वर्तमान मुद्दों

भारत और इजराइल के बीच तोहफों की अदला बदली का स्वर्णिम युग और सम्राट ललितादित्य के खोये शहर महोदय्पुरम का रहस्य

This post is also available in: English

भारत और इजराइल के बीच तोहफों की अदला बदली का स्वर्णिम युग और सम्राट ललितादित्य के खोये शहर महोदय्पुरम का रहस्य

img

-शालिनी & श्री किडाम्बि

एक तरफ तारीखों की ऐतिहासिक हेर-फेर और दूसरा ईस्ट इण्डिया कंपनियों की यादगार

भारतमाता जन्नत में बनी इजराइल की दुल्हन, भारत के सांस्कृतिक इतिहास की एक यादगार

समाज के सभी हिस्सों के मनोवैज्ञानिक उपचार और मानसिक व्यथा के इलाज की शुरुआत 

परिचय

साल भर से कुछ समय पहले भारत और जर्मनी, और आश्चर्यजनक रूप से भारत और सऊदी के बीच एक जोड़ी तोहफों का आदान प्रदान हुआ, हमने इजराइल के साथ भी कुछ तोहफों की अदला बदली की| इजराइल ने जो तोहफा स्वीकार किया और जो तोहफा भारत को दिया, उनमे इतिहास में, दुनिया के मामलों में हमारी भूमिका समझने के लिए गहरे निहितार्थ हैं, साथ ही भविष्य की दुनिया में सबके शांतिपूर्ण समाधान के लिए हमारी भूमिका भी साफ़ होती है| लेकिन देश और काल को समझने में अपनी हैसियत समझने में हम अक्सर गलतियाँ करते है, वही गलतियाँ जो हमने एक देश और संस्कृति की अपनी समझदारी खो जाने और जाग्रत बौद्धिक प्रक्रिया में सदाबहार गुलामी के चलते पिछले डेढ़ सौ सालों में की हैं|

दो तोहफों के बारे में कुछ विचारणीय बिंदु:

5 जुलाई 2017 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इजराइल के दौरे पर थे, वहां उन्होंने और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने कुछ तोहफों का आदान-प्रदान किया| भारत ने तोहफे के तौर पर नेतान्याहू को एक ताज एक तलवार और मूसा संहिता भेंट की| केरल के इस स्मृतिचिह्न को भारत में यहूदियों के लम्बे इतिहास की कलाकृति माना जाता है, बदले में नेतान्याहू ने मोदी को भारतीय सैनिकों की एक तस्वीर के साथ साथ ओल्गा बीच पर खड़े दोनों नेताओं की तस्वीर का तोहफा दिया| इसी के साथ दोनों देशों के संबंधों को “स्वर्ग में रचे स्वयंवर” जैसा करार दिया|

    img

  1. ताम्र पत्रों का पहला जोड़ा जो भारत ने इजराइल को दिया वह कोचीन के यहूदियों की एक खूबसूरत निशानी है| इसे पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रहने वाले विशेषाधिकारों का शाही अनुदान माना जाता है जिसे हिन्दू राजा चेरमण पेरुमाल (जिन्हें अक्सर भास्कर रवि वर्मा के रूप में पहचाना जाता रहा है) ने यहूदी नेता जोसफ रब्बान को महोदय्पुरम/कोदुन्गल्लुर में दिया|
  2. फेर्नान्देज़ कोदुन्गल्लुर को जेरूसलम जैसी जगह मानता है| स्थानीय यहूदी किसी समय में हर ताबूत में शिंगली/क्रेन्गानोर/कोदुन्गल्लुर की मिट्टी डालते थे इस जगह को दूसरे जेरूसलम के तौर पर याद किया जाता है|
  3. परंपरागत यहूदी दस्तावेजों के मुताबिक बाद में जोसफ रब्बान को शिंगली का युवराज घोषित किया गया या जगह या तो क्रेन्गानोर में है अथवा इसके बराबर अहमियत रखती है| एक दूसरे दस्तावेज में यहूदी नेता जोसफ रब्बान को मत्तानचेरी के अधिकार देने का शाही फरमान मिलता है| काना के थॉमस को भी चौथी शताब्दी में इसी तरह के विशेधिकार मिलने की भी रिपोर्ट मौजूद है|
  4. दोनों समूहों (रब्बान और थॉमस काना की परंपराओं) के लोकगीतों में मिलता है कि 1524 में जब कोदुन्गल्लुर को जलाया जा रहा था तो तीन राजा बहादुरी से लड़े, ये तीन राजा थे चेरमण पेरुमाल, जोसफ रब्बान और काना के थॉमस अपना शहर बचाने के लिए बहादुरी से लड़े|
  5. एक दूसरी किवदंती में कहा जाता है कि केरल के यहूदी जोसफ रब्बान ने अपने समूह की ओर से वह ताम्र पत्र स्वीकार किया जिसमे हिन्दू राजा भास्कर रवि वर्मा ने यहूदियों को विशेषाधिकार दिए, इतना ही नहीं 1000 ईस्वी में राजा ने यहूदी सभाघर बनाने के लिए लकड़ियाँ भी दीं|
  6. इन पट्टियों में जो तारीख खुदी है वो क्रिस्चियन एरा के वर्ष 379 की है लेकिन वर्ष 1925 में इसे 1069 क्रिस्चियन एरा कर दिया गया| भारतीय राजाओं ने यहूदी नेता जोसफ रब्बान को कोचीन के यहूदियों का युवराज बनाया साथ ही क्रेन्गानोर के निकट अन्जुवनम के शासन और राजस्व संग्रह की इजाजत भी दी, इसी के साथ बहत्तर फ्री हाउस बनाने के अधिकार भी दिए|
  7. इसका भी जिक्र है कि वल्लुवानाद के राज्यपाल रायिरण चाथन यहूदियों के इस ताम्र पत्र के गवाह रहे| जोसफ रब्बान को ये ताम्र पत्र क्रिस्चियन एरा 1000 ईस्वी में (जो कि 1069 के खिलाफ है) महोदय्पुरम के चेर (कुलशेखर) राजा भास्कर रवि वर्मा प्रथम ने दिए| विलियम लोगान (1841-1914) जो कि ब्रिटिश सरकार में मद्रास सिविल सर्विस का एक स्कॉटिश अफसर था (नियुक्ति के पहले वह मालाबार का कलेक्टर हुआ, उसने मजिस्ट्रेट और जज के तौर पर उस क्षेत्र बाईस साल काम किया| वह मलयालम, तमिल और तेलुगु का जानकार था| उसे मालाबार जिले के बारे में लिखी उसकी पुस्तक के बारे में जाना जाता है जिसे मालाबार मैन्युअल कहते हैं|) उसका कहना है कि वेल्लात्तिरी सीधे चेर राजाओं के सीधे नियंत्रण में नहीं था, लेकिन वहां औरों से आज़ादी और अधिकार बहाल थे|
  8. ऐसा माना जाता है कि ताम्र पत्रों का दूसरा जोड़ा यहूदियों के भारत से व्यापार का पहला दस्तावेज है|
  9. इन प्लेटों में भूमि और कराधान के अधिकार दिए जाने का उल्लेख मिलता, एक हिन्दू शासक ने कोल्लम से पश्चिमी एशियाई और भारतीय व्यापारिक समूहों के साथ व्यापार की देख रेख का जिम्मा एक चर्च को दिया|
  10. इन प्लेटों में पश्चिमी एशियाई व्यापारिक संगठनों के हस्ताक्षर मौजूद हैं जिनमे मुस्लिम, क्रिस्चियन, ज़ोरोस्त्रियन के साथ साथ यहूदियों का भी एक समूह है जिन्होंने जुडो-पर्शियन और संभव है कि अरबी और पहलवी (मिडिल पर्शियन) भाषाओँ में भी दस्तखत किये| मालूम होता है कि इन प्लेटों में दस्तखत की जो लिपि है उसकी जानकारी स्थानीय कारीगरों को नहीं थी इससे वह प्लेट क्षतिग्रस्त मालूम पड़ती है|
  11. कोचीन में मिले ये स्मृति चिह्न जो मत्तान्चेरी, कोच्चि के यहूदी सभाघर में हैं, इनकी एक प्रतिकृति पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने उस समय भारत आने वाले इजराइल के पहले प्रधानमंत्री एरिएल शेरोन को भेंट की थी| वह तोहफा सोलहवीं शताब्दी के एक ताम्र पत्र की हूबहू नक़ल थी जिसमे कोचीन के तत्कालीन राजा ने यहूदियोंके लिए कर मुक्त भूमि के अनुदान की राजाज्ञा खुदी है| इस तरह इस बार फिर उसी तरह का दूसरा इजरायली नेता को दिया जा रहा है|
  12. कोचीन के यहूदी सभाघर में मौजूद सैकड़ों साल पुरानी मूसा संहिता उपरोक्त मामले को मजबूत करती है|
  13. इजराइल से मिले तोहफे में उन भारतीय सैनिकों की एक तस्वीर है जिन्होंने ब्रिटिश सेना नेतृत्व करके जेरूसलम को मुक्त कराया (दिसंबर 11, 2017)|

जो तोहफे हिंदुस्तान ने इजराइल को दिए:

इजराइल के साथ मजबूत संबंधों के प्रतीक के तौर पर मोदी ने नेतान्याहू को दो तोहफे भेंट किये केरल से मिले ताम्र पत्र और मूसा संहिता भारत में यहूदियों के इतिहास में इन दोनों की खास अहमियत है इसी के साथ एक ताज और तलवार भी भेंट की गयी| केरल में कोचीन के यहूदी इन इन स्मृति चिह्नों से भलीभांति परिचित हैं|

भारत से सऊदी अरब और भारत से इजराइल को दिए गए तोहफों के बीच एक सर्वमान्य कड़ी चेरमण पेरुमाल की है| चेरमण पेरुमाल को अब पक्के तौर पर केरल के चेर-केर-सूर-सूर्या-क्षीर-राजा भास्कर रवि वर्मा के तौर पर पहचाना जा चुका है| इसी के साथ कश्मीर जहाँ से सूर्य सम्राट लातितादित्य के शासनकाल में सभ्यता और संस्कृति का प्रसार साइबेरिया से दक्षिणी अमेरिका और आर्कटिक से अन्टार्क्टिका तक हुआ| सम्राट ललितादित्य ने पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर सौर और चन्द्र वेधशालाएं बनवाने के साथ साथ सौर चन्द्र और अग्नि की उपासना का विधान स्थापित किया| इन विधानों में वैदिक अर्हताएं सम्मिलित थीं जिसके अनुसार अंड (सूक्ष्म) पिण्ड (जातियों) और ब्रह्माण्ड (सौर मण्डल) सोम (चन्द्र) अग्नि (उर्जा) और सूर्यखण्डों में विभाजित होते हैं| इस विधान को प्रसारित करने के लिए समकालीन आचार्य शंकर ने संक्षेप में एक सार्वभौमिक पंचायत्न तंत्र की रचना की|

जिस तरह घालमेल के इतिहास की परंपरा में भास्कर रवि वर्मा का कालक्रम 329 ईस्वी से बदलकर 1069 किया उसी तरह ललितादित्य और शंकर के ऐतिहासिक कालक्रम को आगे बढ़ाकर 700 ईस्वी कर दिया गया| ये काम तो ब्रिटिश और भारतीय इतिहासकारों ने किया साथ ही उनके प्रायोजित संस्थानों की मदद से शंकर को शिव की उपासना भर में समेट दिया|

भले ही सम्राट ललितादित्य का कालक्रम घालमेल करके 700 ईस्वी कर दिया गया हो लेकिन वास्तविक अर्थों में उनका समय ईसापूर्व से लगभग 6000 से 7000 वर्षों का है| आज इस समय को सभी इतिहास अध्येता “द डौन ऑफ़ सड्डेन सिविलाइज़ेशन” अथवा ”एलियन क्रिएटेड सिविलाइज़ेशन” कहते हैं जो कि आइस एज के तुरंत बाद लगभग 10000 ईसा पूर्व उपस्थित थी|

इसी तरह एक अनोखे तरीके से भास्कर रवि वर्मा का कालक्रम अथवा शासनकाल 379 ईस्वी से बढाकर 1069 ईस्वी कर दिया गया| यह हुआ 1925 ईस्वी में जिसके तहत “घालमेल के इतिहास की एक स्थापित परंपरा के मुताबिक भारत का शाश्वत इतिहास समेट कर 2000 सालों की समय सीमा में बाँध दिया गया”| इस कर्मकाण्ड में जो उस समय के इतिहासकार शरीक थे वे या तो ब्रिटिश थे या तो उनके रट्टू तोते भारतीय जिनके कर्मों के बहुत गहरे निहितार्थ सामने आये|

यहूदियों के ताम्रपत्र

भारत से गये पहले तोहफे में ताम्र पत्रों के जोड़े थे जो श्री परकरण इरवी वनमार ( जिन्हें भास्कर रवि वर्मा के तौर पर पहचाना जाता है) ने यहूदी व्यापारी जोसफ रब्बान को दिए| जोसफ रब्बान का कारोबार क्षीर-सूर्य-सूर-केर—चेर राजाओं के साथ था| राजा ने जोसफ रब्बान को सूरज और चाँद के रहने तक के लिए बहत्तर विशेषाधिकार दिए| इस विशेषाधिकार का क्षेत्र राजधानी महोदय्पुरम अथवा कोदुन्गल्लुर का क्षेत्र रहा जिसे केरल या तमिलनाडु में बताया जाता है जिसका अब नामोनिशान तक मौजूद नहीं है| स्थानीय ऐतिहासिक जानकारी के मुताबिक सिर्फ भास्कर रवि वर्मा को चेरमण कहा जाता है| लेकिन बाद के इतिहासकारों ने राजा के नाम के साथ इस उपाधि को हटा दिया| उपाधि हटा कर हमें यह बताया गया कि यह चेर राजाओं की औपचारिक उपाधि है| यह उपाधि उन राजाओं अथवा उनके भतीजों या दक्षिण भारत के किसी महान राजा के नाम के साथ जुड़ी है| दक्षिण में सम्राट ललितादित्य द्वारा नियुक्त राजाओं का राज्य क्षेत्र हिमालय से कन्याकुमारी तक होता था| लेकिन इतिहासकारों के इस कृत्य से सम्राट ललितादित्य के विशाल साम्राज्य में नियुक्त किये गए चेर अथवा क्षीर राजाओं का राज्य दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सिमट गया| यह आज के ब्रिटिश विभाजित भारत की तस्वीर है|

जैसा कि हमने पहले के एक आलेख में बताया है कि चेरमण पेरुमाल नाम की उपाधि किसी दूसरे राजा को दे दी| उस राजा को उपाधि देकर ऐसे कालखंड में प्रतिष्ठित किया गया जो कि दो अलग अलग कालखण्डों का औसत होता है| इतिहास में राजा भास्कर रवि वर्मा के दो कालखण्ड मिलते हैं पहला 329 ईस्वी और दूसरा 1069 इसवी इसका औसत है 625 यही वो कालखण्ड है जब राजा के दिए हुए विशेषाधिकार का उल्लेख मिलता है| गौरतलब है कि क्षीर-शूर-सूर्य-केर-चेर राजाओं ने अरब यात्रियों/व्यापारियों/अध्यात्म गुरुओं को सारे राजधानी क्षेत्र महोदय्पुरम में बसने के लिए विशेषाधिकार दिए, इसी के तहत कुलदेवी अर्थली का मंदिर भी उनके सुपुर्द किया गया| खास बात ये है कि ये विशेषाधिकार अनंतकाल तक सूरज चाँद रहने तक के लिए माने जाते हैं|

625 ईस्वी वाले इस चेरमण पेरुमाल के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि उसने इस्लाम कबूल किया, साथ ही वह राजा मक्का जाकर कभी न लौटने वाला पहला भारतीय बना, आजकल कभी न लौटने वाले लोगों को एनआरआई भी कहा जाता है| आज भी विदेश जाकर वापस न लौटने की यह परंपरा न केवल केरल बल्कि पूरे भारतवर्ष में चल रही है| 625 ईस्वी के बाद बहुत लम्बे समय तक माना जाता रहा कि चेरमण पेरुमाल अपने राज्य में वापस लौटेगा| तब एक चलन ये भी शुरू हुआ जिसमे समुद्री राजा ताजपोशी के समय मुस्लिम महिला से पान लेकर कहता था कि “मै तब तक राज्य की हिफाजत करूँगा जब तक मक्का से चाचाजी वापस नहीं आते”| ये परंपरा 1890 के दशक तक जारी रही| कैसे भी करके इन चेर राजाओं का कालखण्ड दो हजार वर्षों से ज्यादा लम्बे समय तक चला| ये वैसा ही चमत्कार था जिससे जीसस या शिर्डी के साईं बाबा न सिर्फ तीन दिनों में बल्कि सैकड़ों सालों के बाद भी तमाम कारनामे करने के लिए दोबारा अवतार ले लेते हैं, जैसे मोहम्मद ने अपनी तलवार से चाँद के दो टुकड़े कर दिए थे| ये सिलसिले पंद्रह सौ सालों तक चलते रहे| डच दस्तावेजों के मुताबिक उसी चेरमण पेरुमाल ने अपनी राजधानी महोदय्पुरम और कुलदेवी का मंदिर 1500 से 1700 इसवी के बीच पुर्तगालियों को दिया, इस बार वो कैथोलिक या प्रोटोस्टेंट ईसाई बन गया|

चेरमण पेरुमाल की कहानी इतने में ख़त्म नहीं होती| ऐसे भी दावे किये जाते हैं कि पहली शताब्दी में उस राजा ने असली सीरियन क्रिश्चियनिटी कबूल की जब पहले सीरियाई क्रिस्चियन वहां पहुंचे, उनके लिए भी उसने अपनी राजधानी और तमाम विशेषाधिकार दिए|

ब्रिटिश और उनके प्रशिक्षित इतिहासकारों ने दूसरी शताब्दी के संगम साहित्य के इन किस्सों को अंतिम सत्य मान लिया| उनका दावा ये भी है कि क्षीर-शूर-सूर्य-केर-चेर राजाओं के पहले का संगम साहित्य बहुत ही अस्पष्ट है, जैसे कि उनके बाद के तथ्य और जानकारियां ठोस और चट्टानी हों|

इन ठोस जानकारियों और चट्टानी तथ्यों के तौर पर हमे क्षीर-शूर-सूर्य-केर-चेर राजाओं के तमाम खुदे हुए ताम्र पत्र मिलते मिलते हैं| उन दिनों में अमूमन पत्थरों में खुदाई की जाती थी क्योंकि ताम्रपत्रों का जीवनकाल 500 से 1000 साल का होता है| सम्राट अशोक और उसके पहले की खुदाई मंदिरों या वेधशालाओं की दीवारों पर मिलती हैं|

अब यहूदियों या थॉमस केनन के ताम्रपत्रों की बात करते हैं| इन ताम्र पत्रों पर राजा ने गैर भारतीय व्यापारियों को तमाम रियायतें दीं| इस तरह इतिहास का पूरा किस्सा भ्रामक मालूम होता है इसके तमाम आयाम हैं जिनसे पूर्वाग्रही इतिहासकारों को छोड़कर बाकी सभी लोग देख सकते हैं| ऐसा लगता है कि तमाम समूह भारत में खासकर के कोदुन्गल्लुर में किसी प्रकार की श्रेष्ठता बोध से ग्रस्त हैं|ऐसी जरुरत क्यों नहीं कि हमारे अनुसंधानकर्ता उन सवालों के जवाब में कुछ ऐसे तथ्य खोज सकें जो भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे|

यहूदी इन ताम्रपत्रों के लिए जो अनुवाद दिखाते हैं वो दस्तावेज उस स्कॉटिश प्राच्य वैज्ञानिक डॉ. लेडेन से जुदा हैं जिन्होंने अंग्रेजों के लिए काम किया| बाद में कोचीन से प्राप्त डच दस्तावेजों में एक तीसरा अनुवाद मिलता है जो कि हिब्रू की बजाए डॉ. लेडेन के अनुवाद से ज्यादा करीब है| 1807 के वार्षिक रजिस्टर में मिलता है कि “हिब्रू में मिली वह पाण्डुलिपि जिसमे ताम्रपत्र पर 379 ईस्वी में यहूदियों को दिए गए अनुदान का जिक्र है, ‘जल्द ही प्रकाशित की जाएगी’| सही सही अनुवाद न मिल पाने के चलते “पूरे ताम्रपत्र का छायाचित्र” बनाने और इस छायाचित्र को हिंदुस्तान और यूरोप के विद्वत वर्ग में प्रसारित किया करने का प्रस्ताव दिया गया| इससे यह समझा जाता है कि जो ताम्रपत्र यहूदी सभाघर के पास मौजूद है वह 1807 तक नहीं छपा| यह प्रतिलिपि मूल ताम्रपत्र भी नहीं है जिस पर राजा भास्कर रवि वर्मा अथवा चेरमण पेरुमाल की राजाज्ञा के दावे दिए जा रहे हैं| जो भी हो लेकिन केरल में कभी ताम्रयुग का जिक्र नहीं मिलता है, जब तक ब्रिटिशों ने प्रतिकृतियां नहीं बनाई तब तक अधिकारिक तौर पर धातुओं के प्रयोग का कोई विवरण भी नहीं मिलता है|

जैसा कि प्लेट पर अंकित मिलता है कि इनका निर्माण 379 इसवी में हुआ होगा, यहूदियों के ताम्रपत्रों में प्रयुक्त तांबे की प्लेट या इसके निर्माण के मानकों से ऐसा नहीं लगता| इससे प्लेटों की असलियत पर एक सवाल खड़ा होता है कि प्लेट की सामग्री मूल ताम्रपत्र की है भी या नहीं, अथवा ये ताम्रपत्र कभी थे भी या नहीं| या फिर इन सवालों से निजात पाने के लिए एक हजार सालों का समय कम करके 1069 ईस्वी का समय किया गया?

एक और राजाज्ञा मिलती है जिसके बारे में अनुमान किया जाता है कि ये आठवीं या दसवीं शताब्दी की होंगी| ताज़ेह्कड़ शासनम के राजा राजसिम्हा पेरुमाल ने नाज़रीनों को विशेषाधिकार दिए| इससे एक बात समझी जा सकती है कि पेरुमालों के बीच आठवीं नवीं शताब्दी तक ताम्रपत्र उतने प्रचारित नहीं थे| इनके बारे दूसरा अचम्भा ये है कि ये ताम्रपत्र पुरानी वत्तेलुत्तु लिपि में लिखे गए और इन पर पुरानी फारसी हिब्रू, पुरानी ग्रीक, पहलवी (जो कि संस्कृत से मिलती जुलती है) और तसल्ली भर की मलयालम समेत कई लिपियों में हस्ताक्षर मौजूद हैं| लेकिन क्षीर,-शुर-सूर्य-केर-चेर-सेर राजाओं की अधिकारिक भाषा संस्कृत अथवा पाली थी या फिर कन्नड़ की पुरानीं शैली होती थी| मलयालम भी लगभग एक हजार साल पहले अस्तित्व में आई| यहूदियों की तरह के कई ताम्रपत्र अरबी भाषा में भी मौजूद हैं| ऐसे भविष्यवाची और आधुनिक इतिहासकारों के लिए फिक्रमंद राजा दक्षिण भारत के केरल के अलावा दुनिया के किसी और हिस्से में नहीं मिलेंगे!

कमोबेश सदासिवन के मुताबिक जिन गवाहों के नाम ताम्रपत्रों पर खुदे हैं जैसे इरायरण कात्तन, मुरक्कन कात्तन इत्यादि बौद्ध नाम हैं, कात्तन यानि सास्ता बौद्ध नाम का ही पर्यायवाची है| इसके साथ ही तमाम विद्वान मानते हैं कि ऐसा भी संभव है कि व्यापारियों की एक टोली के अलावा यहूदी कभी केरल आये ही न हों| इस टोली का कालक्रम है बारहवीं शताब्दी जब केरल में बौद्ध धर्म कमजोर पड़ने लगा था| अगर हम यहूदी बस्ती का भी विचार करते हैं तो तेरहवीं शताब्दी में यह बस्ती भी संख्या में छोटी ही होती थी| लेकिन एक सम्भावना इस बात की जरुर बनती है कि राजा लोग किसी भी समुदाय के विद्वानों का स्वागत और सुरक्षा करते थे| इंसानी बेहतरी के लिए उन्हें रहने रुकने और अध्ययन, ज्ञान विज्ञानं की साझेदारी के लिए पर्याप्त मौके होते थे| यह परंपरा पूरे भारतवर्ष की थी और कोदुन्गल्लुर या महोदय्पुरम इसके अपवाद नहीं हो सकते| इस परिस्थिति में संभव है कि यहूदियों के संतों, पैगम्बरों को भी महोदय्पुरम के इस ज्ञान केंद्र अथवा ज्ञान के किसी भी स्थान पर आवागमन की सुविधा दी गई हो| यह भी संभव है कि बाद में चर्च या ब्रिटिशों द्वारा इसमें हेराफेरी की गई हो और इतिहास से छेड़छाड़ की गयी हो|

[1]एन्नुअल रजिस्टर ऑर ए व्यू ऑफ़ द हिस्ट्री, पॉलिटिक्स एण्ड लिटरेचर फॉर द इयर 1807

[1] (ए सोशल हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया लेखक एस.एन. सदाशिवन)

यहूदियों के ताम्रपत्रों के कुछ अनुवाद और उनकी संदेहजनक वास्तविकता:

क्लाउडियस बुचनैन (12 मार्च 1766-9 फरवरी 1815) नाम के एक स्कॉटिश विद्वान हुए| वे चर्च ऑफ़ इंग्लैंड में आदेश मंत्री थे| साथ ही वे चर्च मिशनरी सोसाइटी के प्रचारक भी थे जिन्होंने कलकत्ता कॉलेज के प्रोवोस्ट का भी काम किया| बुचनैन के मुताबिक यहूदियों के अनुदान उन दिनों के चलन के मुताबिक पीतल की प्लेटों पर होते थे| ये मालाबार की स्थानीय भाषा में थे और लिपि इतनी अधिक पुरानी थी कि इसे ठीक से समझा नहीं जा सका| एक दूसरे स्रोत के मुताबिक बुचनैन ने इन प्लेटों को यहूदियों से ख़रीदा हालाँकि ये स्पष्ट नहीं है कि वे प्लेटें पीतल की थीं या तांबे की| यहूदियों ने जो प्लेट बुचनैन को दी वह बहुत कठिन थी और यहूदी खुद भी उसके अनुवाद को लेकर सहमत नहीं थे| यहूदियों के पास मौजूद जो तर्जुमा बुचनैन को मिला वह कुछ इस प्रकार का था:

राजा जिसने ईश्वर की शांति के लिए धरती को अपनी ख़ुशी के मुताबिक बनाया| उसी ईश्वर के लिए मै एरवी ब्राह्मण अपने हाथों को उठाकर, अनुदान के इस दस्तावेज की अनुमति देता हूँ जो हजारों सालों तक जारी रहेगी—- मै क्रेन्गानोर का निवासी, अपने राज्य के छत्तीसवें साल में, अपनी शक्ति के द्वारा दिए गए अनुदान में जोसफ रब्बान को अपनी शक्ति से अर्जित विरासत सौंपता हूँ|

अब जरा विचार कीजिये कि विरासत की रियासत में ऐसा क्या काम था जो एक विदेशी सपूत को सौंपा गया? इसके जवाब में उसी नक्काशी में खुदे मिलते हैं श्रेष्ठता के विशेषाधिकार| उस समय के तमाम राजा विशेषाधिकारों के इस अनुदान के गवाह भी रहे| त्रावणकोर के राजा बिवादा कबेर्तीं मिटादें, राजा ऐरला नाद मन विक्रीं, समोरिन; राजा वेलोदा मादा आर्चरिन शतिन, अर्गोट के राजा; पालगतेचेरी, कोलास्त्री, कार्बिनाथ, वारा-चंगुर के राजा गणों के हस्ताक्षर भी नक्काशी में खुदे हैं| लेकिन इस दस्तावेज की तारीख का जिक्र नहीं है| इसमें बुचनैन जोड़ते हैं कि पुरानी मलबारी लेखों में तारीखें नहीं होती थीं| उन (यहूदियों) के  मुताबिक इस अनुदान की तारीख सृष्टि के सृजन (जब ईश्वर ने ये ब्रह्माण्ड रचा) के समय 4250 ईसापूर्व की होनी चाहिए| यह समय यहूदी काल गणनाओं में 490 ईस्वीय का है| इसके साथ ही बुचनैन जोड़ते हैं कि आठवीं अथवा नवीं शताब्दी के मालाबार के मशहूर राजाओं में राजा सरम/सेरम पेरुमाल ने यहूदियों, ईसाईयों और मोहम्मदियों को अनुदान दिए|

 ये बात तो कोई भी देख सकता कि उक्त अनुवाद किसी भी स्तर पर अधिकारिक दान शासनम के मुताबिक नहीं| इसके लिए भारत के तमाम राजाओं के दस्तावेज मौजूद हैंऔर देखे भी जा सकते हैं| ईश्वर की शांति में इत्यादि वाक्यारम्भ से न तो शासन होता है और न ही इस तरह की नक्काशी पारंपरिक रूप से बनाए गए पत्थरों में मिलती है| इसके जुदा होने के सबूत के लिए हम 300 से 1200 ईस्वी में मिले किसी भी पत्थर की नक्काशी को देख सकते हैं जिनमे शुरुआती वाक्य के बेमेल होने से फर्क नजर आ जाते हैं| कमोबेश इस अनुवाद से हम ये तो जान ही सकते हैं कि यह अनुदान किसी एरवी ब्राह्मण द्वारा किया गया न कि चेरमण भास्कर रवि वर्मा द्वितीय द्वारा\

 यूगेन हुल्त्श का अनुवाद:

समृद्धि की जय जय कार हो! (निम्नलिखित) भेंट उस किरदार ने दी है जिसने राजाओं के राजा की उपाधि का सम्मान किया”, उन प्रतिष्ठित महाराजाधिराज भास्कर रवि वर्मन ने हजारों जगहों के राजकाज को सँभालने के छत्तीसवें साल के बाद जब वे दो सालों में ख़ुशी से मुयिक्कोदु में रहे:-

हम अन्जुवनम के (ग्राम) इस्सुप्पू इराप्पन को बहत्तर विशेषाधिकारों से सुशोभित करते हैं, जिनमे मादा हाथियों और (अन्य) जानवरों की सवारी, अन्जुवनम के राजस्व, दिवसकाल का दीपक, एक बिछा हुआ कपडा कालीन, एक पालकी, एक छात्र, एक वादूगा (तेलुगु) ढोल, एक लम्बी तुरही, एक द्वार, एक मेहराब, एक मेहराबदार तम्बू, एक माला, एक पैतृक विरासत जो को कि तब तक कायम रहेगा जब तक सूरज और चाँद की जय जय कार हो| 

इस अनुवाद में अनुदान की तारीख यहूदी लोग अपने कैलेंडर के मुताबिक मानते हैं, जिससे ये लगता है कि उन्होंने वास्तविक नक्काशी की व्याख्या अपने लोगों को समझाने के लिए की हो|

उसी प्रतिलिपि का एम.जी.एस नारायणन द्वारा किया गया अनुवाद:

स्वस्ति श्री, समृद्धि की जय जय कार हो, राजाओं के राजा, (तिरुवाडी) महाराजधिराज (कोगोनमाई-कोंदण), श्री परकरण इराविवन्मार (चेरमण भास्कर रवि वर्मा) जिन्होंने हजारों सालों के राजपाट को छत्तीस सालों तक संभाला, और अपनी राजीखुशी के दो सालों के राजकाज में मुयिरिक्कोट्टू में निवास करके यह प्रसाद दान किया|

हम इस्सुप्पू इरप्पन को अन्जुवनम के ग्राम के साथ बकरियों और अन्जुवनम के देयों के अधिकार, दिवस दीपक जलाने के अधिकार, सजावटी कपड़ा, पालकी, छत्र, जानवर की खाल से बना ढोल, तुरही, तोरण द्वार, मेहराब, मेहराबदार गुम्बद और हथियारों के साथ बहत्तर अन्य विशेषाधिकार प्रदान करते हैं| हम परम्पराओं, देयों और तुलादान की छूट प्रदान करते हैं|

कमोबेश, इस ताम्रपत्र के अनुदान के मुताबिक, उन्हें नगर के दूसरे उपनिवेशियों की तरह करों की देनदारी नहीं होगी, लेकिन मौज मस्ती के दूसरे सभी साधन हासिल रहेंगे|

अन्जुवनम के मालिक इस्सुप्पू इराप्पन उसके स्त्री-पुरुष रिश्तेदारों, भाई-भतीजों को अन्जुवनम की संपत्ति का पैतृक उत्तराधिकार सूरज और चाँद के वजूद तक बना रहेगा|

 “वेनातु के राज्यपाल कोवार्त्ताना मत्तंदन इस दस्तावेज को प्रमाणित करते हैं” इसे वेनापलिनातु के राज्यपाल कोटि श्रीकांतन द्वारा प्रमाणित किया जाता है” “इसे वल्लुवानातु के राज्यपाल इरायारण कात्तन द्वारा प्रमाणित किया जाता है” “इसे नेतुम्पुरैयुर्नातु के राज्यपाल कोटि इरवी द्वारा प्रमाणित किया जाता है” “इसे पूर्वी सेनाओं के सेनापति मुरक्कन कात्तन द्वारा प्रमाणित किया जाता है” “इस आलेख की कार्यवाही मौखिक संदेशों के लेखाकार वंरलासरी कंदन-कुंराप्पोलन ने की”|

उपरोक्त अनुवाद राजाओं के औपचारिक दस्तावेजों के काफी करीब मालूम होता है लेकिन कुछ फर्क और गलतियाँ भी दीगर हैं|

कुछ दूसरे अनुवाद भी मौजूद हैं जो कि एकदूसरे से काफी जुदा हैं, इन्हीं में से एक फर्क क्रेन्गानोर के नाम का भी है| इन अनुवादों में मुयिरिखोड़े, मुयिरिकोट्टू, मुज़िरिस और महोदय्पुरम के नामों के फर्क भी दीगर हैं| तमाम अध्येताओं ने या तो मिलते जुलते नामों को साबित करने का काम किया है अथवा एक दूसरे से जुदा दिखाने का|

माइकल सर्गोंन एक भारतीय यहूदी थे जो 1818 में ईसाई हुए| उन्होंने काले यहूदियों के चिन्नोता सभाघर में मिली पीतल की प्लेट की मौजूदगी के बारे में एक नोट लिखा| बताते हैं कि यह पीतल की प्लेट कोचीन में डच राज्य के दौरान श्वेत यहूदियों ने हड़प ली|

डच दस्तावेजों में हिब्रू की पत्रिकाएँ पायी गयीं जो कि कोचीन के यहूदियों के कब्जे में रहीं| लियोपोल्ड एमानुएल जैकब वान डोर्ट ने इन दस्तावेजों का अनुवाद किया| यहूदी से ईसाई बने विद्वान ने अपने नोट में लिखा है कि, “उस भूभाग के शासक शेरम परिमाल ने उनका स्वागत किया और तमाम विशेषाधिकारों से अनुग्रहीत किया, इनको दो ताम्र पत्रों में उकेरा गया, जो कि आज कोचीन में हैं, जिसकी ताबेदारी जोसफ हल्लोगुआ के पास है जो कि लोगों का वर्तमान नेता है, जैसा मैंने देखा वैसा अनुवाद किया”| इसका मतलब ये हुआ कि वान डोर्ट ने कोचीन में डच शासन के समय उन ताम्र पत्रों को परदेसी यहूदियों के कब्जे में देखा| सर्गोंन ने जिक्र किया है कि श्वेत यहूदी जब सत्ता में आये तो वे इस ताम्र पत्र को अपने साथ ले गए| जबकि डच दस्तावेजों में वान दोर्ट के मुताबिक यह श्वेत यहूदियों की संपत्ति थी|

अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बुचनैन लिखते हैं कि असल प्लेटें पीतल की थीं जिनकी उसने ताम्र प्रतिलिपि तैयार कराई| असली प्लेट दोनों ओर खुदी थी जबकि प्रतिलिपियों को दो अलग अलग ताम्र पत्रों में उकेरा गया| उन्होंने ये भी जिक्र किया है कि इन प्लेटों को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के सार्वजनिक पुस्तकालय में जमा कराया गया| लेकिन एक अध्येता तौफीक ज़कारिया ने इस बात का जिक्र किया है कि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में डॉ. क्लाउडियस बुचनैन द्वारा जमा की गई कोचीन के यहूदियों की यह राजाज्ञा (MsOo.1.14) के बारे में पूर्वी विषयों की विभागाध्यक्ष श्रीमती कैथरीन अन्सोर्ज ने एक व्यक्तिगत ई-मेल में जवाब दिया कि, “Oo.1.14- सारी लिखावट तांबे की आयताकार पट्टियों पर हैं| मुझे नहीं पता कि इसके बारे में कोई अध्ययन किया गया” इस प्रकार असली पीतल की प्लेटों की गैर मौजूदगी की पुष्टि होती है| जाहिर है कि क्लाउडियस बुचनैन ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय में भी असली पीतल की प्लेटों की बजाए तांबे की प्रतिलिपियाँ ही जमा की थीं| बुचनैन ने ये भी लिखा है कि प्लेटों को लन्दन ले जाया गया| सवाल है कि क्या ये प्लेटें आज भी लन्दन में मौजूद हैं, अगर ऐसा है तो प्लेटें किसके कब्जे में हैं और इन्हें भारतीय इतिहासकारों से छिपा कर क्यों रखा गया, ये वो रहस्य है जिनपर से पर्दा उठाना बाकी है!

डॉ. फ्रांसिस डे ने अपनी पुस्तक में एक प्रतिक्रिया लिखी है, “रेव सी. बुचनैन बताते हैं कि असली प्लेटें पीतल की थीं और उन पर दोनों तरफ नक्काशी थी| उन्होंने दो ताम्र पत्रों पर इसकी प्रतिलिपि बनाई, जिसे उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय में जमा किया| ऐसा कहा जाता है कि असली नक्काशी बहुत पुरानी दिखती थी जिसे वर्तमान प्लेटों पर उकेरा गया, लेकिन ऐसा हुआ नहीं| अगर दोनों तरफ उकेरी गयी पीतल की प्लेट कैंब्रिज में होती तो शायद ये निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि डॉ. बुचनैन ने नयी प्लेटें यहूदियों को देकर पुरानी वाली रख लीं”|

फ्रांसिस ऐसा भी जिक्र करते हैं कि: “श्वेत यहूदियों के पास तीन ताम्र पत्र हैं, जो कि एक यार्ड के चौथाई और आठवें हिसाब की हैं, मालूम होता है कि इन्हें जहाज की किनारियों से लिया गया है| बाहरी वाले पर कोई नक्काशी नहीं है”|

फ्रांसिस डे का यह बयान हमें परदेसी यहूदियों के कब्जे में मौजूद ताम्र पत्र की असलियत के बारे में सोचने पर मजबूर करता है|

अनुदानों के ताम्र पत्रों की यह यहूदी विरासत हमेशा से रहस्यों और विरोधाभासों से घिरी रही है|ये विरोधाभास “लन्दन से बड़े साहब क्लाउडियस बुचनैन” के आने के बाद शुरू हुये| उन्होंने मालाबार के यहूदियों को देखा और उनसे तमाम पांडुलिपियाँ लेकर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में जमा करायीं|

मिस्टर एडलर (1909) लिखते हैं कि, “ श्वेत यहूदी कहते हैं कि ये हमेशा से उन्हीं के पास रहे; काले यहूदी विरोध करते हैं और कहते हैं कि ये उनके हैं| यह उपाधि कई मामलों में अनोखी है”|

एक कनवर्टेड यहूदी लियोपोल्ड इम्मानुएल जैकब वान डोर्ट ने बुचनैन की रिपोर्ट के पचास सालों पहले मौजूद ताम्र पत्रों को देखा और अनुवाद किया| जबकि अपनी रिपोर्ट में बुचनैन लिखता है कि यह पीतल की अकेली प्लेट थी जिसके दोनों तरफ नक्काशी थी उन्होंने इसी की एक तरफ नक्काशीदार तीन प्लेट वाली प्रतिलिपियाँ बनवाईं! इनमे से कौन सा बयान सही माना जाए? क्या ये सब संस्करण एक ही राजाज्ञा के हैं जो राजा चेरमण पेरुमाल ने यहूदियों खास तौर से जोसफ रब्बान को दीं? क्या चेरों ने जो शाही भेंटे जोसफ रब्बान को सौंपीं वे अलग अलग कालखंड की हैं जिनमे विशेषाधिकार तो वही हैं लेकिन कभी पीतल तो कभी ताम्र पत्रों पर उकेरे गए? या फिर चेरनाद राजा ऐसे अनुदान सभी समुदायों को देते रहते थे? या फिर शाही अनुदान के ये सारे किस्से अप्रवासी व्यापारिक समुदायों के बसावट के दावे के लिए रचे गए?

किसी ने भी इस प्रकार किसी विदेशी धरती पर पहले से मौजूदगी के दावे क्यों नहीं किये? यह जमीन इतनी अहम् क्यों है? कोदुन्गल्लुर/महोदय्पुरम में ऐसा क्या है जिसके लिए यहूदी, ईसाई अथवा मुस्लिम सबसे पहले अपनी मौजूदगी के दावे किये जा रहे हैं?

ऐसा तमाम विद्वानों का मत है कि ताम्र पत्रों पर मौजूद अभिलेख उतने पुराने नहीं जैसा कि पीतल की प्लेट पर होने के दावे बुचनैन करते हैं, तो क्या ताम्र पत्रों को कंपनी के विद्वानों द्वारा बदल दिया गया? यदि ऐसा हुआ भी तो क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीय विद्वानों ने उक्त पट्टियों में खुदी गूढ़ इबारतों को पढ़ लिया हो जिसे ब्रिटिश नहीं चाहते हों कि हमे पता लगे इसलिए इन प्लेटों के साथ साथ इन इबारतों को पढने वालों को ही मिटा दिया गया हो? अथवा नक्काशी की भाषा कुछ ऐसी हो जिससे सिर्फ कंपनी के विद्वान ही परिचित हों इस तरह उन्होंने इस गूढ़लिपि को भारतीय जनमानस के लिए अनुपलब्ध कर दिया हो! यदि ऐसा हुआ भी तो क्यों? यदि ये अनुदान असली हैं तो इसकी एक प्रति वर्तमान शाही अभिलेखागार में होना चाहिए क्योंकि किसी भी अधिकारिक कार्यसम्पादन की प्रति रखने की परंपरा तो तब भी थी? क्या इस प्लेट की एक प्रति श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के तहखानों में मौजूद है जहाँ सारे साहित्य, दस्तावेज और व्यापारिक भेंटे संरक्षित करके रखे जाते थे? मिस्र के शासकों के तमाम दस्तावेज तो वहां आज भी मौजूद हैं

अगर बुचनैन कहता है कि प्लेट की लिपि पढ़े जाने योग्य नहीं है तो फिर यह कैसे संभव है कि राजा ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया हो जो न तो किसी स्थानीय भाषा में हो और न ही अधिकारिक भाषा में हो? यह तो उनके उत्तराधिकारियों और उत्तरवर्ती विद्वानों के वश का भी नहीं?

गुरु से शिष्य और अभिभावकों से उनके बच्चों में ज्ञान का देने की व्यवस्था तब तक स्थापित और स्थिर थी  जब तक ब्रिटिश ने बर्बाद नहीं किया और ईस्ट इण्डिया कंपनी के बुचनैन और दूसरे अधिकारियों ने भारत के इतिहास को फिर से लिखने का काम नहीं किया था, ऐसे में इतने अहम् अनुदान की जानकारी मिट कैसे गयी?

एक तरफ तो बुचनैन अपने अनुसन्धान कार्य में लिखते हैं कि मालाबार के प्रस्तर अभिलेखों में तारीख की प्रमुखता नहीं होती थी, फिर वे इस निष्कर्ष तक कैसे पहुँच गए कि यह अनुदान यहूदी सृष्टि के वर्ष 4425 में हुआ? और दूसरे अनुवादक यह निष्कर्ष निकलने में कैसे कामयाब हुए कि नक्काशी में खुदी तारीख 379 ईस्वी की थी?

कहीं ऐसा न हो कि सिर्फ तारीख रोमन या पर्शियन अंकों में लिखी हों और बाकी सूचना किसी एलियन भाषा में जो किसी को पता न हो? यहाँ तक कि चेर राजा राजसिम्हा के रामेश्वरम स्थित 1025 ईस्वी का प्रस्तर आलेख में सब कुछ संस्कृत में ग्रन्थ लिपि में लिखा है| उसमे राजधानी महोदय्पुरम के राजधानी होने समेत कई और अहम् सूचनाएं हैं| फिर उन्होंने 379 ईस्वी में वे अन्य भाषा में क्यों लिखने लगे? एक और अहम् बात है कि 1951 में राज्य के भाषाई आधार पर विभाजन होने के पहले किसी ऐसे राजा की पहचान नहीं हुई जिसने प्रस्तर आलेखों पर अपने राज्य की सीमाओं का उल्लेख किया हो जैसे तमिल राजा या मलयालम राजा अथवा कन्नड़ राजाओं| हमारी भाषाई अंधभक्ति का दोष प्राचीन राजाओं को देना बौद्धिक बेसुरेपन का एक अप्रतिम उदहारण है, इसी बौद्धिक बेसुरेपन को हम ब्रिटिशकाल के उदय से झेल रहे हैं जिसमे ब्रिटिशों का अहम् योगदान रहा है|

क्या यह ब्रिटिश और चर्च की साझा मंशा रही कि हर प्राचीन पत्थर अभिलेख को अबूझ बनाने के लिए छिपाना अथवा कालक्रम को मिटा दिया जाए? इसके लिए प्रमुख लोगों और इतिहासकारों को भी मिटाना उनको गवारा हुआ| शायद इसके बगैर भारतीय कालक्रम को उनके मिशन के मुताबिक बाइबिल की समयरेखा में समेटना कामयाब नहीं होता| क्या यही वजह है जिसके चलते बुचनैन लिखते हैं कि चेर शासकों की नक्काशियों में तारीखों का जिक्र नहीं होना आम बात है? ये कहते हुए भी वे उस ताम्र पत्र की तारीख क्रिस्चियन कैलेंडर के मुताबिक 379 ईस्वी तय कर देते हैं| जब दो क्रिस्चियन समुदाय या कहें कि ईस्टर्न और वेस्टर्न जीसस के जन्म की तारीख पर एकमत नहीं (रोमन कैथोलिक्स और प्रोटोस्टेंट जीसस का जन्मदिन 25 दिसम्बर मानते हैं जबकि ग्रीक और रुस्सियन इसे 8 जनवरी को मनाते हैं और यहूदी जीसस के जन्म की इन दोनों में से किसी तारीख से सहमत नहीं)

और आज भी एक दूसरे को मिटाने में लगे रहते हैं, वे भारतीय ज्योतिष विज्ञानं में गलतियाँ निकाल सकते हैं, जिसमें जटिल ग्रह गति की गणनाएं हैं जिनसे आज भी आम लोग अपने दैनिक जीवन में गृह गति और उसके जीवन प्रभावों का आकलन अनुमान उँगलियों पर कर सकते हैं|

जब 379 क्रिस्टियन एरा की तारीख प्लेट पर नक्काशी में खुदी हुई थी तो फिर तो फिर 1925 में एक ऐतिहासिक परंपरा के तहत तारीखों को बदलकर 1069 क्रिस्टियन एरा क्यों कर दिया गया? इस तरह और कितने अहम् नक्काशियों पर तारीखें बदली गयीं? क्या यही वजह रही जिसके चलते बुचनैन ने निष्कर्ष निकाला कि प्रस्तर आलेखों में तारीखें मौजूद नहीं या फिर सभी प्राचीन शासकों के लिए समय की कोई अहमियत नहीं थी|

क्या रब्बान दी गयी पीतल की पट्टिका वाला अनुदान कभी थी भी? या फिर पीतल की पट्टिका पर वह अनुदान पत्र यहूदी पाठकों या विद्वानों को सिखाने के लिए बना था, वे विद्वान जो रब्बान से बहुत पहले अपनी किताबों के साथ आते थे, जिन्हें निर्वासित होकर या फिर अन्य कारणों से महोदय्पुरम में शरण सुरक्षा या पनाह मिलती थी| पहले तो वे जान बचाने या अध्ययन के लिए आते थे बाद में कुछ वजहों से उनके इंटरेस्ट बदल गए? यदि पीतल की प्लेट कभी भी थी तो क्या ये लन्दन के अभिलेखागार में आज भी मौजूद है? क्या इस प्लेट को लन्दन में सुरक्षित रखा गया है क्योंकि इसकी लेखी मिट जाने या प्लेट के नष्ट हो जाने के बाद भारत के इतिहास के नाम पर इलियट अथवा मैकाले सरीखे ब्रिटिश इतिहासकारों का रचा आर्य द्रविड़ झगड़ा ख़त्म हो जायेगा? ऐसी क्या अहम् वजह रही जिसके चलते असली प्लेट को वायदे के बावजूद इसके असली मालिकों को नहीं सौंपा गया? अगर तीसरी और चौथी शताब्दी अथवा अट्ठारहवीं शताब्दी तक चेर राजाओं की नक्काशीदार ताम्र पत्र जारी करने की परंपरा नहीं थी और पीतल की नक्काशीदार प्लेटें ज्यादा मशहूर थीं, तो फिर ये ताम्र पत्र अस्तित्व में कैसे आये?

इसका यह अर्थ नहीं कि हमारे पूर्वजों को तांबे की जानकारी नहीं थी बल्कि ये सही है कि उन्होंने कभी इसकी नक्काशीदार प्लेटों का इस्तेमाल नहीं किया| क्या वान डोर्ट ने पीतल की प्लेटें लेकर सेलों में ईस्ट इण्डिया कंपनी के किसी दूसरे अधिकारी को दे दी जहाँ से ये हॉलैंड उसके बाद जर्मनी में यूरोपियन यहूदियों के पास उनके संग्रह में पहुंच गयी|

पीतल की प्लेट का अनुवाद करने वाला कोई नहीं था जिसके चलते 1809 में बुचनैन तांबे की प्रतिलिपियाँ छापकर दूसरी पढ़ी लिखी जमातों को भेजा और इसके लिए एक नक्काशी के कारीगर को नियुक्त किया| इसकी एक प्रति त्रिस्सुर के संस्कृत महाविद्यालय के पंडितों को भेजी गयी| बाद में उसने यही प्रतिलिपियाँ तमाम यूरोपियन केन्द्रों में भेजीं जहाँ पर भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं इतिहास और भाषाओँ का अध्ययन होता था| कहीं ऐसा तो नहीं कि लेखी की भाषा संस्कृत जैसी थी जिससे विद्वान गूढ़लिपि पढ़ सकते थे लेकिन इसे जानबूझ कर दरकिनार किया गया! यदि ऐसा हुआ भी हो तो क्या ये संभव नहीं कि राजपरिवार ने विद्वानों को इसके कहने के लिए निषेध किया हो क्योंकि उन्हें ब्रिटिशों द्वारा की जा रही तबाही का अंदाज़ा हो गया हो| ये वो तरीका था जिससे वर्तमान राजपरिवार पद्मनाभ स्वामी मंदिर के खजाने को चार सौ सालों तक ब्रिटिशों के षड्यंत्र करके भारतीयों का खजाना लूटने से बचा के रख सका!

सवल है कि इतनी अहम् पुरातन नक्काशीदार कलाकृति को काटने कैसे दिया गया, वो भी उस स्थानीय कारीगर को जो लिपि से कतई वाकिफ नहीं था| जो प्लेटें सारी ताकत लगाने के बावजूद 1770 तक राज्यपाल अंद्रियन मोएन्स को देखने तक के लिए मयस्सर नहीं थीं और जिसके बारे में बताया कि या तो वे थीं ही नहीं या फिर खो गयीं, वही प्लेटें कोचीन किले के ईसाइयों को क्यों दी गयीं और ये उन तक पहुंची कैसे? ये ताम्रपत्र ट्रावन्कोर के ब्रिटिश अनिवासी लेफ्टिनेंट कर्नल मैकाले के पास कैसे मिले? ये दोनों ईसाई और यहूदी प्लेटें मैकाले के कब्जे में पायी गयीं|

ज्यादा सही बात तो ये लगती है कि यहूदियों ने केरल में अपने 72 ए.डी. के पुराकाल या उससे भी पहले रोमन या मिस्र काल के निशान खोज निकाले हों जब यहूदी समुदाय के विद्वान संत पैगम्बर लगातार आते रहते थे| उनका आवागमन शंकराचार्य द्वारा बनाये गए महोदय्पुरम, परिहंस्पुरम, पुरुषोत्तमपुरम और द्वारिकपुरम के चारों ज्ञान केन्द्रों में होता रहता था| शायद येमन कुलपति शिमोन रब्बान जिन्होंने उस लेखी को संभाल कर रखने की कोशिश की वे हिंदुस्तान पहुंचे| यहूदियों के इतिहास में ऐसे दतावेज मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि शाल्मानेसेर पंचम के राज्य में तमाम यहूदियों को निष्कासित कर दिया गया| अथवा जब यहूदी संत महात्माओं ने उन्होंने पाया कि उसका राजकाज सत्य के अनुरूप नहीं तो राज्य छोड़ने का फैसला किया, वे कई बार ऐसा कर चुके थे| वे अपने साहित्य और पवित्र पुस्तकों के साथ महोदय्पुरम आ जाते थे क्योंकि वे जानते थे कि महोदय्पुरम में ज्ञान का विशाल भण्डार था और यहाँ पर उनको और उनके साहित्य को पनाह मिल सकती थी| ये भी एक अचम्भे की बात है कि यहूदी महात्मा पैसे रुपयों की बजाए अपनी किताबों के साथ ज्ञान स्रोत महोदय्पुरम आये (ऐसी भी किवादंयियाँ मौजूद हैं कि यहूदी सिर्फ पैसों के लिए हैं)| जिस अध्यात्मिक साहित्य की तलाश पुर्तगालियों से लेकर ब्रिटिशों तक ने की वही वास्तविक यहूदीवाद है जिसकी खिलाफत में रब्बीनिकल यहूदीवाद रचा गया जो कि सद्दुसेस का विस्तार है, जिस पर सेक्लुडियन साम्राज्य के ग्रीक हेल्लेनिक विचारों का प्रभाव मिलता है| यह रब्बीनिकल यहूदीवाद ईसाइयत में ग्रीक हेल्लेनिक विचारों का घालमेल है जिसमे ईसाई जेरूसलम को ब्रह्माण्ड का केंद्र मानते हैं क्योंकि यहाँ जीसस पैदा हुए| चेर राजाओं ने उन संत महात्माओं का स्वागत किया क्योंकि वे महोदय्पुरम के ज्ञान केंद्र का मकसद जानते और उन्होंने एक नागरिक की तरह अनुदान और विशेषाधिकार भी दिए|

शालमनेसेर ने 460 यहूदियों को निष्कासित कर दिया जिनमे (स्रोतों के मुताबिक बहत्तर परिवार थे) से कुछ बाद में महोदय्पुरम पहुंचे| उन्हें महोदय्पुरम में सुरक्षा मिली और स्थानीय शासकों द्वारा उन्हें प्रोत्साहित भी किया गया| एक नागरिक के तौर पर उनके अधिकारों के अनुदान और उपाधियाँ भी दी गयी होंगी (गौरतलब है कि अनुवाद में बहत्तर विशेषाधिकारों का जिक्र है)| शालमनेसेर पंचम का समय ईसा से आठवीं शताब्दी पूर्व का रहा| इसका अर्थ ये लगाया जा सकता है कि पीतल की पट्टियों का समय भी ईसा से आठवीं शताब्दी पूर्व का था इसी तरह राजा भास्कर रवि वर्मा का भी समय वही होना चाहिए| इन पीतल की पट्टियों (जिनके बाद में ताम्र प्रतिलिपियाँ बनीं) को हिब्रू में लिखा गया (आज भी बहुधा लोग यही मानते हैं कि पट्टियों में महज कुछ हस्ताक्षर थे वो भी हिब्रू में) जो कि सबसे पुराने हिब्रू दस्तावजों की तरह छः शताब्दियों तक मृत सागर में घूमती रहीं| इन पीतल की पट्टियों के मिलने तक यहीं माना जाता रहा कि शाल्मानेसेर पंचम द्वारा निष्कासित यहूदी समुदाय यहूदियों की एक खोई हुई जनजाति है जिसके महानतम यहूदी संत महात्माओं ने तमाम अहम् कार्य किये| यहूदियों ने दो हजार सालों तक उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका सहित दुनिया के हर हिस्से में उनकी खोजबीन की| पीतल पट्टिकाओं के मिलने के बाद के पिछले दो सौ सालों के अनुसन्धान में दुनिया भर के यहूदियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि शाल्मानेसेर के निष्कासन के बाद वे यहूदी महोदय्पुरम पहुंचे जहाँ चेर राजा ने उन्हें अपने नागरिकों की तरह आश्रय और पूरे विशेषाधिकार दिए|

क्या यही वजह थी जिसके चलते महोदय्पुरम को पुर्तगालियों द्वारा जला दिया गया और ये भी बताया गया कि इस शहर के लिए स्थानीय यहूदी आखिरी दम तक पूरी बहादुरी से लड़े, क्योंकि वे मानते थे कि यही शहर दूसरा जेरूसलम है|

बदले की भावना में ईसाइयों ने अपने आगमन की ईसा के बाद 52वें वर्ष में कर दी| इसका सबूत वास्को डी गामा के शासन में मिलता है जिसने हिंदुस्तान में यहूदियों के सभी निशान मिटाने की भरपूर कोशिश की| इस आपसी लड़ाई की वजह आने वाले मसीहा की अवधारणा को लेकर थी जिसमे यहूदियों और ईसाइयों की अलग अलग मान्यताएं हैं| आगामी लेख में हम यहूदियों की राजधानी की घोषणा के विषय में बताएँगे|

तो यहूदियों ने अनुदानों की कुछ तख्तियां ईमानदारी से बनाई, संभव है कि इन तख्तियों का समय बहुत पहले का  हो| इसकी वजह ये भी हो सकती है कि यहूदियों के भारत के साथ भौतिक और अध्यात्मिक सम्बन्ध क्राइस्ट के जन्म के पहले भी होते थे| ईसाइयों ने ये प्लेट बनाई दूरदर्शिता से और उनकी तिथियाँ यहूदियों से पहले की कर दीं| इसके बाद ये निष्कर्ष भी निकाल लिया कि यहूदियों की प्लेटों में लिखी तारीखें पढ़ने योग्य नहीं| इसकी सार्थकता साबित हुई उन पट्टिकाओं के न पढ़े जा सकने से| इसी तरह की पट्टिकाएं मुस्लिमों, डच और पुर्तगालियों ने भी बनाईं| मुस्लिमों को तो न सिर्फ विशेषाधिकार दिए गए बल्कि पूरा राजधानी शहर और उनकी कुलदेवी की मूर्ति हटा कर पूरा मंदिर भी दान दे दिया गया| इन सभी अनुदानों में एक अहम् तथ्य ये है कि सभी अनुदान महोदय्पुरम में दिए गए जो कि हजारों सालों से चेरों की राजधानी थी जिसे तमाम अंग्रेजीदां, रोमन और तमिल नामों से जाना जाता है| ये शहर न सिर्फ बर्बाद किया गया, 1524 में एक आगजनी के दौरान धूल में मिला दिया गया जिसके निशान तक नहीं मिलते| इस तरह कितनी आसानी से पूरे इतिहास को मिटा दिया गया!

जब मुस्लिमों, कैथोलिक्स, श्वेत यहूदियों और कृष्ण यहूदियों के बीच दुश्मनी जारी थी और उनमे अपनी मौजूदगी पहले साबित करने की होड़ लगी थी तो उन्हीं में से तमाम लोग दूसरों के दस्तावेजों को मिटाने से भी नहीं चूकते थे, सवाल है कि यहूदियों की ये पट्टिकाएं बच कैसे गयीं?

सवाल ये भी है कि इन सभी पहलवी, फारसियों, मिस्र वालों, रोमानियाई, इस्सैन के रहस्यवादी यहूदी समूहों, विद्वानों, वैज्ञानिकों, सताए हुए ईसाइयों और इस्लामी जमातों को सिर्फ महोदय्पुरम ने ही क्यों आकर्षित किया? दीगर सवाल ये भी है कि सिर्फ चेर राजाओं ने तमाम समूहों को यहाँ तक कि अपनी ही प्रजा से कर वसूल करने के विशेषाधिकार क्यों दिए?

लगभग सभी प्रस्तर आलेखों, मंदिरों और वेधशालाओं जिन्होंने उन्हें आकर्षित किया वे जमींदोज हो गए, वो भी ब्रिटिश या ब्रिटिश प्रेरणा के इतिहासकारों की जुबानी मानें तो क्षीर, शूर, सूर्य, केर, सेर, केर, चेर राजाओं और उनके कल्पित दुश्मनों चोल, पल्लव, पाण्ड्य राजाओं के बीच हुए दैवी युद्ध और हथियारों से| ब्रिटिश इतिहासकार बताते हैं कि वे राजा अपने पसंदीदा ईश्वरों शिव, विष्णु इत्यादि के लिए लड़े और उन्होंने प्रतिद्वंद्वी के देवताओं, मंदिरों और वेधशालाओं को बर्बाद कर दिया| संगम साहित्य में ऐसा लिखा है इसलिए हमे तो ये मानना ही पड़ेगा| तमाम विद्वानों ने विशेष तौर पर इसके बारे में कहा कि संगम साहित्य को इतिहास या ऐतिहासिक तथ्य मानना “गजबाहु न्याय” पर आधारित है जिसकी प्रासंगिकता हाथी के कंधे जैसी है| हाथियों के कंधे नहीं होते क्योंकि उनके हाथ नहीं हैं| उनकी सूंड है| इसलिए अगर ये मानना पड़े कि हाथी के कंधे होते हैं तो पहले ये मानना पड़ेगा कि हाथी की सूंड ही उसका एक हाथ है और हाथियों के तमाम सूँड़ होते हैं जिन्हें हिन्दुस्तानी नहीं देख सकते| अथवा ये कहें कि हाथियों के अदृश्य हाथ होते हैं जिन्हें ब्रिटिश या ब्रिटिशों के प्रशिक्षित इतिहासकारों के सिवाय कोई और नहीं देख सकता है| न्याय के वास्तविक अर्थों में इस सूत्र का अर्थ है कि जो भी कहा गया अथवा परिवाद में संज्ञेय है वह विशुद्ध रूप से झूठ का एक अप्रतिम उदहारण है किसी का पागलपन और मनगढ़ंत किस्सा है| फिर भी यह ब्रिटिश या वर्तमान भारतीय इतिहासकारों को घबराये हुए भारतीयों के सामने ऐसे दावे करने से नहीं रोकता कि संगम साहित्य वास्तविक इतिहास है, कुल मिलाकर यह भारतीय इतिहासकारों का वैसा ही संस्करण है जैसा इलियट ने सिंध के आक्रमण के लिए लिखा|

और तमाम मौकों पर जब वे प्रतिद्वंदी राजाओं या देवताओं के मंदिर नष्ट नहीं कर सके तो युद्धरत राजाओं ने इस्लाम और ईसाई बनी आबादी की मदद लेकर ये काम पूरा किया| इसके सबूत भी दूसरी शताब्दी के संगम साहित्य अथवा बाद के काव्यात्मक शाही दस्तावेजों में मौजूद हैं| राजाओं की अध्यात्मिक शक्तियों अथवा निजी मामलों के जो जिक्र दरबारी कवियों की रचनाओं में मिले उन्हें विनाशकारी जिजीविषा बना दिया गया| इस प्रकार ब्रिटिशों या पुर्तगालियों ने उन क्षीर, शूर, सूर्य, केर, सेर, केर, चेर/चोल/पाण्ड्य राजाओं के सभी प्रस्तर आलेखों को संभवतः अथवा निश्चित रूप से मिटा दिया| मंदिरों के खजाने लूटने और नष्ट करने के इस महान कार्य को उन्होंने वैज्ञानिक अध्ययन अथवा कार्टोग्राफी का नाम दिया| संगम साहित्य की जरुरत भारतीय इतिहासकारों को प्रशिक्षित करने के लिए होने वाली थी| इसकी जिम्मेदारी एच एम इलियट और उनके सहयोगियों ने उठाई|

इस प्रकार उन्होंने ब्रिटिश लुटेरों या शासकों को किसी भी बदमाशी से मुक्त कर दिया| यही काम उन्होंने सिंध और कश्मीर में भी किया ताकि ये साबित किया जा सके कि अरबों ने भारत को बर्बाद किया| इस प्रकार “भारत के भ्रामक इतिहास के इतिहास” का पुलिंदा तैयार हुआ| भारत के भ्रामक इतिहास का यह विषय जर्मन और फ्रेंच लोगों ने भी पढ़ा ताकि उन्हें भी वर्तमान भारतीय पाठ्यक्रम में जगह मिल सके|

सब जानते हैं कि सत्य हमें सभी बंधनों से मुक्ति देता है लेकिन कोई जरुर है जो नहीं चाहता कि भारत की मुक्ति हो और इस बार वे न तो बर्बर अरब आक्रमणकारी हैं न ही ब्रिटिश लुटेरे|

दो तोहफों और उनके इर्द गिर्द के इजराइली घटनाक्रम से उपजे ऐसे तमाम सवाल हैं| क्या इजराइली ऐसी उम्मीद कर रहे थे कि इन तोहफों को के बदले भारतीयों से भी वैसे तोहफे मिलें? यह शातिर यहूदी मजाक हमारे इतिहास या फिर इसकी कमी को बताने के लिए किया गया| यहूदियों के बीच एक मजाक बहुत सुना जाता है| एक बार यहूदी पुजारी और कैथोलिक पादरी के बीच चर्चा हो रही थी| यहूदी पुजारी ने कैथोलिक पादरी से पूछा, “ फादर बनने के बाद आप क्या बनना चाहेंगे? कैथोलिक पादरी ने जवाब दिया, “ मै बिशप बनूँ” यहूदी पुजारी ने कहा, “उसके बाद?” कैथोलिक का जवाब आया “शायद कार्डिनल”| उनके बाद फिर यहूदी पुजारी ने फिर पूछा, “फिर?” इस पर कैथोलिक पादरी का जवाब था कि “अगर सब कुछ ठीक रहा तो शायद मै पोप बन जाऊं”| मासूमियत से यहूदी पुजारी ने फिर पूछा, “उसके बाद?” खिसियाकर कैथोलिक पादरी ने इसके बदले में एक सवाल किया, “ उसके बाद बनने के लिए बचा ही क्या! क्या आप चाहते हैं कि मै क्राइस्ट बन जाऊं?” विचारशील और चतुर यहूदी पुजारी ने पादरी की ओर देखा और कहा, हमारे लड़कों ने दो हजार साल पहले किसी को क्राइस्ट बना दिया था” इतना कहकर वो चला गया|

यह बातचीत एक सामान्य मजाक लगती है| लेकिन इसके पीछे धर्मों और उनके संघर्षों के के भारी कथानक भरे पड़े हैं, इससे अन्तराष्ट्रीय समस्याओं और मजहबी झगड़ों के एक संभाव्य समाधान की भी झलक मिलती है, उन झगड़ों को हम ऐसे भारी भरकम नामों से जानते हैं, जिन्हें समझने के लिए तमाम विशेषज्ञों की जरुरत है ताकि हमारी मीडिया का अनर्गल प्रलाप रुके|

आइये हम यहूदियों की उसी चतुराई और कसावट की नजर में दोनों तोहफों को देखें

ताम्र पत्रों और उनके समय का सवाल

मान लीजिये अगर ताम्र पत्र वास्तविक हों,तो फिर अपनी परम्पराओं और इतिहास को लेकर स्वाभिमानी यहूदियों ने ब्रिटिश “परंपरागत समझौते अथवा इतिहास की तारीखों को 379 ईस्वी से बदलकर 1069 करना क्यों स्वीकार कर लिया”?

यहूदियों ने दस हजार सालों के इतिहास को समेटा है और उनके अपने इतिहास की मियाद साढ़े तीन हजार सालों की है जो कि मिस्र के समय से जाहिर है, ऐसा भी माना जाता है कि उनके पैगम्बर बौद्ध और भारतीय संतों और वैज्ञानिकों के संपर्क में रहे और उन तथ्यों को अपने लेखन में शामिल किया| वे अफ्रीका, अमेरिका, भारत और चीन में लगातार अपनी खोयी जनजातियों गुमशुदा पैगम्बरों उनके लेखों की तलाश में रहे|

अहम् बात ये है कि दस हजार सालों के तमाम दस्तावेज आज भी दुरुस्त हैं यद्यपि वे सामान्य जनता के लिए उपलब्ध नहीं| ब्रिटिश या कैथोलिक चर्च के इतिहास के संशोधन को उन्होंने तब स्वीकार किया जब उनका यहूदी गणराज्य दांव पर था और जब यहूदी राज्य बनने के बाद इजराइल अपने अस्तित्व के खतरे में था| इस जबरदस्ती के अर्धसत्य या झूठ के कारण तमाम परंपरागत यहूदी ब्रिटिश या कैथोलिक चर्च को पसंद नहीं करते| उदहारण के लिए दुनिया भर के बहा’ई लोगों का एक तीर्थ है हाइफा या कहें की हक्का| हाइफा.हक्का जहाँ बहा’ई लोगों का सार्वभौमिक केंद्र और हाउस ऑफ़ जस्टिस है वह जगह बहाउल्लाह को गिरफ्त में रखा तब रखा गया जब वे ऑट्टोमन तुर्कों द्वारा निष्कासित किये गए| अगर कोई वहां जाता है और भवन के यहूदी अथवा बहा’ई क्यूरेटर से मिलता है तो वे बताते हैं कि उसके नीचे तेरह संरचनाएं दफ्न हैं जो उस क्षेत्र में सभ्यताओं के प्रवास की निशानी हैं| लेकिन वे अनिच्छा से ये भी स्वीकार करते हैं कि इस जगह की खुदाई की अनुमति नहीं, क्योंकि यहाँ से मानवता के उद्भव और विकास का वह संस्करण मिल सकता है जो कि चर्च को मंजूर नहीं| चर्च मानता है कि पांच हजार साल पहले ईश्वर ने यह ब्रह्मांड छः दिनों में बनाया और सातवे दिन थक के आराम किया|

इससे यह अहम् सवाल सामने आता है कि यहूदियों ने उस परंपरागत संशोधन को स्वेच्छा से क्यों  स्वीकार किया जिसमे उनका दावा 379 ईस्वी से 1069 ईस्वी का कर दिया गया| क्या भारतीय सन्दर्भ में इसे स्वीकार करने के लिए उन्हें इजराइल बनाने का ईनाम दिया गया?

यद्यपि पूरी दुनिया कहती है कि दुनिया की तमाम समस्याओं के लिए यहूदी जिम्मेदार हैं तो इतने ताकतवर यहूदी अपनी ही पवित्र क्षेत्रों की खुदाई क्यों नहीं कर सकते जिसकी सच्चाई के तमाम दावे किये जा रहे हैं, जिनमे से एक जीसस की कब्र भी वहीँ मौजूद है| उनकी हालत आज भी वैसी ही अनिश्चित है जैसी दो हजार साल पहले थी, हर कट्टर इस्लामी और ईसाई ताकत उनको दुनिया के नक़्शे से मिटा देने पर उतारू है| किसी भी स्थायी मित्र के नहीं होने और लगातार बढ़ते दुश्मनों के बावजूद यहूदी अपनी संस्कृति और परम्पराओं के लिए आज भी सचेत हैं| तमाम यहूदियों के समूहों मसलन आरोनिक यहूदियों बनाम मसीहाई यहूदियों, अश्क्नाज़ी बनाम मिज्राही, ईरानी खानाबदोश यहूदियों बनाम यूरोपियन, अफ्रीकन रुस्सियन यहूदियों के तमाम जत्थे तमाम भूराजनीतिक खिलाडियों से जुड़े हैं और सभी इस बात पर सहमत हैं कि वे किसी भी बात पर सहमत नहीं होंगे|

यशस्वी राजधानी नगर-महोदय्पुरम

राजधानी महोदय्पुरम/कोदुन्गल्लुर जहाँ ताम्र पत्र दिए गए

माना जाता है कि ऊपर बताई गईं सभी अनुदान चेर-क्षीर राजाओं के राजधानी नगर/मुख्यालय महोदय्पुरम में दिए गए| भारत के इतिहास में ब्रितानिया दखल के बाद इस शहर को कोदुन्गल्लुर कहा जाने लगा| भारत के इतिहास में इस शहर के बनने की तारीख और इसका अस्तित्व उतनी बड़ी बात नहीं जितना कि ब्रितानिया दखल जिसके चलते ऐसी कोशिशें हुईं कि इस शहर का नाम आम भारतीयों और इतिहासकारों की याददाश्त से दिलो-दिमाग से हमेशा के लिए मिट जाए| इस सूची में ताम्र पत्रों की तारीख 379 से 1069 ईस्वी किया जाना एक अहम् बात है जिसके लिए “चर्च और ब्रिटिशों की इतिहास के समाधान की परंपरा” बनी| इन करतूतों से चर्च ने भारत के इतिहास का घालमेल करके दो हजार सालों में समेट दिया| सवाल है कि क्रिस्चियन हों या मुस्लिम, सभी लोग ऐसे दावे क्यों करते हैं कि राजा अपने भतीजे के साथ ये उसके बगैर धर्म बदलकर क्रिस्चियन या मुस्लिम हो गया और मुख्य मंदिर में से देवी की मूर्ति हटा कर मंदिर के साथ साथ अपनी राजधानी उन्हें सौंप दी? यह मंदिर क्या है? यह राजधानी क्या है? चाहे ज्ञान के मकसद से कहें या व्यापार के लिए वे लोग हजारों सालों से इस राजधानी में समुद्री मार्ग से ही क्यों आते रहे? वास्को डी गामा सीधे इसी राजधानी शहर में क्यों पहुंचा? दुनिया के सभी समूहों के लिए अहमियत रखने वाले इस शहर का जिक्र संगम साहित्य में क्यों नहीं है? या फिर इस जिक्र को जानबूझकर मिटा दिया गया? अथवा ब्रिटिशों ने स्थानीय भाषा में चलाये गए अध्यात्मिक आन्दोलन में आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष अथवा द्रविड़ सभ्यता अथवा की प्राचीनता का बखान करने के लिए नया साहित्य रचा?

इन सवालों में जिस शहर का जिक्र है उसे महोदय्पुरम कहा जाता था| 1524 के बाद इसे पूरी तरह मिटा दिया गया उसके बाद इसकी जगह पद्मनाभपुरम और बाद में थिरुवनंतपुरम को राजधानी बनाया गया| इस शहर के बारे में तमाम आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये हैं|

पहला और सबसे अहम् तथ्य यह है कि इस शहर को सम्राट ललितादित्य ने बसाया| यहाँ पर कश्मीर के शारदा सर्वज्ञ पीठ के साथ साथ मार्तण्ड मंदिर जैसा एक बड़ी सौर और चन्द्र वेधशाला बनायीं गयी| वह इकलौता राजा था जिसने किसी समय पूरी दुनिया को कश्मीर महा साम्राज्य या कहें कि भारत वर्ष के अधीन संगठित किया| भारत का शाब्दिक अर्थ है, “भरण पोषण कर्ता”, सम्राट ललितादित्य ही भारत बना क्योंकि उसमें पूरी दुनिया को संगठित करने की काबिलियत रही साथ ही उसने तब की दुनिया को हिमकाल के बाद पनपी निराशा से बाहर निकाला| ललितादित्य के पहले भारत की उपाधि धारण करने वाले सम्राट सर्वदमन शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र थे| सम्राट सर्वदमन ने भी सारी धरती और सभी समुदायों को एक साम्राज्य के अंतर्गत संगठित किया| “भारत भारतम” “भारत” की वजह से ही इसे “भारत” कहते हैं इसीलिए “भारतवर्ष” भी| सम्राट सर्वदमन के से लाखों साल पहले दूसरा भारतवर्ष था, यह किसी अन्य मन्वंतर की बात है, वह भारत सम्राट भरत (सर्वदमन) के शासन के पहले खुद ही काल कवलित हो गया|

सम्राट ललितादित्य ने अपनी कुलदेवी क्षीर भवानी का मंदिर बनवाया, क्षीर भवानी सरस्वती का अद्वितीय रूप है जिसमें सुरक्षा के लिए ज्ञान और शस्त्र दोनों योग्यतायें प्रतिध्वनित होती हैं| सारे ज्ञात साहित्य में वही अकेली देवी हैं जिनका निरूपण कमर अथवा कंधे पर एक सांप के साथ होता है, यह सृजन के स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों का अद्वितीय मेल है| कश्मीर को सूर्य क्षेत्र कहते हैं, कभी कभी देवी का निरूपण एक सांप से घिरे सूर्य से होता है| यह उस देवी के सूर्य और कश्मीर दोनों की संरक्षिका होने का प्रतीक है| ऐसा माना जाता है कि देवी का महान मंदिर काराकोरम (काराकोटा) में कहीं मौजूद है| ये क्षेत्र तिब्बत और कश्मीर की पहाड़ियों के बीच स्थित है| हालाँकि तमाम कारणों से आज इस मंदिर को खोजना मुश्किल है लेकिन इस मंदिर की एक प्रतिकृति श्रीनगर में मौजूद है| क्षीर शब्द से चेर की उत्पत्ति हुई क्योंकि इस राजाओं को सम्राट ललितादित्य के साम्राज्य विस्तार के दक्षिण क्षेत्र, इसकी राजधानी महोदय्पुरम और वेधशालाओं की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया| माना जाता है कि मंदिर के चौंसठ द्वार थे जिनका आशय चौंसठ ज्ञान स्रोतों से लगाया जाता है जिनकी सुरक्षा के लिए चौंसठ राजाओं को नियुक्त किया गया| वे इन चौंसठ ज्ञान स्रोतों से वैदिक जीवन के चार पुरुषार्थ सीखेते, समझते और अनुभव करने के साथ साथ जीवन में शामिल करते थे| अर्था(त)हल्ली देवी को अर्थ देने वाली भी कहा जाता है| हमारे सवालों में मौजूद इसी मंदिर के बारे में माना जाता है कि चेर राजाओं ने जीते जी आगंतुकों का धर्म स्वीकार किया और देवी की मूर्ति छोड़कर बाकी मंदिर आगंतुकों को दे दिया|

यह प्रतिष्ठित शहर कब बना ये बहस का सवाल है जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे|

यूरोपीयों की परंपरा अपनी भाषा योग्यता के मुताबिक कह पाने की रही, उनके संपर्क में जो भी आया उसे अपने तरीके से नाम दे दिया, इस तरह नामों का यूरोपीय समुदाय में रोमनाइजेशन, एंगलीकाईजेशन,या ग्रीकाइजेशन होता रहा| रोमन लोग इस शहर को मुज़ीरिस कहते हाँ जो कि मिश्र का अपभ्रंहै, मिस्र का प्राचीन अंग्रेजी संस्करण ईजिप्ट है| रोमनों ने इसी इजिप्ट साम्राज्य का विस्तार माना| इस नष्ट हुए शहर के एक हिस्से को आज कोचीन के नाम से जाना जाता है|

पुर्तगालियों ने इस शहर को पूरी तरह से बर्बाद किया, जलाया और धुल में मिला दिया, उनका यह कृत्य उत्तर और दक्षिणी अमेरिका की तमाम सभ्यताओं के विनाश जैसा है, या फिर मुल्तान (मूल स्थान) के सूर्य मंदिर या अनंतनाग के मार्तण्ड मंदिर के विनाश जैसा है, सवाल है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? और फिर इस शहर को पुर्तगालियों से बचाने के लिए हर यहूदी आखिरी सांस तक क्यों लड़ा?

सम्राट ललितादित्य ने ज्ञान का यह समृद्ध शहर अपने समकालीन आचार्य शंकर की सहायता से बनवाया साथ ही यहाँ दक्षिण का सबसे बड़ा शोधकेंद्र और वेधशाला भी बनवाई| यह शहर सभी समुद्री मार्गों से जुड़ा था जहाँ से पर्शिया, अफ्रीका और अमेरिकी बंदरगाहों तक व्यापार होता था, लोग आते जाते थे, और ज्ञान का प्रसार होता था| हमे एक अहम् बात ये भी ख्याल में रखनी चाहिए कि उन दिनों स्वेज नहर या पनामा नहर भी नहीं खुदी थी| इस हिसाब से तब रोमन इस शहर तक आने के लिए इजिप्ट के दाक्षिणी बंदरगाहों या पर्शिया के बन्दर अब्बास (इस्लाम के पहले इसे क्या कहा जाता ये खोज का विषय है) का प्रयोग करके समुद्री यातायात करते थे| ऐसा न करने की दशा में उन्हें अफ्रीका के मेडागास्कर की खाड़ी से होकर महोदय्पुरम आना पड़ता था|

लेकिन सवाल है कि रोमन ईजिप्ट के समुद्र मार्ग से क्यों आते थे जबकि उनके लिए टर्की, ईरान, इराक़ के रास्ते कश्मीर तक सड़क मार्ग मौजूद था और आज भी मौजूद है? सच बात तो ये है कि रोमन व्यापारी और विद्यार्थियों ने इस सड़क मार्ग से भारत आना तब तक जारी रखा जब तक इस रास्ते पर पर्शियन साम्राज्य ने रोक नहीं लगाईं| आज का हेजाज यानि अरब क्षेत्र रोमन साम्राज्य और पर्शियन साम्राज्य के बीच का बफर जोन था| दक्षिण के अध्ययन केंद्र तक जाने के लिए रोमनों ने ईजिप्ट का समुद्री मार्ग पर कब्ज़ा करके महोदय्पुरम का सीधा रास्ता बनाया (मानचित्र देखें)| मिस्र और सोमालिया के लोग इस रास्ते का इस्तेमाल हजारों सालों तक करते रहे| जब अरबों और उसके बाद ऑट्टोमन ने ईजिप्ट पर कब्ज़ा किया तो सारा यूरोप अंधकार युग में डूब गया| ये अंधकार तब तक जारी रहा जब तक वास्को डी गामा ने मेडागास्कर से अफ्रीका होते हुए महोदय्पुरम तक के समुद्री मार्ग की बहाली नहीं कर ली|

सम्राट ललितादित्य ने महोदय्पुरम में मार्तण्ड मंदिर की तर्ज पर सौर वेधशाला और सभी विज्ञानं और कलाओं का अध्ययन केंद्र बनवाया| दक्षिण के सुदूरतम कन्याकुमारी तक मंदिर के चौंसठ द्वार थे| हर द्वार की सुरक्षा एक राजा के जिम्मे थी जिसका अधिपत्य चौंसठ चेर राजाओं का होता था| ईसा से पूर्व पांचवीं शताब्दी तक वे हिमालय और कुमारी के बीच के क्षेत्रधिपति कहलाते थे| ललितादित्य के बाद एक हजार वर्षों तक शासन किया तब आर्य द्रविड़ संघर्ष जैसी कोई चीज नहीं थी, अपवाद में ये जरुर मिलता है कि दक्षिण के अध्ययन केंद्र जिसे के प्रमुख संरक्षकों ने तमाम बार स्वतंत्र राज्य घोषित किये और अपने यानि कश्मीर साम्राज्य अथवा भारत वर्ष के शासन की व्यवस्था बहाल की| तमाम बार उनके बीच युद्ध भी हुए फिर भी अध्ययन केंद्र और मंदिर परिसर सुरक्षित रहा| सम्राट ललितादित्य के साम्राज्य के सभी हिस्सों में ऐसे भीमकाय मंदिर परिसर बनवाए गए| कालांतर में तमाम कारणों से यातायात और संचार के साधन छिन्न भिन्न हो गए, उसके बावजूद इन प्रतिनिधियों ने शासन की परंपरागत व्यवस्था में सूर्य उपासना जारी रखी| ये राज्य तमाम आपसी झगड़ों के बावजूद सम्राट ललितादित्य द्वारा स्थापित शासन की बुनियादी नीतियों का पालन करते रहे| इससे दुनिया भर के राजघरानों में सूर्य उपासना की अवधारणा शुरू हुई| फ़्रांस में लुई सोलहवें और सत्रहवें के शासन तक ये परंपरा जारी रही इसी के चलते वे सन किंग कहे गए| जब तक इन छोटे राज्यों उनके व्यापारियों, प्रजाओं, वैज्ञानिकों, विद्वानों और दार्शनिकों ने मुख्य उत्तर पूर्व या उत्तर पश्चिम के अध्ययन केन्द्रों का अनुसरण किया वे अपनी समृद्धि की महत्वाकांक्षाओं और अध्यात्मिक दुर्दशा के समाधान के लिए यहाँ आते रहे| चाहे वह निष्कासन हो या ज्ञान प्राप्ति के मकसद से, इस तरह हमे जीसस, मूसा, पारसियों और यहूदियों के कश्मीर आने के वर्णन मिलते हैं| इसी तरह रोम और इजिप्ट के संतों, व्यापारियों और आम लोगों के भी महोदय्पुरम और कश्मीर आने का सिलसिला जारी रहा| ज्ञान प्राप्ति और जीवन अनुभवों के लिए इजिप्ट, रोम और पर्शिया में रहने वाले यहूदी दार्शनिक, व्यापारी और वैज्ञानिकों ने भी कश्मीर और महोदय्पुरम की यात्रा करते रहे|

इसी सन्दर्भ में यहूदियों, क्रिस्चियन और मुस्लिमों को भी इस राजधानी क्षेत्र में रहने के व्यापारिक विशेषाधिकार भी दिए गए| तमाम ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं और अब पुरातन अवशेषों से भी इस बात का पता चलता है कि तमाम व्यापारियों ने मंदिरों और अध्ययन केन्द्रों को तोहफे और सिक्कों की सौगातें भी दीं| आज के कोदुन्गल्लुर कहें या कि प्राचीन महोदय्पुरम की खुदाई में मिले सिक्के इस बात के सबूत हैं कि हमारे सम्बन्ध सिर्फ रोमनों के साथ ही नहीं हजारों सालों से रोमन और इजिप्ट के लोगों के साथ भी जारी रहे|

ब्रिटिशों ने भारत के इतिहास में घालमेल का सिलसिला क्रिस्चियन दस्तावेजों के पांच हजार सालों के मुताबिक करना शुरू किया तो ललितादित्य के कार्य आड़े आये| इसलिए उन्हें कश्मीर साम्राज्य यानि भारतवर्ष और ललितादित्य के सभी दस्तावेजों को मिटाना पड़ा| आज के आजाद भारत में किसी इतिहासकार या आम आदमी को ये नहीं पता कि ललितादित्य कौन था जिसके लिए ब्रिटिशों ने भारत के महान इतिहास को रणनीतिपूर्वक मिटने का कार्य लम्बे समय तक किया| अमर चित्र कथा ने उनके बारे में बच्चों के लिए एक कहानी प्रकाशित की है| वह सम्राट जिसने मंगोलों के साम्राज्य के दस गुने और सिकंदर के जीते राज्य के पच्चीस गुने से ज्यादा बड़े भूभाग पर शासन किया, इस तरह उसके बारे में भारतीय मानस से हर स्मृति मिटा दी गयी|

इस प्रकार सम्राट ललितादित्य के जीवन और मृत्यु की तारीखों को ऐतिहासिक घालमेल की परंपरा में मिटाने की करतूत की गयी| ललितादित्य और शंकराचार्य की तारीखों को 700 ईस्वी कर दिया गया| शंकर के सभी मठ अंग्रेजों के साथ इसी समझौते के साथ साबित रह सके कि वे ब्रिटिशों का बताया वही कालक्रम रटते रहेंगे| शारदा सर्वज्ञ पीठ को कश्मीर से श्रृंगेरी पहुँचाया गया| जैसे ही ललितादित्य और शंकर का कालक्रम बदलकर 700 ईस्वी हुआ, ये समकालीन इतिहासकारों के बीच बड़ी बहस का मुद्दा बना लेकिन तब के राज्यों के दस्तावेजों में उस दर्जे का ऐसा कोई सम्राट या अध्यात्मिक गुरु नहीं था| आचार्य शंकर के निर्देश में सम्राट ललितादित्य के बनवाए चरों अध्ययन केंद्र या तो समुद्र में डूब गए जैसा द्वारिकापुरी और पुरुषोत्तमपुरी में हुआ या फिर नष्ट कर दिए गए, जैसा कि कश्मीर और महोदय्पुरम में हुआ| मालूम होता है कि आज के चार केन्द्रों को असली की तरह प्रचारित किया गया और शंकर की भूमिका संकुचित करके शैवागम तक सीमित कर दी गयी| महोदय्पुरम के बदले में कांची मठ बना और कश्मीर के शारदा सर्वज्ञ पीठ की जगह सृन्गेरी पीठ ने ली|

एक बेहूदा किस्सा फैलाया गया कि शंकर अरबों को शारदा सर्वज्ञ पीठ को अरबों के हाथों बर्बाद होते देखा था इस तरह शारदा की एक तस्वीर कपडे पर बनाई गयी जिसे सृन्गेरी में प्रतिष्ठित कर दिया गया| लेकिन किवदंतियों के अनुसार मानें तो शारदा सर्वज्ञ पीठ के गर्भ गृह, जिसके नीचे सरस्वती नदी निकलती थी, में एक प्रस्तर घोषणापत्र के अलावा शारदा का कोई चित्र नहीं था| यह नदी जिसे नीलम नदी कहा जाता है और पूरा सर्वज्ञ पीठ आज पाक अधिकृत कश्मीर के पश्चिम में मौजूद है|

इन अध्ययन केन्द्रों में ज्यादातर वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और अध्यात्मिक साहित्य का भण्डार था| इतिहास में घालमेल के लिए ब्रिटिशों के लिए उसका मिटाया जाना जरुरी था| लेकिन दिक्कत ये थी कि वहां कुछ भी लिखित रूप में नहीं था जिसे आसानी से नष्ट किया जा सके या मिटाया जा सके| समस्या ये थी कि पत्थरों की खुदाई आसानी से मिटाई नहीं जा सकती थी| दूसरी दिक्कत ये थी कि कश्मीर के मुख्य केंद्र में मौजूद भण्डार तमाम परिवारों के अनुवांशिक भण्डार में था जिनके यहाँ इस साहित्य की साधना भी होती थी| वे परिवार इस साहित्य को किसी को देने को तैयार नहीं थे परन्तु देखने और पढने की स्वीकृति दे देते थे| इसलिए ब्रिटिशों के लिए यह भी बहुत जरुरी था कि वे इसे अवरुद्ध क्षेत्र बनायें ताकि रुसी फ्रेंच या जर्मन सड़क मार्ग से भारत न आ सकें, ये उनके ग्रेट गेम का सिलसिला था| इसके लिए उन्होंने इस्लामी पठानों का अवरोध बनाया| ये जबरदस्त रणनीति कारगर रही|

कश्मीर में मुख्य अध्ययन केंद्र में ज्यादातर बर्बादी या तो ब्रिटिशों के नाम रही या फिर उनके जागीरदारों के, जिन्होंने कमोबेश हर खजाने को लूटा और सस्ती चीजें ब्रिटिशों को सौंप दीं बाकी ऊँचा दाम लगाने वालों को बेच दीं| कश्मीर में ब्रिटिशों के लिए ये काम डोगरा राजाओं ने किया जिन्होंने इसकी शुरुआत महाराजा रणजीत सिंह का खजाना लूटने से की| इन सामंती जागीरदारों की बर्बरता दूसरे मजहबों पर भारी पड़ी क्योंकि उन्हें बताया गया था कि भारत का विनाश सिर्फ अरबों और मुस्लिमों ने किया| इससे ब्रिटिशों का एक अहम् मकसद पूरा हुआ| वे मनोवैज्ञानिक और मानसिक तौर पर ये साबित करने में सफल रहे कि भारतीय पराजित हैं और वे अरबों और मुस्लिमों के आक्रमण का प्रतिरोध तक नहीं कर सकते| अपनी संस्कृति और विरासत बचाने के लिए उन्हें श्रेष्ठ ब्रिटिशों की मदद लेनी होगी| दक्षिण में जहाँ कोई अरब नहीं था वहां एक नया ट्विस्ट आया, वहां ये किस्सा गढ़ा गया कि स्थानीय राजाओं ने अपने धार्मिक भरोसे के चलते अपने राज्य खुद बा खुद बर्बाद कर दिए| यह इसलिए भी जरुरी था ताकि द्रविड़ों के बीच आर्यों के आक्रमण के विरोध में एक सुधारवादी आन्दोलन चलाया जा सके| ब्रिटिशों को बहुत अच्छे से पता था कि आर्यों के आक्रमण जैसी कोई बात नहीं| अगर हिमालय से कन्याकुमारी तक का राज्य चेर राजाओं के पास रहा तो कौन आर्य और कौन द्रविड़| एक बात जो ब्रिटिश बताने में नाकाम रहे वो ये थी कि 1740 तक पेशवा शासन आते-आते इस्लाम की राजनीतिक ताकत लगभग ख़त्म हो चुकी थी और तब पूरा पेशवाओं के नेतृत्व में पूरा भारत एकजुट हो रहा था| इस तरह ब्रिटिशों ने न केवल एक ऐसे आक्रमणकारी को गढ़ा जो कभी था ही नहीं साथ ही साथ असल ऐतिहासिक घटनाओं को भी मिटाया| उन्हें पेशवाओं से नफरत थी क्योंकि वे लम्बे समय तक पेशवाओं को काबू नहीं कर सके|

ब्रिटिशों के फूट डालो और राज करों की रणनीति में एक दिक्कत कश्मीर में आई| फूट डालो और राज करो नीति का पहला कारनामा था जिसमे हिन्दू मजहब बना, ये बंटवारा उस हिन्दू और बौद्ध प्रतिद्वंदिता के आधार पर हुआ जो कभी थी ही नहीं| कश्मीर ही नहीं पूरे भारतवर्ष में जो भी विष्णु मंदिर बने उनमे बुद्धा की मूर्ति विष्णु के अवतार के रूप में मौजूद रहती थी| इसका अर्थ ये हुआ कि उस समय नाम चाहे जो भी हों, सभी पूर्वी देशों में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराएँ बहाल थीं| भारतीय इतिहास में घालमेल करने में ब्रिटिशों का मुख्य उद्देश्य तो यही था कि लम्बे समय तक भारतीयों को उनकी जड़ों से दूर रखा जा सके जो कि ब्रिटिश के जाने के बाद भी जारी रहे| ऐसी बौद्धिक अराजकता में बुद्ध की पूजा और विष्णु के अवतार में सत्य की खोज करने वालों के बीच विभेद हो| इसलिए कश्मीर के सभी विष्णु मंदिर या तो नष्ट कर दिए गए या फिर झेलम नदी की बाढ़ में नष्ट हो गए| ब्रिटिशों का ही अनुसरण करते हुए हम भी बाँध और सड़क बनाने के लिए मंदिरों को विस्थापित किये जा रहे हैं| इससे एक और मकसद पूरा होता है जिसमे ये कहा जा रहा है कि कश्मीर तो सिर्फ कश्मीरी शैव सिद्धांतों के लिए है और इसका भारत के घोषित धर्म हिंदुत्व से कोई लेना देना नहीं|

हमे याद रखना चाहिए कि विस्थापन भी एक तरह से प्राचीन संरचनाओं को नष्ट करने और उन्हें अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों में भारी मुनाफे में बेचने के लिए एक महिमामंडित काम है| जहाँ विस्थापन संभव नहीं था वहां एक अनोखी अफवाह फैलाई गयी कि कि बौद्ध धर्म का कालक्रम हिन्दू धर्म से पहले का है और ये संरचनाएं बौद्ध विहार हैं जिन्हें बाद में हिन्दू मंदिर बना दिया गया, यह आपसी कलह बोकर भविष्य के धार्मिक संघर्षों की एक दूसरी फसल तैयार की जाती रही| इसी दृष्टिकोण से महोदय्पुरम के अर्थाली मंदिर को भी एक बौद्ध विहार बताया गया जिसे राजाओं ने हिन्दू मंदिर बना दिया और बाद में मुस्लिम और ईसाईयों को दे दिया गया|

कश्मीर और दक्षिणी चेर साम्राज्य के मंदिरों के संबंधों को अलग किया जाता रहा| कश्मीर में हर वो चीज जो मूल्यवान है उसे भी अलग किया गया, नष्ट किया गया और साम्राज्य की सभी स्मृतियों को नष्ट करके इतिहास में घालमेल जारी रहा ताकि आर्यों के आक्रमण और द्रविड़ों का संघर्ष जड़ें जमा सके| लेकिन इसे करने में दो समस्याएं सामने आयीं| पहली ये कि पत्थरों की भारी संरचनाएं, सूर्य मंदिर, सौर वेधशालाएं और दूसरे धार्मिक केन्द्रों में अभिलेख मौजूद थे| दूसरी दिक्कत ये थी कि इन संरचनाओं के दस्तावेज कल्हण की राजतरंगिणी में अभिलिखित थे| पत्थरों की संरचनायें, शिलालेख ब्रिटिशों और उनके पिट्ठुओं ने बर्बाद किये जिनका आरोप सातवीं शताब्दी के अरबों और जनजातीय तमिल राजाओं पर लगाया गया| इनके ब्योरे चाच्नमा और संगम साहित्य में मौजूद हैं| इस प्रकार सभी कलाकृतियों को लूटकर लन्दन के नीलामी घरों को बेच दिया गया| जिसे नष्ट नहीं किया जा सका उसे पिट्ठू राजाओं और अंग्रेजों के संग्रहालयों में पहुंचा दिया गया| इन संग्रहालयों से लगातार तस्करी करके ऊंचे दामों पर बेचने का सिलसिला चलता रहा, आज भी जारी हैं| सार्वभौमिक अध्ययन केंद्र रहे कश्मीर को शैव सिद्धांतों तक सीमित कर दिया गया| कश्मीरी समाज दो हिस्सों में बंट गया जिनमे से एक को अंग्रेजों के बनाये अन्तराष्ट्रीय कट्टरवादी गिरोहों ने वित्तपोषित करना जारी रखा और दूसरा समूह भारत सरकार के साथ बना रहा जिसे राष्ट्रवादियों अथवा सेकुलरों का समर्थन मिलता रहा| इन समूहों के आपसी संघर्ष से कश्मीर और केरल में वह सब भी नष्ट होता रहा जिसे अंग्रेज कभी नष्ट नहीं कर सके थे|

कल्हण का सवाल

कल्हण और राजतरंगिणी बचे रहे| इस साहित्य में कश्मीर और भारत वर्ष की प्रतिष्ठा का ब्यौरा मिलता है| इसमें सम्राट ललितादित्य की उपलब्धियों को भौतिक समय और परिस्थितियों के वास्तविक विवरण भी मौजूद थे| कश्मीर और भारत के इतिहास का घालमेल के शुरुआती सालों में इस साहित्य की भी खोज कर कब्जे में करने की कोशिश की गयी| ब्रिटिश खुफिया के अनुभवी और बुजुर्ग जासूसों को इस साहित्य की प्रतियाँ खोजने के लिए लगाया गया तो पता लगा कि असली साहित्य कल्हण के उत्तराधिकारियों के पास मौजूद है| यही इकलौती प्रति है जिसमे ललितादित्य के बनवाए गए महोदय्पुरम के साथ साथ सौर और चन्द्र वेधशालाओं के चौंसठ द्वारों का जिक्र मौजूद था| इस साहित्य में ललितादित्य द्वारा पूरी और द्वारिका के पुनर्निमाण का भी जिक्र है, साथ ही पूरी दुनिया में सूर्य मंदिरों के भी विवरण मौजूद रहे| यही वह साहित्य है जो बताता है कि ललितादित्य ने श्रीक्त यानि साइबेरिया से दक्षिण अमेरिका तक समान रूप से मानवीय मूल्यों को स्थापित किया| इसी साहित्य में ललितादित्य द्वारा चेर/क्षीर राजाओं को नियुक्त करने की जानकारी मिलती है जिनके जिम्मे कश्मीर साम्राज्य का दक्षिणी हिस्सा (जिसे आजाद भारत में हिमालय से कुमारी तक के क्षेत्र को कहा जाता है) दिया गया जिसमे महोदय्पुरम का अध्ययन केंद्र भी शामिल था| जब तक इसे अमान्य नहीं करार दिया जाता बदनाम नहीं किया जाता ब्रिटिश भारत के गुलाम भारतीय कश्मीर या भारत वर्ष की वास्तविक प्रतिष्ठा के अनुरूप खुद को बदल सकते हैं| अंततोगत्वा ब्रिटिश कामयाब हुए और कल्हण के जीवित उत्तराधिकारी ने लाहौर के संग्रहालय में नौकरी की दरख्वास्त की| इसके बाद का सब कुछ इतिहास भर रह गया| उसे नौकरी मिली और समझौते में ब्रिटिशों को राजतरंगिणी| इसके बाद पचास सालों तक कोई इसे हाथ नहीं लगा सका| पचास सालों के बाद इस साहित्य का ब्रिटिश संस्करण प्रकाशित हुआ जिसमे ललितादित्य एक कश्मीरी राजा भर रह गए और उनका कालक्रम 700 ईस्वी हो गया साथ ही यह बात उनकी उपलब्धि मानी गयी कि उन्होंने अरबों को भारत से बाहर भगाया| इस कवायद से आगे की पीढ़ियों को ये समझाने में सफलता मिली कि जिस राज तरंगिणी में शक्तिशाली कश्मीरी राजाओं खास तौर पर तीसरे भरत सम्राट ललितादित्य और उनकी राजधानी महोदय्पुरम और इसकी सौर वेधशालाओं का उल्लेख है, उसे ऐतिहासिक दस्तावेज या सन्दर्भ मानने की बजाये राजा की अतिशयोक्ति पूर्ण गाथा मान लिया जाए| ऐसा कोई पराक्रमी राजा 700 ईस्वी में खोजने से नहीं मिला|

ब्रिटिशों ने यह महसूस किया कि अगर भारतीयों को किसी भी समय ये पता लग गया कि अरबों का आक्रमण एक मिथक है तो उस मिथक को ललितादित्य के साथ जोड़कर संकुचित कर दिया ताकि भारत कभी अपने महानतम राजा का सम्मान न कर सके| ये बिलुकल उसी तरह हुआ जैसे हम सुभाष चन्द्र बोस का सम्मान नहीं कर सकते जिन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ युद्ध लड़े इसी तरह ललितादित्य को भी दरकिनार कर दिया गया| इस प्रकार महोदय्पुरम को भी उसके समकालीन दूसरी उपलब्धियों की तरह भुला दिया गया|

कल्हण के समस्त कार्य को एक मनगढ़ंत काव्य की तरह दरकिनार कर दिया गया, जबकि चाच्नामा जैसी काल्पनिक कथा को वास्तविक अर्थों में ऐतिहासिक तथ्यों की तरह पेश किया गया| ललितादित्य की तरह ही शंकर को भी आगे बढ़ा के 700 ईस्वी कर दिया गया| महोदय्पुरम का नाम बदलकर कोदुन्गल्लुर कर दिया गया जो कि तमिल भाषा का या क्रेन्गानोर डच स्वर का या मुज़ीरिस एक रोमन भाषा का नाम मालूम होता है|इस शहर की भीमकाय सौर वेधशालाओं को सभी सन्दर्भों से हटा दिया गया| महोदय्पुरम की सभी संरचनाओं को धूल में मिला दिया गया| कश्मीर में किये गए इस विनाश को धर्म परिवर्तित करके इस्लाम कबूल किये ब्राह्मण राजा के नाम किया गया| निराश राजा इस्लाम कबूल करके सुल्तान बना फिर उसने कश्मीर को बर्बाद किया फिर मार्तण्ड मंदिर और उसकी प्रस्तर संरचनाओं के निशान तक मिटा दिए| क्षीरल या कहें कि केरल में कोई नहीं जानता कि पूरे महोदय्पुरम या मार्तण्ड मंदिर को किसने नष्ट किया|

इसे ऐसे शहर के तौर पर जाना जाने लगा जिसे मुस्लिम क्रिस्चियन अथवा व्यापारियों अथवा सीरियन क्रिस्चियन समुदाय को हमेशा के लिए दे दिया गयाजहाँ भारतीयों के निशान तक नहीं मिलते| रोम इत्यादि देशों के साथ बने व्यापारिक संबंधों को मिटा दिया गया आज वे चर्च के हाथों में हैं| तेरहवीं शताब्दी के बाद से जितने भी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दस्तावेज अथवा साहित्य चोरी गए आज भी वे पुर्तगाल अथवा रोम में संरक्षित रखे मिलते हैं| चोरी गए इस साहित्य को वापस लाने के लिए डॉ. कुरियन के नेतृत्व में केरल के ईसाईयों ने चालीस सालों से लगातार अपना प्रयास जारी रखा है| जबकि बेचैन और निराशराष्ट्रवादियों, देशभक्तों, वामपंथियों और सेकुलरों की ज्यादा चिंता रही कि राष्ट्रीय निराशा से बाहर निकलने के लिए ब्रिटिशों की मदद कैसे ली जाये| इस प्रकार जिस हीनभावना और दूसरे मजहबों के प्रति दुविधापूर्ण वैमनस्य की बीमारी भारतीयों को लगी वो सबसे पहले ब्रिटिशों ने रची|

एक बार पत्थरों की संरचनाएं बर्बाद हो गयीं तब ब्रिटिशों ने स्थानीय राजाओं के संगम साहित्य की कविताओं और प्रार्थनाओं में उन्हें सर्वोपरि दिखा के इसे ठोस चट्टानी ऐतिहासिक तथ्यों की तरह प्रस्तुत करना शुरू किया, जिसमे इस बात का खास ख्याल रखा गया कि महोदय्पुरम या कश्मीर का उपलब्ध का विवरण बिलकुल भी न हो और अगर मिले भी तो अस्पष्ट हो| और अगर कोई जानकारी संगम साहित्य में मौजूद नहीं तो वह इतिहास नहीं!!! जैसे अगर कोई जानकारी चाच्नामा में नहीं तो यह भारत का इतिहास नहीं| इलियट ने इसे ही भारतीयों द्वारा बताया गया भारत का इतिहास कहा है| ये इतिहासकार कौन हैं? वे मुंशी जिन्होंने ब्रिटिशों को पर्शियन सिखाई और संस्कृत के स्थानीय विद्वान जिन्होंने ब्रिटिशों को भाषा सिखाई और वे कट्टर भाषाविद जिन्होंने ब्रिटिशों के लिए कवितायेँ रचीं जिन्हें संगम साहित्य में शामिल किया गया|

जैसा कि ऊपर जिक्र है कि इलियट और अन्य इतिहासकारों के मुताबिक दक्षिण भारत का विनाश स्थानीय राजाओं ने ही किया| चोल पूर्व पत्तायम (प्राचीन चोल दस्तावेज) नाम की तमिल पाण्डुलिपि जिसकी तारीख स्पष्ट नहीं है, में तमिल और द्रविड़ियन राजवंशों के दैवीय उत्पत्ति की किवदंती मिलती है, इस किवदंती में शालिवाहन (जिसे भोज के नाम से भी जाना जाता है) 1443 ईस्वी में विक्रमादित्य को परास्त करता है और शिव और विष्णु के उपासकों को सताने लगता है| जब (विष्णु और शिव दोनों के) उपासक चिल्लाते हुए शिव के पास जाते हैं तो शिवजी उनके लिए तीन तमिल राजाओं को बनाते हैं: वीर चोल, उल चोल और वज्रंगा पाण्ड्य| इन राजाओं के तमाम साहसिक कारनामे हैं जिनमे खजाने की खोज और शांतनु (महाभारत काल में युद्ध के पहले) से विक्रमादित्य काल (जो कि पहली शताब्दी का माना जाता है और वास्तविक अर्थों में तो मौजूद ही नहीं) तक के हिन्दू राजाओं की गाथाएं मिलती हैं| अंततोगत्वा 1443 ईस्वी में वे शालिवाहन को परास्त करते हैं| इलियट और दूसरे इतिहासकारों के मुताबिक शालिवाहन को परास्त करने के बाद ये तीनों राजवंश आपस में लड़ने लग गए और एक दूसरे के राज्यों और मंदिरों को बर्बाद कर दिया, इसी प्रक्रिया में महोदय्पुरम के भी विनाश हुआ|

ये किस्सा हेजाज की उस लड़की के किस्से जैसा है जो अरब सागर में कहीं से चीखी थी| यह उन पहले चार आदेशों जैसा मालूम होता है जिसमे कहा गया है कि “मै तुम्हारा भगवन हूँ सभी भगवानों और उनकी तस्वीरों को नष्ट करके तुम मेरे पास आओ”| दूसरा बिंदु है जब शालिवाहन परास्त हुआ तो शक्तिशाली विजय नगर साम्राज्य मौजूद था जिसका उनके दस्तावेजों में कोई जिक्र तक नहीं| तीसरा अहम् बिंदु है कि 1400 ईस्वी में कोई तमिलनाडु को नहीं जानता था जिसका अर्थ ये है कि उस समय तमिलनाडु कर्णाटक और केरल के बीच राज्यों का कोई भाषाई बंटवारा नहीं था| यह बंटवारा तो 1950 में हुआ| लेकिन किस्से में जिस तमिल राजा को भगवन शिव ने बनाया कुछ समय बाद उनमे से एक बाद में मलयाली बन गया| ये किसी नए नए स्कूल मास्टर के पहले लेक्चर में बच्चों को सुनाये जाने वाले किस्से जैसा है| ऐतिहासिक रूप से बुद्धूओं जैसा|

ये आश्चर्यजनक है कि भारतीय बुद्धिमानों में किसी के पास इस बात के लिए कोई तर्क या सवाल नहीं कि अगर शिव जी 1443 में भक्तों की पुकार सुनकर शालिवाहन को हराने के लिए तीन राजा बना सकते हैं तो फिर वे इसके चार सौ साल पहले जब सोमनाथ मंदिर की तबाही हो रही थी तो किसी राजा को सोमनाथ की बर्बादी रोकने क्यों नहीं भेजा? यह कहानी भी इलियट की परंपरा की है उन्होंने अरबों के सिंध और कश्मीर पर कब्जे की कहानी रची जो कभी हुई ही नहीं, बल्कि इस कहानी को अनुसंधानकर्ताओं को भ्रम में डालने के लिए गढ़ा गया ताकि वे असल गुनाहगारों तक सोच भी न सकें| इसी तरह पुर्तगालियों द्वारा किये गए अत्याचारों के भी तमाम दस्तावेज मौजूद हैं जिसमे ब्राह्मण और यहूदी तबकों के साथ बेहिसाब अतिक्रमण, लूट, बलात्कार और नर संहार की घटनाएँ दर्ज हैं| ये सभी घटनाएँ 1501 से 1650 ईस्वी तक जारी रहीं उसके बाद ब्रिटिशों ने इस कब्जे को सौंप दिया गया| हजारों, मंदिरों मस्जिदों और यहूदी सभाघरों के साहित्य को को या तो जला दिया गया या फिर नष्ट करके धूल में मिला दिया गया अथवा चर्च में तब्दील कर दिया गया| सुरक्षा के लिए तमाम आबादी ने अपने साहित्य के साथ गोवा से मालाबार आकर चेर राजाओं के यहाँ शरण ली|

पुर्तगाली तब भी उनके पीछे पड़े रहे (सारी सम्पदा लूटने के बाद) उन्होंने  मालाबार में भी यहूदी और गैर यहूदी आबादी के साहित्य की तलाश जारी रखी और अंततोगत्वा महोदय्पुरम पर कब्ज़ा करके उसे धूल में मिला दिया| यह भारतीय इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय है जिसका जिक्र इतिहास में नहीं मिलता है न ही इसकी चर्चा किसी अध्येता समूह के बीच हो रही है| छपे हुए साहित्य में जितना स्थान अरब आक्रमणों को दिया गया वह वास्तविक इतिहास की लीपापोती भर है जिससे भारत में पुर्तगालियों के विनाश के काले कारनामों को छिपा दिया गया| बाद में ब्रिटिशों ने इस काम को शैक्षणिक गतिविधियों के घालमेल करके पूरा किया|

1443 की यही तारीखें भारतीय राजाओं के उन काल्पनिक किस्सों की भी है जिसमे उन्होंने भारतीय राजाओं के आपसी झगड़ों का ताना बाना बुना| ये घालमेल की परंपरा उसके सौ साल बाद 1524 में हुई| क्या उसी दौरान पुर्तगालियों ने गोवा से महोदय्पुरम तक के पश्चिमी तट तक यहूदी बस्तियों को खोजकर उनको कब्जे में लिया?

मिशनरी जासूस फ्रांसिस ज़ेवियर ने कहा कि भारत का ईसाईकरण तब तक नहीं हो सकता जब तक ब्राह्मणों को नहीं मिटा जाता, उसी पादरी की सलाह पर हजारों ब्राह्मणों की हत्या कर दी गयी और ब्राह्मण बस्तियों को नष्ट कर दिया गया | यहूदियों को ज्ञान की चाहत थी और वे ब्राह्मणों जैसे लगते थे इसलिए दोनों को नष्ट होना ही था| पुर्तगालियों ने ब्राह्मण और यहूदियों के सभी खजाने और ऐतिहासिक दस्तावेज खंगाले और पाया कि ये सृष्टि के प्रारंभ के 5000 साल वाले ईसाई संस्करण से भी ज्यादा पुराने हैं इसलिए उन्होंने इन सभी दस्तावेजों को लूट के बाद नष्ट कर दिया ताकि कोई सबूत ही न बचे| यही काम उन्होंने ब्राज़ील में भी किया बिलकुल वैसे ही जिस तरह स्पेनिश अमेरिका में करते रहे| बाद में जब ब्रिटिश और चर्च इस बात पर सहमत हुए कि फ़्रांस को भारत से चुनौती दी जाए तो पुर्तगालियों ने लूट के माल के साथ साथ सारा कब्ज़ा ब्रिटिशों को दे दिया| कैथोलिक चर्च के समझौते में ये पुर्तगाली राजकुमारों की ब्रिटिश राजघराने के साथ हुई शाही शादी में दहेज़ के जैसा था| इसके बाद जो काम पुर्तगालियों से बाकी रह गया था उसे ब्रिटिश लोग पूरा करते रहे| यहूदियों को इस प्रकार के नरसंहार और यूरोप के अतिक्रमण की जानकारी पहले से ही थी इसलिए उन्होंने महोदय्पुरम पर पुर्तगालियों के कब्जे को रोकने के लिए जी जन से लड़े क्योंकि हजारों सालों से यहाँ उनके पैगम्बर आये, बसे और शांति से रहे जिसके लिए इसे दूसरा जेरूसलम कहा जाता है|

या फिर ये किस्सा आंशिक रूप से सत्य है जिसे अंग्रेजों ने एक पहेली की तरह रचा जो भारतीयों को सुलझानी है| भारतीयों के लिए कश्मीर के कठपुतली राजाओं की तरह अट्ठारहवीं शताब्दी में उन्होंने तीन राजाओं को खड़ा किया जिससे कि वे कठपुतली राजा खजाने और पाषण आलेखों की खोज करते रहे और ब्रिटिश उसे नष्ट करते रहे या फिर अपने साथ ले जाते रहे| अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर वे पाषण आलेख और खजाने कहाँ हैं? 1443 में मिले खजाने और पाषण आलेख कहाँ गए? उस समय दक्षिण भारत में कोई अरब आक्रमणकारी नहीं देखा जा सका जब कोई अरब आक्रमणकारी आया ही नहीं तो फिर किसने लूटा और बर्बाद किया? इतना तो स्पष्ट है कि अगर मुग़लों और अरबों ने दक्षिण भारत को नहीं लूटा और बर्बाद किया तो फिर ये काम किसका था? इन सभी सवालों का जवाब हमें तब मिलेगा जब हम इस सत्य को जाने कि हम क्या हैं और समय और स्थान के तौर हमारी हैसियत क्या है और जब हम मानवता के लिए अपनी जिम्मेदारियों की भूमिका समझ सकेंगे तो सारे जवाब एक शब्द में मिल जायेंगे|

ब्रिटिशों ने ये पक्का किया कि कश्मीर और महोदय्पुरम के बीच कोई सम्बन्ध न रह जाये| उन्होंने इसकी भी ताकीद की कि इस अहम् मसले में कभी भी कोई सोच भी न सके| इस दिशा में की गयी कोई भी खोज या अनुसन्धान उनके एक सौ पचास सालों की करतूतों का खुलासा कर देगी कि उन्होंने कैसे बहुसंख्यक समुदाय को बौद्धिक रूप से जाहिल बना कर खड़ा किया|

कहीं ऐसा तो नहीं कि इस दिशा में जब चेर राजवंश (पद्म्नाभदास चेर) के सदस्य शशि थरूर ने एक कश्मीरी महिला सुनंदा पुष्कर से विवाह किया और भारतीय इतिहास के जबरन भुला दिए गए सत्य को उजागर करने की कोशिश की तो उन्हें सुनंदा पुष्कर की हत्या का इनाम दिया गया?

ब्रिटिश ने भारत की हर चीज को न केवल बर्बाद किया बल्कि ये करने के लिए उन्होंने अपने कठपुतली शाही घरानों के अनुचरों, हत्यारों और जासूसों का संजाल तैयार किया जिससे भारतीय राजनीती में लेफ्ट राईट और सेंटर के तमाम रंग बने| इनका काम ये सुनिश्चित करना है कि भारत के निकटवर्ती भविष्य में कोई ब्रिटिशों की करतूत की दिशा में सोच कर उन्हें उजागर भी न कर सके| महात्मा गाँधी और नेताजी सुभाष जैसे बड़े व्यक्तियों की हत्या इसका आखिरी पड़ाव है|

जब ये इतिहास के घालमेल की प्रक्रिया ख़त्म हुई तो ये ऐतिहासिक परंपरा के तौर पर प्रकाशित हुई| क्या जिन यहूदी दस्तावेजों और पाषाण आलेखों में महोदय्पुरम का जिक्र मिलता है वे चेर राजा चेरमण पेरुमाल यानि भास्कर रवि वर्मा द्वितीय ने दूसरी और तीसरी शताब्दी में दिए? क्या 379 की घटना का कालक्रम यहूदियों से जबरदस्ती 1069 का करवाया गया? इसके लिए जरुरी था कि एक जोड़ी ताम्र पत्र बनें लेकिन वैधानिक रूप से तो ये जालसाजी ही थी| जैसा कि ऊपर बताया गया है कि यहूदियों के पास इजराइल राज्य बनाने या 379 वाले ताम्र पत्र स्वीकार करने के के बीच किसी एक को चुनना था| उन्होंने पहले को चुना क्योंकि ऐसा न करने पर उन्हें ब्रिटिश की धुन पर नाचना पड़ता जो उनके लिए ज्यादा पीड़ादायी होता| क्या भास्कर वर्मा की उपाधि हटाकर इसे फ्री होल्ड कर दिया गया जिस केरल के हर उस शासक के नाम से जोड़ा गया जिसने समय समय पर अनुदान दिए? क्या इसी मकसद से चाँद के दो टुकड़े होने और राजा के साथ साथ उसके भतीजे के इस्लाम कबूल करने की कहानी रची गयी?  इसके बावजूद भी क्या हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय को इतिहास का ब्रिटिश संस्करण में भरोसा है जिसके चलते उन्होंने इन ताम्र पत्रों को तोहफे के तौर पर इजराइल को दे दिया?

या फिर कुछ और भी है जो इससे भी ज्यादा जटिल है?इतिहासकारों के मुताबिक हिब्रू वर्णमाला या लिपि का पहला दस्तावेज 800 ईस्वी पुराना है| यहूदियों का सबसे पुरानी मूसासंहिता पहली बार ग्रीक में लिखी गयी उसके बाद हिब्रू प्रति बनाई गयी| मृत सागर की मूसासंहिता को 1946 में ये खोजा गया जिसके बारे में कहा जाता है कि हिब्रू में बनी ये किताब 79 इसवी की है और इसके बारे में भी तमाम विरोधाभास हैं| ताम्र पत्रो की जो भी नकलें अनुवाद के लिए दी गयीं उनके बारे में आरोप लगा कि असल मूसासंहिता अमेरिका में है जिसे 1994 तक आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं किया गया, और वहां भी उसकी नक़ल ही जारी की गयीं| तमाम इतिहासकार ये भी कहते रहे कि ये डमस्कस के लेखों की नकलें हैं जो इजिप्ट से आयीं और महज 900 साल पुरानी हैं| तमाम अध्येता ये भी दावा करते हैं कि 800 ईस्वी के पहले हिब्रू लिपि मौजूद ही नहीं थी| इन सबसे ज्यादा बुरी बात तो ये है कि इजराइल के पुराने भवनों में मिले पाषाण आलेख भी ग्रीक में हैं और उन्हें भी हिब्रू में तब अनुवाद किया गया जब ये लेखन लिपि बन सकी| जाहिर है कि पीतल की पट्टियों पर जो भी खुदाई मिली उनमे हिब्रू में हस्ताक्षर नहीं हो सकते, फिर भी दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की मृत सागर की मूसासंहिता को छोड़ दें तो ये दस्तावेज हिब्रू लिपि के मौजूदा दस्तावेज हैं| यहूदी इस खुदाई को जरुर सम्भाल के रखेंगे क्योंकि ये उनकी भाषा की की प्राचीनता की निशानी है| या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि हिब्रू लिपि 50 ईसा पूर्व से 50 ईस्वी के बीच महोदय्पुरम के आसपास कहीं विकसित हुई, जब यहूदी यहाँ पर आजाद रहकर अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिए चिंतन करते थे| भारतीय राजा मानवीय बुद्धिमत्ता और विकास का सम्मान करते थे, इसी उपलब्धि के पुरस्कार में भारतीय राजाओं ने उन्हें पीतल पट्टिकायें दी हों जिसे बाद में अंग्रेजों ने चुरा लिया| कहीं ऐसा तो नहीं कि ये पीतल की पट्टियाँ हिब्रू में न होकर संकृत में रही हों?

क्या यही वजह रही कि इस दस्तावेज को अनुवाद के लिए थ्रिस्सूर यूनिवर्सिटी भेजा गया? कहीं ऐसा तो कि मूसासंहिता महोदय्पुरम या इसके आसपास लिखी गयी हों और बाद में उसे इजराइल ले गए हों और जब यहूदियों के लिए राजनीतिक हालत बिगड़े हं तो उन्हें डेड सी यानि मृत सागर के पास दफ्न कर दिया गया हो? या फिर ऐसा न हो कि ये मूसासंहिता भारत में ही महोदय्पुरम में लिखी गयी हो बाद में ये दावे किये गए हों कि ये दस्तावेज मृत सागर के पास गुफाओं में मिले? इन सवालों के प्राथमिक विचार वोन डोर्ट के सवालों से उठते हैं जिसकी हम आगे चर्चा करेंगे|

पुरुषोत्तमपुरी का अध्ययन केंद्र रहने तक इजिप्ट के शासक, विद्वान और आम लोग भी पर्शिया के रास्ते यहाँ तक आते रहे| पुरुषोत्तमपुरी के सागर में समां जाने के बाद उनका ध्यान महोदय्पुरम पर बना| उड़िया, बंगाली और हिब्रू में समानताओं से इस विचार को बल मिलता है कि इन सबका विकास रब्बानी यहूदीवाद के हजारों साल पहले हुआ जिसे उन्होंने बाद में कुछ परिवर्तनों के साथ पुनर्जीवित किया हो|

एक चीज तो स्पष्ट है, महोदय्पुरम के सम्राट ललितादित्य का जो नाम ब्रिटिश पूरी दुनिया से खास तौर पर हर भारतीय के मन से मिटाना चाहते थे, वह बदला लेने के लिए कोदुन्गल्लुर की हालिया पुरातात्विक खुदाई में सैकड़ों रोमन, इजिप्टीयन और अफ्रीकन सिक्कों, शहर के नक्शों, रोमन, अफ्रीकन और अरबी व्यापारियों द्वारा स्थानीय अध्ययन केंद्र/मंदिरों को भेंट किये गए तोहफों और तमाम दूसरी कलाकृतियों के साथ दोबारा जी उठा है| अगर ब्रिटिशों को सिक्कों की मौजूदगी का पता होता तो वे इस शहर और इसके मंदिरों को शायद सावधानी के साथ नष्ट करते और सारा इलाका जोत डालते| रोमन, इजिप्टीयन और अफ्रीकन सिक्कों की मियाद ईसा से पांच शताब्दी पहले के तीन अहम् तरीकों के बारे में बताती है|

  1. कश्मीर साम्राज्य या कहें कि भारतवर्ष जिसे आज इण्डिया के नाम से जाना जाता है के दक्षिण भाग में महोदय्पुरम एक बड़े अध्ययन केंद्र और व्यापारिक केंद्र के तौर पर मौजूद रहा| ये बात भी प्रमाणित होती है कि ये शहर सम्राट ललितादित्य ने ने बनवाया इसकी मियाद कम से कम पांच शताब्दी ईसा पूर्व यानि ईसा के पांच हजार साल पहले की है जो अंग्रेजों के 700 ईस्वी के दावे को गलत साबित करती है| इससे ललितादित्य के इतिहास के बार में कल्हण की सत्यता भी प्रमाणित होती है|
  2. इजिप्ट के सिक्के महोदय्पुरम के और भी ज्यादा पुराने इतिहास का संकेत करते हैं इनसे चेर/क्षीर राजाओं के हिमालय से कुमारी तक के क्षेत्र का संरक्षक होने का पता चलता है जिससे आर्य द्रविड़ संघर्ष की दूसरी कहानी भी मिथ्या साबित होती है|
  3. कल्हण के अनुसार महोदय्पुरम को सम्राट ललितादित्य ने बनवाया, समय और स्थान की प्राचीनता में ललितादित्य और शंकर की मियाद साबित होने के बाद महाभारत और दूसरी ऐतिहासिक घटनाओं भी ताकीद होती है| ये घटनाएँ कब, कहाँ और कैसे हुईं इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे|

अलग अलग धर्मों और संस्कृतियों के इन व्यापारियों ने जो तोहफे दिए वह इन मंदिरों और अध्ययन केन्द्रों के सम्मान प्रकट करता है, यह तथ्य शायद बहुसंख्यक भारतीयों को बर्दाश्त न हो सके जो अपने और ब्रिटिशों के अलावा बाकी दुनिया को  आतंकवादी मानते हैं|

भारतीय इतिहास की लीपापोती

कुछ साल पहले जब रोमिला थापर ने इस तरह के सभी तोहफों वगैरह का दस्तावेजीकरण किया तो उन्होंने एक लेख लिखा कि अरब और मुस्लिमों ने शायद सोमनाथ को नष्ट नहीं किया हो क्योंकि वे वहां रहे और उन्होंने वहां परिवार भी बसाए, उनके सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्ध भी रहे| तब रोमिला थापर को राष्ट्र विरोधी करार दे दिया गया, नास्तिक वामपंथी बताकर झूठ फ़ैलाने और भारतीय इतिहास की लीपापोती करने का आरोप लगा| उन्हें मुक्ति तब मिली जब पद्मनाभ मंदिर का खजाना खुला| उसके अन्दर रोमन, मिस्र, पर्शियन और अरब सभ्यताओं से ज्यादा प्राचीन सिक्के मिले| पद्मनाभपुरम से लेकर तिरुवनंतपुरम बनने तक कुलशेखर चेर राजाओं ने इन सिक्कों और दस्तावेजों को श्री पद्मनाभ मंदिर के खजाने में सुरक्षित रखा, ब्रिटिश खुफिया इस खजाने को खोजने और लूटने में नाकाम रही जिसकी कीमत आज ट्रिलियन डॉलर के ऊपर आंकी जाती है| भाग्य के फेर में आजाद भारत की सरकारों ने केरल के कम्युनिस्ट शासकों की तरफदारी करके मंदिर के खजाने को राज्य प्राधिकरणों को सौंप दिया जहाँ से ये खजाना कुछ ही वर्षों में ये ऐतिहासिक दस्तावेज कुछ ही वर्षों में अपने गंतव्य यानि ब्रिटिश नीलामी घरों तक पहुंचना तय है| यद्यपि पद्मनाभपुरम उन चेर राजाओं की राजधानी रही जिन्होंने सत्रहवीं शताब्दी में कुलशेखर और पद्मनाभ दास की उपाधि ग्रहण की| राजा राम वर्मा ने कुछ अनजान कारणों से अपनी राजधानी को 1795 ईसवी में पद्मनाभपुरम से बदलकर तिरुवनंतपुरम पहुँचाया|

वह तोहफा जो बदले में इजराइल ने भारत को दिया

चित्र 2

मोदी के इजराइल दौरे पर भारत को दो तस्वीरें मिलीं| उनमे से एक हस्ताक्षरित तस्वीर में दोनों नेता ओल्गा बीच पर खड़े हाँ जिसमे नेतान्याहू मोदी के लिए गहरी मित्रता की भावव्यंजना लिए नजर आते हैं| तोहफे में जो दूसरी तस्वीर मिली है उसमे ब्रिटिश सेना के उन भारतीय सैनिकों की बहादुरी दर्शाती है जिन्होंने 11 दिसंबर 1917 को जेरूसलम आजाद कराया| उस समय तो इण्डिया नहीं था न ही इजराइल देश अस्तित्व में आया था| सिर्फ बाल्फौर घोषणापत्र जारी हुआ था जिसमे यहूदी गृहराज्य की अवधारणा रखी गयी थी| तब सिर्फ ब्रिटिश राज था| इसलिए ये कहना ज्यादा उचित होगा कि वे ब्रिटिश सेना के सिपाही थे| सवाल है कि इजराइल ने ऐसा तोहफा क्यों दिया जिसमे आजाद भारत को छोड़कर कहीं भारतीयता नहीं दिखाई देती बल्कि इसमें ब्रिटिश श्रेष्ठता और भारत की ब्रिटिश गुलामी का साफ़ सन्देश है| यह ब्रिटिश सेना के उन गुलाम भारतीय सिपाहियों की तस्वीर है जिन्होंने जेरूसलम को आजाद कराया, न कि तब के आजाद भारतीय सैनिकों की तस्वीर जिन्होंने इजराइल को आजाद कराया जिसका कि तब अस्तित्व ही नहीं था| (संभवतः यह भी गज बाहू न्याय का सर्वश्रेष्ठ उदहारण है? या फिर यह भारतीय सैनिकों का सम्मान प्रदर्शित करती तस्वीर है जिसमे इस बात का कोई फर्क नहीं कि वे किसकी सेना में थे, इसलिए तोहफे में दी गयी?)

1948 तक इजराइल अस्तित्व में नहीं था| नए बने राज्यों में एरेत्ज़, इजराइल इत्यादि के तमाम नामों को नकार के इजराइल का नाम 1947 में तय हुआ| 1917 में ऑट्टोमन साम्राज्य अस्तित्व में था और वर्तमान क्षेत्र मिस्र अथवा सीरियाई शासन का हिस्सा हुआ करता था| ब्रिटिश नीतिकारों ने अरब में लॉरेंस सरीखे जासूसों का इस्तेमाल करके अरब जनजातियों का इस्तेमाल करके ऑट्टोमन के खिलाफ बगावत करायी|

उस दौरान तेल की खोज हुई थी इसलिए बगावत में ब्रिटिश ने युद्ध के बाद दखल दी ताकि वे पूरे मिडिल ईस्ट पर काबिज हो सकें| इस तरह हमारी दुनिया में नए कठपुतली गणराज्य बने और आज के इजराइल/फिलिस्तीन को उनका संरक्षक बनाकर और इसे फिलिस्तीन नाम दिया गया (इंडो पर्शियन भाषाओँ में इसे फालस्थान कहा जाता है)| इस तरह ऑट्टोमन साम्राज्य से आधुनिक टर्की, मिस्र, फिलिस्तीन बने और बाद में फिलिस्तीन पंद्रह छोटे छोटे गणराज्यों में बंट गया जिनमे से एक सऊदी अरब भी था| इन गणराज्यों को उपनिवेश के बाद के ब्रिटिश हितों के लिए रचा गया| फिलिस्तीन के इस संरक्षण क्षेत्र में उन्होंने अरब और यहूदी कबीले आबाद किये तब के फिलिस्तीन में यहूदी आबादी कुल जनसँख्या की 3% से 10% के बीच होती थी|धीरे धीरे ब्रिटिश संरक्षण में ब्रिटिश और इंग्लैंड के यहूदियों खासकर रोथ्सचाइल्ड के बीच हुए एक समझौते के तहत यूरोप से यहूदियों की घर वापसी बढ़ी| दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारत के विभाजन के बाद फिलिस्तीन का विभाजन हुआ| भारत की तर्ज पर इस विभाजन से फिलिस्तीन के यहूदी और अरब समुदायों के दो हिस्से हुए| फिलिस्तीन का यहूदी हिस्सा 1948 में इजराइल गणराज्य बन गया|

ब्रिटिशों के लिए मिडिल ईस्ट की आज़ादी भारतीय सिपाहियों ने कराई| यह आज के फसाद की जड़ है, क्योंकि इसमें तमाम राज रियासतें और वहाबी, सलाफी सरीखे इस्लाम के ताबेदार ब्रिटिश और अमेरिकी औजार बन गए| उन्हीं औजारों का इस्तेमाल करके बने सुन्नी जिहादियों के गिरोह ने हमारे कश्मीर को झुलसा दिया, इसके लिए हमारे पडोसी भाईजान  उनके मददगार बन गए| वहाबी-सलाफी-जिहादियों के इस अन्तराष्ट्रीय गिरोह के सामने और ज्यादा खूंखार शिया जिहादियों की कट्टरपंथी जमात खड़ी हुई उनके भी मददगार ब्रिटिश ही बने| आज वे सभी चीनी OBOR के लिए कश्मीर पर नजरें गड़ाए बैठे हैं|

सवाल है कि इजराइल के प्रधानमंत्री इन तस्वीरों से भारत को क्या सन्देश देना चाहते हैं? क्या इजराइल आज भी भारत को ब्रिटिशों का गुलाम मानता है? क्या ये तोहफा कल आज और आने वाले कल की दुनिया में हमारी हैसियत दिखाने की एक नजीर मानी जाए? क्या ये तोहफा दुनिया को ये दिखाने के लिए है कि हम कितने बुद्धू हैं? क्या हम इजराइल की मंशा को समझ पाने में कामयाब नहीं? इस तोहफे में ऐसा क्या है जिससे हम भारतीय राष्ट्रगौरव की अनुभूति करें? दो आजाद देशों की गहरी मित्रता का ये कैसा प्रदर्शन है? या फिर ऐसा है कि इजराइल वर्तमान में हमे हमारी स्थिति दिखाना चाहता है और उनकी मंशा ये है कि हम गुलामी की अवस्था से बाहर निकले|

भारत और इजराइल- स्वर्ग में रचा स्वयंवर!

एक प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नेतान्याहू बताते हैं कि भारत-इजराइल की दोस्ती “स्वर्ग में स्वयंवर” जैसी है, इस वाक्य ने भारत के तमाम राष्ट्रवादियों के दिल जीत लिए! नेतान्याहू के इस बयान में जो शरारत की बात है वह भारतीय बुद्धिमत्ता की पकड़ में नहीं आई|

यहूदी धर्मों के आपसी विवाहों को नहीं मानते कम से कम ये इजराइल में तो वैध नहीं| नेतान्याहू यहूदी मान्यता के एक कट्टर धार्मिक प्रधानमंत्री हैं क्या उनका यह बयान विश्व के भूराजनैतिक परिदृश्य में कहीं सार्थकता साबित करता है? जबकि भारत एक गैर यहूदी देश है तो उनके यह कहने का क्या मतलब है कि भारत की इजराइल से स्वर्ग में शादी हुई? उनके धार्मिक मन्त्र कहते हैं कि इजराइल ईश्वर की दुल्हन है और वे इजराइल के बच्चे हैं, इस सन्दर्भ में उनका बयान के क्या अर्थ निकलते हैं? इजराइल के दृष्टिकोण से भारत की क्या भूमिका बनती है?

जब इजराइल में बहुविवाह वैध नहीं हैं तो नेतान्याहू भारत और चीन के मामले में इस तरीके के बयान कैसे दे सकते हैं? इसे भद्दे मजाक के तौर पर लिया जाए या फिर ये किसी और चीज का इशारा है? शमा इजराइल या कहें कि सुनो ओ इजराइल नाम के एक यहूदी दैनिक समाचार पत्र में यह साफ़ तौर पर कहा गया कि इजराइल ईश्वर की दुल्हन है| इसका अर्थ ये हुआ कि इजराइल स्त्रीलिंग है|भारत में भी कुछ लोग भारत देश को भारतमाता कहते हैं| फिर इस बात का क्या अर्थ हुआ कि इजराइल के धार्मिक प्रधानमंत्री यह कहें कि एक महिला के रूप में उनका देश जो कि उनके ईश्वर की दुल्हन भी है भारतमाता से शादी कर रही है जो कि खुद एक महिला है?या फिर ऐसा है कि हम कुछ भी नहीं जानते? अथवा वर्तमान सरकार ने मदर इंडिया को फादर इण्डिया बना दिया?या फिर इन दोनों देशों के आजाद लोकतंत्र को प्रतीकात्मक रूप से समलैंगिक सम्बन्ध के तौर पर दिखाया जाए जो कि बड़े दायरे में हमारे आधुनिक सांस्कृतिक बदलाव का संकेत करता है? या फिर इजराइल के प्रधानमंत्री के बयान का अर्थ ये हुआ कि भारत उनके ईश्वर की दुल्हन हो गया इसलिए नैसर्गिक तौर पर दुल्हन के सभी गुणधर्म उनके बाप के हुए?

या फिर क्या उन्हें पता है कि ज्ञान की खोज में लगी भारतीय सभ्यता में सम्पूर्ण धरती को ईश्वर की दुल्हन कहा जाता है? क्या वे ऐसा करके हमे अपने देश के साथ साथ इजराइल का ख्याल रखने की नसीहत देते हैं क्योंकि उनके देश इजराइल को भी ईश्वर की दुल्हन कहा जाता है?

सामान्य तौर पर पूरी धरती को विष्णु की दुल्हन कहा जाता था|लेकिन तमाम भारतीय सिर्फ ब्रिटिशों के बनाये भारत को ही भारतमाता मानते हैं जो कि विष्णु की दुल्हन है| हमारे सांस्कृतिक इतिहास के मुताबिक जब जब धरती ने पर्यावरण अथवा आबादी के विनाश से आहत हुई तो उसने अपने पति से शिकायत की और उन्होंने मसीहा के रूप में अवतार लिया दुनिया को बचाया| यही अवधारणा यहूदियों में भी मौजूद है, इजराइल ईश्वर की पत्नी है और वे आखिरी समय में दुनिया को उथल पुथल से बचने के लिए एक मसीहा भेजते हैं और शांति की दुनिया बनाते हैं जिसे जेरूसलम कहा जाता है| यह पैगम्बर इस सृष्टि के आखिरी समय में आते हैं जिसका समय सात हजार साल पहले का है| इसके मुताबिक यह दुनिया इस समय चक्र के अंतिम 1000 सालों में पहुँच चुकी है| इन्हें सेप्टूजिनेरियन अथवा प्रोफेटिक अथवा अपोकैल्पिटीक अथवा इस्सैन यहूदी कहा जाता है और अब्राहम के पहले असली यहूदीवाद इसे ही मानते थे|

हिंदुत्व की तरह ही रब्बानी यहूदीवाद चर्च द्वारा रचा गया जो कि इसे स्वीकार करता है लेकिन उनके आकलन में इस चक्र का गुजरा हुआ समय लगभग पांच हजार सालों का होता है या फिर उससे भी पचास साठ साल पहले का जैसा कि चर्च वाले मानते हैं| यही शक्तिशाली भविष्यवाणी साबित मानी गयी जिससे यहूदियों के पैगम्बरों ने मसीहा की खोज तब तक जारी रखी जब तक रब्बानी यहूदीवाद को इजराइल का राजधर्म नहीं घोषित कर दिया गया| बाद में अट्ठारहवीं शताब्दी में यह ज़िओनिस्म के साथ घुल मिल गयी| इन यहूदी पैगम्बरों ने ध्यान और उपासना करते हुए सादा जीवन जिया और धैर्यपूर्वक मसीहा का इंतजार करते रहे| सावधानीपूर्वक खगोलीय बारीकियां देखते हुए उन्होंने अपने जीवन प्रार्थना में व्यतीत किये| वे सच को कहने में कभी संकोच नहीं किये और जब जब उन्हें निष्कासित किया गया वे अपनी किताबों के साथ सीधे पुरुषोत्तमपुरम अथवा कश्मीर या महोदय्पुरम पहुंचे| चूँकि महोदय्पुरम, पुरुषोत्तमपुरम और कश्मीर में भीमकाय वेधशालाएं थीं इसलिए बिना किसी अपवाद के यहूदी पैगम्बरों और वैज्ञानिकों ने इसके इर्द गिर्द अपना जमावड़ा लगाया| जब चर्च ने इसाई उत्पीडन या यहूदियों की सामूहिक हत्याएं हुईं चर्च ने यहूदियों को न केवल यूरोप में शिकार किया बल्कि दुनिया भर में खोजकर उनकी हत्याएं कीं| इसकी वजह यही थी कि इस्सैन यहूदियों के सृष्टि के सृजन औरन अंत के तथ्य और समय चक्र के अनुमान रोमन, क्रिस्चियन अवधारणाओं के अनुरूप नहीं थे, सम्राट ललितादित्य द्वारा प्रचलित की गई सूर्य उपासना की मैत्री अवधारणा पर्शिया में मौजूद थी|

रब्बानी यहूदीवाद ने जेरूसलम को राजधानी बनाया क्योंकि उनका मानना है कि इसे इजराइल की राजधानी घोषित करने के साथ ही भविष्यवाणी पूरी होती है और इस प्रकार मसीहा आता है और यही अंतिम समय होता है| समय के अंत की यही अवधारणा दुनिया की सभी संस्कृतियों में व्याप्त है| इस्लाम में ऐसा कहा जाता है कि जिब्राइल ने मोहम्मद को लकड़ी की संदूक दी और उसे इस तरह दफ़नाने को कहा कि कोई आदमजात इसे पा न सके| लेकिन अक्टूबर 2015 यह वह समय था जब सऊदी सरकार मोहम्मद की पत्नी खदीजा की बनवाई मस्जिद की मरम्मत करवा रही थी और तीर्थयात्रियों के लिए शौचालय का विस्तार हो रहा था तब जिब्राइल का यह संदूक खोज निकाला गया| इस्लाम के मुताबिक इससे आखिरी समय का संकेत हुआ है| रब्बानी यहूदियों ने बदली हुई गणनाओं को देखकर जेरूसलम को इजराइल की राजधानी घोषित कर दिया| तमाम विरोधों के बावजूद हुई इस घोषणा का ट्रम्प ने समर्थन किया| गौरतलब है कि ट्रम्प फ्री मेसन हैं जिन्हें चर्च की शाह हासिल है| यहूदीवाद के मुताबिक अंत का समय नजदीक है और मसीहा आने वाला है| इसका एक और संयोग बहाउल्लाह के अनुमान से मिलता है कि 2024 में वर्तमान ईसाई युग का अंत होगा और दुनिया को बचानेवाला आएगा| इसकी विस्तृत चर्चा के लिए हमारे आगामी लेख जेरूसलम राजधानी और अंतिम समय की पहेली और मसीहा को देखें|

अगर ऐसा कहा जाता है कि भारत और इजराइल का स्वर्ग में स्वयंवर हो चूका है तो क्या इसका अर्थ ये निकाला जाए कि दोनों की शादी एक ही ईश्वर से हुई है? क्या इजराइल इन्हीं समानताओं का संकेत दे रहा है कि ये समानताएं ऐसी तयशुदा हैं कि भारत को भी वही करना होगा जो इजराइल करे, भारत भी सत्य और उनके इतिहास की खोज  खोये हुए पैगम्बरों की खोज और सांस्कृतिक इतिहास की खोज करें| वजह साफ है दोनों को एक ही शक्तिशाली समूहों ने बर्बाद किया है, इसलिए सत्य की खोज करना और सत्य के लिए लगनशील होना मानवता को बचने के लिए जरुरी है और उस धरती को भी बचाने के लिए जिसे ईश्वर की धरती कहा जाता है|

इसका दूसरा पहलु ये भी है कि शायद यहूदी जानते हैं कि भारत के इतिहास के साथ क्या हुआ? शायद उन्हें अपने इतिहास के साथ हुए अतिक्रमण का भी पता हो| उन्हें ये भी मालूम है कि मनोवैज्ञानिक, मानसिक तौर पर निराश रहे राष्ट्रवादी कैसे अपने मिट रहे इतिहास को बचाने और पराजय को विजय में बदलने के लिए पट्टिकाएं अपने पास सुरक्षित रखी हैं| इजराइल के लोगों को ये भी पता है कि इतिहास के बगैर बने झूठे स्वाभिमान का रवैया कितना भ्रामक और खतरनाक होता है|

जिस तरह ताम्र पत्रों के तारीखों की जालसाजी वास्तविक प्राचीन इतिहास की मजबूती और उसके मिटाए जाने गवाही देती है, वैसे ही अगर इन तस्वीरों का सही अर्थो में अध्ययन करके सवाल खड़े किये जाएँ तो हमे अपने इतिहास को सही अर्थों में समझने का रास्ता मिलेगा| यही रास्ता भविष्य की दुनिया में भारत की भूमिका तय करने में मददगार साबित होगा|

यह निराशाजनक है कि भारतीय मेधा का ऐसा दिमागी फितूर रचा गया कि भारतीय अरबों के खिलाफ युद्ध नहीं जीत सकते और हमारी मानसिक तसल्ली के लिए हमे बदला लेना ही है| लेकिन इसका हल इतिहास मिटा देने से नहीं निकलने वाला इतिहास मिटाने की यह हरकत ब्रिटिशों की कोरी कपोल कल्पना भर थी| अगर हम भारत के असली इतिहास की खोज कर सकें और उसको फिर से स्थापित कर सकें तो तमाम कपोल कल्पनाएँ हवा में उड़ जाएँगी जिनको ब्रिटिशों के रट्टू तोते इतिहासकार आज भी रटे जा रहे हैं| इसके बाद ही हम अपनी असहाय रहने की राष्ट्रीय हताशा से बाहर निकल सकेंगे| ऐसा करने से हम ब्रिटिशों पर शाश्वत निर्भरता से भी छुटकारा पा सकेंगे| यदि हम सामान्य ऐतिहासिक पराजयों को मिटाते हैं और उन्हें मनमाफिक विजय में बदलते हैं तो भी यह वैसी ही गलती होगी जो तमाम देशों के वामपंथी करते हैं जिसकी वजह से गुलाम बनाने वाले पश्चिमी गिरोहों ने उन देशों के मानवीय और अन्य संसाधनों की बेतहाशा लूट आज भी जारी रखी है| फिर भी अब हमे अपने तमाम संसाधनों के भरोसे सही दिशा में काम करने की उम्मीद करनी चाहिए|

ओ हेनरी ट्विस्ट द ब्रास/कॉपर प्लेट्स डेटेड टू 727-722 बीसी

संत गाद की खोई हुई पहचान और उनके महान कार्य

कुछ दो सौ साल पहले, जर्मनी में एक पहेलीनुमा दस्तावेज प्रकाशित हुआ; जिसके बारे में कोई नहीं बता कि इसमें झूठ क्या है और सच क्या है| ये काम जे.जी. ईकोर्न ने किया| वे आधुनिक बिब्लिकल स्कालरशिप के संस्थापक माने जाते हैं| उन्हें ये दस्तावेज मिला भारत में कोचीन के यहूदी समुदाय से, कैसे मिला ये बात स्पष्ट नहीं|  इस प्रकाशित दस्तावेज ने तमाम लोगों के होश उड़ा दिए| जल्द ही इस दस्तावेज का हिब्रू में अनुवाद किया गया| उस समय के एक मूर्धन्य विद्वान नाफ्तली हेर्ज़ वेस्सेली ने इसका अनुवाद किया| वेस्सेली ने न केवल इस दस्तावेज का अनुवाद किया साथ ही उन्होंनेदस्तावेज में मौजूद वाक्यांशों की एक व्याख्या भी लिखी| उनका ये लेख हिब्रू की सबसे पहली पत्रिकाओं में से एक हामीअसेफ़ में प्रकाशित हुआ| अपने इस लेख को उन्होंने भौगोलिक खोजों के साथ शुरू किया जिन्होंने दुनिया की एक नयी अवधारणा सामने रखी| उन्होंने वे तथ्य सामने रखे जो शायद दस खोयी जनजातियों की खोज में मदद कर सकें| उनकी चर्चा ईकोर्न की मूल विषयवस्तु की भूमिका जैसी थी जिससे कोचीन में यहूदियों के इतिहास की चर्चा होती है|

वेस्सेली के अनुसार यह प्रमाणिक दस्तावेज मर्सलस ब्लेस ने दिया| मर्सेलस ब्लेस डच ईस्ट इण्डिया कंपनी का एक क्लर्क था| इस आदमी को ये जानकारी मिली लियोपोल्ड ईम्मानुएल जैकब वोन डोर्ट नामक एक कनवर्टेड यहूदी से| बताया जाता है कि 1757 में वोन डोर्ट ने ये सूचनाएं कोचीन के यहूदियों के प्रमुख की एक किताब से नक़ल करके हासिल कीं| वोन डोर्ट को ये जानकारी रुचिकर लगी तो उसने इसका डच में अनुवाद करके सीलोन में एक दूसरे क्लर्क को दे दिया| तीस सालों गुजरने के बाद रुएत्ज़ नामक आदमी ने इन जानकारियों का डच से जर्मन में अनुवाद किया| अनुवाद करके जब उसने एकोर्न की पत्रिका में इसको प्रकाशित किया गया तब पता लगा कि ऐसे भी लोग मौजूद रहे और उनके बारे में नाम मात्र की जानकारी मौजूद है|

इस तरह की हिब्रू, डच, जर्मन, हिब्रू (और फ़िलहाल की अंग्रेजी) अनुवादों की श्रंखला असामान्य बात है लेकिन ये असामान्य प्रमाणिक दस्तावेज की सच्चाई तो है ही| किसी भी घटना में कोचीन के यहूदियों के इतिहास में एक अद्वितीय बात मिलती है, उनमे से कुछ लाइनों ने हमारा भी ध्यान खींचा| उसके मुताबिक “कोचीन के यहूदियों के पत्रक” में लिखा है कि उनका खास इतिहास अश्शूर के राजा शालमानेसेर द्वारा निष्कासित किये जाने के बाद शुरू हुआ, राजा ने एलाह (2Kgs 17:1 ff) के बेटे होशेया के नौवें साल में  सामरिया पर को हराया| शालमानेसेर ने 460 यहूदियों को यमन भगा दिया, और पत्रक कहता है कि:

“निकाले गए लोग अपने साथ मूसासंहिता तोरा, जोशुआ की किताब, रुथ की किताब, जजों की किताब, और सैमुएल की दूसरी किताब और १. राजाओं की किताबें २. सोलोमन के गीतों के गीत, डेविड, अस्सफ़, हेइमान और कोरा के बच्चों के हल्लेल के गीत, कहावतों, सोलोमन के पुरोहितों के साथ उनके रहस्य, गाद, नाथन, षेमैयाह और अहिजाह की भविष्यवाणियां सदियों पुराना काम, जोनाह और यशायाह इत्यादि लोग अपने साथ वहां (यमन) लेकर पहुंचे|

ईसा के 727 से 722 साल पहले शालमानेसेर पंचम अश्शूर के राजा हुए| पहले वे ज़िमिर्रा के गवर्नर के रूप में प्रकट होते हैं| यह इलाका उनके पिता तिग्लाथ-पिलेसेर तृतीय के शासन क्षेत्र फोएनिसिआ में था| उनके शासन के दुर्लभ और दुष्प्राप्य हैं|

727 में तिग्लाथ पिलेसर की मौत के बाद तेबेत के के पच्चीसवें दिन उसने अश्शूर की गद्दी संभाली| गद्दी संभालकर उसने अपना नाम असली नाम उलुलायु की जगह अक्कादियन रखा, तब से उसे इसी नाम से जाना जाता है| ऐसा भी समझा जाता है कि उसे ऐसे सुझाव दिए गए कि वह उलुलायु का नाम बेबिलोनिया के राजा के तौर पर करे, इसे किसी भी प्रमाणिक अधिकारिक दस्तावेज में नहीं पाया गया|

उसके उपनाम शालमानेसेर को बाइबिल के लिए प्रयोग किया जाता है| उसके नाम सामरिया की विजय करके इसरायली लोगों को वापस भेजने का भी श्रेय दर्ज है|

अगर उपरोक्त कहानी का यह संस्करण सच है तो यहूदी ईसा के ७२७-७२२ पहले महोदय्पुरम पहुंचे| उस समय इस हिस्से को इजराइल नहीं बल्कि समरिया साम्राज्य के नाम से जाना जाता था (गौरतलब है कि समर एक इंडो-पर्शियन मूल का शब्द हैजिसका अर्थ है युद्ध भूमि, सम्राट का अर्थ है राजा, भारत और मिडिल ईस्ट में परिवारों के उपनाम समर हैं)|

कोचीन के यहूदियों के पत्रक के मुताबिक निष्कासित यहूदियों के ये 72 परिवार महोदय्पुरम पहुंचे तो वहां के गवर्नर चेरमण पेरुमाल द्वारा उनका स्वागत किया गया विशेषाधिकार दिए गए और उन्हें वहां बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया| ऐसा उन पीतल या तांबे की पट्टियों में लिखा मिला है| यहूदियों के भारत आये समूह के पास उनके काम और किताबें थीं, जिनमे तोराह, जोशुआ, रुथ और जजेस की किताबें थीं| ये किताबें और उनके सैद्धांतिक पहलू रब्बानी यहूदीवाद के नहीं हैं| लेकिन किताबों के क्रम की प्रमाणिकता सेप्तुआजिंट के प्रचलित पाठ और आधुनिक अनुवाद में मिलती है|

इस किस्से में एक और ट्विस्ट है, जो बाद में मनगढ़ंत साबित हुआ| ऐसा कहा गया कि निष्कासित यहूदी पांच सौ सालों तक यमन में रहे और जब यमन के राजा ने उनकी किताबें जब्त कर लीं तो उन्होंने दस दिन का उपवास किया, उसके बाद उनकी किताबें वापस मिलीं तो वे महोदय्पुरम/मालाबार चले गए| अगर ये किस्सा भी सच है तो भी इन नबियों या कहें की रहस्यमय यहूदियों की तारीख ईसा से लगभग 220 साल पहले की होती है|

लेकिन तमाम बिब्लिकल स्कॉलर और अनुसंधानकर्ता इस बात को नहीं मानते| उनका कहना है कि जिस जिस घटना का यमनी यहूदियों के लिए जिक्र है वह कभी हुई ही नहीं| यह घटना जिसका श्रेय यमनी यहूदियों को जाता है वह कोचीन में पुर्तगालियों के शासन के दौरान हुई|  उनके भारत आगमन की तारीखें बदलने का काम रबानी अथवा बिब्लिकल इतिहास के लिए किया गया|

ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि यहूदियों के साथ इसी तरह की एक घटना के 1505 में कोचीन में हुई, न की यमन में| प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेजों के पुर्तगाल से खरीदकर लायी गयी मुताबिक तोराह की मूसासंहिता कोचीन के यहूदियों को बेच दी गयी, जिसे बाद में जब्त किया गया| इसका भी जिक्र मिलता है कि लिए पुर्तगाल के राजा ने इस काम के लिए कोचीन के वाइसराय को फटकार भी लगाईं क्योंकि उसकी वजह से किताबें लौटानी पड़ीं|

जो भी हो, यहूदियों के पत्रकों में इस बात का जिक्र जरुर मिलता है कि उनके पास संत गाद की हजारों साल पहले खोयी हुई भविष्यवाणी और किताबें मौजूद रहीं| यह अहम् खोज न केवल महोदय्पुरम आने वाले किसी भी मजहब के संतों और धर्मगुरुओं की प्राचीनता का एक सबूत है बल्कि इससे यहूदियों की असल परम्पराओं का भी पता लगता है जो आज के रब्बानी या कहें कि ज़िओनिस्म से बहुत अलग है| प्राचीनकाल के अधिकांश यहूदी या कहें कि एस्सेन यहूदी अपने नबियों के उपदेश मानते थे और साधना और उपासना में व्यस्त रहते थे| कोई स्थायी बस्ती न होने के कारन वे ऐसे फक्कड़ सन्यासियों जैसे थे जो सत्य की खोज में भटकते रहते थे| वे क़यामत के बारे जानते थे और लोगों को इस सत्य का उपदेश देते रहते थे, उन्हें उस मसीहा का इंतजार था जो आआएगा तो जेरूसलम के आतंरिक और बाहरी मामलों में शांति और समृद्धि का युग लायेगा|

इसका अर्थ ये हुआ कि चेरमण पेरुमाल भाष्कर रवि वर्मा भी ईसा के 727-722 साल पहले हुए न कि 1025 में जैसा कि जिक्र किया गया है| यहूदियों की पत्रिका में बयान की गयी कोचीन के यहूदियों की घटनाएँ क्रमशः 894, 907, 1416, 2000 और 2100 में हुईं (जिनकी शुरुआत संभवतः ईसा से 311 साल पहले हुई)| ब्रिटिश और दूसरे इतिहासकार जो इतिहास में घालमेल करना चाहते हैं उनके मुताबिक हमें बाद की तारीखों को सत्य मान लें, जिनमे अट्ठारहवीं शताब्दी का पता चलता है| इससे ये जाहिर होता है यहूदी अपनी सारी किताबें लेकर बारहवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत आये| लेकिन कुछ यहूदी अध्येताओं के अनुसार कोचीन के यहूदियों और उनके ताम्र पत्रों की बहस दो शताब्दी पुरानी है| आज ऐसा माना जाता है कि वे 1000 साल पुरानी हैं| ऐसा मालूम होता है कि साहित्य की ऐतिहासिकता को लेकर लेखक ने तथ्यों और तारीखों को लेकर संशय बनाया दिया हैं| कोई भी ये सवाल करने को भी तैयार नहीं कि अगर यहूदी बारहवीं शताब्दी में आये तो फिर उन्हें ये ताम्र पत्र  1000 ईस्वी में कैसे मिल गए?

खैर कुछ भी हो, ऐसा लगता है कि जिन वर्षों का ऊपर जिक्र किया गया है वे तारीखें यहूदी पत्रक की परंपरा के मुताबिक हैं जिनमे आम तौर पर हर वर्तमान सृष्टि की शुरुआत से जोड़कर गणना की जाती है, उनके मुताबिक वर्तमान सृष्टि 6000 से 7000 साल पहले शुरू हुई| तारीख तय करने की ये परंपरा किन वजहों से ईसाई तरीके में तब्दील हो गयी इसका पता नहीं लेकिन ये समय सृष्टि का नहीं बल्कि जीसस क्राइस्ट के जन्म का है जो कि ईसा के जन्म की पहली शताब्दी से लिया जाता है| इसी तरह ताम्र पत्रों की तारीख या तो 1650 अथवा 1000 ईस्वी और भी बहुत कुछ बताया जाता रहा| अगर हम इस मार्ग का भी अनुसरण करते हैं तो तारीखें 2000 और 2100 साल पहले जाती हैं जिनका कोई मतलब नहीं, क्योंकि 1650 में जब रब्बान परिवार के आखिरी सदस्य का देहांत हुआ तो इसे यहूदी परंपरा के सृजन का 5410वां साल माना गया|

यहूदियों के पत्रक के अंत में लिखा है कि “सृजन के 5410 वर्ष में, क्रिस्चियन के 1650 में, रब्बान परिवार के आखिरी सदस्य की मृत्यु हुई, उसका नाम योशया (था), वह मालाबार के यहूदियों का कुलपति था जो कि कालीकट (जो कि कोचीन से बहुत ज्यादा दूर नहीं है) में रहता था|”

सृजन के 5410वें साल का मतलब है ईसा के 3760 साल पहले| यहूदी इस साल को अब्राहम और यहूदियों के तमाम कुलपतियों की शुरुआत का साल मानते हैं| तमाम विद्वान मानते हैं कि आज के राज्य, संत और मनीषि सृजन के कम से कम सौ सालों बाद बने| तमाम विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि इस युग के राज्य, संत और मनीषियों की महोदय्पुरम के साथ सम्बन्ध और भी पहले के हैं जिनका लिंक स्पष्ट नहीं है| या टाइम फ्रेम क्या था और ये सम्बन्ध कितने पुराने हैं इसकी चर्चा हम आगे करेंगे|

यहूदी परंपरा के कालक्रम में वर्णित 894, 907, 1416, 2000 और 2100 की उपरोक्त तारीखें क्रिस्चियन एरा के मुताबिक क्रमशः 2866 बीसी, 2853 बीसी, 2344 बीसी, और 1760 बीसी की हैं| इससे सिर्फ ये संकेत मिलता है कि इस कालखंड में दुनिया के मिडिल ईस्ट हिस्से से संतों और मनीषियों का आवागमन उस हिस्से में बड़े पैमाने पर हुआ जिसे महोदय्पुरम कहा जाता था| अचम्भे की बात तो ये है कि बिना किसी तर्क या वजह के तारीखों की घालमेल की गयी ताकि हर बात इतिहास के 2000 साल के कालक्रम में समेटी जा सके| ये भी गौरतलब है कि इसे ही साबित करने के भ्रामक बौद्धिक अभ्यास आज भी जारी हैं|

निष्कासन के पहले के यहूदी पत्रक हिब्रू भाषा में संरक्षित किये गए, जोस बिन हलाफ्ता द्वारा 160 ईस्वी में लिखे गए सदर ओलम रब्बह में दुनिया की सृष्टि का समय ईसा के 3761 साल पहले का है जबकि सदर ओलम जुत्ता के मुताबिक ईसा से 4339 साल पहले का| चौथी शताब्दी में हिल्लेल द्वितीय ने यहूदी कैलेंडर के मुताबिक सृष्टि का समय ईसा से 3761 साल पहले तय किया|

इसलिए हम इस बात पर निश्चित नहीं हों कि कोचीन के यहूदी अपने कालक्रम कैलेंडर के 3761 वर्ष वाले संस्करण को मानते हैं या नहीं|

सबसे पहले के तमाम जो सेप्टूजिंट का अनुसरण किया उन्होंने सृष्टि के सृजन की गणना ईसा के 5500 साल पहले से की| और मध्यकाल तक ईसाइयों ने इस अनुमानित समय का प्रयोग जारी रखा, इनमे से क्लेमेंट ऑफ़ अलेक्सांद्रिया (5592 बीसी), अन्तिओच के थेओफिलस (5529 बीसी), सेक्स्टुस जूलियस अफ्रिकैनुस (5501 बीसी), रोम के हिप्पोलिटस (5500 बीसी), टूर्स के ग्रिगोरी (5500बीसी) अलेक्सांद्रिया के पनोडोरस(5493), मैक्सिमस द कोन्फेस्सर (5493), जॉर्ज सिन्सल्लुस(5492 बीसी), सुल्पिसिअस सवेरुस(5469), सेविल्ले के इसिडोर(5336), प्रमुख हैं| बाईजैनटाईन कैलेंडर का सृष्टि की उत्पत्ति का परंपरागत अनुमान सितम्बर में ईसा से 15509 साल पहले का है|

यूसेबिउस के पत्रक की बताई गयी सृष्टि की उत्पत्ति की तारीख ईसा से 5228 साल पहले की है जबकि जेरोम (क्रिस्टियन एरा 380, कांस्टेंटिनोपल) ने सृष्टि के उत्पत्ति की तारीख 5199 बताई रोमन शाही की क्रिसमस के दिन की शहीदी स्मृतिकाओं के विषय में इस तारीख का प्रयोग किया जाता रहा जैसे चार मालिकों के आयरिश एनल्स|

यहूदी ज्योतिषियों में बडे का नाम अहम् है, वे ऐसे ज्योतिषी थे जिन्होंने सेप्टूजिंट के तारीखी जरीब को तोडा| उनके काम का जिक्र उनकी कृति डी टेम्पोरिबस (ऑन टाइम) (ये काम 703 ईस्वी में पूरा हुआ) में मिलता है| इसमें सृष्टि की तारीख 18 मार्च 3952 ईसा पूर्व का बताया गया है|

अर्माघ के आर्चबिशप हुए जेम्स उस्शेर| उन्होंने किताबी कालक्रम को मजबूती से समझकर कहा कि सृष्टि का सृजन ईसा से 4004 साल पहले का है| जैसे ही इन कालक्रमों और सृजन की तारीखों का एकीकरण किया गया इतिहास के किरदारों और उनके कालखंडों का घालमेल हो गया| इससे एक बात से साबित होती है कि चर्च और ब्रिटिश ऐतिहासिक कालखंडों के घालमेल में बड़े माहिर थे| वे अपनी मर्जी की कालगणनाओं को अपनी सुविधा और काबिलियत से तय कर लेते थे|

शायद यहूदी इस बात के लिए उकसाए गए थी कि वे अपनी कालगणना को छोड़कर नए तरीके को सीखें| ये तरीके सीख के अपनी कालगणनाओं को इसके मुताबिक बयान करें इसके लिए उनके ऊपर भारी दबाव था और कोई विकल्प भी नहीं था साथ ही साथ चर्च के अधीन रहते हुए लगातार उत्पीड़न का सिलसिला था|

कोचीन के पत्रक या किताबें निश्चित रूप से बड़े काम की हैं| यहूदियों और क्रिस्चियन दोनों लोगों के इतिहास में सच्चाई की एक लहर उठनी तय है| वे भारतीय इतिहास या यहूदी इतिहास के प्रचलित तमाम कथानक या मिथकों की कहा सुनी को मिथ्या साबित करने वाले हैं| क्या यही वजह है कि इन किताबों के साथ साथ असल भारतीय साहित्य की खोज जरुरी है| क्या इसी वजह से उन किताबों को खोजकर बर्बाद कर देना भी जरुरी है ताकि चर्च के स्वीकार किये गए उनके तमाम संस्करण बने रहें?

कुछ यहूदी अध्येताओं ने ताम्र पत्रों और उनसे जुडी किताबों को दो सौ सालों तक पढ़ा| उनके मुताबिक वोन डोर्ट के बाद दूसरी विस्फोटक सुचना कोचीन के पत्रकों से आई| वह सुचना यह थी कि ताम्र पत्रों की लिपि तमिल के वर्णाक्षर से मिलती है(जबकि एक सत्य ये भी है कि तमिल लिपि तो अट्ठारवीं उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश की मदद से ईजाद हुई, इसकी बुनियाद सृजन के आर्यन कथानकों पर आधारित थी)| विद्वानों का कहना है कि प्राच्य अथवा परंपरागत तमिल लिपि इंडो-ब्राह्मी लिपि के वर्णाक्षर से मिलती है| ये भी अचम्भे की बात होगी कि हिब्रू लिपि, वह नहीं जो कि इस समय चल रही है और अट्ठारहवीं सदी में ईजाद हुई है, भी ब्राह्मी से मिलती जुलती है| सच बात तो ये है कि हर सिमेंटिक भाषा की हर लिपि में भारतीय भाषाओँ की ब्राह्मी लिपि के निशान खोजे जा सकते हैं| इसका मतलब साफ़ है कि हिब्रू और तमिल दोनों भाषाओं की लिपि एक जैसी है और ये महोदय्पुरम के पास ही विकसित हुईं| इनकी मियाद मृत सागर के पास मिली मूसासंहिता से ज्यादा पुरानी है| इसी से हिब्रू और अन्य लिपियों का निर्माण हुआ| इसलिए भी तमाम आधुनिक पूर्वी लिपियाँ तमिल, सिंहला, उड़िया, थाई जैसी भाषाओँ की लिपियों से बनाई गयी हों| क्या यही वजह है जिसके चलते पीतल की प्लेटों को आम जनता और अध्येताओं के लिए नष्ट कर दिया गया और ताम्र पत्रों को ठीक उसी जगह से काट दिया गया जहाँ हस्ताक्षर मौजूद थे? अगर उपरोक्त दावे सत्य हैं तो फिर आर्य द्रविड़ बंटवारे का सवाल ही नहीं होता, साथ ही ये सिमेंटिक और गैर सिमेंटिक बंटवारे की भी की जगह नहीं जो इजराइल गणराज्य के बंटवारे का सबब बनी और जिसके चलते जेरूसलम में रब्बानी, जिओनिस्ट जैसे संस्करण पनपे| इससे हिब्रू लिपि की प्राचीनता भी साबित होती है जो महोदय्पुरम के पास विकसित हुई| इससेये भी साबित होता है कि लिपि के विकास का समय सृजन के यहूदी और क्रिस्चियन संस्करण के पहले का है| दुनिया भर में साइबेरिया से दक्षिणी अमेरिका और आर्कटिक से अन्टार्टिक तक के ज्ञान और बुद्धिमत्ता और संस्कृति का स्रोत अकेली यही संस्कृति साबित होती है| 2000 सालों से ज्यादा समय से इस एकात्मता को खण्डित करने के प्रयास लगातार होते रहे हैं| इन प्रयासों में तमाम विरोधाभासों के साथ साथ मजहबी प्रतिस्पर्धा, सांस्कृतिक और भाषाई बंटवारों में फूट डालो और राज करो के साथ साथ शोषण की मंशा साफ़ साफ़ दिखाई देती है| दुर्भाग्यवश भारत में यह एकात्मता पिछले पांच सौ सालों से टूटती रही है| इसकी शुरुआत पुर्तगालियों के पश्चिमी तट के विनाश से हुई जिसे बाद में ब्रिटिशों ने अंजाम दिया जिससे हमारे वर्तमान में सामाजिक राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व का जीवन भी बेदाग़ नहीं बचा|

इतिहास की यह हालत, ऐतिहासिकता कहें या घटनाओं की मजाक बनी तारीखें, राजाओं के ऐतिहासिक किरदार उस भारत के हैं जहाँ दुनिया भर के संत मनीषि स्वयं और मानवता के भविष्य के लिए सत्य की खोज में आते रहे| ये कैसी दर्दनाक स्थिति है, अपनी बौद्धिक, मानसिक और समझदारी के मामलों में गिरते गिरते हम कहाँ पहुँच गए हैं!

निष्कर्ष:

वर्तमान सरकार महाभारत युद्ध और रामायण जैसे तमाम ऐतिहासिक पहलुओं की पहचान करने और साबित करने जैसे कई सराहनीय कार्य कर रही है| लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हमारी सरकार हमारे अपने इतिहास में मौजूद इलियट जैसों की रची उन कपोल कल्पनाओं को दूर करे| इन कपोल कल्पनाओं के चलते भारत के लाखों सालों का विकास संकुचित होकर ब्रिटिश निर्मित भारत की सीमाओं भर का रह गया है| इसके बावजूद कि 2200 साल पहले सम्राट ललितादित्य द्वारा बनाये गए शहर महोदय्पुरम के रोमनों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध रहे हों, वेदों का 2000 साल पहले लिखे जाने के ऐतिहासिक दावे सत्य नहीं हो सकते, वेदों को महाभारत युद्ध के बाद लिखा गया| इसलिए जब तक हम इतिहास के ब्रिटिश संस्करण की समय सीमा की समस्या को नहीं सुलझाते हम अपने तमाम ऐतिहासिक आंकड़ों का वास्तविक समय सुनिश्चित नहीं कर सकते| ऐसा नहीं करने पर हम अपने इतिहास के साथ वही गलती करेंगे जिसमे ब्रिटिशों ने महाभारत युद्ध की का समय 3332 वर्ष पूर्व और वेदों का कालखण्ड 2000 वर्ष पूर्व नियत करके की है| भारत में लेफ्ट राईट और सेंटर की रचना करके ब्रिटिशों की मंशा सत्ता शक्ति के संतुलन की व्यवस्था बनाने में रही लेकिन हमारे सामूहिक बौद्धिक बौद्धिक बेसुरेपन के निदान के लिए यह जरुरी है कि हम निष्पक्ष और तार्किक मानक तय करें इसलिए यह वामपंथी विद्वानों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वे महज विरोध करने के लिए विरोध न करें| वास्तविक अर्थों में देखा जाये तो इस बौद्धिक बेसुरेपन के शिकार हम सभी हैं जिन्हें नहीं पता कि क्या किया जाये, अथवा कैसे तय करें अथवा सत्य की खोज के लिए कहाँ जाएँ सत्य को हम खुद क्यों नहीं खोज सकते| हम सभी को इस उम्मीद के साथ इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए|

 

 

 

Share:
error: Content is protected !!