहर ले जायें ताकि हम भारतीय जरुरत पड़ने पर भी स्वर्ण आधारित मुद्रा न बना सकें| इसका एक रास्ता यह है कि देश में ज्यादा से ज्यादा कालाधन बने ताकि इस कालेधन के बदले में सोना बनाया जा सके|      यही वह मुकाम होगा जहाँ जाने अनजाने में हमारी अपनी सरकार नोटबंदी करके पश्चिमी अर्थशास्त्रियों की ठगी और लूट की शिकार हो रही है| इसी के लिए नोटबंदी करके भी ज्यादा बड़े मूल्य के नोट चलाये गए| यही वजह है कि इसके बारे में आम जनता को भी नहीं बताया जा रहा है, कि ये मुद्रा विदेशों में कहाँ छप रही है |

तीसरा, भारतीय सामंतों को असल मामले की समझ और सच्चाई से दूर रखा जाए

अगर हम देखते हैं कि भारतीय अनुसन्धान संस्थानों के साथ ज्यादती हो रही है कि वे अपना स्तर गिरायें, गुणवत्ता से समझौता करें तो निश्चित ही भारत बर्बादी की ओर बढ़ रहा है| उन्हें भारत के साथ युद्ध की जरुरत ही नहीं, क्योंकि उनके लिए भारत कभी गणतंत्र रहा ही नहीं| जिनकी अपनी सोच और विचार नहीं, ऐसे गुलामों को सँभालने के लिए विदेशी मालिकों के चंद नारे ही काफी हैं| साफ़ नजर आता है कि आजकल भारत में लोकशाही नहीं नाराशाही का जोर है| यही नारे उछाल कर मीडिया देश को गुमराह करता है|

तमाम अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने जनता के सामने स्वीकार किया कि कॉर्पोरेट मीडिया नकली मीडिया है| वाइट हाउस भी यह घोषणा कर चूका है कि सभी कॉर्पोरेट मीडिया संस्थान जैसे सीएनएन, एबीसी, एलए-टाइम्स, जो नकली मीडिया हैं वे वाइट हाउस से दूर रहें| लेकिन हम भारतीयों के लिए वही कॉर्पोरेट मीडिया मानों सच के दूसरे पर्याय हों|

महज एक उदहारण नकली मीडिया की पोल खोलने के लिए काफी है कि यह मीडिया भारत और बिभाजित भारत यानि पाकिस्तान के बीच कितना संशय पैदा करता है| सर्जिकल स्ट्राइक हुई, जिसे कश्मीर मामले में भारत की सेना ने किया| सीएनएन इण्डिया ने प्राइम टाइम पर एक कार्यक्रम दिखाया जिसमे उन्होंने एक पाकिस्तानी जनरल के हवाल से स्ट्राइक के होने की सूचना पुख्ता की|भारत की जनता ने नारेबाजी की, जो इसके पक्ष में नहीं थे वे राष्ट्रद्रोही करार दिए गए|

उसी समय उसी चैनल के पाकिस्तानी संस्करण ने जो कार्यक्रम दिखाया उसमे उनके पत्रकारों ने उसी नीलम घाटी में जाकर खोजबीन की और पाकिस्तानी आवाम को समझाया कि भारत ने ऐसी कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की है|अनुभवी पाकिस्तानी जनरल मुस्करा दिए क्योंकि उन्होंने भारतीय सेना के इस ऑपरेशन का दायरा नहीं बताया| वरना भारतीय दावे के मुताबिक 260 किलोमीटर के दायरे में की गयी ये कार्यवाही महज सर्जिकल स्ट्राइक नहीं एक बड़ा हवाई हमला साबित होता| लेकिन सभी चैनलों ने उसी खबर को घुमा-फिरा कर बजाया, जिसने उनकी खबर से इनकार किया वही देशद्रोही|

ऐसे अभियानों में ये सवाल भारतीय वायुसेना की क्षमता पर नहीं| न ही इसमें कोई सवाल है कि आतंकवाद से निबटने के लिए मजबूत इरादों और सख्त कार्रवाई की जरूरत है| हमारा सवाल ये है कि क्या भारत की जनता को वो सब मान लेना चाहिए जो कॉर्पोरेट मीडिया परोस रहा है? इसलिए ये देश इस बात को जानने का अधिकार तो रखता ही है कि वहां पर असल में हुआ क्या था?

  1. नोटबंदी का अनकहा असर – कृषि की बर्बादी और रिटेल में ऍफ़डीआई

भारत में किसानों की दुर्दशा पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया| कर्ज, उदारीकरण, और वैश्वीकरण की मिलावट से आयातों को सब्सिडी दी गयी, इससे लागत मूल्य और नकदी फसलों के मामले में भारी वित्तीय संकट उत्पन्न हो गया| नतीजन पिछले बीस सालों में 300000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की| हरित क्रांति के नतीजे (भूमि क्षरण, घटती उर्वरा शक्ति, भूगर्भ जल का गिरता स्तर, सूखा आदि) से न्यूनतम समर्थन मूल्यों और आय गारंटियों के बावजूद छोटी जोत वाले किसानों के लिए खेती जारी रख पाना दूभर है| पिछले वर्ष की नोटबंदी की नीति के असर ने उनकी स्थिति और अधिक दयनीय कर दिया है|

भारत में छोटी जोत वाले किसान को हर मोर्चे पर मार पड़ी है| कंपनियों की शाह पर सरकार खाद्यान्न और कृषि क्षेत्र का भी पूंजीकरण कर रही है| यह फ़िलहाल की व्यवस्था को उन कंपनियों की जरुरत के मुताबिक उनके हवाले करने जैसी है, जिसको विश्व बैंक की रणनीति और निर्देश से चलना है| नवउदारवादी नीतियों के चलते आत्म निर्भर ग्रामीण आबादी के करोड़ों लोग शहर पलायन को मजबूर हैं|

रीजनल कॉम्प्रेहेंसिव इकनोमिक पार्टनरशिप (RCEP) से इस प्रक्रिया को गति मिल सकेगी| यह व्यापार प्रस्ताव एशिया पसिफ़िक के सोलह देशों के बीच लागू होना है| RCEP का विस्तार दुनिया की आधी आबादी के 420 मिलियन परिवार आधारित खेतों तक है, जो दुनिया का 80 प्रतिशत अनाज उगाते हैं|

GRAIN एक अन्तराष्ट्रीय गैर लाभकारी संगठन है जिसने हाल ही में एक संक्षिप्त रिपोर्ट प्रकाशित की है जो RCEP के प्रस्तावों और गतिविधियों से सम्बंधित है| रिपोर्ट में RCEP से अपेक्षा की गयी है कि वे खाद्यान्न और कृषि व्यापार से जुडी कंपनियों के लिए नए अधिकारों और आकर्षक व्यापारिक अवसर पैदा करें| इससे भारत की दुर्बल होते जय किसान खाद्यान्न आत्म निर्भरता के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा|

भूमि अधिग्रहण और बीज बचत

GRAIN के मुताबिक RCEP से विदेशी कंपनियों को भूमि खरीदने के अधिकार होंगे| यह कंपनियों को महज अधिकारों और जमीन की कीमतों और छोटे किसानों के विस्थापन के अनुमान से ज्यादा बेहतर नियंत्रण स्थापित करने में कारगर होगा| अगर RCEP को अपनाया जाता है तो यह भारत में हो रहे भूमि अधिग्रहण को ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से भी ज्यादा सस्ता और तेज प्रक्रिया में तब्दील कर सकता है|

  1. और हमारे प्रधानमंत्री जी इजराइल में घोषणा कर दी कि हम रियल एस्टेट में 100% FDI मंजूर करते हैं| एक बड़ा अचम्भा ये भी है कि आम जनता और प्रधानमंत्री जी जिस FDI को फॉरेन डिस्ट्रक्शन ऑफ़ इंडिया कहते थे, सत्ता में आकर 180 डिग्री का यू टर्न लेकर FDI का मतलब फर्स्ट डेवलपमेंट ऑफ़ इंडिया बना दिया| मालूम होता है कि देश का विकास कभी हुआ ही नहीं, और देश के विकास के लिए विदेशियों का हस्तक्षेप बहुत जरुरी है जिसके लिए FDI की दरकार है|

हम वापस किसान के बीज बचत के मुद्दे पर आते हैं, GRAIN ने रेखांकित किया है कि मोंसंटों और बाएर चाहते हैं कि यह परंपरा ख़त्म हो ताकि किसानों को उनके बीज हर साल लेने पड़ें| आज बीज उद्योग बहुत केन्द्रित है और आने वाले दिनों में विलय होने से और ज्यादा मजबूत होंगे| ऐसे में उनका सरकारों और किसानों पर असर भी बढेगा|

एक उदहारण सामने है, चीन सिनजेंटा (Syngenta) को खरीदने की प्रक्रिया में है, सिनजेंटा (Syngenta) दुनिया की तीन सबसे बड़ी बीज कंपनियों में से एक आंकी जाती है| ग्रेन के मुताबिक ऐसा होने से बीज विधानों में चीन की हिस्सेदारी बढ़ेगी और RCEP के बैद्धिक सम्पदा अधिकारों उसके अधिकार मजबूत होंगे| ऐसा होने से कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था चरमराने के बाद भारत चीन के लिए दुधारू गाय साबित होगा|

मोंसैंटो के जीन परिवर्धित बीजों के व्यापार के दुष्प्रभाव भारतीय किसानों की बर्बादी का सबब रहा है, साथ ही कंपनी ने रॉयल्टी के भी दावे किये हैं| भारत में कंपनी ने राजनेताओं और साझेदार व्यापारियों के साथ मिलकर नियम बनवाए भी और तोड़े भी| RCEP में परिस्थितियां और भी भयावह हो सकती हैं| ग्रेन के मुताबिक अगर राज्यों ने वनस्पतियों पर हुई खोजों के पेटेंट जारी करने शुरू किये तो जीन परिवर्धित बीजों पर एकाधिकार बनेगा, बीजों के दाम बढ़ेंगे, कॉर्पोरेट का नियंत्रण भी बढेगा| साथ ही बड़े खतरे वाले उत्पादों (जैसे जीन परिवर्धित बीज) के मानकों में गिरावट भी होगी जैसा कि जीन परिवर्द्धित मस्टर्ड में हुआ|

भारत का डेरी सेक्टर

पांच दशकों से नीति निर्धारित करने में सक्रिय सरकार ने डेरी सेक्टर के लिए को-ऑपरेटिव मॉडल को प्रोत्साहित किया है| RCEP में आयात को सब्सिडी देने से डेरी सेक्टर में गलत प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा| इस प्रकार के पिछले प्रयोगों में हुई तेल क्षेत्र की बदहाली सामने है|

देश के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक गुजरात गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के प्रबंध निदेशक आर एस सोढ़ी के मुताबिक फ्री ट्रेड के नाम से हो सौदों में देश का घरेलू डेरी उद्योग लुट जायेगा| इससे भारत के उभरते बाजार से सीधे जुड़े करोड़ों किसानों पर सीधा असर पड़ेगा|

भारत का डेरी उद्योग आत्म निर्भर ओने के साथ साथ दस करोड़ लोगों को रोजगार भी देता है, जिसमे से अधिकांश महिलाएं हैं| यह सेक्टर लघु और सीमान्त किसानों, भूमिहीन गरीबों और लाखों परिवारों के लिए जीवन रेखा जैसा है| आज तक वे ही इस सेक्टर की रीढ़ रहे हैं|

डेरी उत्पादों के सबसे बड़ी निर्यातक न्यूज़ीलैण्ड के डेरी फर्म फोंटेर्रा को भारत के डेरी बाज़ार में आने के लिए RCEP का इंतजार है| कम्पनी ने खुले तौर पर कहा है कि भारत के बंद बाज़ार का खुलना कंपनी के लिए महत्वपूर्ण है|  बहुत से लोग मान रहे हैं कि कंपनी के आने से या तो अधिकांश लोग या तो फोंटेरा के लिए काम करेंगे या फिर बाज़ार से बाहर हो जायेंगे |

इसी दौरान RCEP के तमाम देशों ने न केवल किसानों की सब्सिडी बढाई बल्कि अपने खाद्य सुरक्षा के मानकों को भी छोटे व्यवसाय से दूर कर दिया है, इससे RCEP वाले कई देशों में उद्योग हाशिये पर है| इसलिए बाज़ार में बहुत जगह सेंधमारी की गुंजाइश है: 1998 के तेल के खेल में नकली सुरक्षा मानक बने जिनसे विदेशी तेल कंपनियों को देश में आने का रास्ता मिला: ग्रामीण भारत के कोल्हू बंद हो गए, या जबरिया बंद करवा दिए गए|

ग्रेन का एक तथ्य ये भी है कि RCEP के लागू होने से मेगा फ़ूड पार्कों में निवेश बढेगा ताकि निर्यात आधारित बाज़ार तलाशे जा सकें, यह भारत में पहले से ही जारी है| इन प्रोजेक्ट्स में उच्च तकनीक की फार्म-टू-फोर्क वाली सप्लाई चैन की जरुरत होगी, संभव है कि इससे छोटे उत्पादकों कुटीर उद्योगों के लिए आफत खड़ी हो जाए| गौरतलब है कि एशिया में ग्रामीण और शहरी परिधि पर मौजूद समुदायों में यही प्रमुख हैं| कॉर्पोरेट नियंत्रित सप्लाई चेन के बढ़ने से किसान उन्ही पर निर्भर होंगे या फिर ताकतवर कंपनियां औद्योगिक दर्जे के उत्पादन के लिए किसान को दरकिनार कर सकती हैं| ऐसे में छोटे किसानों को खेती के लिए अपनी पारंपरिक बचत का निवेश करना करना होगा, इससे सोने की जब्ती का रास्ता बनेगा| ऐसे में 1000 रुपये की आय का फार्मूला भी किसान के लिए राहत नहीं साबित होगा और उन्हें खेती छोड़कर शहर में मजदूरी के लिए जाना पड़ेगा, शहरी क्षेत्रों में पलायन बढ़ना तय है, जहाँ किसानों को सरकारी तंत्र में ही गुलामों जैसा जीवन जीना पड़ेगा |

रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बढेगा

आने वाले सालों में एशिया-पसिफिक में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बढ़ना तय माना जा रहा है| रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग चीन में सर्वाधिक है और भारत में तेजी से बढ़ रहा है| ग्रेन ने रेखांकित किया है कि सिंजेंता जो कि दुनिया की सबसे बड़ी एग्रोकेमिकल कंपनी है, की खरीद के बाद चीन की RCEP में निर्णायक हिस्सेदारी बन जाएगी|

जनवरी 2017 में चीन ने घोषणा की है कि विदेशी बाज़ारों को बढावा देने के लिए वह नाइट्रोजन और फॉस्फोरस आधारित उर्वरकों पर निर्यात शुल्क हटा देगा| RCEP के व्यापार मंत्रियों ने पहले चरण में 65% वस्तुओं पर आयत शुल्क समाप्त करने की घोषणा की है| ग्रेन की रिपोर्ट कहती है कि खेती में प्रयुक्त रसायन इसमें शामिल हैं| इसके नतीजे में खाने और पेयजल में रसायनों की मात्र बढ़ जाएगी| ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढेगा, आदमी और जमीन दोनों की बीमारियाँ बढेंगी, उर्वरता कम होगी|

बड़े रिटेल से स्थानीय बाज़ार धराशायी होंगे

RCEP रिटेल सेक्टर में भी उदारीकरण की मांग की जा रही है, यह कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में भी कंपनियों के लिए रास्ते खोलेगा| इससे छोटे व्यपारियों और पथ विक्रताओं पर आजीविका का संकट खड़ा होगा| रिटेल में विदेशी कंपनियों के आने से किसानो पर बहुत बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि कंपनियों की नीति समस्त खाद्य श्रंखला को धीरे-धीरे एकाधिकार बनाने की रही है, यह प्रक्रिया खरीद से वितरण तक में लागू होगी|| मूल्य निर्धारित करने का अधिकार रखने वाली कंपनियां छोटे-छोटे किसानों से छोटी छोटी खरीद नहीं करेंगी, इसके नतीजे में असहाय किसान बड़ी कंपनियों की दया का पात्र बन जायेगा|

RCEP की योजनाकारी कॉर्पोरेट को मजबूत करने की है, ताकि एशिया के कृषि क्षेत्र में बीज से खाने की थाली तक कंपनियों की दखल हो| कृषि के कॉर्पोरेट केन्द्रित होने से करोड़ों लोगों को रोजी रोटी का  संकट खड़ा होगा| कंपनियों के खाद्यान्न उत्पादन के तरीकों की कीमत सामाजिक, स्वस्थ्य और पर्यावरण की बर्बादी से चुकानी होगी, जिसे झेलना आम आदमी और राज्य दोनों के लिए दुष्कर होगा|

नवउदारवादियों का तर्क है कि किसानों और कंपनियों के समझौते से बेहतरी के रास्ते बनेंगे इसलिए यह भारत जैसे देशों के कायांतरण के लिए जरुरी हैं| लेकिन ये गलत बयानी किसी काम की नहीं, क्योंकि ये किसी देश के जीडीपी आधारित विकास की परिभाषा के बाहर है, साथ ही ऐसे बयान संकुचित, काल वाह्य और भ्रामक भी हैं|

RCEP जैवविविधता प्रधान खाद्य उत्पादन को दरकिनार करने वाला व्यंजन है, यह अधिसंख्य आबादी के लिए खाद्य संप्रभुता और खाद्य सुरक्षा का खतरा पैदा करता है| या भारत जैसे देशों में बेहिसाब बेरोजगारी पैदा करेगा, जहाँ कार्यशील आबादी के लिए इतना बड़ा नुक्सान उठाने की क्षमता मौजूद नहीं|

इसके पर्यावरणीय नुकसानों के चलते पूंजीवाद के अनंत विकास की सोच से प्रेरित RCEP का विकास का यह मॉडल स्थायी नहीं|

“जीवन की गुणवत्ता का अर्थ अध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रश्न है, इसे महज मार्क्सवाद के उत्पादनवाद तक सीमित नहीं करना चाहिए| समाजवाद का मकसद हमेशा से आदमी की आज़ादी ही रहा है, जो कि भौतिक संपत्तियों से कहीं ज्यादा मायने रखती है… गाँधी ने प्रकृति के मूल्यों की मांग की बात की है… हमे प्रकृति की सीमा में रहना होगा|”

पटनायक ने वर्तमान नवउदारवाद का विकल्प प्रस्तुत किया है, जिसके मुताबिक हमे खुद को पूंजीवाद नियंत्रित वैश्वीकरण से अलग कर लेना चाहिए जो विदेश व्यापार से घरेलू बाज़ार को प्रभावित करता है और कृषक समुदाय के लिए भी दोयम दर्जे की सुरक्षा को प्रोत्साहित करता है, लेकिन ऐसा करने के लिए राज्य को जनकल्याण के खर्च बढ़ाने  होंगे ताकि संपत्ति और आय का वितरण सर्वजन सुलभ हो सके|

पूंजीवाद में उत्पन्न समस्याओं के नए और खोजपरक समाधान के लिए हमे पर्यावरण/ खाद्य संप्रभुता की वकालत में जनांदोलन चलाने की जरुरत है, जिसमे वैश्वीकरण की बजाए स्थानीयकरण को बढ़ावा दिया जाए, आत्म निर्भरता बने न कि कॉर्पोरेट की निर्भरता की बात हो|

स्थानीय खाद्य अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने की जरुरत है जिनके व्यापार अन्तराष्ट्रीय घेरेबंदी से सुरक्षित हो सकें| बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों की बजाए समुदायों के नियंत्रण वाली, समुदायों के लिए हितकर व्यवस्था से हमे स्वास्थ्यवर्धक खाद्यान्न और टिकाऊ खेती हासिल हो सकेगी, आदमी की जरुरत तो बस इतनी भर की है|

हमे मेक्सिको को देखना होगा जहाँ मुक्त व्यापार ने खाद्य और कृषि क्षेत्र तबाह कर दिया: स्वास्थ्य बर्बाद कर दिया, बेरोजगारी पैदा की, गरमी आबादी को समस्याग्रस्त प्रवासियों में तब्दील कर दिया जो कि आज आरक्षित श्रमिक के तौर पर हैं और कार्यशील लोगों की जगह पर कभी-कभी काम में लग पाते हैं, यह भारत के दीवारों पर लिखने वाली इबारतें हैं|

RCEP भारत के लिए स्थायी कृषि का कोई समाधान नहीं, जहाँ का किसान विकास के केंद्र में हैं, उसके लिए इसकी नीतियों से कोई बास्तविक या व्यावहारिक समाधान नजर नहीं आता|

यूनिवर्सल बेसिक इनकम- उदारीकरण का भगवा मिशनरी साम्यवाद

यूनिवर्सल बेसिक इनकम का फार्मूला इसलिए ईजाद किया गया ताकि लोग अपनी खेती और जमीनें छोड़कर शहरीकरण में शामिल हो सकें| अगर 1000 रुपये प्रति व्यक्ति मिलता भी है तो इसका 80% सिर्फ खाने भर के लिए पर्याप्त हो सकेगा| शहरी आबादी का यह पैसा बड़ी कंपनियों की जेबें भरेगा और लोगों की सेहत के साथ साथ खाने की आदत ख़राब करेगा| देश की हालत ऐसे कैंप की तरह हो जाएगी जहाँ की दोयम दर्जे की आबादी को बड़े खिलाडियों के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सके| यह कुछ वैसा ही हाल होगा जिसका प्रयोग उन्होंने भारत के राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना का बेजा इस्तेमाल अफीमी अन्नपूर्णा बनाने में किया था|

इस से निजात पाने का एक ही रास्ता है कि गाँधी के आदर्शों के भारत को बहाल किया जाए| हमे अपने मानवीय और प्राकृतिक संसाधनों के साथ हमे आत्मनिर्भरता हासिल करके स्वराज रचने की जरुरत है, न कि अंग्रेज की दी हुई आज़ादी में उलझे रहने की| सबसे अहम् बात तो ये होगी कि हम भारत में मौजूद कालेधन को जब्त करके लोगों की भलाई में लगा सकें और गुट निरपेक्ष आन्दोलन के अगुवा बन कर भारत और दुनिया की तमाम समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करें| इंसानी तरक्की और खुशहाली का सही रास्ता अध्यात्मिक विकास और विविधता में ही मौजूद है|

Share:
error: Content is protected !!