भारत में विमुद्रीकरण

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भारत में विमुद्रीकरण

श्री किडाम्बी

सत्ता के घमण्ड की महागाथा या सीधी जालसाजी

सूचना के अधिकार में मिली सच्चाई से हुआ खेल का खुलासा

नोटबंदी का असल मकसद भारत की अदृश्य और काली अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बनाना था| 2016 में हुई भारत की नोटबंदी की पूरी महागाथा लिखते हुए पिछले आलेख में हमने बताया कि यह कवायद महज सरकारी है या असरकारी यानि नोटबंदी-इलाज है या वरदान!  जैसा कि हमने पहले भी संकेत दिया था फ़िलहाल के आंकड़े बताते हैं कि इस कार्यवाही से कालाधन रखने वालों की तादात बढ़ेगी और कालेधन की मात्रा दोगुनी होगी| इससे व्यवस्था में कानून के हिमायती और ईमानदार लोगों की परवरिश करने की बजाए विशेष कृपा पात्र भ्रष्टाचारियों को ही फायदा मिलेगा|

गौरतलब है कि 9 नवम्बर से 31 दिसम्बर के बीच हुई इस प्रक्रिया में नियमित अपडेट देने की बजाए रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया खामोश रहा और उसके बाद कोई जानकारी नहीं दी गई कि कितने नोट वापस आये, यानि नोटों की मात्रा के बारे में कोई अपडेट नहीं किया|

यहाँ तक की देश की संसदीय समिति को भी रिजर्व बैंक ने कोई जानकारी या अपडेट साझा नहीं किये सिर्फ इतना जवाब दिया गया कि गिनती जारी है|

हालाँकि मार्च 2017 में प्रकाशित अपनी सालाना रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ने एक तालिका प्रस्तुत की है जिसमे नोटों के वितरण के आंकड़े दिए गए हैं| इस तालिका के आंकड़ों से जाहिर होता है कि एक हजार रुपये के 89 मिलियन नोटों की वापसी ही नहीं हो सकी जिनकी कुल कीमत 8900 करोड़ होती है| इसी को आधार मान के पिछले वर्ष की के आंकड़ों से तुलना करें तो पता चलता है कि एक हजार रुपये की कीमत के 6325 मिलियन नोट जारी किये गए जिनकी कुल कीमत 632600 थी| इसी तरह मार्च 2017 तक जारी हुए पांच सौ रुपये के 5852 मिलियन नोटों की कुल कीमत 294100 करोड़ हुई|   

*स्रोत: रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट 2016-2017

रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जुलाई 2016 से जून 2017 के बीच नोटबंदी के लिए केन्द्रीय बैंक ने 500 और 1000 रुपये के नोटों की छपाई पर 7965 करोड़ रुपये खर्च किये| ये खर्च हुई भारी भरकम धनराशि पिछले साल खर्च हुए 4321 करोड़ रुपयों से 133% ज्यादा थी|  

इसका नतीजा हुआ कि नोटबंदी के लिए नोट की छपाई और दूसरे प्रावधानों के चलते रिजर्व बैंक का कुल खर्च वर्ष 2016-17 में 31155 करोड़ रुपये हो गया, जबकि वर्ष 2015-2016 की तुलना में ये खर्च 14990 करोड़ रुपये होता था| इन आंकड़ों की गवाह खुद रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट है|

अपनी रिपोर्ट में रिजर्व बैंक बताता है कि वर्ष 2016-2017 में छपे गए कुल नोटों का 3.5 हिस्सा प्रिंटिंग प्रेस में बाकी बचा रहा जबकि पिछले वर्ष बाकी बची रकम का कुल प्रतिशत 17.4 प्रतिशत था|

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले साल 2016-2017 में 29043 मिलियन नोटों की आपूर्ति की गई जो कि विगत वर्ष (2015-2016) में हुई 21195 मिलियन नोटों से की आपूर्ति से 37% ज्यादा थी|

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले साल 2016-2017 में 29043 मिलियन नोटों की आपूर्ति की गई जो कि विगत वर्ष (2015-2016) में हुई 21195 मिलियन नोटों से की आपूर्ति से 37% ज्यादा थी|

डिप्टी जनरल मेनेजर पी. विल्सन ने लिखित तौर पर बताया कि इस वर्ष 2016-2017 पांच सौ रुपये के नए नोटों का विक्रय मूल्य 3090 प्रति हजार जिसके मुताबिक प्रति नोट छपाई का खर्च 3.09 रुपये होता है|

साथ ही रिजर्व बैंक ने यह भी बताया कि 1000 रुपये के मूल्य के नोटों के बारे में गलगली द्वारा मांगी गई सूचना के विषय में उसे कोई जानकारी नहीं|

रिजर्व बैंक मुद्रा नोटों की खरीद भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड से करता है जो कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया के पपूर्ण स्वामित्व की कंपनी है, जिसकी बैंक नोट के सुरक्षा मानकों का स्वदेशी संस्करण निर्धारित करने में अहम भूमिका है|

आरटीआई कार्यकर्ता ने यह सूचना भी मांगी कि नोट छपाई के अनुबंध में कुल कितनी कीमत के नोट छापने को दिए गए, कितनी मात्रा की आपूर्ति हुई और कितनी बाकी है| लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड इसकी सुचना देने से इनकार कर दिया क्योंकि यह सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8(1)(a) के अंतर्गत आती है और विमुक्त है| यह भी अचम्भे की बात है कि रिजर्व बैंक ने आज तक नोटों के बारे में ऐसी किसी जानकारी का खुलासा नहीं किया|

सुभाष चन्द्र अग्रवाल की एक आरटीआई एप्लीकेशन के जवाब में नोटों की छपाई की कीमत के बारे में बताया गया कि भारतीय रिजर्व बैंक के स्वामित्व वाली कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड दस और बीस रुपये के नोटों को सत्तर पैसे और 95 पैसे में अधिकृत एजेंसी को बेचती है| जबकि केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली सिक्यूरिटी प्रिंटिंग एण्ड मिन्टिंग कारपोरेशन ऑफ़ इण्डिया लिमिटेड (SPMCIL) उन्हीं नोटों को इनसे ज्यादा कीमत पर बेचती है जिनका मूल्य 1.22 और 1.216 रुपये होता है|

CURRENCY-PRINT-COST-2016

सुभाष चन्द्र अग्रवाल की आरटीआई के जवाब में बैंक नोट की छपाई के लिए दिया गया आरबीआई का जवाब

 

बैंक नोट (रु.) SPMCIL BRBNMPL
BNP, Dewas CNP, Nashik
1 0.785
10 1.220 0.70
20 1.216 0.95
50 0.864 1.09
100 1.516 1.544 1.43
500 2.970 3.09
1000 3.732 3.54

आरटीआई एप्लीकेशन में यह भी जानकारी मांगी गई कि नोटों की छपाई की कीमत कम करने के लिए क्या कदम उठाये गए हैं| इसके जवाब में SPMCIL ने कहा कि उनके पास ऐसी कोई सूचना नहीं है और याची के इस सवाल के जवाब के लिए करेंसी नोट प्रेस, नासिक और बैंक नोट प्रेस, देवास को भेज दिया| दूसरी तरफ BRBNMPL ने यह कहते हुए सवाल का जवाब देने से मना कर दिया कि “बैंक नोट की छपाई की कीमत की जानकारी नहीं दी जा सकती क्योंकि यह जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8(1)(a) के अंतर्गत जवाब देने से विमुक्त है|

किसी भी नोट की छपाई में लगा खर्च प्रति नोट पेपर, इंक सुरक्षा फीचर इत्यादि की वास्तविक कीमत के मुताबिक है| इसका नोट पर छपे मूल्य से कोई सरोकार नहीं| उदहारण के लिए मान लीजिये कि दो हजार रूपए के नोट की छपाई में 3.59 रुपए लगते हैं| रुपए की अंकित कीमत सकल घरेलू उत्पाद (जो कि किसी कालखण्ड में काली और सफ़ेद अर्थव्यवस्थाओं और अर्थव्यवस्था में सफ़ेद और कालेधन को मिलाकर तय होता है) से आंकी जाती है किसी भी देश में मुद्रा जारी करने की वजह सकल घरेलू उत्पाद ही होता है|    

भारत में चल रहे विभिन्न नोटों की छपाई का खर्च नीचे दी गयी तालिका में जाहिर होता है:

तालिका 1 नोटों की छपाई का खर्च
नोट का मूल्य छपाई का खर्च  वितरण में नोट का अंकित मूल्य
1 1.14 1
5 0.48 5
10 0.96 10
20 1.5 20
50 1.81 50
100 1.79 100
500 2.5 Old 500
1000 3.17 Old 1000
500 3.09 New 500
2000 3.54 New 2000

16 मार्च 2017 के इण्डिया टुडे के मुताबिक:

सरकार ने बुधवार को खुलासा किया कि पांच सौ के नए नोटों की छपाई का खर्च 2.87 रुपये से 3.09 रुपये और दो हजार रुपये के नए नोटों की छपाई का खर्च 3.54 रुपये से 3.77 रुपये के बीच है| ये आंकड़े वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्य सभा के बजट सत्र के दौरान एक सवाल के लिखित जवाब में जारी किये|

  • आठ नवम्बर से एक दिन पहले वैधानिक रूप से बंद किये गए पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों की कीमत 15.44 लाख करोड़ थी|
  • 24 फरवरी 2017 को देश में जारी कुल मुद्रा का मूल्य 11.64 करोड़ था|
  • नोटबंदी के बाद 10 दिसंबर 2016 तक पांच सौ और हजार रुपये के प्रचलित नोटों में से रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया को कुल 12.44 लाख करोड़ वापस मिले|

अगर हम कालेधन की निरस्त की गई कुल मुद्रा के बारे में जारी किये गए आंकड़ों पर गौर करें तो उनके किये गए और कहे गए आंकड़ों में को मिलान नहीं दिखता है| पूर्व वित्तमंत्री ने भी इन अनियमितताओं को अपने तरीके से मजाक तो बनाया लेकिन हम पाठकों के लिए अगली पंक्तियों में इस विडम्बनापूर्ण स्थिति का बयान कर रहे हैं जिनसे जाहिर होता है कि यह कितनी बड़ी जालसाजी थी|

नोटबंदी के असर के बारे में रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया द्वारा जारी किये गए एक प्रकाशन में मिलता है कि नोटबंदी में कुल 154400 करोड़ (पंद्रह लाख चौव्वालिस हजार करोड़) मूल्य के नोट (ये आंकड़ा नोटों की गिनती नहीं बल्कि कीमत कीमत का है) निरस्त किये गए और 16000 करोड़ व्यवस्था में वापस नहीं पहुंचे|

रिजर्व बैंक की मुद्रा के अंकित मूल्य और 1000 रुपये के नए छपे नोटों की बात करते है| 6,32,60,00,000 कीमत के एक हजार रुपये के 632.6 करोड़ नोटों में लगभग 8.9 करोड़ नोट (जिनका अंकित मूल्य 89,00,00,00,000 रुपये) बैंकिंग व्यवस्था में वापस लौटे ही नहीं| जाहिर है कि ये बैंकिंग व्यवस्था के बाहर चलन में जारी रहे या संस्थाओं को दान कर दिए गए|

अगर हम रिजर्व बैंक के ऊपर दी गई दोनों तालिकाओं को मिलाकर देखें तो तमाम सवाल खड़े होते हैं| हमे उन सवालों का जवाब तलाश करना है|

रिजर्व बैंक ने अपने बयान में बताया कि वे भारत की 15.44 लाख करोड़ कीमत की अंकित मुद्रा निरस्त कर रहे हैं, इसमें से जारी किये गए 1000 रुपये के नोटों की कुल संख्या 632.6 करोड़ है जिनकी कीमत 6,32,60,00,000 करोड़ है, बाकी निरस्त की गई मुद्रा का अंकित मूल्य पांच सौ रुपये है, यानि बाकी नोट 500 के हुए| इसका अर्थ ये हुआ कि 500 रुपये के नोटों का अंकित मूल्य लगभग 911400 लाख करोड़ हुआ जिसमे 1822 करोड़ रुपये के नोट निरस्त हुए|  

रिजर्व बैंक के मुताबिक 16000 करोड़ रूपये की निरस्त मुद्रा बैंकिंग व्यवस्था में वापस नहीं लौट सकी, ये आंकड़ा कुल मूल्य का लगभग 1% है| लेकिन एक दूसरे बयान में रिजर्व बैंक बताता है कि 1000 रुपये के 8.9 करोड़ नोट वापस नहीं लौटे इसका अर्थ ये हुआ कि 1000 रुपये के अंकित मूल्य के जो नोट व्यवस्था में वापस नहीं लौटे उनकी कीमत 89,00,00,0000 करोड़ होती है| 64,40,00,00,000 मूल्य की जो बाकी मुद्रा वापस नहीं मिल सकी वो 500 रुपये के कीमत के नोटों में थी| रिजर्व बैंक के बयानों में सामान्य अंकगणित अभी तक नदारद है|

रिजर्व बैंक की स्वीकारोक्ति में दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य पिछले तीन साल के गंदे नोटों से जुड़ा है| रिजर्व बैंक के मुताबिक 500 और 1000 मूल्य की 341000 करोड़ मूल्य की भारी भरकम राशि के गंदे नोटों में निरस्त की गई (गंदे नोटों पर रिजर्व बैंक की रिपोर्ट तालिका में देखें)| सवाल है कि ये नोट गए कहाँ| क्या इन नोटों को नष्ट करके बदला गया? या फिर ये सत्तासीन पोलिटिकल पार्टियों के बीच जारी कर किये गए? क्या यह राशि हमारे प्रधानमंत्री द्वारा अर्थव्यवस्था के लिए बताये गए कालेधन में शामिल है? पहले के गंदे नोटों का क्या हुआ?

अगर हम उदारीकरण के बाद के पच्चीस वर्षों में रिजर्व बैंक के आकलन देखें तो एक अचम्भा मिलता है| अचम्भा ये है कि अगर गंदे नोटों को नष्ट करके दोबारा से जारी न किया जाए तो बारह वर्षों में हमारी व्यवस्था में मौजूद गंदे नोटों की कीमत जारी की गई कुल मुद्रा के बराबर हो जाती है| इस तरह हमने पिछले पच्चीस सालों में हमने पिछले साल नवम्बर में निरस्त किये गए नोटों से दोगुनी कीमत के नोटों को अपनी अर्थव्यवस्था में खपाया है, जिससे लगभग 30 लाख करोड़ कीमत का कालाधन बना| क्या यही वजह है कि रिजर्व बैंक 500 और 2000 के नए नोटों के लिए 21000 करोड़ रुपये खर्च करता है जबकि इसकी इन नोटों की छपाई की असल कीमत एक चौथाई होनी चाहिए, जैसा कि तालिका में जाहिर है|

रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया और उनके वित्तीय सलाहकारों ने जो अंकगणित लगाईं है वह दसवीं दर्जे के उन विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट जैसा काम है जो कभी कभी दूसरे बच्चों की कॉपी से नक़ल करके पूरा करते हैं| हमारे प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में दो प्रतिशत की गिरावट की भविष्यवाणी की, यह अंकगणित उनके उस बयान के माफिक है| बड़ा सवाल ये है कि रिजर्व बैंक का ये आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद की गणनाओं के बाद आया या उसके पहले ही तैयार हो चुका था!   

 

तालिका क्रमांक.2  निरस्त किये गए नोटों का मूल्य
नोट जो जारी किये गए जो निरस्त किये गए
V U R = UV
1000 6326000000 6326000000000
500 18228000000 9114000000000
निरस्त की गयी मूद्रा का कुल मूल्य 15440000000000

ऊपर दी गई सूचनाओं के विश्लेषण के लिए दूसरे पहलुओं में आगे जाने के पहले एक बात गौर करनी होगी| वो अहम बात ये है कि रिजर्व बैंक 15.44 करोड़ की निरस्त मुद्रा को जल्द से जल्द बदलना चाहती है ताकि बेचारे गरीब भारतीय अपने पैसे को निकालने के लिए लाइनों में लग के न मरें| वे कहते हैं कि ऐसा करने में छः महीने लगेंगे|  

तालिका क्रमांक 3.  निरस्त की गई मुद्रा की कीमत और बदले गए नोटों की संख्या
छापी गयी मुद्रा नोट छपाई की दर कुल छपे नोटों की संख्या छपाई की कुल कीमत छपी मुद्रा का कुल मूल्य
500 3.09 18228000000 56324520000 9114000000000
2000 3.54 3163000000 11197020000 6326000000000
छपाई और नोट बदलने की कुल कीमत 67521540000 15440000000000

 

तालिका क्रमांक 4. आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक नोट छपाई और उसका मूल्य
छापी मुद्रा नोट छपाई की दर नोट छपाई का खर्च छपी मुद्रा की संख्या कुल सृजित मुद्रा
रुपये में डॉलर्स में
v r R u = R/r RV = u x v 1$ = Rs 60
500 3.09 105,000,000,000 33,980,582,524 16,990,291,262,136 283,171,521,036
2000 3.59 105,000,000,000 29,247,910,864 58,495,821,727,020 974,930,362,117
Grand Total of New Currency Printed 210,000,000,000 63,228,493,388 75,486,112,989,155 1,258,101,883,153

 

Table No. 5.Cancelled Notes versus Replaced Notes Number and Value
Replacement Value 9114000000000 6326000000000 15440000000000
Supposed Replacement Cost of Printing 56324520000 11197020000 67521540000
Unit Cost 3.09 3.54 Actual Cost of PrintingPrinting as per RBI Data 105,000,000,000 105,000,000,000 210,000,000,000
Units to Print 18228000000 3163000000 Value Printed 16990291262136 59322033898305 76312325160441
Supposed to be Replaced With 500 2000 Units Printed 33980582524 29661016949
Value 9114000000000 6326000000000 15440000000000 Units cost to print 3.09 3.54
Number 18228000000 6326000000 ACTUAL COST OF PRINTING AND ACTUAL UNITS PRINTED
Cancelled 500 1000 Denomination 500 2000 Grand Total of Replace Value

ऊपर दी गई पहली तालिका में नोटों की छपाई की कीमत दी गई है| आरबीआई द्वारा दिए गए आंकड़ों से   

1000 रुपये और 500 रुपये के निरस्त नोटों के बारे में जानकारी मिलती है| इन आंकड़ों से यह आकलन करना आसानी से किया जा सकता है कि नोट बदलने की कवायद में छपाई की क्या कीमत चुकाई गयी| पांच सौ रुपये के निरस्त नोटों को बदलकर नए पांच सौ के नए नोट चलाये गए, संख्या में कोई फेरबदल नहीं| लेकिन अगर एक हजार रुपये के निरस्त नोटों की जगह दो हजार रुपये के नोट प्रयोग होते हैं तो नोटों की संख्या पहले चल रहे 1000 रुपये के नोटों की आधी होगी, यानि की रिजर्व बैंक को आधे नोट ही छपने होंगे| तालिका क्रमांक दो निरस्त किये नोटों का मूल्य और नोटों की संख्या के बारे में ब्यौरा मौजूद है| तालिका क्रमांक तीन रिजर्व बैंक के निरस्त नोटों को बदलने की अनुमानित वास्तविक कीमत के बारे में बताती है| तालिका क्रमांक चार में “रिजर्व बैंक द्वारा छपाई के लिए दी गई कीमत” और नोटों के अंकित मूल्य को बताती है| तालिका क्रमांक पांच में निरस्त किये गए नोटों के बारे में रिजर्व बैंक के बयान और बदलने के लिए छापे गए नोटों के बारे में रिजर्व बैंक के बयान का फर्क जाहिर होता है|

ऊपर दिए गए आंकड़ों से जाहिर है कि आरबीआई द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक नोटों की छपाई पर 21000 करोड़ रुपये खर्च किये गए, इसके लिए पूर्व वित्त मंत्री ने संकेत भी दिया कि आरबीआई ने निरस्त किये गए नोटों से पांच गुना ज्यादा नोट छापे| अगर ये नोट तब के लिए बचा के रखे गए हों जब जरुरत होगी तो वितरण होगा तो भी यह अचम्भे की बात है| अगर हमारे अधिकारी लोग ऐसा नहीं सोचते कि भारतीय राजनीति की सच्चाई को नहीं जानते या इसे संभाल नहीं सकते तो यही अकेला ऐसा तथ्य है कि जिसके लिए जितना हो सके भारत के लोगों को जवाब देना चाहिए|

पहला सवाल है कि क्या इस प्रक्रिया की कोई निगरानी नहीं हुई कि आरबीआई कितने नोट निरस्त कर रहा है और कितने बदल रहा है? इससे भी ज्यादा आधारभूत सवाल ये है कि क्या आरबीआई को पता है कि कितने बड़े नोट छपे? क्या ऐसा कोई आंकड़ा है कि गंदे नोटो में कितनी मुद्रा वापस मिली जिनको बदलकर या बिना बदले मुक्त किया गया? क्या गंदे नोटों दोबारा वितरण में चलाया गया? क्या सभी पोलिटिकल पार्टियों के पास जमा गंदे नोटों को बदलने के लिए आरबीआई ने निरस्त की गई मुद्रा से पांच गुना ज्यादा नोट छापे? अगर रिजर्व बैंक को पता था कि अर्थव्यवस्था में जनता के पास मौजूद नोटों से पांच गुना ज्यादा मुद्रा मौजूद है तो क्या ऐसी मुद्रा का काली और सफ़ेद अर्थव्यवस्था के प्रभावों का कोई आकलन किया गया? क्या यही वजह है कि जब लोग महज चार हजार रुपये निकलने के लिए लाइन में लग के मर रहे थे तब उन्होंने सबसे पहले छपाई करके कालेधन से बदलने का काम किया?

क्या यही वजह है कि पूरे देश में मनी एक्सचेंजर्स ने कालेधन को चालीस प्रतिशत पर ख़रीदा? क्या इस कालेधन को बड़े नोटों में बदलकर उसी पैसे से डॉलर, पौंड और सोना ख़रीदा गया? क्या यही वजह है कि कालेधन को रोकने के नाम पर पहले बड़े नोट बंद किये गए और फिर उससे ज्यादा मूल्य के नोटों को जारी किया गया? शायद इसी कारनामे के बारे में पूर्व वित्तमंत्री ने ट्वीट किया कि कालेधन से बचने के नाम पर की जा रही इस कवायद का असल मकसद नए नोटों में ज्यादा कालाधन बना कर टैक्स हेवन देशों में पहुँचाना है?  

 

आरबीआई में आये कुल गंदे नोटों का मूल्य
2014-15 2015-16 2016-17
संख्या कीमत कीमत कीमत कीमत
अंकित मूल्य मिलियन में बिलियन में संख्या बिलियन में संख्या बिलियन में बिलियन में
1000 663 663000 625 625000 1514 1514000 2802000
500 2847 1423500 2800 1400000 3506 1753000 4576500
100 5173 517300 5169 516900 2586 258600 1292800
50 1271 63550 1349 67450 778 38900 169900
20 801 16020 849 16980 546 10920 43920
10 4388 43880 5530 55300 3540 35400 134580
TOTAL 2727250 2681630 3610820 9019700

स्रोत: आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17

चार्ट को देखकर कुछ बिन्दुओं पर गंभीर सवाल उठते हैं जिनके बारे में शीर्षस्थ बिजनेस स्कूलों या समाज के फिक्रमंदों को करोड़ों रुपये की पगार ले रहे आर्थिक सलाहकारों से अथवा ब्रेकिंग न्यूज़ बेचने वाली मिथ्याचारी मीडिया से  जरुर करना चाहिए|

  1. क्या ऐसा कोई अचम्भा हुआ जिससे आरबीआई को तीन साल में नब्बे लाख करोड़ रूपये मिल गए?
  2. वर्तमान नोटबंदी के दौरान निरस्त की गयी मुद्रा की कीमत 15.44 लाख करोड़ है, जिसमे से 6 लाख करोड़ नोट आरबीआई को वर्ष 2016-17 में वापस मिले|
  3. आरबीआई में निपटारे के लिए आई मुद्रा का अर्थ तो यही है कि कटे-फफटे नोटों के रूप में मिली ये मुद्रा आम जनता के लिए तो नहीं होती|
  4. अगर इतनी बड़ी मात्रा में मुद्रा का निपटारा हो जाता तो न तो जनता में हड़बड़ी होती और न ही लम्बी-लम्बी क़तारें|
  5. जब 1000 और 500 रुपये के नोटों को निरस्त किया गया तो अर्थव्यवस्था 2% कमजोर हुई लेकिन जब दोगुने नोटों को इकठ्ठा किया गया तो अर्थव्यवस्था में कोई गिरावट नहीं|
  6. यह भी अचम्भे की बात है कि निरस्त हुए 1000 और 500 रुपये के नोटों की छपाई में छः महीने लगातार नोट छपाई हुई लेकिन गन्दे नोटों के बारे यह मान लिया जाता है कि आरबीआई ने इन नोटों को जनता के विरोध के बगैर तत्काल बदल दिया |  
  7. सबसे ज्यादा चिंतनीय सवाल ये है कि इन गंदे या ख़राब हुए नोटों के लिए पिछले साल इकठ्ठा किये गए नोटों के लिए कोई प्रिंटिंग कीमत शामिल नहीं!
  8. आरबीआई ये जरुर कह सकता है कि गंदे नोटों को एक बार में जारी करने के लिए उन्होंने तीन साल इंतजार किया| यहाँ हम देखते हैं कि 500 रुपये और 2000 रुपये के नोटों की प्रिंटिंग का वर्तमान मूल्य रिजर्व बैंक के अनुमानित कीमत का चार गुना है| ये कीमत निरस्त नोटों की छपाई के लिए आवश्यक कीमत 21000 करोड़ भी नाकाफी है| ऐसे में आरबीआई के इस दावे का क्या अर्थ रह जाता है कि उन्होंने अलग अलग मूल्य के गंदे और कटे-फटे नोटों के बदले में सिर्फ 500 और 2000 रुपये के नोटों की छपाई की है|
  9. ये भी क्या खूब बात है कि पर्यावरण की जिम्मेदारी वहन करते हुए 15 लाख करोड़ के लिए कुछ पेड़ों के बदले आरबीआई ने 63 लाख करोड़ की 500 रुपये और 2000 रुपये के नोट प्रिंट कराये जिसका खर्च 21000 करोड़ बताया गया| अगर आरबीआई महज निरस्त नोटों को बदलना भी चाहे तो निरस्त नोटों को बदलने की कीमत 6752 हजार करोड़ होती (तालिका 3, 4 और 5 देखें)|
  10. सवाल उठता है कि 500 रुपये और 2000 रुपये के नए नोट कहाँ गए? क्या ये नोट उन कालेधन वालों के पास गए जिन्होंने 30% से 40% पर कालेधन को एक्सचेंज किया?
  11. क्या वे कटे फटे और गंदे नोट सच में गंदे नोट भर थे या फिर ये कालाधन था जिसे बदलने और ठिकाने लगाने के लिए गंदे नोटों का नाम दिया गया?
  12. अगर इतने नोट पिछले तीन सालों में आये तो फिर उदारीकरण के बाद से अब तक के गंदे नोटों का कुल मूल्य कितना हुआ? क्या पिछली सरकारों ने इन्हें दोबारा जारी किया? या फिर इसे पूर्व वित्त मंत्री के बयान के मुताबिक कालेधन को सफ़ेद करना ही माना जाये?
  13. गंदे नोटों के बारे पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की कर्णाटक के प्रमुख धार्मिक नेता से भिडंत हुई, उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में गंदे नोटों के कारोबार में सत्ताधारी राजनीतिक दलों का हाथ है, जिसको वर्तमान सरकार ने फ़िलहाल की नोटबंदी में विधिमान्य बना दिया दिया है?
  14. क्या यही वजह है कि किसी भी रंग के राजनैतिक दल, किसी अर्थशास्त्री या वित्तीय विशेषज्ञ ने फ़िलहाल की नोटबंदी पर मूलभूत सवाल भी नहीं उठाये?
  15. क्या यही वजह है जिसके चलते ज्यादातर जोशीले नेता, चार्टर्ड एकाउंटेंट और अर्थशात्री इस मामले में खामोश हैं क्योंकि कुछ भी हो ये उनके और वित्तपोषित राजनीतिक दलों के भविष्य का सवाल है?    

 

Bibliography

http://www.printweek.in/news/133-jump-cost-printing-currency-notes-26261

http://www.thehindubusinessline.com/money-and-banking/currency-printing-cost-more-than-doubles-to-₹-7965-crore/article9837136.ece

http://www.thehindubusinessline.com/money-and-banking/printing-cost-3-for-500-note-35-for-2000/article9496339.ece

http://indiatoday.intoday.in/story/demonetisation-new-currency-notes-printing-cost-note-ban/1/905114.html

https://www.indiatimes.com/news/india/ever-wondered-how-much-it-costs-to-print-a-₹-500-and-₹-2000-note-here-s-your-answer-269945.html

https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/AnnualReport/PDFs/RBIAR201617_FE1DA2F97D61249B1B21C4EA66250841F.PDF

 

 

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