भारत के इतिहास में दो रट्टू इस्लामी मिथक

This post is also available in: English

भारत के इतिहास में दो रट्टू इस्लामी मिथक

शालिनी और श्री किदम्बी

 

एच एम इलियट & कंपनी और मनोरोगी इतिहासकार: संस्कृति के भक्षक, लुटेरे और बलात्कारी

एच एम इलियट की नव उदारवादी राजनीतिक शुचिता के पक्षकार: शांतिदूत या जादूगर संत

उलो आज़म: ईश्वर, शिक्षक या गुरुओं की किताबें रखने वाले लोग-मोहम्मद की कुरान

– इतिहास समझने का तर्कहीन हिस्टीरियाई तंत्र और भारत में फैला बौद्धिक बेसुरापन

– मिथक/ इतिहास का एक खाता1: चाँद के दो टुकड़े होने के बाद इस्लाम का शांतिपूर्ण आगमन

– मिथकीय/ इतिहास का एक खाता2: सिंध पर इस्लामी हमला, गलत झूठे और मनगढ़ंत इतिहास का एक अध्याय- पंद्रह साल के एक लड़के ने सिंध, मुल्तान और पर्शिया पर कब्ज़ा किया और बीस की उम्र में अरब वापस लौटकर उस लड़के की हत्या हुई|

परिचय:
एक मजहब के तौर पर इस्लाम और मुस्लिम आबादी को हिंसा और लूट का आधारित बताया जाता है| जब हमारा पश्चिमी पडोसी पाकिस्तान बना तो मामला इतना ही नहीं रहा, पूरे इस्लाम को भारत में एक बड़े आतंकवादी संगठन के तौर पर देखा जाने लगा| ब्रिटिश और अमेरिकी दखलंदाजी के चलते हमारे देश का यह वर्तमान पिछले दो सौ सालों का खास सबक है| लेकिन भारत के इतिहास में इस्लाम के कई संस्करण दर्ज हैं| भारत के इतिहास के इन दर्ज संस्करणों में इस्लाम को शांतिदूत और रूहानी ताकतों का जादूगर भी बताया जाता है| जब वे भारत आये तो भारतीय राजाओं ने उन्हें न केवल स्वीकार किया बल्कि अपने मंदिर और अध्यात्मिक केन्द्रों को भी उन्हें सौंप दिया ताकि वे शांतिदूत सारी भारतीय विरासत को नेस्तनाबूद करके मस्जिदें बना सकें| इस्लाम की तथाकथित हिंसक और अहिंसक दोनों धाराएँ  दोनों मोहम्मद के युग यानि हिज्र के पहले सौ सालों में हिन् हिंदुस्तान आ गयी थीं| हिंसक धारा उत्तर और उत्तर पश्चिम से तो अहिंसक धारा दक्षिण और दक्षिण पश्चिम में भारत पहुंची| हिंदुस्तान के इन दोनों हिस्सों के बीच कम से कम दो हजार किलोमीटर का फासला था| ये वही तथ्य हैं जिन्हें भारत में इतिहास के नाम पर पिछले दो सौ सालों से लगातार दोहराया जाता रहा है ताकि यह सच साबित हो जाये| यह भी अचम्भा है कि इन्हीं हिन्दुस्तानी तथ्यों के आधार पर हमारे राजनीतिक निर्णय आज भी हो रहे हैं| किसी ने न तो समझने की कोशिश की न ही हमारे इतिहासकारों, अकादमिक लोगों और सुरक्षा एजेंसियों को इसकी परवाह है जिससे देश का सामाजिक राजनीतिक और अध्यात्मिक ढांचा बिगड़ रहा है|

जबकि मिडिल ईस्ट में इस्लाम के सामाजिक राजनीतिक मजहबी और रूहानी विकास में ईसाइयत और यहूदी मजहबों का जिक्र बदस्तूर शामिल है| सुधारने का कोई प्रयास हुआ ही नहीं इसलिए हम इतिहास का मिथकों का ब्रिटिश संस्करण रटे जा रहे हैं| यही वजह है कि हम वैश्विक हिंसा और आतंकवाद की जटिल परिस्थितियों को समझने और हल करने लायक भी नहीं बचे| इस्लामी आर्थिक संप्रभुओं द्वारा फैलाये जा रहे आतंकवाद में हमारा इतिहास बोध आड़े आता है, जिसे आज़ादी के सत्तर वर्षों बाद आज भी सुधारने की जरुरत तो है लेकिन हमारी ऐतिहासिक लफ्फाजी दूर करने के गंभीर प्रयास शायद ही हो सकें| अफसोसजनक बात तो ये है कि इन लफ्फाजी भरे किस्सों वाले इतिहास बोध से हमारी भविष्य की नीतियां बनाई जा रही हैं| जब हम अपने देश की नीतियां उन्हीं किस्सों पर बुनते हैं तो हम उस खास मकसद में अपने आप ही शामिल हो जाते हैं जिन मकसदों से बांटो और राज करो का ब्रिटिश का नौकरशाही कारोबार आज भी फल फूल रहा है| इस प्रकार की खंडित अवधारणाओं के जारी रहते देश के बचे-खुचे धर्मनिरपेक्ष ढाँचे का नेस्तनाबूद होना तय मानिये! ऐसे ही एक उदहारण में दक्षिण भारत के एक राज्य की खुफिया के आईजी ने बयान दिया कि उन्हें इस्लाम के बारे में कुछ भी नहीं पता और रिटायरमेंट के बाद उन्होंने इस्लाम का अध्ययन शुरू किया|  

पूर्व ब्रिटिश सचिव अलास्तैर क्रूक के एक शानदार लेख में उसने सारे तथ्यों के साथ लिखा है कि इस्लामी कट्टरपंथियों का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं, इस्लामी चरमपंथ को ब्रिटिश ने ईजाद किया| ऐसा करने के लिए उन्होंने अल सउद परिवार के अधिकारिक अध्यात्मिक फिरके वहाबियत को खाद पानी देकर तैयार किया| वहाब अपनी कब्र से चीख चीख कर कहते हैं कि मुहम्मद के आजाद ख्याल सेक्युलर फिरके के लोगों के सर कलम कर दिए जाएँ|

हमारे आगामी लेख मिडिल ईस्ट में भूकंप को देखें

ऐतिहासिक तथ्यों की सरसरे तौर पर जांच करें तो मिलता है कि अरब या पर्शियन इतिहास में उक्त दोनों धाराओं का कोई जिक्र नहीं| जाहिर है कि ये दोनों संस्करण झूठ, मनगढ़ंत और कल्पनालोक की कहानियां हैं जिनके किरदारों को भाषाई रूपकों की बदौलत जिन्दा किया गया है|

इन्ही भाषाई रूपकों को बांटो और राज करो के राजनीतिक मिशन के चलते पीढ़ी दर पीढ़ी पिलाते रहे हैं| भारत में इस्लाम के हिंसक आगमन का किस्सा तथाकथित तौर पर इस सहस्राब्दी का सबसे बड़ा मजाक है जो इतिहासकारों की लफ्फाजी के चलते सत्य मान कर पढाया जाता रहा है| सिंध के रास्ते इस्लाम के हिंसक आगमन का जिसमे मुहम्मद बिन कासिम का जिक्र मिलता है वह कुछ इस तरह है| मुहम्मद के कालखण्ड एक अरब महिला अरबी बेड़े में श्रीलंका जाती है| यहाँ गौरतलब है कि अरब में महिलाओं को मकान की पहली मंजिल की बालकनी से झाँकने की इजाजत  आज भी नहीं है| दूसरी बात रही बात जहाजियों की तो उस समय अरबी जहाजियों को पर्शिया के बंदरगाह पर जाकर रेगिस्तानी कबीलों से माल लेना होता था|

उस दौर में ज्यादातर व्यापार हिंदुस्तान से होता था, जिसमे व्यापार के लिए सड़क मार्ग ही इस्तेमाल होते थे| ये सड़क मार्ग पश्चिमी भारत से लेकर कश्मीर तक आज भी मौजूद हैं, ये अलग बात है कि आज उन मार्गों को OBOR के नाम पर नशाखोर चीन हमसे हड़पना चाहता है|

वो सड़क मार्ग पर्शिया, यूरोप और अफ्रीका तक मौजूद हैं| तब के गुजरात के तटीय बंदरगाह भी भारतीय समुद्री डाकुओं के कब्जे में थे| उन जहाजियों को समुद्री लुटेरों ने पकड़ लिया| ये किस्सा तमाम बदलते बयानों की जुबानी सुनने को मिलता है जिसमें तेरह साल की एक लड़की ने मदद के लिए बगदाद के गवर्नर को चिट्ठी लिखी| जवाब में गवर्नर ने सिंध के राजा को मामले में दखल करने के लिए चिट्ठी लिखी (बदलते बयानों और दस्तावेजों की जुबानी इस किस्से में संभव है कि अगले संस्करणों में फ़ेडेक्स या स्पीड पोस्ट का भी जिक्र मिले)| जब सिंध के राजा ने यह कहकर कि वह क्षेत्र राज्य का हिस्सा नहीं है न ही उसने कभी समुद्री लुटेरों का नियंत्रण किया है, किसी दखल से मना कर दिया| तब इससे अपमानित होकर बगदाद के गवर्नर ने अपने पंद्रह साल के भतीजे कासिम को समुद्री लुटेरों की बजाए सिंध जीतने के लिए भेजा| कासिम की सेना में चौदह हजार सैनिक थे जिनमे दो हजार अरबी थे बाकी वालंटियर| उसने लड़ते-लड़ते पूरे पर्शिया को पार किया जिसमे सारे अरबी मरते दम तक लड़े, सिंध पर कब्ज़ा किया और लूटा| इतना सब करके जब कासिम पाच साल बाद बगदाद पहुंचा तो वहां नया खालीफा काबिज हो चूका था, खलीफा से सत्ता संघर्ष में कासिम और उसके चाचा जान की हत्या हो गयी| इस किस्से में एक खामी यह है कि उस कालखंड में अरब और खासकरके अरबी महिलाएं पढ़ी लिखी नहीं होती थीं| दूसरे किस्से में मिलता है कि लड़की लुटेरों से बच के भाग निकली और खुद ही जाकर गवर्नर से मिली| तीसरे किस्से में मिलता है कि लड़की ने किसी को खबर दी और उसने दूसरे समूह के मार्फ़त गवर्नर को ये खबर भिजवाई| दीगर हालातों में ये सभी किस्से बराबर माने गए|

इसी दौरान इस्लाम का शांतिपूर्ण आगमन गढ़ा गया, एक हैरतंगेज कारनामे के साथ जिसमे असंभव जैसा अदम्य साहस और महानता बताई जाती है| ये किस्सा भी एक बेतुके मजाक जैसा है जिसे मिशनरी शिद्दत के साथ रूहानी लिफाफे में सजा के पेश किया जाता रहा| ये हमारे बौद्धिक बेसुरेपन का खुला दस्तावेज है, जो कि आज़ादी के इतने सालों के बावजूद हमारे इतिहासबोध की बदस्तूर गिरावट दिखाता है| ये गिरावट हमारे प्रेस, पब्लिक एजुकेशन, प्रिंटिंग और पब्लिक डिबेट्स के चार खम्भों के खोखले हो जाने से लगातार होती रही है|

इस्लाम के पहले की एक अरबी कहावत है ऐन्शिक़क अल कमर या कहें शिकाक-अल कमर या कहें कि इन्शिगाघ-अल कमर| इसका मतलब होता है चाँद के दो टुकडे करना (तलवार से)| ये ख़िताब पैगम्बर मुहम्मद साहब के नाम दर्ज है जो किसी इंसानी मखलूक के लिए मुमकिन नहीं| इस कहावत की बुलंदी देखने को मिलती है ईरान में मुल्ला अयातुल्ला की हुकूमत में, उनकी हुकूमत में यह किस्सा मदरसों में पढाये जाने वाले पाठ्यक्रम में शामिल किया गया, साथ ही यह भी कि जब अमेरिका और दूसरे देशों के मिशन चाँद पर उतरे तो उन्होंने एक छोर से दूसरे छोर तक वो निशान देखे जो चाँद के दो टुकड़े करने की वजह से बने थे| इससे ही पैगम्बर मोहम्मद की ताकत और रूहानी तासीर की ताकीद बताया गया| शायद हमारे पाठक इससे सहमत न हों लेकिन इस्लामी इतिहास ऐसे ही चट्टानी सबूतों से भरा है जिन्हें बदलना नामुमकिन है| कुछ स्वयंभू धर्मगुरु और वेदपाठी भारत में भी हैं जिन्होंने चाँद को खींचकर लाने धरती के नजदीक लाने का दावा किया, बताते तो ये भी हैं कि उसके दो महीनों बाद चाँद को दोबारा उसकी जगह पे पहुँचाया भी| ऐसा करके उन्होंने भारत और जापान को उस चीन के नुक्लेअर टेस्टिंग से पैदा हुई रेडियोधर्मी विकिरणों से बचाया!  

यह अविश्वसनीय मजाक या कहें  कि इतिहास का एक किस्सा कहता है दक्षिण भारत के एक राजा ने चाँद के दो टुकड़े होते देखा, बाग़ में चहलकदमी करता राजा ये देख के हैरान रह गया| उसके बाद अरब के जहाजियों का एक बेडा आया उसमे शामिल लोगों ने बताया चाँद के दो टुकड़े करने वाला कोई और नहीं खुद मुहम्मद साहब थे| राजा ने राजपाट छोड़ दिया, पैगम्बर से मिला, इस्लाम कबूल कर लिया और वहां से लौटते हुए राजा ओमान में मर गया| मरने से पहले उसने अपने तमाम मातहतों और सहयोगियों को चिट्ठियां लिखीं कि नए मजहब का स्ताक्बल हो और हजारों साल पुराने मंदिरों को कृतज्ञतापूर्वक उन्हें सौंप दिया जाये ताकि मूर्तियों को हटा कर उन संरचनाओं को मस्जिद बनाया जा सके| ऐसी ही एक संरचना हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने सऊदी अरब के राजा को तोहफे में भेंट की है, जिसका विस्तृत विवरण पिछले आलेख दो तोहफों की दास्तान में दिया |  

या फिर असल कुरान जो बेरुत म्यूजियम में सुरक्षित है उसकी जुबानी को सही मानें, जो कहती है कि पर्शियन और पर्शिया के दूसरी तरफ वाले लोग उलो आज़म हैं| उलो आज़म: किताबों के लोग ईश्वर या शिक्षकों यानि गुरुओं से हुए इसलिए इस्लाम उनके लिए नहीं है| और मुहम्मद साहब ने अपने अनुयायिओं को अपने रहते ये खास हिदायत दी कि वे चीन और भारत तक जाकर सीखें और ज्ञान प्राप्त करें| इसकी वजह ये थी कि सारे हिजाज यानि अरब में महज चार लोग पढना लिखना जानते थे और पैगम्बर खुद उनमे शामिल नहीं थे| फिर भी उनका मानना था कि पूरब के लोगों का ज्ञान और समझदारी कहीं बेहतर है| पैगम्बर की समझदारी और दूसरों को सही रास्ता दिखाने की काबिलियत किसी किताबी लिखा-पढ़ी से नहीं बल्कि रूहानी ताकत से बनी| उनकी साधना ने उन्हें अल्लाह का नूर दिखाया जो कि उस वक्त किसी और के पास नहीं था|

पैगम्बर साहब के जन्नतनशीं होने के बाद जब सुलेमान प्रथम ने ओट्टोमान टर्की की हुकूमत संभाली, उस समय कुरान के दस हजार से ज्यादा संस्करण प्रकाशित हो चुके थे| एक के बाद एक करके सभी हुक्मरानों ने अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से उसमे फेरबदल की और हर एक का दावा था कि उन्ही का संस्करण असली है| यह सिलसिला मुहम्मद के बाद खलीफा उमर के दौरान शुरू हुआ था| अंततोगत्वा सुलेमान ने एक बड़ी सभा बुलाई जिसमे सबको अपने अपने असली संस्करण लाने को कहा उसके बाद राजा ने अपनी ताकत के मुताबिक सभी संस्करणों को जला कर सिर्फ एक का विधान मुकम्मल किया| ऐसा होने से वह कुरान तुर्किश हुकूमत का एक पैमाना साबित हुई| लेकिन तमाम अध्येता मानते हैं कि असल कुरान जो पैगम्बर के जन्नत नशीं होने के तुरंत बाद बनी वह बेरुत के लेबनान म्यूजियम में है जिसके साथ पैगम्बर की बिना दाढ़ी वाली एक तस्वीर भी मौजूद है| सभी अरबी और मिडिल ईस्ट वाले उसी की बराबरी करने में लगे रहते हैं|

पामर्स्टन के दस्तावेज के मुताबिक इस्लाम को रूसियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए, और उसी तरह ब्रिटिश और चर्च के गठजोड़ से भारत और उसकी ज्ञान सम्पदा की बर्बादी हो| ऐसा करके फ्रेंच और जर्मन बौद्धिक और आम समुदायों में  कैथोलिक विरोधी दस्तावेजों को बचाया जा सके| जब भारतीय सन्दर्भों में हिंदूइस्म, बुद्धिज़्म, सिखिस्म, जैनिज़्म और दुनिया भर में जूदाइज़्म, कम्युनिज्म, कैपिटलिज्म समेत तमाम इज्म रचे गए| उसी समय भारत के पारंपरिक इतिहास को मिटाकर एक नए हिन्दू इतिहास की रचना हुई ताकि सबको चर्च के दो हजार साल के समय में समेटा जा सके| इन नए दस्तावेजों ने हमारे देश की प्रिंटिंग, पब्लिक लाइब्रेरीज़, पब्लिक आर्काइव्ज, पब्लिक एजुकेशन, और पब्लिक डिबेट्स के चार खम्भों को खोखला कर दिया| इन्ही नकली और गलत सलत दस्तावेजों की बदौलत राजनीतिक और अध्यात्मिक ठिकाने आबाद हुए जिनको ब्रिटिश ने समर्थन दिया| इन ठिकानों को भारतीयों और इस्लामिक समुदायों से भी समर्थन हासिल होता गया| इस तरह कैथोलिक दस्तावेजों की बदौलत हिन्दू इतिहास बना और वहाबियत की बदौलत इस्लाम का नया संस्करण ईजाद हो गया| तभी से इन ऐतिहासिक तथ्यों की खिलाफत करने या मजाक बनाने को भी ईशनिंदा करार दी दिया गया| इस तरह करोड़ों सालों का भारत और पूरी दुनिया का इतिहास पांच हजार साल पुराने इसाई संस्करण में समेट दिया गया| तमाम प्राचीन साहित्य और वेदों में मौजूद ज्योतिषीय आंकड़ों को दो हजार सालों के इतिहास के कालक्रम में दफ्न कर दिया गया| सीबीएस रेडियो प्रोग्राम बैंकर्स ऑफ़ गॉड और गॉड’स बैंकर्स को सुनें|

इस का ऐसा असर हुआ कि ज्यादातर अध्यात्मिक, धार्मिक और राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे स्वीकार किया और वेदों के पांच हजार साल वाले विचार का प्रचार प्रसार करने लगे| यह परिस्थिति और भी दयनीय तब दिखी जब हमारे राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री रुस की यात्रा पर थे| रूस के पार्लियामेंट में उन्होंने खुलेआम कहा कि वेदों की रचना दो हजार साल पहले हुई, यह सुनकर वहां मौजूद लोगों को अचम्भा तो हुआ साथ ही साथ भारत के अपने अध्येताओं की कलई भी खुल गयी| प्रधानमंत्रीजी के इस दो हजार साल वाले बयान पर आज तक किसी अध्यात्मिक, धार्मिक या ऐतिहासिक अध्येता समूहों ने किसी सुधार की कोई कोशिश भी नहीं की है|

इसकी वजह ये भी है कि तमाम मिथकों को रटते हुए हमारा औपचारिक प्रशिक्षण हुआ| हमारे देश की प्रिंटिंग, पब्लिक लाइब्रेरीज़, पब्लिक आर्काइव्ज, पब्लिक एजुकेशन, और पब्लिक डिबेट्स के चार खम्भों पर कब्ज़ा करके पहले सिखाने का कारोबार ब्रिटिश ने किया उसके बाद उनके कठपुतलीनुमा शक्तिशाली लोगों ने| अंग्रेज के जाने के बाद भी इस बात का ख्याल रखा गया कि इस देश में सत्ता शक्ति का प्रभाव बदस्तूर बना रहे| यही वजह है कि हिन्दू मुसलमान के बीच न भरने वाला बंटवारा आज तक ज्वलंत प्रश्न बना हुआ है| इतिहास के इन दो खातों से से हमे तमाम सबक मिल सकते हैं, इसमें हम दक्षिण भारत में केरल में अहिंसक तरीके से इस्लाम के भारत आने से लेकर उत्तर भारत के सिंध में मुस्लिम आक्रान्ताओं के हिंसक आक्रमणों का लेखा जोखा सामने रख रहे है| इन्हीं आक्रमणों के बाद कश्मीर के मंदिरों और देश के दूसरे हिस्सों की तबाही की जांच भी मौजूद तथ्यों के आधार पर की जा सकती है|

तमाम कहानियां सिर्फ इतिहास के भारतीय संस्करण में मिलती हैं, कुछ एक के लिए तो हमारे पश्चिमी पडोसी देश भी इंकार करते हैं, इतना अजीब मानते हैं कि वे इनको पाकिस्तानी इतिहास का एक हिस्सा भी नहीं मानते| इन किस्सों को इतिहास कहें या कल्पनाएँ या अपराध कथाएं, कोई तार्किक मस्तिष्क इन किस्सों को वाजिब तो नहीं कह सकता| मनोरंजक बात ये है कि इन किस्सों के बारे में अरब या पर्शिया समेत दूसरे देशों में इस विषय में कोई सन्दर्भ या सबूत नहीं मिलता, जहाँ से ये कहानियां उपजीं| हालाँकि इस्लाम के आगमन के इन किस्सों के भारतीय संस्करणों में उन देशों के साथ रिश्तों के आधार पर जरुर देखने को मिल जाते हैं| इन किस्सों को मानने या इनकार करने का संकेत भारतीय मानस में इस्लाम के प्रति बन रहे अविश्वास की एक बड़ी वजह भी है|

मिथक/ ऐतिहासिक खाता एक: चाँद के दो टुकड़े होने के बाद इस्लाम का भारत में शांतिपूर्ण आगमन

कहा जाता है कि कोदुन्गल्लुर, केरल में मौजूद चेरमण पेरुमाल जुमा मस्जिद, पहली मस्जिद थी जो 629 इसवी में बनी| मस्जिद से पहले वहां अरथाली (सरस्वती) मंदिर था, जब मंदिर बना तब आज का कोदुन्गल्लुर शहर महोदयपुरम कहा जाता था जिए सम्राट ललितादित्य ने बनवाया| खैर ये बात बहुत पुरानी है लेकिन माना जाता है कि 629 इसवी में जब मस्जिद बनी तो पैगम्बर मुहम्मद जीवित थे, यह खास मस्जिद इराक की पहली मस्जिद 639 इसवी, सीरिया 715 इसवी, मिस्र 642 इसवी, तुनिशिया 670 इसवी से भी पहले बनी| इसका अर्थ ये हुआ कि यह मस्जिद अरब की पहली मस्जिद के बाद सबसे पुरानी मस्जिद है| अगर ये तारीखें सही मानीं जाएँ तो इस मस्जिद का समय आदि शंकराचार्य (सृन्गेरी के शारदा पीठ की बताई तारीखों से यही समय निर्धारित हुआ है, ब्रिटिश प्रोपगंडा में ऐसा बताया गया कि सृन्गेरी का शारदा पीठ का निर्माण कश्मीर के शारदा सर्वज्ञ पीठ के बदले में किया गया) के भी बहुत पहले का हुआ और इसी कालखण्ड में ह्वेन सांग का भारत में आना भी हुआ| रोचक सवाल तो ये है कि ये मस्जिद अरब से इतनी दूर क्यों बनी? वो भी मुहम्मद की इन शिक्षाओं के बावजूद कि इस्लाम को सुदूर पूर्व भारत में न लेकर जाया जाए, क्योंकि उनके मुताबिक भारत में पूर्ण स्थापित धर्म के साथ साथ कश्मीर का सार्वजानिक शिक्षा केंद्र भी मौजूद था| इस के पीछे कौन लोग थे? इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात तो ये है कि अगर ये मस्जिद है तो फिर इसकी संरचना शैली अरब की दूसरी मस्जिदों में क्यों नहीं अपनाई गयी? हम जरुर कह सकते हैं कि इस्लाम स्थानीय आर्किटेक्चर का सम्मान करता है| लेकिन इस मस्जिद के अलावा जितनी मस्जिदें बनी वो सभी पर्शियन आर्किटेक्चर की शैली में बनीं तो फिर इस संरचना को गिराकर वर्ष 1987 में पर्शियन आर्किटेक्चर की शैली में क्यों बनाया गया?  

केरल में इस मस्जिद के बारे में एक किस्सा आज भी प्रचलित है, जिसे आज भी हमारा प्रधानमंत्री कार्यालय तथ्य के रूप में मानता है| इसी तथ्य के हिसाब से हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस संरचना की सोने की प्रतिकृति सऊदी राजा सलमान को भेंट की| एक बार एक राजा जिसका नाम कहें या उपाधि चेरमण पेरुमाल—जब अपनी राजमहल की बालकनी में घूम रहा था तो उसने देखा की चाँद के दो टुकड़े हो गए और वे दो टुकड़े आपस में जुड़ भी गए| राजा अचम्भे में पड़ गया , उसने अपने ज्योतिषियों से सलाह की, जो जो इस घटना की पुष्टि नहीं कर सके जो कि एक रहस्यमय अनुभव जैसी थी| कुछ महीनों बाद उसे कुछ अरब के यात्री मिले जो सीलोन जा रहे थे, राजा को उन यात्रियों से पता चला कि इस आश्चर्यजनक घटना के पीछे पैगम्बर मुहम्मद थे और उन्होंने एक नया मजहब शुरू किया है| तब राजा ने जो किया वो अविश्वसनीय था| उसने अपना राजपाट छोड़ दिया, राज्य का बंटवारा करके उसने पैगम्बर से मिलने के लिए मक्का का रास्ता पकड़ा| वहां जाकर वो पैगम्बर से मिला, इस्लाम क़ुबूल किया और कुछ समय तक अरब में रहा भी| उसके बाद उस मजहब को अपने गृहराज्य में प्रचारित करने के लिए कनवर्टेड राजा ने केरल लौटने का निश्चय किया, लेकिन वो रास्ते में मर गया, ओमान में|

उसके बाद राजा के साथ चले पैगम्बर मुहम्मद के अनुयायी महोदयपुरम या कहें कि क्रेन्ग्नोर या कोदुन्गल्लुर पहुंचे और ये वही लोग थे जिन्होंने कोदुन्गल्लुर में पहली मस्जिद बनाई जिसका बाद में तमाम लोगों ने अनुसरण किया| दंतकथाओं के मुताबिक सराफ इब्न मलिक, मालिक इब्न दीनार, मलिक इब्न हबीब, इब्न मलिक और उनकी पत्नियों और मित्रों की जिम्मेदारी में कोदुन्गल्लुर की पहली मस्जिद बनी| उसके बाद कोल्लम (उत्तर में), मरावी (मतई), फकनुर मंजरुर (मंगलौर), कन्जिराकुट्टू (कासरगोड), जर्फत्तन (करिप्पत), दह्फत्तन (धर्मातम), फंदरिना(पंतालायानी कोल्लम) और कैलियाथ (बेय्पोर के निकट चालीयम) में मस्जिदें बनीं| लेकिन इतिहास के असल दस्तावेजों की मानें तो मुहम्मद के पास जाने वाले प्रमुख लोगों में सिर्फ एक पर्शियन ज़ोरोस्त्रियन सलमान फारसी ही इकलौता आदमी था| पर्शियन लोग इस्लाम के विचारों के प्रसार के लिए उसे ही जिम्मेदार मानते हैं जबकि व्यावसायिक और राजनैतिक विचारों को उन्होंने भी यहूदियों के ओल्ड टेस्टामेंट से उधार लिया|

भारत में मौजूद इस सबसे पुरानी मस्जिद के बारे में तमाम सवाल उठते हैं,

पहला तो इसका नाम ही है, चेरमण पेरुमाल के साथ इतिहास के तमाम विरोधाभास जुड़े हैं, यहाँ तक कि ये एक नाम है या उपाधि इसी का संशय बरक़रार है|

अमूमन ये नाम चेरमण पेरुमाल का प्रयोग राजा भास्कर वर्मा (चौथी शताब्दी) के लिए किया जाता है, जिसने महोदय्पुरम यानि कोदुन्गल्लुर को राजधानी बनाकर केरल में राज किया, इसकी तस्दीक होती है रोमन व्यापारिक दस्तावेजों से| रहस्यमयी तरीके से उसके राज का समय सात सौ साल बढ़ा दिया गया| ये काम ब्रिटिश और उनके प्रशिक्षित भारतीय इतिहासकारों ने किया 1925 में| न केवल चेरमण पेरुमाल की उपाधि उसके नाम से हटा दी बल्कि ये उपाधि केरल में राज करने वाले सभी चेर वंश के सभी राजाओं के नाम से जोड़ दी गयी| यद्यपि चेर राजाओं ने 1000 इसवी के बाद अपने नाम को कुलशेखर रखना शुरू किया लेकिन ब्रिटिश ने उन सभी को चेरमण पेरुमाल कहना शुरू किया| भास्कर वर्मा की यह उपाधि सभी चेर राजाओं के नाम के साथ जोड़ देने से बहुत भारी संशय पैदा हुआ| इस संशय से भारी बौद्धिक बेसुरापन उपजा, इससे बड़ा उदहारण क्या होगा कि मक्का जाने वाले राजा के नाम की जो कहावत 629 इसवी की थी उसका कालखण्ड 1029 इसवी कर दिया गया| इस संशय को और बढ़ाते हुए डच और पुर्तगाली लोगों ने ये भी दावे किये कि वे चेरमण पेरुमाल राजा क्रिश्चियनिटी में भी कन्वर्ट हुए और उन्होंने चर्च बनवाने के लिए तमाम मंदिर दिए| इसके सबूत में उन्होंने ताम्र पत्र भी पस्तुत किये जो कि हिब्रू, पर्शियन, पहलवी और ग्रीक भाषाओँ में थे, इनमे से कोई भी भाषा कभी भारतीय भाषाओँ में शुमार नहीं रही, सांत्वना भर के लिए उन्होंने पुरानी मलयालम में जरुर कुछ शिलालेख दिखाए|

केरल के नम्बूदरी मानते हैं कि चेरमण पेरुमाल की वंशावली का तुक्का एक सफ़ेद झूठ है, ताकि वे अपनी श्रेष्ठता साबित कर सकें| एक दस्तावेज में ऐसा भी जिक्र मिलता है कि स्थानीय ग्रामीण परिषदों के असफल रहने के बाद चेर राज्य के ब्राह्मणों ने केरल के बाहर के शासकों को केरल पर राज्य करने के लिए बुलाया| इन शासकों को चेरमण कहा गया और उनके महिमामंडन के लिए उनके नाम के साथ पेरुमाल की उपाधि जोड़ी गयी| किवदंती है कि चेरमण पेरुमाल बारह थे लेकिन ये संख्या केरालोपति में मिलने वाले चेरमण पेरुमालों की संख्या 25 से मेल नहीं खाती| इसमें एक विरोधाभासी विचार ये भी है कि केरल एक बौद्ध राज्य रहा और पेरुमाल बुद्धा का एक समानार्थी शब्द है| एक और जिक्र मिलता है विख्यात संत कुलशेखर अल्जह्वर (ऑलवेज या कहें अज्ह्वार्स) से, जो कि बारह श्री वैष्णव संतों में से एक थे| वे भगवन राम के अनन्य उपासक थे इसलिए उनकी उपाधि मिली पेरुमाल| उनके उत्तरवर्ती आज भी उसी उपाधि का प्रयोग करते हैं जिनमे त्रावनकोर राजा भी शामिल हैं, जिन्होंने राजा मार्तंड वर्मा के बाद पद्मनाभदास की उपाधि और ग्रहण कर ली|

कुछ विद्वानों का मत है कि चेरमण पेरुमाल किसी राजा का नाम नहीं बल्कि उपाधि है| यद्यपि चेरमण का प्रयोग चेर वंश के राजाओं के समरूप शब्द के तौर पर किया गया लेकिन पेरुमाल का अर्थ “महान” के तौर पर लगाया जाता है| सत्रहवीं या अट्ठारहवीं शताब्दी में लिखी गयी पुस्तक केरलोपति के एक संस्करण के मुताबिक जब नौवीं शताब्दी में संघर्ष हुआ तो केरल के चौंसठ इलाकों के प्रतिनिधियों ने केरल के बाहर से पेरुमालों को शासन करने के लिए लाये, तय हुआ कि उनमे से हर एक का शासन बारह वर्षों का होगा| माना जाता है कि ये चौंसठ इलाके परशुराम ने दान किये थे| इस हिसाब से मस्जिद वो इतिहास बिलकुल भी वास्तविक नहीं लगता जिसमे चेरमण पेरुमाल नाम के राजा और उसके परिवार और अनुयायियों के इस्लाम क़ुबूल करने का जिक्र मिलता है, जो कि बाद में मस्जिद बनाने के जिम्मेदार भी हुए|      

अगर मान भी लिया जाए कि चेरमण पेरुमाल नाम का कोई राजा हुआ भी तो परम्पराओं में उस चेर राजा के इस्लाम क़ुबूल करने की अलग अलग तारीखें मिलती हैं|  एक संस्करण में बताया गया कि शंकर वर्मन या चेंगल पेरुमाल (621-640) नाम का राजा 627 के आसपास पैगम्बर मुहम्मद से मिला, जब वह पचास साल का था| यह दस्तावेज तारीख जुहूर अल इस्लाम फिल मालीबार के नाम से मिलता है जो कि केरल में इस्लाम के होने का सबसे पुराना दस्तावेज माना जाता है| इस दस्तावेज को मुहम्मद बिन मलिक ने लिखा, इसी दस्तावेज में जिक्र मिलता है कि ज़हीरुद्दीन बिन ताकियुद्दीन की अगुवाई में आदम के पाँव के दर्शन करने श्रीलंका जाते तीर्थयात्री कोदुन्गल्लुर (क्रेन्गानोर) में उतरे और चेर राजा से मिले| (गौरतलब है कि यहाँ लेखक का कहना है कि तीर्थयात्रियों के अरबी नेता पेरुमाल इ मिले न कि कोई अरब व्यापारी जैसी कि कहावत है)|

उस समूह ने राजा को पैगम्बर और उनके मिशन के बारे में समझाया| उन्होंने पैगम्बर के दिखाए कारनामों के बारे में भी बताया जिसमे चाँद के दो टुकड़े करने की बात भी सामने आई जिसका गवाह खुद राजा था| जब वह समूह आदम का पाँव देख के वापस लौटा तो राजा अरब जाने के लिए उनके साथ हो लिया| वहां जाकर हिज्र के छः साल पहले सत्ताईसवें शव्वल की जुमेरात को जेद्दाह में राजा ने पैगम्बर मुहम्मद से मुलाकात की|  उसने इस्लाम क़ुबूल किया और ताजुद्दीन (भरोसे का ताज) नाम क़ुबूल फ़रमाया| कुछ साल अरब में रहने (कुछ किस्सों में मिलता है कि राजा सत्रह दिन वहां रहा) के बाद राजा ने मालाबार लौटने का निश्चय किया| लौटते समय यमन के शहर मुक़ल्ला (तमाम लोग मानते हैं कि यह जगह यमन नहीं ओमान थी) में हिज्र के साल में मुहर्रम महीने के पहले दिन राजा का इन्तेकाल हो गया|

उमर बिन मुहम्मद सुहरावर्दी के मुताबिक चेरमण पेरूमल के धर्मान्तरण की वजह महलदीप (मालदीव) के राजा के प्रभाव की वजह से हुआ| राजा के मिडिल ईस्ट के साथ सम्बन्ध थे और वह चेरमण के साथ दोस्ताना सम्बन्ध रखता था| महलदीप का राजा बसरा के नागरिक मालिक बिन दीनार को जानता था| उसे एक किताब मिली जिसमे पैगम्बर के हैरतअंगेज कारनामों का जिक्र था उसी किताब में उसने चाँद के दो टुकड़े होने की घटना को भी जाना| राजा ने वो किताब चेरमण पेरूमल और उसके प्रधानमंत्री मंत्री कृष्ण मुन्जाद के सामने पढ़ी| तीनों को इस्लाम में रूचि हुई और उन्होंने चुपके से अरब जाना तय कर लिया वहां उन्होंने पैगम्बर की समाधि का भी दौरा किया| इसी दौरान पेरुमाल की रानी प्रधानमंत्री के निवास में अवैध सम्बन्ध बनांते हुए पकड़ी गयी, उसने एक मनगढ़ंत कहानी बताई कि मंत्री उसके साथ जबरदस्ती कर रहा था| लेकिन वह आश्चर्यजनक रूप से दण्ड से बच गया, तब उसने राजा को बताया कि रानी ने उसे भ्रमित कर दिया था| रानी के पाप से बचने के लिए रजा को इस्लाम क़ुबूल करना चाहिए और मक्का जाना होगा| यह संस्करण एक अच्छी तकनीक है जिससे पूरब या भारतीय महिला का दामन दागदार किया जा सके और उसे बेईमान और चरित्रहीन ठहराया जा सके| साथ ही इस किस्से से किसी भी घृणित कार्य को अंजाम देने वाले आदमी को इस्लाम क़ुबूल करने के लिए प्रेरित करना भी आसान हो सकता है, अपराधी के लिए मक्का जाकर अपने पाप धोने का रास्ता भी खुला है| यह एक के साथ एक फ्री जैसा ऑफर है जिसमे स्थानीय धर्म और इस्लामी मजहब दोनों के मानने वालों के लिए आरोपों की भरमार है| यही ब्रिटिश का खास खेल है जिसमे वे बर्बर मजहबों और संस्कृतियों के ही नहीं सारी इंसानियत के तारणहार बनकर सामने आते हैं|      

हालाँकि वत्ताल्पयासम का एक कर्मकाण्ड है इसके लिए जिसमे चिरक्कल कदालायी मंदिर में कृष्ण को तर्पण करके पेरूमल के पाप धुल सकते थे| अलग अलग शाही परिवारों से उस राजा की चार रानियाँ थीं और श्रीदेवी कोलाथिरी स्वरूपम के घराने से थी| (नोट: कोलाथिरी के बारे में कहा जाता है कि वे चेरों के उत्तरवर्ती थे| अगर ये सत्य है तो फिर यहाँ बेईमान रानी के एक अलग खानदान का क्या मतलब हैं?) राजा ने उसके शब्द को सुनकर पाप किया क्या इसलिए उसको मक्का जाना होगा? उस पाप को धोने के लिए!

मंत्री मालदीव पहुंचा और बाद में उसने राजा के साथ इस्लाम क़ुबूल कर लिया| निराश पेरूमल अपने पाप की शुद्धि के लिए मक्का गया साथ में भतीजे राजकुमार कोहिनूर को लेकर| राजा की अरब यात्रा को जानकर चालीयम में रहने वाले उसके रिश्तेदार और मंत्री ने उसके साथ जाने का निर्णय लिया| 82 हिजरी (701 AD) में वे सभी क्रेन्ग्नोर में एक जहाज से मक्का रवाना हुए, तब पहले वालिद वहां के खलीफा थे| जब वे बसरा पहुंचे तो वहां मलिक बिन दीनार ने उनकी आगवानी की| बसरा में उन्हें जफ़र बिन सुलेमान ने शुरुआती शिक्षा दी| बसरा से वे अरब गए जहाँ वे बारह सालों तक रहे| 94 हिजरी (713 AD) में सभी साथी मालाबार लौटे उसी रास्ते में शहर मुक़ल्ला में पेरुमाल का देहांत हो गया|

सोलहवीं शताब्दी में अरब के एक मलयाली मुस्लिम शैक जैनुदीन ने तुहाफ़त उल मुजाहिदीन नाम की एक किताब में जिक्र किया है कि चेर राजा का धर्मान्तरण हिज्र से संभवतः दो सौ सालों बाद (822 AD) हुआ| लेकिन वह भी कोई इस ऐतिहासिक घटना का कोई पक्का सबूत नहीं देता| उसके अनुसार ये घटना पैगम्बर साहब के जीवनकाल में नहीं बल्कि दो शताब्दियों बाद हुई| लेकिन बाद के शायद जोड़तोड़ वाले इतिहासकार शायद उसका डिस्क्लेमर भूल गये|

डॉ. हरमन गुन्देर्ट दो चेर राजाओं के बारे में बताते हैं जो मक्का गए| पहले बाना पेरुमाल जो बुद्ध को स्वीकार करने के बाद मक्का गए| उसी दौरान गुन्देर्ट का दावा है कि बाना पेरुमाल ने ईसाइयत कबूल की| उन्होंने क्रिश्चियनिटी कबूल की हो या बुद्धिज़्म लेकिन संदेह बरक़रार रहता है कि इसके बावजूद वे मक्का गए तो क्यों? अगर वे मक्का गए तो संभव है कि उन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया हो| जो दूसरे राजा मक्का गए केरलोपति में उनका नाम चेरमण पेरुमाल मिलता है| उनके जाने का समय 322 इसवी बताया जाता है, लेकिन अगर मुहम्मद से मिलने के मकसद का ख्याल करें तो यह यात्रा सही मालूम नहीं पड़ती| इस्लाम के उपदेश 600 AD के बाद शुरू हुए| अगर हम ये मानते हैं कि चेरमण पेरुमाल भास्कर वर्मा नाम के व्यक्ति ने मक्का की यात्रा 322 AD में की तो इस यात्रा का मकसद कुछ और रहा होगा| एक और संस्करण है जो कहता है कि चेरमण पेरुमाल ने मक्का के लिए प्रस्थान 210 AH में किया| संभवतः यही संस्करण कुछ ठीक जान पड़ता है लेकिन इसमें जोड़तोड़ करने वाले इतिहासकारों ने भास्कर वर्मा का नाम हटा कर शताब्दियों का हेर-फेर किया है|

केरलोपति में भी तमाम पेरुमालों के मक्का जाने का जिक्र है, घटनाओं के कालक्रम का फर्क देखकर कुछ ऐसा संदेह बनता है कि संभवतः दो पेरुमालों का धर्मान्तरण हुआ| शंकर वर्मा का धर्मान्तरण हुआ पैगम्बर के समय में और राम वर्मा कुलशेखरण उसके बाद| हो सकता है कि दोनों की मौत अरब में हुई हो लेकिन मालिक बिन दीनार की मिशनरी गतिविधियों के लिए रास्ता दूसरे वाले ने ही बनाया|

डॉ. एम.जी.एस. नारायणन का सुझाव है कि चेर राजाओं का धर्मान्तरण पैगम्बर के समय में न होकर 1122 AD में हुआ| लेकिन वे इनकार नहीं करते कि इसके पहले मालाबार में मुस्लिम थे ही नहीं| लेकिन चेरमण पेरुमाल के धर्मान्तरण के बाद इस्लाम में धर्मांतरण की गतिविधियाँ तेज हो गयीं| राजा का इस्लाम लेकर आने का फैसला सही साबित नहीं होता है क्योंकि मुहम्मद ने अपने अनुयायियो को यही सुझाया कि इस्लाम को पूर्वी देशों में लेकर न जाएँ क्योंकि ये उनके लिए नहीं बल्कि अरब जैसे उस समय के भ्रष्ट देशों के लिए है|

चेरमण पेरुमाल के निर्देश पर पहला मिशनरी समूह कोदुन्गल्लुर पहुंचा और उपदेश देना शुरू किया| यद्यपि सभी स्रोतों के बयान इस मिशन में मलिक बिन दीनार और उसके सहयोगियों का जिक्र करते हैं लेकिन उसमे भी समय के वैसे ही फर्क हैं जैसे कि पेरुमाल के धर्मान्तरण को लेकर मिलते हैं| इस्लाम की शुरुआती शताब्दियों में और भी कई लोग हैं जिनके नाम मलिक बिन दीनार मिलते हैं इससे संशय पैदा होता है कि उनमे से मालाबार कौन आया?

ए. शुस्तेर्री के संकेत में मलिक बिन दीनार का नाम अरब की बजाए ईरानी मूल का मालूम पड़ता है, अधिकांश स्रोतों के मुताबिक मालाबार में अपने मिशन के बाद मलिक बिन दीनार खुरासन गया और रास्ते में उसकी मौत हो गयी| इससे संभावना बनती है कि शायद मलिक बिन दीनार जिसने मालाबार में मिशनरी गतिविधियों को अंजाम दिया वह बसरा के प्रसिद्ध सूफी हसन का शागिर्द हो, जिनकी 744 AD में मौत हुई| अगर रिहालत अल मुलुक का यह कथन सच मान लिया जाए कि चेरमण पेरूमल के निर्देशों पर मलिक बिन दीनार और उसके साथी 82 AH (701AD) में अरब से मालाबार आये, तो यह तथ्यों ने नजदीक पहुँचता है| केरल के इतिहास में यह कालखण्ड बर्बादी और अस्थिरता का गवाह रहा और श्रीधर मेनन मानते हैं कि इस दौर में धार्मिक और बौद्धिक गतिविधियाँ बहुतायत हुई| इसलिए संभव है कि पेरुमाल के धर्मंतार्ण की घटना इसी कालक्रम में हुई हो(?)| इस सम्बन्ध में यह भी ध्यान देने लायक है कि कलादी की परंपरा बहुतायत से होती रही जब एक छोटी रियासत में शंकराचार्य का जन्म हुआ जिसके राजा ने खुद इस्लाम क़ुबूल कर लिया था (?)|

ऐसा बताया जाता है कि मालिक बिन दीनार और उसके सहयोगी कोदुन्गल्लुर में पहली मस्जिद बनाने के जिम्मेदार रहे| अगर हम केरलोपति परंपरा (जिसके अपने तमाम संस्करण हैं, जिनमे से कौन सा सही है ये तय कर पाना बहुत ही मुश्किल है) का ख्याल करें जिसमे मक्का के लिए रवानगी के पहले चेरमण पेरुमाल अपनी जिम्मेदारियां सबको बांटते हैं जिनमे जोनकों (मैप्पिलों) के साथ पुनतुरक्कों के क़ाज़ी (जमोरिन) भी शामिल हैं, इसका अर्थ ये हुआ कि उस समय चेरमण की रवानगी के पहले ही वहां पर मुस्लिम और मस्जिदें मौजूद हैं और वहां शरियत कानून अमल होना काजियों की जिम्मेदारी में रहा| अगर ऐसा है तो पहली मस्जिद के निर्माण की जिम्मेदारी मलिक बिन दीनार और उनके सहयोगियों की नही होती है क्योंकि वे तो पेरुमाल के मक्का जाने के बाद आये| हुसैन रन्तत्तानी कहते हैं कि रिहालत अल मुलुक में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि कोदुन्गल्लुर या कालीकट की मस्जिदें मलिक बिन दीनार ने बनवाईं|  

लोगान कहते हैं कि मलिक बिन दीनार और उनके सहयोगी इतने कम समय में शायद ही तमाम जगहों पर इतनी सारी मस्जिद बनवा पाये हों जिनका सेहरा उनके नाम दर्ज है| उसके लिए मस्जिद निर्माण के पहले की कुछ तैयारियों की भी जरुरत तो रही होगी|

परम्पराएँ कहती हैं कि मलिक बिन दीनार और उनके सहयोगियों के पास पेरुमाल की लिखी चिट्ठियां थीं जो उसने मस्जिदें बनवाने के लिए तमाम शासकों को लिखीं| उन चिट्ठियों में मिशनरी गतिविधियों और मस्जिद बनवाने में सहयोग करने के लिए कहा गया| इस प्रकार जब वो पहली बार कोदुन्गल्लुर में उतरे तो वहां के शासक ने बुद्ध विहार खाली करवा के मस्जिद बनवाने के लिए मुस्लिमों को दे दिया, उसके बाद इस जगह को चेरमण पल्ली कहा गया| ऐसा कहा जाता है कि सातवीं शताब्दी में ये मस्जिद पल्लीबाना पेरूमल ने बनवाई, जो कि बौद्ध से इस्लाम में कन्वर्ट हुआ| जब मुस्लिम मिशनरीज़ ने काम करना शुरू किये तो बुद्धिज़्म का महत्त्व घटता गया| शायद यही वजह रही कि बुद्धा विहार को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया| इस तरह परम्पराओं के मुताबिक मालाबार में चेरमण पल्ली की की पहली मस्जिद तामील हुई| इसी तरह मदई की मस्जिद बनाने में कोलातिरी राजा ने सहयोग किया जिसके लिए पेरुमाल की चिट्ठी में आदेश किया गया था|

अगर हम इस किस्से पर भरोसा करते हैं तो हमे धर्म बदलने वाले उस राजा की मानसिकता पर भी सवाल करने होंगे जिसने अपने गृहराज्य में मिशनरी दूतोंको भेजकर इस्लाम का प्रसार करवाया| ये कवायद कम से कम पैगम्बर मुहम्मद की उस तालीम की खिलाफत थी जिसमे उन्होंने अपने शागिर्दों को इस बात के लिए मना किया कि इस्लाम लेकर हिन्द न जाएँ क्योंकि वहां उलो आज़म यानि किताबों के लोग रहते हैं| क्या उस राजा ने अपने उपदेशक की सलाह को दरकिनार किया? क्या वह राजा पैगम्बर मुहम्मद का बेईमान शागिर्द साबित हुआ? या फिर चेरमण पेरुमाल कोई और था जो मुहम्मद के जीते जी उनसे मिला? सभी जानते हैं कि भारतीय शासक सभी ज्ञान स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्कट जिज्ञासु होते रहे हैं| तो क्या राजा की नीयत इस्लाम क़ुबूल करने की न होकर अरबी व्यापारियों के बताये गए महान दार्शनिक मुहम्मद से मिलने की रही, ताकि वह उनसे मिलकर अपने संशय दूर कर सके? और किस्से का आखिरी हिस्सा जिसमे मालाबार के क्षेत्रीय राजाओं को चिट्ठियां भेजने का जिक्र है क्या वह उन लोगों की बेईमानी नहीं हो सकती जो राजा के साथ थे? या फिर बाद का संस्करण इतिहास की सच्चाई को तोड़ मरोड़कर कर तैयार किया गया?

मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक कोदुन्गल्लुर केरल के समुद्री वंश के राजाओं की राजधानी थी, जिस पर 622-628 इसवी (हिज्र 1 से 7) तक एक विद्वान राजा चेरमण पेरुमाल भास्कर रवि वर्मा ने राज किया| यहाँ कुछ मोहम्मदी तीर्थयात्री आये जिन्हें परम्पराओं में बताया गया कि राजा को अपने साथ हज के लिए ले जाने में कामयाब रहे| अपने राज का त्याग करके राजा ने धर्म के लिए मक्का की यात्रा की, उसने अपने राज को हिन्दू राजकुमारों के बीच बांटकर अपनी साख बनाई, उन राजकुमारों के वंशजों ने 1947 तक राज किया| यह वाकया इस्लाम का पहला धर्मांतरण था| समुद्री वंश का संस्थापक उस राजा का एक भतीजा था, जिसे राजपाट का एक हिस्सा मिला| समुद्री राजा के समय वहां सत्तारूढ़ होने पर यह कहते हुए एक मुस्लिम महिला के हाथ से पान लेने की परंपरा शुरू हुई कि “ मै अपने चाचा के आने तक तलवार (राज्य) की हिफाजत करूँगा”| यह परंपरा 1890 तक जारी रही| इससे कुछ सवाल बनते हैं, पहला ये कि अगर ये पहला धर्मान्तरण था और समुद्री राजा मक्का गए राजा का भतीजा था तो कनवर्टेड पेरुमाल की मालाबार के शासकों को लिखी चिट्ठियों में समुद्री राजा का जिक्र क्यों नहीं हुआ? वह भी तो राजा के बंटवारे के राज्य का हिस्सेदार था| अगर समुद्री राजा इस घटना के बारे में जानते थे तो फिर शपथ ग्रहण की ये परंपरा इतने लम्बे समय तक क्यों जारी रही? क्या इसका ये मतलब नहीं कि पेरुमाल राजा की मौत और उसकी चिट्ठियों की जानकारी समुद्री राजा के अलावा राज्य के बाकी सभी सभी हिस्सेदारों को हो गयी थी? क्या पेरुमाल की चिट्ठियों का ये किस्सा कुछ गड़बड़ नहीं लगता?

एक मजेदार बात और है, चेरमण पेरुमाल जो राजा भास्कर रवि वर्मा द्वितीय के नाम से मशहूर है, उसी राजा ने यहूदी नेता जोसफ रब्बान के लिए भी ताम्र पत्र पर शाही फरमान जारी किया जिसके मजे जोसफ के उत्तराधिकारी भी लेते रहे| इतना ही नहीं, सेंट थॉमस पर्वं नाम की सोलहवीं शताब्दी की एक पुरानी पाण्डुलिपि मिलती है जिसे रामबान गीत के नाम से जाना जाता है| कोदुन्गल्लुर के नजदीक पलायुर में मिली इस पाण्डुलिपि के रचयिता हैं सेंट थॉमस रामबान जो इस गीत में ईसा के शिष्य सेंट थॉमस के आगमन और भारत में उनकी गतिविधियों की जानकारी देते हैं| इन गतिविधियों में चेर राजा और उसके भतीजे के ईसाइयत में कन्वर्ट होने का जिक्र मौजूद है| शक्तिशाली चेर राजाओं को स्वयं सम्राट ललितादित्य ने महोदय्पुरम की हिफाजत के लिए नियुक्त किया था, सवाल ये है कि भारत के धर्मान्तरण के इतिहास में सिर्फ चेर राजा ही क्यों शामिल हुए?

ये सभी किस्से कोदुन्गल्लुर के इर्द गिर्द मौजूद हैं, आज भी ये जगह बड़े पुरातात्विक महत्व की है, शायद उसी जगह से इन सवालों के जवाब भी मिल सकें|  ये जगह अपने व्यापारिक महत्त्व के लिए भी जानी जाती है जो शायद बिलकुल भी न हो| इस महोदय्पुरम के बारे में एक मनोरंजक बात और है, यह महोदय्पुरम ताकतवर राजाओं चेरों, केरों, क्षीरों की राजधानी रही है (इनके नामों की उत्पत्ति ज्ञान की देवी क्षीर भवानी के नाम से हुई)| यही चेर कश्मीर के ताकतवर सम्राट ललितादित्य से सम्बंधित हैं| सम्राट ललितादित्य के साम्राज्य में आज के भारत से लेकर पर्शिया, अफ्रीका से साइबेरिया तक का हिस्सा शामिल था| उसने सूर्य मंदिर बनवाए उन मंदिरों की मरम्मत के दस्तावेज पर्शिया में भी मिलते हैं|उसने कश्मीर के मार्तण्ड मंदिर की प्रतिकृति दक्षिण भारत के महोदय्पुरम में बनवाने की ठानी, उसे पूरा करने के लिए कश्मीर से सभी विशेषज्ञ बुलाए गए| उसके बाद यहाँ यह सबसे बड़ी सौर और चन्द्र वेधशाला बनी जिसमे सरस्वती देवी की प्रतिमा स्थापित हुई, जो कि ज्ञान की देवी हैं और कश्मीरी राजाओं की कुलदेवी भी मानी जाती हैं| इस जगह को दक्षिण भारत का नालंदा कहा गया| कश्मीर के शारदा सर्वज्ञ पीठ की तरह ये जगह भी एक सार्वजानिक अध्ययन केंद्र रही है| इन जानकारियों का बहुत बड़ा हिस्सा कल्हण की राजतरंगिणी में मिलता है, जिसके लिए तमाम आलोचक हैं| कल्हण के बाद की पीढ़ियों ने तीन प्रतियाँ सहेजकर रखीं और अंग्रेज की तमाम मांगों के बावजूद उन्हें नहीं दीं| राजघरानों के निजी संकलनों, जर्मन या फ्रेंच विद्वानों के पास दूसरी कोई प्रति नहीं थी ये अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है| लेकिन बाद की पीढ़ियों के सामने आये आर्थिक संकट के चलते उन्हें ब्रिटिश अधीनता में काम करना पड़ा जिसकी शर्त ये थी कि वे एक प्रति उनको दे देंगे| यह कि उन्होंने सारी प्रतियाँ ले लीं या फिर एक ही तक रहे ये भी आज तक अज्ञात है| ब्रिटिश की राजतरंगिणी में इस प्रकार की रूचि का मकसद क्या है? ये प्रति हासिल करने के बावजूद पचास वर्षों तक जन सामान्य के लिए उपलब्ध नहीं रही| उसके बाद ब्रिटिश राजतरंगिणी के अपने छापे संस्करण के साथ अवतरित हुए| असली किताब पाने के लिए वे कल्हण के वारिसों के परिवार के पीछे क्यों लगे रहे? किताब के बदले में नौकरी देने की भी कोशिश की गई, सवाल है कि उन अंग्रेजों के लिए किताब इतनी महत्वपूर्ण क्यों? इस पचास साल के अन्तराल का क्या अर्थ हैं? उस अन्तराल में क्या हुआ? क्या इस किताब को ब्रिटिश ने ठिकाने लगाया? क्या उस किताब में ऐसी कुछ जानकारियां थीं जो अंग्रेज के लिए खतरनाक थीं? राजतरंगिणी की जानकारियां या दर्शन अगर अगली पीढ़ी को पहुँचता तो अंग्रेज को क्या कोई खतरा होने वाला था? क्या राजतरंगिणी में मौजूद चेर, केर, या क्षीर राजाओं की लोकस्मृतियों को धूमिल करने के लिए अंग्रेज ने उन राजाओं का इतिहास धूमिल किया? क्या और भी कोई कारण रहे जिसके चलते कश्मीर और महोदय्पुरम या कोदुन्गल्लुर के इतिहास से छेड़छाड़ की गयी? सम्राट ललितादित्य के साम्राज्य से जुडी अहम् जगहों में इस्लाम, क्रिश्चियनिटी और यहूदियों के शांतिपूर्ण आगमन के किस्सों का असल मकसद या अर्थ क्या है?         

कोदुन्गल्लुर में आज भी पुरातात्विक खुदाई जारी है उससे तमाम मनोरंजक जानकारियां सामने आ रही हैं| इतिहास में मौजूद दस्तावेज गवाह हैं कि ज्ञानप्रेमी यूरोपियन लोग भारत के ज्ञान केन्द्रों में आते रहे हैं, महोदय्पुरम उन ज्ञान केन्द्रों मे से एक रहा| इसका मतलब व्यापारियों के साथ तमाम ज्ञान प्रेमी भी सड़क और जलमार्ग से भारत आये| ये सिलसिला वास्को द गामा और क्रिस्टोफर कोलंबस के बहुत पहले शुरू हुआ| पुर्तगाली महज भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते सुधारने नहीं आये बल्कि शायद वे महोदय्पुरम के अध्ययन केंद्र के विषय में कुछ ज्यादा जानते थे| ये तो साफ़ है कि इन विदेशियों का मकसद महज मसाले का व्यापार या धर्मान्तरण भर नहीं था| यह स्थान पूरी दुनिया के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है, इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगता है कि वे सभी लोग यहाँ पर धार्मिक लबादे में आये क्योंकि सभी जानते हैं कि भारत धार्मिक सहिष्णु देश है और नए विचारों का खुले दिल से स्वागत करता रहा है (यहाँ तक कि सबसे ज्यादा ताकतवर राजाओं ने भी धर्मान्तरण का आमंत्रण स्वीकार किया!)|

महोदय्पुरम के शासक तब भी बहुत ताकतवर थे जब पुर्तगाली यहाँ आये|  ऐसे में यह भी इस्लाम का भारत में शांतिपूर्ण आगमन बहुत आम बात लगती हैं, अरथाली मंदिर का रूपांतरण करके मस्जिद बन जाना भी और शाही विशेषाधिकार भी संभव है कि हुए हों| देश के इस हिस्से में यहूदियों, ईस्लामी, संत थॉमस वाले ईसाईयों, कैथोलिकों आदि का एक एक करके आना जारी रहा| सभी ने अपने आगमन की बंदोबस्त की जिम्मेदारी चेर राजाओं पर डाली जो कि महोदय्पुरम के रक्षक रहे| इस लिहाज से महोदय्पुरम एक ऐसा पड़ाव है जहाँ थोड़ी गहरी रिसर्च किये जाने की जरुरत है| ताकि ये बात साफ़ हो सके कि ऐसा क्या है जिसे जानबूझ कर हिंदुस्तान के इतिहास में दफन किया जा रहा है?

दूसरे कोलाथिरी राजा ने 88 हिजरी में पहले शहर काज़ी सय्यद अबू बकर से दीक्षा लेने के लिए वलापतानम (बालिपत्तम) की मस्जिद बनवाई| इब्न बतूता के यात्रावृत्तान्त से एक किस्से का जिक्र करते हुए सी.ए. इन्नेस ने एक राजा धड्कानन के धर्मान्तरण के बारे में लिखा है| जब इब्न बतूता आया तो वहां का शासक नास्तिक था, उसके परदादा मुसलमान हुए थे उन्होंने मस्जिद और तालाब बनवाया था| शासक के परदादा का इस्लाम  क़ुबूल करना एक पेड़ जैसा था जिसके फल के तौर पर राजाने मस्जिद बनवाई|

अरक्कल वंश का इतिहास बताता है कि इसका संस्थापक राजा चेरमण पेरूमल का भतीजा था जिसका नाम कोहिनूर था, वो वही लड़का था जिसके साथ राजा मक्का गया, इस्लाम क़ुबूल किया और उसके बाद लड़के ने सैफुद्दीन मुहम्मद अली का नाम अख्तियार किया| परिवार का एक दूसरा किस्सा है जिसमे बताते हैं कि कोलातिरी राजा के नायर मंत्री ने इसकी स्थापना की| उसने इस्लाम के उद्धार के लिए एक मुस्लिम महिला से शादी भी की| यह उत्तर भारत के सुल्तानों या मुग़लों की तरह नही रही, मालाबार की एकमात्र मुस्लिम वंशावली है अली राजा  जिसकी उत्पत्ति देशज मानी जाती है|  

एक अज्ञात लेखक की पाण्डुलिपि मिलती है जिसका नाम है “किस्सत शकरवती फर्माद” या किस्सत शकृति फिर्माद जिसका अनुवाद इजराइल ओरिएण्टल स्टडीज के अंक में प्रकाशित हुआ| हालाँकि इस किताब के समय काल का कोई ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद नहीं लेकिन लन्दन के ब्रिटिश पुस्तकालय में मिले इस दस्तावेज का ये अनुँवाद डॉ. योहन्नान फ्रेइडमान ने किया 1975 में| इस दस्तावेज में नाम मिलता है चक्रवती फर्मास का नाम मिलता है, साथ ही चाँद के दो टुकड़े होने का भी जिक्र मौजूद है, उसमे राजा खुद ही मक्का जाने की पहल करता है, पैगाबर के सामने इस्लाम क़ुबूल करता है, घर वापस लौटते हुए यमन के ज़फर में उसका इन्तेकाल हो जाता है|  

एक चोल शिलालेख में जिक्र मिलता है कि चेरों ने हमला होने की दशा में समुद्र पर अधिकार कर लिया, जिसे इतिहासकारों ने चेरमण पेरुमाल के समुद्री अभियानों का नाम दे डाला| ऐसा कहा जाता है कि अरब में भी मालाबार के एक राजा का मकबरा है जिसने इस्लाम क़ुबूल किया|

केरल के राजा के पैगम्बर से मिलने और कन्वर्ट होने का ये किस्सा पहली बार पुर्तगाली लेखक दुआर्ते बरबोसा ने लिखा जिसका समय 1510 AD बताया जाता है| वह शक्तिशाली राजा चेरमण पेरुमाल के बारे में लिखता है कि उस राजा ने पेरुमाल के बताये गए समय से 600 साल पहले राज किया| वह लिखता है कि तब राज्य के तीन हिस्से हो चुके थे कालीकट, कान्नानोर और कूइलों जिनको राजा के निर्देशों की चिट्ठियां दी गयीं| लेकिन यहाँ दिक्कत इस बात की है कि पेरुमाल का सपना और उसकी मक्का यात्रा उसके छः सौ साल बाद हुई 910 AD में| लेकिन इतिहास का लोकप्रसिद्ध संस्करण कहता है कि मस्जिद राजा चेरमण पेरूमल के इन्तेकाल के बाद 629 AD में बनी|  

इसी कहानी का एक दूसरा संस्करण मिलता है 1610 AD में जिसके पुर्तगाली लेखक का नाम है जोअस द बार्रोस| बार्रोस के मुताबिक कट्टर मजहबी सौदागर मूर्स यहाँ आये, उन्होंने राजा को मोहम्मदी फिरके में कन्वर्ट किया| वह कालीकट गया जहाँ मूरों ने राजा को भरोसा दिलाया कि अपने किये हुए पापों से मुक्ति पाने के लिए राजा को मक्का जाना होगा| उसके बाद राजा ने अपना राजपाट छोड़ कर वही किया|

डिओगो द कोउटोस ने एक ट्विस्ट देकर बर्रोस के किस्से को पूरा किया| उसके मुताबिक पेरुमाल क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट हुआ न कि इस्लाम में| कोउटोस यह भी जिक्र करता है कि पेरुमाल की मौत मयलापोर में ईसा के शिष्य सेंट थॉमस के घर में होती है, इस तरह लेखक पेरुमाल की मक्का यात्रा से इनकार करता है|  

डच चापलिन कैंटर विस्स्चेर इसी कहानी का एक और संस्करण बताता है, यहाँ चेरमण पेरुमाल 1723 में मौजूद है, यह किस्सा एक और ट्विस्ट के साथ है| वह इस बात से इत्तेफाक तो रखता है कि चेरमण पेरुमाल एक महान राजा था जो अपने राज्य का बंटवारा करके एक समुद्री अभियान पर निकला| लेकिन उसे संदेह है कि “यह यात्रा या तो वह शपथ लेकर गंगा स्नान करने जाता है या फिर मूरों के बताये रास्ते के मुताबिक मुहम्मद से मिलने मक्का जाता है ताकि वह इस्लाम कबूल कर सके”| इसका अर्थ ये हुआ कि विस्स्चेर के समय के पहले भी तमाम कहानियां मौजूद थीं| चेरमण पेरूमल की कहानी डच कमांडर वान अद्रिआन मोएंस (1781 AD), फ्रांसिस बुचनन (1801) और ग्रंथावारी (उन्नीसवी शताब्दी) तक जारी रही|

पुर्तगाली और मुस्लिम इतिहास के खातों में थोड़े बहुत फर्क हैं, लेकिन दोनों इस बात से सहमत होते हैं कि केरल के एक राजा ने मक्का की यात्रा की, लेकिन दोनों की यात्रा का समय मस्जिद के दस्तावेजों से मेल नहीं खाता है|

विक्रम चोल के 1122 AD के एक शिलालेख में जिक्र मिलता है कि जब पांड्यों ने घाटों का काम संभाला तो चेरों ने समुद्री अभियानों पर पकड़ बनानी शुरू की| एक दूसरा शिलालेख है जो चेरों की सच्चाई बयान करता है, उस शिलालेख से पता चलता है कि चेरों ने समुद्र को कुएं की तरह मथ डाला|  इतिहासकार इसका अर्थ पढ़ते हैं कि आखिरी चेर पेरुमाल जो कि राम कुलसेखर थे वे समुद्र के रास्ते से गए| एक दूसरेमंदिर का दस्तावेज बताता है कि जाते समय राजा को देवी का हार पहनाया गया जिससे पता चलता है कि राम कुलशेखर 1122 AD तक जीवित रहे|  

ये शिलालेख पेरुमाल के समय को पुर्तगालियों और मुस्लिम दस्तावेजों के बाद का ठहराते हैं| लोक मानस और जनश्रुतियों के अनुसार एक राजा अरब गया और वहां से उसने कुछ लोगों को अपने गृह राज्य में इस्लाम का प्रचार करने भेजा| केरल की मतायी मस्जिद उन प्रचारकों की बनाई दस मस्जिदों में से एक है| पत्थरों पर खुदाई करके घटनाएँ दर्ज करना एक आम बात है, और लगभग सभी जगह होती है| मतायी मस्जिद के एक पत्थर में ऐसा भी जिक्र मिलता है कि यह मस्जिद राम कुलशेखर के अंत के गायब होने के दो वर्ष वर्ष 1124 में बनी|  

समकालीन शासकों और घटनाओं की जानकारी से शायद चेरमण की गुत्थी सुलझाने में मदद मिले| राम कुलशेखरा के समकालीन राजाओं के दो शिलालेख मिलते हैं, लेकिन चेरमण पेरुमाल और कोदुन्गल्लुर की मस्जिद के किस्से से जुड़ा ऐसा कोई शिलालेख मौजूद नहीं| कोदुन्गल्लुर मस्जिद के दो शिलालेखों में दो राजाओं का भी जिक्र मिलता है इनमे से एक हैं, कोलुत्तुनाद के उदय वर्मन और तुलु राज्य के कविवंश, ये दोनों राजा बारहवीं शताब्दी की शुरुआत के हैं| इस तरह पेरुमाल की कहानियां तीसरी शताब्दी से लेकर आठवीं और बारहवीं शताब्दी तक मिलती हैं| इसे और ज्यादा उलझाने का काम 1882 किया विलियम लोगन ने, जिसने यह भी दर्ज किया कि पंद्रह साल पहले अरब से कुछ लोग आये जिन्होंने मस्जिद और मीनारों की मरम्मत के लिए धन की माग की|

अरब प्रायद्वीप में मौजूद ज़फ़र मस्जिद में एक शिलालेख है जो कहता है कि ये मस्जिद मालाबार के राजा अब्दुल रहमान सैमिरी से सम्बंधित है| ये शिलालेख में मिलता है कि वह आदमी 212 हिज्र (827-28 ई.) में वहां पहुंचा| मकबरे का नाम समुथिरी का तो है लेकिन ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं जो कि ज़मोरिन के बाहर जाने और कन्वर्ट होने की गवाही दे सके|  

राजा के जाने की एक और वजह केरालोपति में मिलती है कि छत्तीस साल राज करने के बाद राजा उदास था| सारे पेरुमाल परशुराम द्वारा दान किये भूभाग पर राजा हुए, जिनमे बारह साल राज करने के बाद उन्हें जमीन दूसरों को सौंपने का विधान था, शासन के लिए देना होता था|   कुछ स्रोतों से मिली जानकारी कहती है कि चेंगामल पेरुमाल मक्का जाकर पैगम्बर से मिले| एक सन्दर्भ में मिलता है कि कोझिकोड के राजा ज़मोरिन ने अब्दुल रहमान ज़मीरी के तौर पर इस्लाम क़ुबूल किया 638 में| मक्का से लौटते हुए यमन के पास ज़फर में ज़मीरी का इन्तेकाल हुआ, जहाँ बताया जाता है कि उसकी कब्र फ़िलहाल में भी मौजूद है| उसी के बाद अरियित्तुवाजह्चा के परंपरागत त्यौहार में मुसलमान की तरह सजने की प्रथा शुरू हुई, जिसमे राजा शपथ भी लेता था कि मक्का जाने वाले राजा का वारिस मक्का की भी हिफाज़त करेगा||  

एक और रोचक किस्सा है कि केरल के नायकों में से एक प्रमुख मैपिला मुस्लिम ओउवायी के समर्पण से कोझिकोडे की देवी प्रकट हुई| उप्पुकुत्तन माप्पिला का एक किस्सा “परायी पेट्टा पंदिरू” के काव्य में मिलता है, यह वाकया 378 ईसा पूर्व का है| इसका अर्थ हुआ कि यह मस्जिद बनने के दावे से बहुत पहले का मामला है| जाहिर है कि अरब लोग भारतीयों और मालाबार को जानते थे और अपना असर भी रखते थे, इस्लाम से पहले वे मूर्तिपूजक भी थे| 629 ई. में कोदुन्गल्लुर की पहली मस्जिद बनने के साथ इस्लाम के शांतिपूर्ण आगमन और केरल वासियों के इस्लामिक कन्वर्शन की बजाए यह तथ्य ज्यादा सार्थक लगता है|   

केरल में आने वाले किसी यात्री ने ऊपर लिखे बयानों का कभी जिक्र नहीं किया, पेरुमाल के किस्से बदलते रहे और शांति से इस्लाम कबूल करने  और मंदिर के मस्जिद में धर्मान्तरण के दस्तावेज पहली मस्जिद में मिलते हैं| सुलेमान, अल बरुनी, तुलेदा के बेंजामिन, अल कज्विनी, मार्को पोलो, फ्रिअर ओडोरिक, फ्रिअर जोर्दानुस, इब्न बतूता, अब्दुर रज्जाक, निकोलो-कोंटी समेत किसी भी यात्री लेखक ने चेरमण के तथाकथित रूप से इस्लाम कबूल करने को लेकर कुछ भी नहीं लिखा|   

इस कहानी का अंजाम चाहे जो भी हो लेकिन एक बात अहम् हो जाती है, केरल के केद्रीकृत राज्य की सत्ता तमाम छोटे राज्यों में बंट गयी| ये विघटन हुआ क्यों? क्या इसलिए कि राजा ने खुद जाने के पहले सबके हिस्से अलग-अलग कर दिए? क्या राजा के गायब होने को सत्ता बदलने का जिम्मेदार कहा जायेगा? ये चेर राजाओं के ऊपर होने वाले चोलों और पांड्यों के आक्रमण की भी कोई भूमिका है? लेकिन सच्चाई तो इसके उलट है, चेर चोल औ पांड्य राजाओं को दक्षिण भारत रक्षक राजाओं की उपाधि दी जाती है जिन्होंने एकजुट होकर किसी भी नौसैनिक या वाह्य आक्रमण से महोदय्पुरम की रक्षा की| और अगर ये सच है तो फिर इतिहास में बार बार ये क्यों रटाया जाता रहा है कि चेर चोल और पंड्या राजाओं के आपसी युद्ध लगातार जारी रहे| क्या ये संयुक्त सैन्य समीकरण बाद में बंट गए?    

हमलों के चलते राजस्व का नुकसान हुआ, राजा को तमाम तरह के समझौते करने पड़े, नतीजा हुआ कि राज्य का शासन भारी पड़ने लगा तो क्या ऐसे में राजा का भागने का ही रास्ता बचता है?  

क्या चोल और पंड्या राजाओं ने केरल के ज्यादातर हिस्से को कब्ज़ा करके ताकतवर सत्ता बनाई? और इतिहासकारों ने पेरुमाल के मक्का जाने की घटना को  प्रतीक बनाकर इस सारी कवायद को ढक दिया?

चेरमण पेरुमाल और मलिक बिन दीनार को लेकर जो संदेह है वही संशय मस्जिद बनने को लेकर भी है|

कोदुन्गल्लुर की मस्जिद में सामान्य मस्जिदों जैसा नहीं है, इस मस्जिद की दिशा एक मंदिर की तरह पूर्व में है जबकि सभी मस्जिदों की दिशा पश्चिम में होती है| मस्जिद के अन्दर एक तालाब है जो कि मंदिर प्रांगण में अक्सर देखे जाते हैं| मस्जिद में दीपक और दीप स्तम्भ हैं,जिन्हें मंदिरों में देखा जा सकता है| जुमे की नमाज के लिए मौलवी जिस मंच का इस्तेमाल करते हैं वह शीशम की है, उसमे भी तमाम कलाकृतियाँ मंदिरों जैसी हैं, केरल के मंदिरों की कलाकृतियाँ अमूमन मंदिरों जैसी ही हैं|    

बताते हैं कि इस्लाम को आबाद करने के लिए अरथाली के सरस्वती मंदिर को मस्जिद में बदल दिया गया| यह तथ्य ज्यादा मजबूत मालूम होता है क्योंकि बच्चों को अक्षर ज्ञान सिखाने की शुरुआत के लिए तमाम हिन्दू परिवार अक्षरभास्य के लिए सरस्वती मंदिर में आते हैं| लेकिन सवाल है कि मंदिर को मस्जिद में बदल देने की वजह क्या थी जिसमे मस्जिद में बदल जाने के बावजूद सोलह सौ साल से अखण्ड दीपम प्रज्ज्वलित होता रहा है| मंदिर की मूर्ति का क्या हुआ? इतिहास के साथ हुई छेड़छाड़ की वजह क्या है? ये तो सभी समझदार लोगों के सवाल होने चाहिए, जिनके जवाब जरुरी हो जाते हैं|   

क्या कोदुन्गल्लुर शहर की आबादी इतनी हो गई की मस्जिद के लिए जगह नहीं बची? राजा ने देखा कि सिर्फ यही जगह मस्जिद के लिए मुफीद है और लोग तैयार हो गए! अरथाली मंदिर ही क्यों? किसी दूसरे मंदिर को बदलकर मस्जिद क्यों नहीं बनाया?  

कुछ इतिहासकार बताते हैं कि यह बुद्ध विहार रहा जिके मंदिर को बदलकर मस्जिद कर दिया गया| अगर ऐसा हुआ भी तो मस्जिद के लिए बुनियादी नियमों को भी दरकिनार क्यों कर दिया गया? यह तर्क उचित नहीं लगता क्योंकि केरल में बौद्ध धर्म का प्रसार बारहवीं शताब्दी तक रहा और उसके रहते बुद्ध विहार को बदलकर मस्जिद बनाना लगभग असंभव होता!

अगर हम इस बात से इन्कार भी करें कि या तो ये बुद्ध विहार था जिसे मस्जिद में बदल दिया गया तो भी यहाँ मस्जिद बनाने के बुनियादी नियम नदारद क्यों हैं? अन्दर मौजूद दीपक और तालाब तो कुछ और कहानी कहते हैं| सवाल उठता है कि ये संरचनाएं दुनिया में मौजूद सभी मस्जिदों से अलग क्यों हैं? क्या यहाँ मौजूद पुरातात्विक अवशेष मंदिर होने के सबूत नहीं हैं? ये साजिश और भी गहरी मालूम होती है जब हम ये देखते हैं कि यहाँ की बनावट दुनिया भर की मस्जिदों की निर्माण शैली से एकदम अलग हैं|

वहां किन परिस्थितियों में यह मान्यता प्रचारित हुई कि मंदिर या बौद्ध विहार को बदल कर मस्जिद बनाई गयी?

ऐसा बताया जाता है कि नाम्बूदरियों के अमानवीय कर्मकांडों के चलते ऐसे धर्मान्तर हुए| केरल में केवल नम्बूदरी ही नशीं बल्कि सभी ब्रिटिश इतिहास में सभी ब्राह्मण वर्गों को क्रूर और स्वार्थी बताया जाता रहा है| सिर्फ ब्राह्मणों को ही नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों को किसी न किसी तरह का गुनाहगार बताया जाता रहा है| ये तो साफ है कि ब्रिटिश का मूल उद्देश्य तो पवित्र भारत भूमि पर उनके लिए प्रमुख खतरा साबित हो रहे ब्राह्मण वर्ग को बिगड़ना और बर्बाद करना ही था|  

भारत के समाज के जितने वर्ग थे उन सभी के लिए कर्त्तव्य और जिम्मेदारियों को व्यवस्था ईजाद की गयी ताकि सभी मिलकर समाज की समग्रता और बेहतरी के लिए योगदान कर सकें|

यही वेदों के सिद्धांतों का मौलिक सार है जो भारत की विभिन्नता में एकता का सूत्र बना हुआ है|तमाम तरह के लोग आपसी समझदारी से रहते हैं| कुछ मामले खड़े भी हुए तो राज और समाज के अगुवा मिलकर उसका निदान करते हैं| ऐसा नहीं होने पर समाज के वर्गों के बीच फासले बढ़ते जाते हैं, कार्य और व्यवहार में गिरावट भी आम बात नजर आती है| तमाम पीढ़ियों के गुजरने के साथ उन सभी समुदायों अस्तित्व के कार्यों, मान्यताओं और मकसदों के पीछे के तर्क और सिद्धांत बदलकर यांत्रिक जीवन शैली में तब्दील हो गए, यह हालत खतरनाक है| ब्रिटिश हुकूमत के दौरान ये हमारे लोगों के आपसी फासले बढ़कर नफरत की हद तक जा पहुंचे|

उस दौरान इन समुदायों को जातीय खांचों में बदलने की जो प्रक्रिया शुरू हुई संवाद की कमी के चलते आज बंटवारे जैसे भयावह हालातों को पैदा कर रही है| हर वर्ग को दूसरे के खिलाफ लड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है| तब से लेकर आज तक ऊंच-नीच, छोटे-बड़े के फर्क पैदा किये जाते रहे| कुछ कर्मकांडों को बुराई बताया गया, जिसके बारे में ठीक से जानकारी नहीं होने के चलते ब्रिटिश के लगातार प्रोपेगंडा में फंसने लगे| जो अंग्रेज ने दिखाया, जो कुछ कहा वही बेहतर मानने लगे यूँ कहिये कि अनुभव और अनुमान में भी ब्रिटिश तरीके बेहतर मान बैठे| यूँ कहें कि खाता न बही जो कहा वो सही, ऐसा होने से सत्य सनातन की खोज रुक सी गयी|  

तमाम तरीके ऐसे ईजाद किये गए जिसे चाहे अनचाहे हम स्वीकार करते रहे और उनके सिखाये पढाये तौर तरीकों को बेहतर मानने का सिलसिला चल पड़ा| ब्रिटिश की लगातार कोशिशों का मकसद यही रहा कि कैसे भी करके एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके|  उनके तर्कों और सिद्धांतों को मानकर ब्रिटिशों के पक्ष में खड़े हुए लोगों को औजार बना कर दूसरों को सिखाने पढ़ाने का सिलसिले से एक नए समाज की नींव पड़ी| इसी प्रक्रिया में उन्होंने लोगों को ज्ञान के स्रोतों से काटकर लोगों के जीवन की जद्दोजहद पैदा कर दी| सही लगने वाली गलत जानकारियां देकर समाज में धर्म, भाषा, समुदायों के हिसाब से लोगों के बंटवारे कर दिए| उनका शुरुआती मकसद ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्गों को बर्बाद करना था जिनकी भूमिका समाज समाज को संगठित करने की थी, यही वर्ग हिंदुस्तान को गुलाम बनाने में सबसे बड़ी बाधा थे| इन समुदायों के साथ जितना अत्याचार हुआ वह अनकहा इतिहास है| ब्रिटिश ने जिन्हें लोअर क्लास कहा उनके शोषण के लिए इन्ही दोनों अप्पर क्लास को ठहराया| एक ही समुदाय के लोगों का शोषण करने में भी उन्होंने कोई संकोच नहीं किया| एक समुदाय के शोषण के लिए उन्होंने रिश्वतखोरी को आम बात बना दिया जो आज तक जारी है, जो नहीं माने उन्हें डराने के लिए सत्ता की ताकत का सीधा इस्तेमाल किया, फूट डालो और राज करो के यही सिलसिले बदस्तूर जारी रहे| झूठ को सालों लगातार रटाते रहने के साथ साथ तमाम हथकंडे अपना कर उन्होंने भारतीय समाज को सांस्कृतिक इतिहास से दूर कर दिया| इस तरीके से हमेशा एक रहा भारतीय समाज स्थायी बंटवारे के शिकार हो गया|    

इस बंटवारे के लिए उन्होंने हमारे सांस्कृतिक साहित्य, विज्ञानं और असली इतिहास को दरकिनार करके इतिहास विज्ञानं समाज और राजनीति के अपने संस्करण प्रस्तुत किये, जिन्हें हुमाज तक पढ़ रहे हैं|

यही सोशल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट हमारी शिक्षा व्यवस्था में गहराई से समां गया| इस व्यवस्था की ही देन है काल्पनिक अमानवीय यातनाएं जिसमे एक विशेषाधिकार प्राप्त समुदाय ने समाज में हाशिये पर पड़े दूसरे लोगों का बेहिसाब शोषण किया| इसके चलते बलहीन समुदायों को अत्याचारों से राजनीतिक आज़ादी और शोषण से भगवानों की तानाशाही से अध्यात्मिक मुक्ति के लिए प्रेरित किया जाता रहा| इसी के साथ साथ ब्रिटिश ने कैथोलिक चर्च के साथ मिलकर खुद को राजनीतिक आज़ादी और अध्यात्मिक मुक्ति का मसीहा साबित करने की कवायद शुरू की| उनकी ये कवायद पूरी दुनिया में जारी रही, चीन और भारत जैसे पूर्वी देशों की तरह उन्होंने अफ्रीका और अमेरिका के सारे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विचारों और व्यक्तित्व नष्ट कर दिया| पूरी आबादी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृतियों को मिटा देने की ये कवायद गुलाम देशों में सेना की ताकत से फलित हुई| जब अमेरिका से भारत तक के समाज में विशेषाधिकार और बलहीन लोगों के बीच बंटवारे की ये साजिश साकार नहीं हुई तो उन्होंने द्रविड़ों की सभ्यता में आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत प्रस्तुत किया| इस सिद्धांत से गुलाम देशों में नस्लीय और भाषाई आधार पर बंटवारे का माहौल तैयार हो गया| यही वजह है जिसके चलते भारतीय इतिहास के ब्रिटिश संस्करण में अत्याचारों से मुक्ति के किस्से गढ़े गए, भारतीय इतिहास का इलियट संस्करण की देन सिर्फ इतनी ही है| कासिम के आक्रमण, केरल की आबादी के खुद ब खुद इस्लाम, यहूदी और ईसाइयत कबूल करने और कश्मीर की समस्या की जड़ में यही सब किस्से शुमार हैं|

जब हमारे अपने गौरवशाली अतीत का कोई रास्ता नहीं रहा तो जो भी मिला वही वास्तविक समझा जाने लगा| आज भी हम इसी रटे रटाये संस्करण को अपनाकर अतार्किक तौर अपनी गौरवशाली परम्पराओं को दरकिनार कर रहे हैं, भूल बैठे हैं| जबकि हमारी अपनी परम्पराओं ने न केवल हमारे देश की बल्कि पूरी दुनिया की मदद की है| अपनी परम्पराओं से दूर होना ही हमारी कमजोरी की मूल वजह है जिसके चलते हम ब्रिटिशों के स्वार्थी मकसदों के शिकार हो रहे हैं और अपने समाज के बंटवारे करने की हद तक पहुँच चुके हैं| इसका कोई समाधान तब तक नहीं निकलने वाला जब तक हम खुद अपने लिए प्रयास नहीं करते| यदि हमे इस बात का एहसास नहीं होता है तो हमारी गुलामी चिरकाल तक जारी रहेगी|

“जब नम्बूदरियों को इसका शिकार बनाया गया” तो इस्लाम कबूल करने का आरोप उन्ही पर लगा| ये बिलकुल उसी तरह है जिस प्रकार बताया जाता है कि 52 ईस्वी में नम्बूदरियों ने खुद सेंट थॉमस से मिलकर ईसाइयत कबूल की| ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं जिनसे जाहिर होता है कि जब सम्राट ललितादित्य ने महोदय्पुरम में मार्तण्ड मंदिर की प्रतिकृति बनवाई तो नम्बूदरी उनके साथ आये| इस मंदिर के चौंसठ दरवाजे थे जिनकी भौगोलिक स्थिति का अब तक कोई पता नहीं| दक्षिण के बंदरगाह का यह नगर सम्राट ने बसाया, यहाँ पर एक वृहत सौर वेधशाला भी स्थापित की गई| ये चौंसठ दरवाजे परंपरागत ज्ञान के प्रतीक थे इस ज्ञान के साथ नम्बूदरियों को परंपरागत ज्ञान सत्ता के मंदिर का रक्षक नियुक्त किया गया| ये एक व्यवस्था थी जिसके रक्षकों को ब्रह्मक्षत्र कहा गया, यह परंपरा परशुराम ने शुरू की थी| सम्राट ललितादित्य को परशुराम भी कहा जाता था| केरल के चेरनाद नम्बूदरी खुद को परशुराम के अनुयायी मानते हैं| सिर्फ नम्बूदरी ही नहीं कोंकणस्थ ब्राह्मण और दुनिया भर के तमाम ब्राह्मण समुदाय आज भी परशुराम और ललितादित्य की परम्पराओं से जुड़े हुए हैं|   

अगर कोदुन्गल्लुर में इस्लाम को आबाद करने के लिए राजा की चिट्ठी मिली और वहां से शासक राजा के वायदे के मुताबिक इस्लाम को कबूल भी करते तो भी इस बात की क्या सम्भावना बनती है कि राज्य की प्रजा भी इस्लाम को कबूल करे| महज राजा की चिट्ठी से वे सदियों से जारी अपने सभी संस्कारों और परम्पराओं को दरकिनार करके कैसे एक मस्जिद बना सकते हैं? क्या ये भारत जैसे देश में शांतिपूर्वक होना संभव है? क्या इस बदलाव के लिए कोई विरोध नहीं हुआ होगा? उस समय के चोल और पाण्ड्य जैसे ताकतवर पड़ोसी राजाओं ने भी कोई सवाल नहीं किया ये भी कम अचम्भा नहीं| किसी ने मस्जिद से मंदिर बनाने का विरोध भी नहीं किया? कोई भी इस विचार के खिलाफ नहीं गया| ये सब इलियट का रचा मनगढ़ंत दस्तावेज मालूम होता है, जिसे सिंध और कश्मीर में मुस्लिमों के आक्रमण और मंदिरों की लूट जैसी प्रस्तुति करके सत्य बनाने की कोशिश इतिहास में होती रही है|   

मनगढ़ंत इतिहास का खाता 2: सिंध पर इस्लामी आक्रमण, एक झूठा और मनगढ़ंत इतिहास जिसमे पंद्रह साल के लड़के ने सिंध मुल्तान और पर्शिया पर कब्ज़ा किया, और बीस साल की उम्र में अरब लौट कर शहीद हुआ

हम इसे गलत और झूठा इतिहास कहते हैं क्योंकि यह एक ऐसा प्रयास है (जो काफी हद तक कामयाब भी हुआ) जिसमे पैगम्बर मुहम्मद के देहांत के बाद अरबों का एशिया जीतना दिखाया गया है| इसके लिए लिए ब्रिटिशों ने तमाम तरह के ऐतिहासिक दस्तावेजों का दिखावा करके सच्चा इतिहास बनाने की कोशिश भी की| ज्यादातर इतिहासकार ये मनगढ़ंत किस्से आज भी यथावत रटे जा रहे हैं, जो कि सामान्य विचार में ही विरोधाभासी हैं| इनमे न तो अरबी इतिहास के दस्तावेज मिलते हैं न ही पर्शियन इतिहासकारों के बयान|  

हम इस बात से इनकार नहीं करते कि मुहम्मद साहब के पहले भी भारत और अरबों के बीच व्यापार होता रहा है, लेकिन ये सारा व्यापार भूमार्ग आधारित था| हेरोडोटस (484 ई.पू.) ने माना है कि अरबों का केरल से सामान लाकर ईडन में यहूदियों को बेचा| उन्होंने स्थानीय लोगों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित किये जिनसे मप्पिल मुस्लिम समुदाय बना| अरब घुमंतू थे रेगिस्तानों में रहते थे वे न तो आर्किटेक्ट थे न ही बिल्डर जिन्होंने महान शहर बसाए| न ही अरब जहाजों के विशेषज्ञ थे जो लम्बी दूरी के समुद्री यातायात के लिए जहाज बना सकें| जब तक सड़क मार्ग साबित रहा तब तक उन सभी साम्राज्यों (पर्शियन, रोमन, तुर्क और मंगोल) की तरक्की जारी रही, क्योंकि ये भूमार्ग आधारित यातायात प्रधान राज्य थे| उन दिनों पूरा अफ्रीका और एशिया का भूमार्ग से जुड़ाव था जिसका केंद्र सिल्क रूट माना जाता था|    

अरब में इस्लाम आबाद होने के पहले कुछ सालों में मुहम्मद के नजदीकी लोगों की आपसी लड़ाई में सब एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहे| कहना अतिशय नहीं होगा कि मुहम्मद के देहांत के बाद लगभग नब्बे प्रतिशत अरब आबादी धार्मिक हो गयी| खलीफा के सामने सबसे पहली दिक्कत आतंरिक संघर्षों से निबटने की थी| अरबों के लिए पूर्व में पर्शियन के साथ हजार सालों के युद्ध का इतिहास सामने है तो उत्तर में बीजान्टिन साम्राज्य की गुलामी भी| मुहम्मद के बाद की पहली शताब्दी में पर्शियन सभी अरबों को मार गिराने की नीति बनाकर सभी भुमर्गों पर काबिज होने लगे| बगदाद तक का रास्ता बंद होने के बाद सिंध यानि आज के भारत तक के रास्ते की गुंजाइश ही नहीं रही| इस विषय में ज्यादा गहराई से जानने के लिए ईरान के इस्लामिक इतिहास और अरबों के इस्लामिक इतिहास को देखा जा सकता है|

एक दूसरा तथ्य ये है कि मुहम्मद साहब के समय बहुत कम ही अरब जातियां रहीं जो पढना और लिखना जानती थीं, जिन्हें मुहम्मद साहब ने इस्लाम का उपदेश दिया, इनमें मुहम्मद साहब के तीन करीबी रहे अली, अबू बकर और उस्मान| यही वजह थी कि मुहम्मद साहब ने खुद ही उपदेश दिया कि ज्ञान और विज्ञानं सीखने समझने के अलावा “पूर्व की तरफ आगे न देखा जाए”| सच तो यही है कि इस्लाम के लिए उन्होंने खुद कहा कि अरबी लोग ज्ञान विज्ञानं के लिए भारत और चीन जा सकते हैं लेकिन इस्लाम उनके लिए नहीं हैं क्योंकि वे अध्यात्मिक गुरुओं और उनकी पवित्र किताबें पहले ही लिखी जा चुकी हैं|

मुहम्मद साहब को सच्चाई से अमल करने वाली अरब सेना यहाँ तक खलीफा हारुन रशीद ने सीखने या व्यापर करने के अलावा कभी भारत नहीं आये| इस तरह से उन्होंने जो कुछ भी सीखा या समझा वह ग्रीकों से मिली जानकारी के खिलाफ था| उन्होंने हमेशा कहा और मुहम्मद साहब के आदेश को अमल किया जिसमे बताया गया था कि सत्य और ज्ञान के लिए वे चीन तक जायें| मुहम्मद साहेब का यह आदेश ईरान और अरब की तमाम शरिया अदालतों का हिस्सा है जिसके तहत वे दुनिया के भूराजनैतिक सन्दर्भों के लिए फैसले करते हैं| मुहम्मद साहब के देहांत के सौ सालों में खलीफा उस्मान ने बहुतेरी कोशिशें करके अरबों को पढाया मुसलमान औरतों को भी तालीम दी|

उस दौर में अरब की उन जनजातियों के लिए को लिखना और पढना तक नहीं आता था, ये भी कड़वा सच है कि वे जनजातियाँ रोमन, बीजान्टिन और पर्शियन राज्यों की कम से कम हजार सालों तक गुलाम रहीं| नबी की मौत के दस सालों के भीतर ही उनको तमाम राजनीतिक संघर्षों का गवाह होना पड़ा| अरब के आतंरिक कलह के तत्कालीन हालत भी जाहिर हैं| ऐसे में यह भरोसा करना मुश्किल है कि रेगिस्तान के शहर के बाशिंदे जिनकी आबादी हिंदुस्तान के किसी एक बड़े शहर से भी कम रही हो, वे सैनिक ताकतों के साथ पूर्व में पर्शिया को हराकर, उत्तर में बीजान्टिन का नियंत्रण करते हुए पश्चिम में मिस्र और उत्तर अफ्रीका तक कब्ज़ा कर सकें| वे अचानक से जहाज बनाने के तरीके सीख के भूमध्य सागर पर कब्ज़ा बना लेते हैं, इसके बावजूद एक बड़ी तादात में मजबूत सैनिकों को लेकर ईरान पार करके, अफ़ग़ान को नियंत्रण करके (जिन्हें आज भी सोवियत नहीं संभाल पा रहे) उस समय के भारत यानि आज के सिंध तक आ जाते हैं!!! हमे कितना बेतुका किस्सा बताया गया इसका अंदाज़ा लगाना हो तो जरा तब के अरब की आबादी देख लीजिये, कितनी आबादी रही होगी? इतने बड़े पैमाने पर युद्ध करने के लिए कितने संसाधनों की जरुरत होगी? युद्ध लड़ने के लिए उनके पास क्या मौजूद रहा जिसके बलबूते लड़ लेते?

लेकिन ये साबित करने के लिए कि उन्होंने सेना लेकर पश्चिमी भारत पर कब्ज़ा किया और वे भारत की तमाम संस्कृतियों के लूटेरे थे, ब्रिटिश इतिहासकार इलियट ने एक आश्चर्यजनक खाते की खोज की जिसका अरब में कोई जिक्र ही नहीं मिलता, उसका पर्शियन इतिहास में भी कोई जिक्र नहीं| लेकिन उसके बावजूद ये किस्सा इतना सच्चा है कि हम हिन्दुस्तानी आज भी बिना कोई सवाल किये यथावत माने बैठे हैं, न ही इतिहास के इस खाते की आज तक किसी भी तरह की कोई जांच ही कर सके हैं! ऐसा किया था तो सच ही होगा इस सोच के साथ हमारी बौद्धिक गिरावट जारी है, शायद यही ब्रिटिश चाहते भी थे|

फिर भी इलियट की यह खोज कामयाब रही कि बिन कासिम ने ने सिंध पर आक्रमण करके आदित्य मंदिर बर्बाद कर दिया| इलियट का यह संस्करण इतिहास का कुछ ऐसा दृश्य प्रस्तुत करता है:

——————————कथानक शुरू—————————-

बर्जिन के मुताबिक उमय्यद को इलाके में दखल का ख्याल इसलिए हुआ क्योंकि सिंध के राजा दाहिर ने मुसलमानों के जहाजों पर हमला किया और मुस्लिम आदमियों और औरतों को क़ैद कर लिया|पहले उन्होंने गांधार की काबुल शाही से ख्य्बेर दर्रे के रास्ते पर कब्ज़ा करने की कवायद की थी| सिंध पर कब्ज़ा करके वे गांधार के खिलाफ एक दूसरा मोर्चा खोलने में कामयाब हो सकते थे, किसी समय उनके पास ये मौका था, जिसे वे पहले ही आजमा चुके थे|

विंक के मुताबिक उमय्यद का ये ख्याल मेड्स(सिंध में रहने वाली स्क्यथिंस के एक कबीले) और दूसरों के अभियान से और पुख्ता हुआ| मेड्स ने सस्सनिद जहाजों को टिगरिस से श्रीलंका के तटों पर लूटा और वे कच्छ, देबल और काठियावाड़ के बंदरगाहों पर अरबी जहाजों का शिकार करते थे| उस समय सिंध अल हिन्द का खुला मोर्चा था जिसमे रहने वाले ज्यादातर कबीले पश्चिमी हिन्द महासागर में दखल रखती थीं| मुस्लिम खबरियों ने जोर दिया कि सिंध के जहाजी और जमीनी रास्तों पर कब्जे के लिए कबीलों की इन्ही हरकतों के चलते देबल के लुटेरों ने अरबी जहाजियों को वो इलाका और हिन्दुस्तान के अहम् जहाजी और जमीनी रास्ते छोड़ने पर मजबूर कर दिया जिनका अहम् ठिकाना सिंध था| हज्जाज की सरकार में देबल’ के मेड्स ने एक हमले में श्रीलंका से अरब जा रही औरतों को कैद कर लिया, इससे यह उमय्यद की खिलाफत के लिए खतरे की घंटी थी जिससे उन्हें मकरान, बलोचिस्तान, और सिंध इलाकों में पैर जमाने में कामयाब बनाया| उमय्यद की खिलाफत के स्पेन और सिंध पर हमले का समय रहा 710|  

इस अभियान में एक अहम् वजह सस्सनिड्स के बेड़े को नामंजूर करना भी था जिसे अरबों ने तरक्की की और अरबी विद्रोहियों से उमय्यद का निज़ाम मजबूत हुआ|

बाद में गवर्नर दीबल परताब राये ने इन अरबियों को कैद करवा दिया| परताब राये की कैद से भाग निकली अरबी लड़की ने एक चिट्ठी लिखकर हज्जाज बिन युसूफ से मदद के लिए गुहार की| जब हज्जाज ने दाहिर से कैदियों की रिहाई और मुआवजा माँगा तो उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसका उन पर कोई कब्ज़ा नहीं| अल हज्जाज ने मुहम्मद बिन कासिम को बदला लेने के लिए भेजा उसने 711 में सिंध का अभियान शुरू किया| मुहम्मद बिन कासिम का ये अभियान तीसरी कोशिश थी, पहली दो कोशिशें उम्मीद के खिलाफ रहीं गर्मीं और थकान के चलते कामयाब नहीं हो सकीं|   

———————–कथानक ख़त्म——————————-

अब हमे इस वाहियात किस्से पर कुछ सवाल तो करने ही चाहिए| कासिम जो कि अपने चाचा, बसरा के गवर्नर की देख रेख में रहता था और चाचा खुद लडाइयों में लगा हुआ था तो फिर पंद्रह साल के लड़के को सिंध में लड़ने के लिए किसने भेज दिया?

ऐसा काम जो सिकंदर महान के लिए भी भारी चुनौती साबित हुआ उस काम के लिए इस बेहूदगी भरे किस्से पर कौन भरोसा करेगा?

हम अपने पाठकों से इस किस्से के कुछ अहम् बिन्दुओं पर गौर चाहेंगे:  

  1. पहला बिंदु ये कि मुस्लिम औरतें श्रीलंका से अरब जा रही थीं? ये आज की बात नहीं बल्कि मुहम्मद के समय का किस्सा है, मुहम्मद के अरब की औरतें श्रीलंका की जुबान में इतनी काबिल कैसे हो गईं? ये जरुर कहा जा सकता है कि वे अरब सौदागरों की बीवियां या बेटियां रही होंगी जो उनके साथ श्रीलंका गयीं| तो सवाल उठता है कि क्या वे बिना मर्द मुसाफिरों के साथ ही घूम रही थीं? और अगर मर्द मुसाफिरों की मौजूदगी में उनका अपहरण हो गया तो वे क्या कर रहे थे? क्या वे सभी मारे गए या गिरफ्तार हो गए? फिर उनके रहते ऐसा क्या हुआ कि औरतें इतनी असहाय हो गयीं कि लड़की को गवर्नर के लिए चिट्ठी लिखनी पड़ी?  क्या ऐसा नहीं कहा जाता है कि मुहम्मद के सह्योगियोंमे सिर्फ चार लोग थे जो लिखना और पढना जानते थे? मुहम्मद के इन्तेकाल के सौ सालों में ही औरतों को अरबी ही नहीं सिंहला भाषा भी सिखा दी गयी? मुस्लिम औरतों के तालीम की क्या हालत है वो आज भी किसी से छुपा नहीं है! लेकिन 711 में एक मुस्लिम लड़की चिट्ठी लिखती है ये किस्सा किसी समझदार के लिए तो हजम कर पाना आसान नहीं!  

2) अरब जाती मुस्लिम महिलाओं का सिंध के पास अपहरण हो हाता है! जिनके साथ कोई मर्द मुसाफिर नहीं! क्या मुस्लिम दुनिया में आज महिलाओं की क्या हालत है वह किसी से छिपी है? इसी किस्से का एक संस्करण बताता है कि सीलोन के राजा के खलीफा के लिए एक जहाज में सुन्दर लड़कियों और औरतों को भेजा जिसे सिंध के राजा दाहिर ने कैद कर लिया, वो राजा जो महिलाओं के ऊपर किसी अत्याचार को सहन नहीं कर सकता, उस ब्राहमण राजा ने क्या उन औरतों को आजाद कराने की कोशिश नहीं की? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उस राजा ने लड़कियों और औरतों की हिफाज़त की हो और किस्से बनाने वाले इतिहासकारों ने उसे खलनायक बना दिया हो? अगर हम ये मान भी लें की कासिम का अभियान सच में हुआ भी हो तो क्या ये संस्करण नहीं हो सकता बजाए इसके कि लड़कियों और औरतों को लुटेरों से आजाद कराने के लिए खलीफा ने लुटेरों पर हमला किया? ऐसे में राजा पर हमले वाला किस्सा एक मजाक भर नहीं!!!

3) “लड़कयों में एक से एक कैद से भाग निकली”! ऐसा करने वाली वो हेरोइन थी कौन और आखिरकार उसका क्या हुआ?

4) कैद से निकल कर भागी लड़की ने अल हिजाज के खलीफा गवर्नर को चिट्ठी लिखी! किस तरह वो ऐसे हिंसक माहौल में रह पायी जहाँ वो उस जगह की जबान तक से वाकिफ न रही हो? चिट्ठी लिखने के बाद उसने चिट्ठी भेजी कैसे? या फिर वह अपनी चिट्ठी खुद लेकर गयी? यह अपने गृहराज्य तक पहुंची कैसे?

5) मुहम्मद बिन कासिम 695 में पैदा हुआ और सिंध पर हमले का उसका तीसरा अभियान 710 ई. में हुआ, तो क्या वह सिंध पर हमले के लिए पर्शिया पार करने के समय महज पंद्रह साल का था?             

जब पर्शियन और अरबियों के बीच दुश्मनी थी तो ऐसे में दुनिया जीतने वाले इस पंद्रह साल के लड़के ने पर्शिया पार करके हिंदुस्तान पर हमला किया कैसे?

6) 15000 की कुल सेना (6000 सीरियन घुड़सवार, 6000 इराकी ऊँट सवार और 300पैदल सेना) के साथ निकला कासिम सिंध को जीतने में कामयाब हुआ! और वो भी उस राजा दाहिर के सामने जिसके पास पचास हजार तलवारबाज थे! जिसमे हाथियों और घुड़सवारों का दस्ता भी शामिल था! ये तो उस राजा की निजी सेना थी! हमला करके जीतने वाली सेना कम से तीन गुना ज्यादा संख्या बड़ी होनी चाहिए… जब तक की हाथियों की पीठ पर लगे हौदे में विस्फोट न हो जाए और रणभूमि के हाथी भूतों से डरकर भागने न लगें… आखिर ये अफवाह भी खूब है कि सिंध के राजा की हार हुई!

7) अगर कासिम सिंध के साथ हुई अपनी तीसरी लड़ाई में महज पंद्रह साल का था तो पिछले अभियानों में उसकी उम्र क्या रही? क्या उसे सिकंदर महान की तरह महान मुहम्मद बिन कासिम नहीं कहा जाना चाहिए?

अपने कामयाब अभियान के बाद महज पांच सालों में कासिम अपने चाचा के साथ लड़ाई में बसरा के नए खलीफा सुलेमान बिन अब्द अल मलिक के हाथों मारा गया! जब महज पंद्रह साल का महान अरबी योद्धा मुहम्मद कासिम सीरिया से सेना बना कर, भयानक पर्शिया पार करके, गुजरती सिन्धी और बलूचियों को हरा सकता है, सिंध के राजा के साथ समझौता कर सकता है, तो फिर वह वापस लौट कर नए खलीफा के साथ लड़ाई में कैसे मार दिया जाता है? हिंदुस्तान में साजिश रचने वाला अरबी इस अभियान में कैसे क़त्ल हो गया?

अब अरबी औरतों को पढने के लिए श्रीलंका भेजते हैं (हालाँकि वो सड़क के रास्ते और ज्यादा बेहतर जगहों पर जा सकती थीं), उन्हें जहाजी लुटेरे पकड़ लेते हैं, जो सिंध के राजा के नियंत्रण में नहीं! पकड़ी गयी लडकियों में तेरह साल की एक लड़की बाख निकलती है और बचाने के लिए बसरा के गवर्नर को चिट्ठी लिखती है| जबकि अरब में ऐसा कोई नहीं जो लिख या पढ़ सके| जिन लुटेरों ने लड़की को कैद किया वे अपना कर्त्तव्य निभाने के लिए उसकी व्हिट्ठी गवर्नर को भेजते हैं, जवाब में सिंध के राजा को चिट्ठी मिलती है जो जवाब में लिखता है कि लुटेरे उसके कब्जे में नहीं, इससे अरब की नीतियों की खिलाफत होती है| गुस्सा के गवर्नर अपने पंद्रह साल के भतीजे को भेजता है, भतीजा अपनी पंद्रह हजार की अजेय सेना लेकर ईरान के दुर्गम रास्ते से होकर सिंध पहुँचता है, जहाँ वो हजारों लाखों की सिन्धी सेना पर भारी पड़ता है, अरबी महिलाओं को आजाद कराना भूलकर वो नायक बसरा वापस जाता है और अपने चाचा के साथ पकड़ा जाता है, शहीद होता है| वहां का खलीफा मौजूदा खलीफा से नफरत करता है| यह वाहियात किस्सा युद्ध के न्यूनतम जानकारों के लिए कल्पना की अद्वितीय मिसाल है (101 युद्ध कलाएं)|  

अब हम अरबी महिलाओं के कैद होने के इस किस्से के ही दुसरे संस्करण देखते हैं जिसमे भारत के इतिहास में क़सिम्की मौत का बयान मिलता है…

  1. अल बालाधुरी के खाते से:

Source:http://icraa.org/muhammad-b-qasim-and-the-true-story-of-damsels-in-distress/#_ftn18

—–उसके बाद मुज्जा;अह अल हज्जाज मुहम्मद इब्न हारून इब्न धीरा अन नमरी को नियुक्त करते हैं, उसकी हुकूमत में रूबी के जजीरे के बादशाह कुछ औरतें भेजते हैं, उनके बापों के पास, ये औरतें उसके मुल्क में मुसलमान के तौर पे पैदा हुईं, जिनके बाप सौदागर थे और मर गए| जो औरतें अल हज्जाज जाना चाहती हैं, बादशाह उनको अल हज्जाज भेजकर तरफदारी करता है, लेकिन उन औरतों के जहाज पर अद देबल के पास बवारिज का हमला होता है और जहाज में मौजूद सभी को कैद कर लिया जाता है| बानू यारबू काबिले की एक लड़की चिल्लाती है, “ओ हज्जाज! मै यहाँ हूँ” अल हज्जाज उनकी गुहार सुन लेता है, या लब्बायक (ये आवाज wahts app या स्काइप, अथवा VOS पर मिलती है, जो कि केरल से सीधे अरब जाती है)| खलीफा उसे राजा दाहिर को भेजकर कहता है कि राजा औरतों को आजाद कराये,लेकिन राजा कहता है कि “मेरा उन सब पर कोई नियंत्रण नहीं” तब अल हज्जाज से उबैदुल्लाह इब्न नभान को अल देबल पर हमले के लिए भेजा जाता है| लेकिन वो मारा जाता है| उसके बाद अल हज्जाज से एक चिट्ठी बुडैल इब्न तःफाह अल बाजली को लिखते हैं, जो कि ओमान में थे, उनको खबर मिलती है कि अद दौबुल की खिलाफत करें| लेकिन जब बुदैल दुश्मन से मिलता है तो उसका घोड़ा उसे छोड़कर भाग जाता है, दुश्मन उसको घेरकर मार देते हैं, उसके बाद अल हज्जाज मुहम्मद इब्न अल कासिम इब्न अल हकाम इब्न अबू उकील इन चार्ज को भेजता हैं जो कि अल वालिद इब्न अब्द-अल मलिक की जगह पहुँचकर सिंध पर हमला करता है—-

  • The narrative from Chachnamah:
  • चाच्नमा का किस्सा:

 

यही किस्सा तारीख सिंध व हिन्द में दर्ज है, जिसे आम लोग चाच्नमा के नाम से जानते हैं:

यह सरनदेब के राजा से जुड़ा किस्सा है जिसने हज्जाज के लिए एक छोटे जहाज में मोतियों के जजीरे से कुछ तोहफे भेजे| खलीफा के लिए भेजे मोतियों के साथ साथ कुछ खूबसूरत नगीने के साथ साथ खूबसूरत तोहफों में गुलाम भी रुखसत किये जिसमे औरत और मर्द दोनों शामिल थे| तमाम मुसलमान औरतें काबा देखने और खलीफा का शहर देखने के मकसद से भी गयीं| (गौरतलब है कि: मुसलमान औरतें जहाज में मौजूद मर्द मुसाफिरों से बिछड़ गयीं जिसके बारे में कोई भी सोच नहीं सकता!!) जब वे कजरून इलाके में पहुंची तो उनका जहाज तूफान में फंस गया, दाहिने मुड़ के उनका जहाज देबल बंदरगाह पहुँच गया| वहां लुटेरों का एक दस्ता था, नागामढ़ के कबीले वालों ने आठ जहाजों पर कब्ज़ा करके रेशमी कपड़े लूट लिए गुलाम मर्द और औरतों को कैद कर लिया और जवाहरातों के साथ साथ सारा माल असबाब लूट लिया|

सरंदेब के राजा के अधिकारियों और उस औरत ने बताया कि लूटी गयी जायदाद खलीफा और राजा की है, लेकिन लुटेरों ने कोई ध्यान नहीं दिया| लुटेरे बोले कि, “अगर तुम्हारी शिकायत सुनने वाला हो तो उसको कहो कि तुम्हारी हिफाजत करे और तुम्हारी आज़ादी को ख़रीदे”| तब वे सब एक साथ रोये, “ हे हज्जाज हमारी फरियाद सुन और हमारी मदद कर!” जो औरत सबसे पहले बोली वह बनी अज़ीज़ के खानदान से थी| वसत असादी कहता है कि जब देबल पर कब्ज़ा हो गया तो उसने उस औरत को देखा, वह औरत निहायत खूबसूरत थी और उसकी लम्बाई नायाब थी| जहाज में मौजूद सौदागरों को देबल लाया गया, जो लोग जहाज से निकल के भागने में कामयाब रहे वे हज्जाज पहुंचे, वहां पहुंचकर उन्होंने सारा किस्सा सुनाया| उन्होंने बताया कि कैद में मुसलमान औरतें चिल्लाती रहीं कि “ऐ हज्जाज हमारी फरियाद सुन और हमारी मदद कर”| ये सुनकर हज्जाज ने उन औरतों की गुहार का जवाब दिया| परम्पराओं में ये कहा जाता है कि जब उन औरतों ने हज्जाज से गुहार की तो उनसे जवाब माँगा गया, तब उन औरतों ने कहा कि,” हमे सोते से जगाकर परेशान किया जाने लगा तो हमने गुहार की ताकि हमे निर्दयी लोगों की गिरफ्त से आज़ादी मिले”|   

पाठक यहाँ ध्यान दें कि इस किस्से में कोई लड़की नहीं बल्कि एक खूबसूरत मुस्लिम औरत का जिक्र है, और इस कहानी में चिट्ठी लिखने की बजाए चिल्लाने की बात कही गयी है जिसे इराक के हज्जाज में सुना जाना था!!!

जफ़र ने इस बयान के समर्थन में इस्लामिक कल्चर पर एक त्रैमासिक पत्रिका (हैदराबाद डेक्कन, जनवरी 1945, संस्करण 57-59) में एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक है “एंड ऑफ़ इमाद-उद-दीन मुहम्मद बिन कासिम, द अरब कॉन्करर ऑफ़ सिन्द”| लेख में इन्होने लिखा है कि कहना सार्थक होगा कि यह किताब उस जीत के बहुत बाद नहीं लिखी गयी| एच.एम इलियट ने इसकी विस्तार से चर्चा अपनी किताब में की है जिसका नाम है, “द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन्स ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस” इस किताब का संपादन जॉन डाउसन ने किया है, (लन्दन: ट्रूब्नर एंड कंपनी, 1867) 131, 134-136| इस जानकारी को आधार बना कर चाचनाम और उसकी टीम ने हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया लिखकर इस झूठ को पुख्ता करने की कोशिश की| इलियट और उनके साथियों ने इसी संस्करण को आधार बना कर भारत के लोगों द्वारा भारत का इतिहास लिखने का दावा किया| ये उसी दौर की बात है जब भारतीय साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथों को झूठ कहकर दरकिनार कर दिया गया| कल्हण की राजतरंगिणी उसी का एक उदहारण है| बाद में इलियट और उनके साथियों की लिखी “द हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन्स ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस” एक प्रमाणिक दस्तावेज बन गयी!

जबकि फरहान अहमद शाह लिखता है कि- बलाधुरी का “फुतूह अल बुलदन” सबसे पहला दस्तावेज है जिसमे मुम्मद बिन कासिम के सिंध के साहसिक कारनामे का जिक्र मिलता है| उसमे लिखी तमाम बातों को सदियों तक इतिहास में कोई जगह नहीं मिली| क्या ये चाचनाम के संस्करण का विरोधाभास नहीं जो कि इलियट का संस्करण है|

एक रिसर्च स्कॉलर मनान अहमद के मुताबिक अब्बासिद की अदालत में बताया गया बलाधुरी का लिखा इतिहास ऐतिहासिक दस्तावेजों से हटा दिया गया है| लिखने के दो सौ साल पहले का किस्सा है जिसे चाच्नमा ने अपने मकसद भर के लिए दोबारा लिखा है|

बलाधुरी ने हज्जाज के कमांडर नुमरी का किस्सा लिखा जो कि सिंध पर मुस्लिम हमले के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ| “मुस्लिम औरतों का अपहरण” वो किस्सा है जिसे बलाधुरी ने कासिम के अभियान के एक दशक पहले लिखा इस बयान की बावत मकरन मोर्चे पर चालीस सालों से जंग जारी थी|

फिर भी नाटकीय तरीके से इतिहास में ये किस्से गूंजते रहे और आज भी वही जारी है| वह कहता है कि यह एक अविश्वसनीय किस्सा है जिसमे मजलूम मुसलमान औरत दूर की एक हुकूमत से मदद की गुहार करती है| उपन्यासकारों, नाटककारों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए ये अनकही आवाजों और इस्लाम की मर्दानगी का दावा करने का माहौल बनाने के लिए काफी है| शायद यही वजह है जिसे विद्वानों ने भी बगैर किसी आलोचना के कबूल किया|

अब हम कासिम के किस्से और और उसके बाद सिंध में इस्लाम आबाद होने की बात पर गौर करते हैं,

  1. इलियट सरीखे आदिम इतिहासकारों ने जबरिया कन्वर्शन की बात उठाई है, वे लोग भारत के इतिहास की बर्बादी के जिम्मेदार हैं| इसे उन दो वजहों के तौर पर देखा जा सकता है जो नफरत भरे माहौल में सिंध में कन्वर्शन की जरुरत का खाका तैयार करते हैं| कम संख्या में सैनिकों के बावजूद आक्रमण करने को कासिम की आभासी मजहबी सहिष्णुता से जोड़कर देखा गया, वास्तविकता में इसी धार्मिक कट्टरता के चलते मदिरों का तोड़ा जाना भी जायज ठहराया जाता रहा| यही विचार हमें कोउसेंस, मजूमदार और वैद्य सरीखे दूसरे इतिहासकार भी घोलकर पिलाते रहे|

इलियट ने इस्लाम को “आतंकी, विध्वंसक, हत्या, और बलात्कार” के साथ जोड़कर दिखाया, जिसमे “आक्रामक अरबियों” को “निर्दयी कट्टर” ठहराया, जो कि “प्रचण्ड और जोशीले” लूट और धर्म परिवर्तन के मकसद से लड़ते रहे हैं| यू. टी. ठाकुर ने कासिम के शासनकाल को “सिंध के इतिहास का कला अध्याय” कहा, जिसके दस्तावेजों मे सिंध के लोगों के का बेहिसाब धर्म परिवर्तन के दस्तावेज, मंदिरों की बर्बादी, कत्लेआम हुआ| हिन्दू या बौद्ध मान्यता के चलते सिंध के लोगों को डरपोक और शांतिप्रिय बताया गया जिन्हें मजबूरी में “बर्बर हमलों” को बर्दाश्त करना पड़ा|

इस तरह की लीपापोती से उसने भारतीयों के लिए अरबों की क्रूरता की तस्वीर उकेरी जिससे वे भारतीय और अरबी/मुस्लिम अवाम के बीच स्थायी नफरत का माहौल बनाने में कामयाब हुए और आम लोगों के जेहन में ये सिलसिला आज भी जारी है| इलियट के इस गंभीर प्रयास से बने इतिहास के नए संस्करण में मुहम्मद बिन कासिम को अक्सर पहला पाकिस्तानी कहा जाता है, ये तथ्य पाकिस्तान के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है| मुहम्मद अली जिन्ना ने भी यही माना कि पाकिस्तान का आन्दोलन पहले मुस्लिम के तौर पर मुहम्मद बिन कासिम ने शुरू किया, जिन्ना के मुताबिक पाकिस्तान का आन्दोलन तब शुरू हुआ जब पहले मुस्लिम ने सिंध की धरती पर कदम रखा, इतना ही नहीं उन्होंने सिंध को हिंदुस्तान के इस्लाम का दरवाजा तक करार दे डाला!

  1. अपने आप हुए धर्मान्तरण का श्रेय थॉमस डब्लू. अर्नाल्ड और हबीब और कुरैशी सरीखे आधुनिक मुस्लिम इतिहासकारों को जाता है| उन्होंने माना कि ये धर्म परिवर्तन निहायत शांतिप्रिय तरीके से हुए और सारे धर्म में अरब ताकतों ने उदार, शांतिप्रिय और सहिष्णु नीति अपनाई| इन इतिहासकारों ने अरब मुस्लिमों के व्यवहार को “तारीफ के काबिल” बताया और उनके कामों को एक “बेहतर सभ्यता की शेखी” करार दिया|

एक अतिवादी संस्करण में अरब मुस्लिमों को सिंध के आक्रामक और जबरिया धर्म परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है लेकिन दूसरी तरफ उन्हें आदरणीय और सहिष्णु बताया जाता है जो कि उनका धार्मिक कर्तव्य है जिसमे वे धर्मान्तरण को जीवन्तता, बराबरी और इस्लामी मजहब की नैतिकता मानते हैं| अरब सिंध के बनने को पिछली तारीखों में शहरों के हवाले हिंसक हों या रक्तहीन, उनमे देबल के ब्राह्मणों के जबरिया खतना करने या कासिम के हवाले से गाय कटवा कर हिन्दू भावनाओं को भड़काने के तमाम उदहारण मौजूद हैं जिन्हें खास नजरिये से या अन्यथा में देखा या इस्तेमाल किया जा सकता है|

कुछ इतिहासकारों ने एक बीच की रेखा जरुर खींची, जिसमे उन्होंने कासिम को हिन्दूओं और बौद्धों के बीच शांति स्थापित करने वाला करार दिया; जिसमे उन्होंने कहा कि गैर मुस्लिम उसके अधीन काम करके जीते हुए राज की हुकूमत संभालें, लेकिन उसके कट्टरपंथी तरीके में “नास्तिकों” से दूरी बरक़रार रही| इस बात की भी जिरह जारी रही कि कासिम बीच राह में फंस गया जिसमे उसे अपनी हुकूमत में धिम्मियों को स्थानीय सिंधियों के ऊपर  रखने का मशविरा दिया गया लेकिन ये भी हिदायत रहीं कि उन्हें गैर नागरिक माना जाए|

ऐसा माना जाता है कि सिंध पर कब्ज़ा करने के बाद कासिम ने शरिया के हनाफ़ी फिरके को कबूल किया, इस फिरके में हिन्दू, बौद्ध और जैनियों को “धिम्मी” और “किताबों के लोग” कहा जाता है, जजिया कर देने के बाद उन लोगों को धार्मिक आज़ादी मिली| ये अहम् मामला है क्योंकि कई शताब्दियों के बाद यह खास तरीका हिंदुस्तान के मुस्लिम हुक्मरानों की हुकूमत में भी देखा गया|   

हज्जाज की मौत के बाद भी मुहम्मद बिन कासिम के राज्य विस्तार की तैयारियां जारी रहीं, ये काम खलीफा अल—वालिद प्रथम ने किया जिसकी हुकूमत हासिल करके सुलेमान इब्न अब्द अल-मलिक ने हज्जाज के सभी करीबियों से बदला लिया| सुलेमान ने हज्जाज के पोलिटिकल विरोधियों का समर्थन हासिल किया साथ ही हज्जाज के कामयाब जनरलों कुतैबह बिन मुस्लिम और कासिम को दोबारा खिदमत में रखा| उसने हज्जाज से मात खाए यज़ीद इब्न अल-मुहल्लब और अल मुहल्लब इब्न अबी सुफ्फ्राह के बेटे को फारस, किरमान, मकरान और सिंध का गवर्नर बनाया, ऐसा करके उसने कासिम की कड़ियों को दोबारा जोड़ लिया|  

कासिम की मौत के मसले में दोबारा देखते हैं जिसका जिक्र तमाम किस्सों में मिलता है:

  1. नौवीं शताब्दी के पर्शियन इतिहासकार अल बलाधुरी के मुताबिक कासिम एक पारिवारिक कलह में में इराक के गवर्नर के हाथों मारा गया| खलीफा अल वालिद प्रथम की मौत के बाद उसके भाई सुलेमान इब्न अल-मलिक नया खलीफा बना| सुलेमान कासिम के खिलाफ इसलिए हुआ क्योंकि उसने हज्जाज के हुक्म के मुताबिक अपने जीते हुए सभी इलाकों में सुलेमान की दावेदारी कबूल नहीं की थी| जब कासिम ने हज्जाज की मौत की खबर सुनी तो वह अरोर लौट गया| बाद में कासिम खलीफा के दावेदार सिंध के गवर्नर के हुक्म से गिरफ्तार कर लिया गया| उसकी गिरफ़्तारी यज़ीद इब्न कब्शा अस सासकी ने की, जो इराक के नए गवर्नर यज़ीद इब्न अल मुहल्लब और नए खजांची सलीह इब्न अब्द अर-रहमान के लिए काम करता था| सलीह के भाई को हज्जाज ने क़त्ल किया था इसलिए उसने कासिम और उसके रिश्तेदारों तडपा तडपा के मारा| चाचानमा की तुलना में अल बलाधुरी के किस्से में उसका जिक्र बहुत कम मिलता है!
  2. चाच्नमा में एक किस्सा मिलता है जिसमे कासिम की मौत का सेहरा राजा दाहिर की बेटियों के नाम जाता है जिन्हें कासिम ने अपने अभियान के दौरान गिरफ्तार किया था| कासिम ने राजा की बेटियों को गिरफ्तार करके खलीफा के हरम के लिए तोहफे के तौर पर भेजा| इस किस्से में खलीफा की राजधानी बगदाद बताई जाती है(जो कि आज तक नहीं बनी और अगर होगी भी तो डमस्कस में)| इस किस्से में ये बताया गया कि राजा की लड़कियां खलीफा को ये भरोसा दिलाने में कामयाब रहीं कि भेजने के पहले कासिम ने उनके साथ ज्यादती की, इस टालमटोल का नतीजा ये हुआ कि मुहम्मद बिन कासिम को बैलों के खाल में सीकर सीरिया वापस भेजा गया, जिसकी वजह से रास्ते में दम घुटने के चलते उसकी मौत हो गयी| इस कथानक में उन लड़कियों के टालमटोल के मकसद को वजनदार बनाने की कोशिश की गयी ताकि उनके पिता की मौत का बदला साबित हो सके| जब इस टालमटोल की जानकारी हुई तो खलीफा को पछतावा हुआ और उसके हुक्म दिया कि दोनों बहनों को दीवार में जिन्दा चुनवा दिया जाए|    

गौर करने की बात ये है कि अरब और ईरान के तमाम प्रमाणिक दस्तावेज बताते हैं कि वह लड़का कभी अरब के बाहर गया ही नहीं —ये सच्चाई कोई भी भारतीय आसानी से सोच सकता है, लेकिन कभी किसी ने ऐसा करने की जेहमत नहीं उठाई|

हम ये नहीं कहते कि आदित्य मंदिर नष्ट नहीं किया गया, लेकिन हमारा सवाल है कि ये सब किसने किया, कब किया और क्यों किया? ऐसा ही अतिवादी सोच का किस्सा केरल की पहली मस्जिद के बारे में भी है और भारत से सऊदी अरब को दिए तोहफे के बारे में भी|

जैसा कि बर्नार्ड शॉ कहते हैं कि “अगर हम ईश्वर से बात करें तो वो प्रार्थना है. अगर ईश्वर हमसे वापस बात करने लगे तो स्चिजोफ्रेनिया”| गूगल पर पेरूमल की एक सामान्य खोज भी करें तो गूगल में ही मिला हर किस्सा विरोधाभासी नजर आता है| पेरुमाल के साथ हिंदुस्तान आये हर आदमी की अस्तित्व खुद में विरोधाभासी है| उसके पिता का जन्म दिन बेटे के जन्म के चालीस सालों बाद का है!!! उसके बार में कहा जाता है कि वह आदमी अफगान था जिसने बाद में इस्लाम कबूल किया, लेकिन मुहम्मद की मौत के बाद कम से कम सौ सालों तक इस्लाम अरब के बाहर नहीं गया इसकी एक वजह उनके हिमायती और नजदीकी लोगों के आपसी झगड़े भी थे|   

हो सकता है कि नायर सेवा समिति या ट्रावनकोर के शाही परिवारों के पास पेरुमाल के इस किस्से के बारे सही सही जानकारी हो|

वे सभी कथानक जो पहले के पैराग्राफों में दिए गए हैं उनकी तारीखों, सालों, घटनाओं और उन लोगों की जानकारियां बहुत गड़बड़ हैं|

सीरिया के आतंकी समूहों के कारनामों को देखकर केरल में उनकी जयजयकार होती है, जहाँ से इस्लाम का शांतिपूर्वक आगमन हुआ| आम सवाल ये उठता है कि पिछले दो सौ सालों से ही सभी मुसलमान आतंकी गतिविधियों में क्यों लगे हुए हैं? क्या मोहम्मद के सबक कतई कामयाब नहीं या फिर इस्लाम के अलंबरदारों ने मोहम्मद के नाम पर अपने बनाये हुए कानूनों को थोपना शुरू कर दिया है? या फिर ये सच है कि ऐसे भी छिपे हुए हाथ हैं जिन्होंने आईअ\एसआईएस और दूसरे संगठनों के नाम पर समाज में शांतिभंग करने और निजी हितों के लिए मजहब के नाम पर समाज को टुकड़ों में बाँट देने की कवायद कर रहे हैं? क्या इस्लाम के शांतिपूर्ण तरीके से आने और आक्रामक तरीके से आने और इस देश में काबिज होने के दोनों कथानकों के पीछे नफरत फैलाने वाले कोई अदृश्य हाथ भी हैं? अगर ऐसा है तो उसकी वजह क्या है? क्या वजह है कि हिंदुत्व के कट्टरपंथी अयोध्या के बाबरी मस्जिद के मामले को आज भी जिन्दा किये हुए हैं लेकिन उन्हें सरस्वती मंदिर के बुद्धविहार बना देने की कोई परवाह नहीं? जब वे बाबरी मस्जिद के राम मंदिर होने के दावे कर सकते हैं और मक्का में विष्णुपद मंदिर की बात करते हैं तो वे कोदुन्गल्लुर के मंदिर या मस्जिद को लेकर क्यों खामोश हो जाते हैं? और फिर उनके कालजयी इतिहासकार अपनी सरकार को मंदिर/ मस्जिद की प्रतिकृति उन अरबों को भेंट करने की इजाजत कैसे दिए देते हैं जिनके बारे में सब यही जानते हैं कि वे हमारे मंदिरों और सांस्कृतिक केन्द्रों के लुटेरे रहे?    

इन सवालों के जवाब चाहे कुछ भी हों लेकिन ये एक बात तो और साफ़ होती है कि किसी के निजी हितों के लिए इस देश में इस्लाम को एक औजार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है| हिन्दू मुस्लिम बंटवारा हमेशा से ज्वलंत मुद्दा बना रहा है और आज ये देश की शांति के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो रहा है| इस्लाम के शांतिपूर्ण तरीके से आने और आक्रामक तरीके से आने और इस देश में काबिज होने के दोनों कथानकों झूठे हैं जिन्हें हिंदुस्तान के इतिहास में लगातार रटाया जाता रहा है जिसका अपना मकसद है| जरुरत तो इस बात की है कि लोग विवेकपूर्वक विचार करें और इस झूठ पर सवाल करें|

“तिहास और विरासत का ज्ञान आज के समय और स्थान भर की समझ के लिए बहुत ही जरुरी है| इसी से हमे अपने इर्द गिर्द की समस्याओं और भविष्य के बारे में समझ होती है| प्रुशिया के इलेक्टोर ने अपने उत्तराधिकारी को इस सन्देश में एक गहरी सलाह दी है, “आज घेरे खड़ी समस्याओं के लिए ऐतिहासिक दृष्टिकोण बनाओ| इतिहास के दस्तावेजों के लिए जानकारी के लिए औद्योगिक परामर्श दुरुस्त किये जाएँ, ये सिर्फ राज्य और हुकूमत के संतुलन के लिए नहीं बल्कि आज के समय और कल के भविष्य के बदलाव के लिए जरुरी है| आज की समय और जगह के इतिहास के बारे में संवेदनशील रहो और इतिहास के तनावों और समय की निरंतरता के लिए जागरुक रहिये, वर्तमान और आने वाले कल के बदलाव की ताकतें वह सब बदल सकती हैं जिन्हें इतिहास में बदला न जा सका, इसलिए दुश्मनों को जगाने की बजाए हर एक के लिए  अपनी ऐतिहासिक निरंतरता का ख्याल रखनी जरुरी है|”  

इस प्रक्रिया में बिचौलिया उपकरण बने, रजवाड़े अपनी इलाकाई सीमाओं की हिफाजत न कर सके| जबकि उन्हें उनके लिए इलाकाई मामले सुलझाना और राजा को जवाबदेही तय की गयी थी| यही दृष्टिकोण भारत के राजधर्म से ग्रहण किया गया, जिसमे बिचौलिया उपकरण केन्द्रीय अधिकरण और क्षेत्रीय प्रधान के पूरक बने| 1684 का एक दस्तावेज स्पष्ट करता है कि निर्वाचिका से अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर हिस्से में हो रहे कामों की जानकारी रख सके, इसलिए वह चुने हुए लोगों और अधिकारीयों पर निर्भर होती है| चूँकि वे सभी इन्सान हैं और सामान्य कमजोरियों और लालच के शिकार हो सकते हैं| बिचौलियों की भूमिका इलाकाई राजकाज के हिस्सों को ठीक करे और संतुलन बनाये| ये एक अहम फैसला था जिसे ब्रिटिश ने भ्रष्ट करके आज की ऐतिहासिक अनिद्रा पैदा कर दी, जिसके साथ लेफ्ट, राईट और सेंटर के तमाम बुद्धि विचार जुड़े और बने बिगड़े|

ज्ञान सीखने के माध्यम को नेस्तनाबूद करने के लिए ब्रिटिश ने पूरी पर्शियन और संस्कृत पर पाबन्दी लगा कर देश के सांस्कृतिक और सामाजिक संवाद को निष्प्राण किया और हमारे इतिहास को हिन्दू मुस्लिम दुविधा में उलझाने के लिए हिंदी और उर्दू जबान ईजाद की जिसकी सिरमौर अंग्रेजी हुई| इसी अंग्रेजी से उन्होंने संघर्षों के अपने संस्करण निकाले जिनको ब्रिटिश नियन्त्र वाली प्रेस, पब्लिक एजुकेशन, पब्लिक आर्काइव्ज और पब्लिक डिबेट्स से प्रमाणिक बना दिया|

यह समय है जब हम भारतीयों को जागकर दुनिया को दिए अपने तोहफों को देखना चाहिए| दुनिया को दिया हमारा तोहफा कोई बुद्धिमत्ता नहीं बल्कि खतरनाक मरीचिका में छितरे और भ्रम में पड़े उन लोगों की उम्मीद है, बचे खुचे गुट निरपेक्ष सदस्यों के मरूद्यान से हटकर इतिहास के रेगिस्तान में भयानक मौत मरने से बचने की| आइये हम सच्चे, सटीक, उद्देश्यपूर्ण और कर्तव्यनिष्ठ  इतिहास को पढने का संकल्प लें ताकि हम इस महान पाप से बच सकें|

error: Content is protected !!